केजरीवाल से फर्जीवाल बनने का मनोरंजक सफर

1450092_345009415640903_142333322_nअभिषेक रंजन
ना-ना करते प्यार, तुम्हीं से कर बैठे, करना था इंकार, लेकिन इकरार, तुम्ही से कर बैठे
कुछ ऐसा ही हाल आजकल अन्ना के लोकपाल मुहीम से जन्मे आआपा का है। पहले राजनीती को ना, फिर कांग्रेस-भाजपा से समर्थन लेने से ना, अब अन्ना के
लोकपाल को ना। लेकिन बदलते हालात में सबको गले लगाने को आतुर दिख रही है सत्यवादी हरिश्चन्द्र की पार्टी। अब जबकि बहुप्रतीक्षित लोकपाल बिल राज्यसभा के बाद लोकसभा मे पास होकर कानून की शक्ल लेने ही वाली है, फर्जीवाल कंपनी अन्ना के ही मंशा पर सवाल उठा रही है और समर्थकों से कहवा रही है कि अन्ना कांग्रेसियों से मिल गए है। वही दूसरी तरफ दुनिया देख रही है कि कैसे वह कांग्रेसी समर्थन से सरकार बनाने के लिए बेचैन है।
सर्वे का नाटक करके अपने नापाक मंसूबों पर जनता की मुहर लगवानी चाहती है ताकि कल को कुछ गड़बड़ करें तो कांग्रेस पर उसका ठीकरा फोड़कर बच निकले।
यानी चित भी मेरी, पट भी मेरी।
सच पूछे तो कांग्रेस-भाजपा से समर्थन न लेंगे, न देंगे का ताल ठोककर नेतागिरी करने आए राजनीति के इस नए जमूरे ने जबरदस्त नौटंकी का जाल बिछा
रखा है जिसमें बेचारी जनता पिस रही है। दिल्ली से मतलब न रखने वाले भी इस नाटक का लुत्फ़ उठा रहे है लेकिन दिल्ली की जनता-वह तो बस ठगी महसूस कर
रही है! ज़मीनी हकीक़त और चुनावी प्रेक्षकों के विश्लेषण की माने तो आआपा की जीत के पीछे कांग्रेस का एक पूरा गुट लगा हुआ था। सब जानते है कि इस चुनाव में शीला दीक्षित अकेले चुनाव मैदान में थी, जिन्हें न तो पार्टी संगठन की तरफ से पूरा समर्थन हासिल था, न ही कार्यकर्ताओं की। इसलिए गुटबाजी में बटी और संभावित हार से सहमें कांग्रेसी समर्थकों के वोट आआपा को शिफ्ट हुए, जिसकी वजह से कई क्षेत्रों में कांग्रेसी प्रत्याशियों को अपने कैडर वोट भी नही मिले। कांग्रेसी समर्थकों को पक्का भरोसा था कि कल तक हाथ के साथ रहे लोग झाड़ू पकड़कर अपने ही पास आएंगे. दूसरी ओर, चुटकी बजाते ही देश की सभी समस्याओं के समाधान संबंधी चुनावी वादों से दिग्भ्रमित जनता से भी वोट बटोरने में आआपा सफल रही. अब जबकि फर्जी दावे, नाटक-नौटंकी, मोदी-विरोधी मीडिया, नक्सली-माओवादी समर्थकों के लगातार लिखे लेखों और सोशल मीडिया पर बैठाए पेड समर्थकों की वजह से अप्रत्याशित सीटें मिल गई है तो इन्हें समझ में ही नही आ रहा-करे तो क्या करे! इन्हें भरोसा ही नही था कि कांग्रेसी आका हमारे इतने शुभचिंतक निकलेंगे और दिल्ली का पढ़ा लिखा तबका हमारे झांसे में आ जाएगा! कांग्रेसी समर्थक पत्रकारों द्वारा लिखे गए रिपोर्ट और लेख के बाद भी आआपा को भरोसा नही था कि कांग्रेसी वोट शिफ्ट होंगे और 28 सीटें मिल जाएगी. अब जबकि अनुमान से अधिक सफलता हाथ लग गई है तो ये भस्मासुर की तरह लोकतांत्रिक परंपरा को भी भस्म करने पर तुले हुए है. अब भला इन्हें कौन समझाए कि सत्ता पक्ष और विपक्ष नाम की कोई चीज
होती है. हर पार्टियाँ अपने अपने अजेंडे के साथ चुनावी मैदान में उतरती है. फिर भला कोई क्यों किसी के अजेंडे को अपना मानेगी. जनहित से संबंधित फैसले लेने के तौर तरीके भी पार्टियाँ अपने तरीके से लेती है. लेकिन ये महाशय जबरदस्ती थोपने पर लगे है. ये तो सौभाग्य है कि 18 सूत्रीय मांग में भारत को कश्मीर से अलग करने और बाटला हाउस एनकाउंटर को फर्जी ठहराने की मांग नही थी.
दरअसल, फर्जीवाल कंपनी अच्छी तरह जानती है कि लोगों को बहला फुसलाकर वोट लेना तो आसान है, हसीन सपने पॉवर-पॉइंट प्रेजेंटेशन पर दिखाकर विदेशी चंदे तो जुटाना आसान है, 10-20 को साथ लेकर एनजीओ तो चला सकते है लेकिन सरकार चलाकर जन आकांक्षाओं पर खड़ा उतरना मुश्किल है. इसलिए कुछ नही कर सकते तो आआपा के नेता दिल्ली को लगातार बेवकूफ बनाए जा रही है. फेसबुक, ट्विटर पर सर्वे-सर्वे का खेल फिर से शुरू हो गया है! लोगो से ट्विट करके
सुझाव मांगे जा रहे है. अरे भैया, सीधा सीधा कान क्यों नही पकड़ते जो इतना घुमाकर घुमाकर अपनी मंशा समझा रहे हो! एक बार बेवकूफ बनाकर वोट तो ठग लिए, अब क्यूँ बना रहे हों? सरकार बनाओ. फालतू की नाटकबाजी क्यों? जिन्होंने वोट दिया उनकी मंशा तो झाड़ूराज की थी फिर बहानेबाजी क्यों?
जबसे आआपा बनी है, उसके नेता भारतीय संविधान, लोकतंत्र का मखौल उड़ाने में कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ी है! कभी संसद और नेताओं को लुटेरा बताने वाले
लोग भ्रम और स्वप्नों की जाल बुनकर, लोगों को बरगलाकर, उन्हें मुर्ख बनाकर अपना उल्लू सीधा करना चाहते है. कभी राजनीती को पानी पी-पीकर गालियाँ देने वाले और आजकल नए नए विधायक बने लोगों को कायदे से तो जनता के हितों की रक्षा करने के लिए सेवा में जुट जाना चाहिए था. जनता से किये
लम्बे चौड़े वादें पूरे करने के बारे में सोचना चाहिए था. लेकिन जनता को दिखाए हसीन सपने लेकर अपना कुनबा खड़ा करने वाले लोग फिर से एक्टिविस्ट की
भूमिका में आना चाहते है। वैसा एक्टिविस्ट जिसे दूसरों को गलियां देना, उसकी वेवजह आलोचना करना अच्छा लगता है। लेकिन जब कुछ कर दिखाने की बारी आती है तो वह अपनी जिम्मेवारियों से पल्ला झाड लेने में ज्यादा बहादुरी दिखाता है।
महात्मा गांधी की इच्छा थी, आज़ादी मिल गई इसलिए कांग्रेस को समाप्त कर दिए जाने चाहिए। अन्ना समर्थक होने के नाते हमारी भी यही मंशा है कि लोकपाल मिल गई इसलिए लोकपाल के समुद्र मंथन से उपजे विष आआपा भी समाप्त हो जाए। वरना जैसे कांग्रेस लोगों को हमने तुम्हें आज़ादी दिलाई कहकर, लगातार बेवकूफ बनाकर देशवासियों को ठगती रही, वैसे ही दिल्ली में आआपा अगले पांच साल ठगेगी ! फिलहाल ड्रामेबाजी का दौर जारी है! जिससे दिल्ली की जनता आजिज़ आ चुकी है और मानो कह रही है -ड्रामेबाजी बंद करिए आप केजरीवाल जी!
कायदे से तो लोकपाल बनते ही आआपा भंग कर देनी चाहिए लेकिन देखना दिलचस्प होगा कि मोदिविरोध का नया मुखौटा आआपा ऐसा करेगी? भरोसा कम है क्यूंकि टीम आआपा अन्ना के लिए भारत रत्न की मांग करके अभी कुछ दिन और अपना नाम
चमकाना चाहती है। अन्ना के बिना वजूद ही क्या है इनका!
(प्रवक्ता से साभार)

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