नई शिक्षा नीति : अभी भी बहुत कुछ परिवर्तन की अपेक्षा है

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शिक्षा के क्षेत्र में सुधारों की अनुशंसा के लिए एक यशपाल कमिटी बनी थी। पिछली यू.पी.ए. सरकार के दौर में एक नेशनल नॉलेज कमीशन भी बना था, साथ ही एक हरी गौतम समिति की रिपोर्ट में भी कई सुधारों की जरुरत बताई गई थी। इन शिक्षा के सुधारों का वही हुआ था जो विदेशी टुकड़ाखोर और उनके बगलबच्चा कॉमरेड आम तौर पर करते हैं। सलाह कहीं ठन्डे बस्ते में पड़ी रही, एक इंच भी कोई काम आगे नहीं सरका। तीन साल में भाजपा नेतृत्व भी इस दिशा में कुछ भी करती हुई नहीं दिखी इसलिए हम उन्हें कोसने से भी नहीं चुकते। जब २०१६ के आखिर में के.के. शर्मा को ठग मण्डली के चंगुल से निकाल कर शिक्षा विभाग में लाया गया तो बदलाव की आहट सुनाई देने लगी थी।

हम इंतज़ार कर रहे थे कि कब विदेशी फण्ड पर पलने वाले गिरोह इस खबर पर छाती कूटना शुरू करते हैं। औरों से नहीं तो कम से कम हमें ठग मण्डली से उम्मीद थी कि वो “मोदी जी तो काम नहीं करने देते जी”, “हमारे आदमी ले जा रहे हैं जी”, जैसे प्रलाप करते दिखेंगे। जब ये सब लम्बे समय तक होता हुआ नहीं दिखा तो हमारी उम्मीद जरा कम हो गई। पञ्च वर्षीय योजनायें बनाने वाले आयोग वगैरह ख़त्म करके जो नीति आयोग बना था, उसमें से भी निकलकर कोई वैसे नीतिगत बदलावों की कोई खबर नहीं आ रही थी। फिर पिछले मार्च की एक बैठक में सीधा प्रधानमंत्री स्तर का एक फैसला आया। इस बार यू.जी.सी. और ए.आई.सी.टी.ई. को ख़त्म करने का फैसला ले लिया गया था। कई साल पहले जब अमेरिका में सर-दे-साईं पिटे थे, अपने उसी वक्त के भाषण में प्रधानमंत्री जी ने कहा था कि हम तेजी से बेकार कानूनों को ख़त्म करते जा रहे हैं।

ऐसे ही घटिया, सड़ियल और विदेशी मानसिकता से ग्रस्त कानूनों से भरा पड़ा एक यू.जी.सी. एक्ट भी था। इंडिया को भारत बनाने के लिए इसे ख़त्म किया जाना जरूरी था। आज की तारिख में भारत में चार अलग अलग किस्म के विश्वविद्यालय होते हैं, एक सेंट्रल यूनिवर्सिटी है, दूसरी स्टेट यूनिवर्सिटी, तीसरी डीम्ड यूनिवर्सिटी है तो चौथी प्राइवेट यूनिवर्सिटी। इसमें सेंट्रल जहाँ अभिजात्य है तो वहीँ गिरते गिरते प्राइवेट यूनिवर्सिटी बिलकुल अछूत होती है। ४६ सेंट्रल, ३५८ स्टेट, १२२ डीम्ड और २५८ प्राइवेट यूनिवर्सिटी मिला कर भारत में अभी ७८५ विश्वविद्यालय होते हैं। ये सब भारत के ही हैं, लेकिन अगर आप किसी एक से ग्रेजुएशन करते करते सेकंड-थर्ड इयर में किसी दूसरी यूनिवर्सिटी में जाना चाहें तो आप हरगिज़ नहीं जा सकते। किसी एक में पढ़े दो साल भूल जाइए, शुरू से तीन साल की पढ़ाई करनी पड़ेगी।

विश्वविद्यालयों की ये लम्बी फेरहिस्त देख कर चौंकिए मत। अकेले राजस्थान में ७३ अलग अलग यूनिवर्सिटी हैं, अचानक किसी का नाम बता दें, तो वो सच में कोई विश्वविद्यालय है या ऐसे ही कोई नाम बक दिया है वो शिक्षा मंत्री भी नहीं बता पायेंगे। ये सिर्फ एक राज्य का हाल नहीं है। गुजरात में सबसे ज्यादा यानि २८ स्टेट यूनिवर्सिटी होती है, इसके ठीक पीछे बंगाल और उत्तर प्रदेश हैं, जहाँ २६-२६ स्टेट यूनिवर्सिटी हैं। दक्षिण भारत जो कई कई डोनेशन वाले मेडिकल-इंजीनियरिंग कॉलेज के लिए जाना जाता है, वहां तमिलनाडु है, जहाँ सबसे ज्यादा डीम्ड यूनिवर्सिटी हैं (२८)। राजस्थान वाले ७३ विश्वविद्यालयों में से ४२ प्राइवेट विश्वविद्यालय हैं। केन्द्रीय यूनिवर्सिटी की गिनती शायद केंद्र से दूरी के साथ ही घटती है। दूर दराज के क्षेत्रों में जहाँ कॉलेज भी नहीं वहीँ दिल्ली में पांच और उत्तर प्रदेश में छह केन्द्रीय विश्वविद्यालय मौजूद हैं।

सिर्फ इतनी लिस्ट पर हैरान परेशान हो रहें हैं तो हम आपको ये भी बताते चलें कि कई लोग जबरिया डिग्री वाले भी कहलाते हैं। ये जबरिया डिग्री हम स्वायत्त संस्थानों (autonomous bodies) से मिली डिग्री वालों को कहते हैं। ऐसे स्वायत्त संस्थानों से मिली डिग्री की वजह से कई युवा यू.जी.सी. के हिसाब से काफी पढ़े-लिखे और सिर्फ प्लस टू एडुकेटेड एक साथ ही हो जाते हैं। इन स्वायत्त संस्थानों की लिस्ट में आयेंगे १८ आई.आई.टी. कुल ३२ एन.आई.टी. भी हैं, १८ ही ट्रिपल आई.टी. या आई.आई.आई.टी. होते हैं, इंडियन स्कूल ऑफ़ माइंस होता है, कई स्टेट फण्ड पर चलने वाले तकनिकी संस्थान हैं, बहुत से एग्रीकल्चरल इंस्टीट्यूट हैं। आल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंस (एम्स) के सारे ब्रांच भी इसी लिस्ट पर है, इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ साइंस एजुकेशन एंड रिसर्च के सारे केंद्र भी इसी पर आयेंगे। ओह हाँ, जो आई.आई.एम. हैं, इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट वो भी इसी पर आएगा। वो डिग्री भी नहीं देता, डिप्लोमा देता है।

कोई बगलबच्चा गिरोह निराश ना हो ! हम नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा को भूले नहीं हैं। समस्या ये है कि उसने अपना स्टेटस अक्टूबर २०११ में बदल लिया था। अभी हमें ये साफ़-साफ़ पता नहीं कि वो डीम्ड है, प्राइवेट है, सेंट्रल है या स्टेट इसलिए पहले उसका नाम नहीं लिया था। जैसे ही पता चल जाए कि नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा का ड्रामा क्या है और उसकी डिग्री कहाँ मान्य है, तमाम बुद्धिजीवी हमें भी बताएं। हम उसे भी लिस्ट में डालेंगे।

कई साल पहले से कुछ लोग कहते रहे हैं कि आपको मोदी सरकार के क्रन्तिकारी फैसले अभी नहीं बल्कि इसकी सरकार के तीन साल बीतने पर नजर आयेंगे। शिक्षा में होगा परिवर्तन दिखता था, टैक्स व्यवस्था में बदलाव होगा ये वरुण भाई का मानना था, विदेश नीतियों में बदलाव आएगा, पड़ोसियों के साथ ही नहीं आन्तरिक मामलों में भी चीज़ें बदलेंगे ये पुष्कर अवस्थी जी की पुरानी पोस्ट में दिख जायेगा। कई साल से विदेशी बोटी पर पल रहे टुकड़ाखोरों ने हमारे शिक्षा के संस्थानों में अड्डा जमा रखा है। इन धूर्तों के समर्थन के अलावा ना तो इनमें घुसने का कोई तरीका होता है ना ही टिके रहने का।

[यू.जी.सी. जैसी संस्थाओं को ख़त्म कर के HEERA का गठन इस दिशा में किया गया पहला फैसला था। शिक्षा सुधारों का स्वागत होना चाहिए।]

तो किस्सा एक किसान का है। होता कुछ यूँ है कि एक शाम किसान अपनी गाय को घर वापस ले चलना चाहता था। संभवतः गाय का पेट भरा नहीं था और वो और घास चरना चाहती थी, या ऐसी ही किसी वजह से गाय लौटना नहीं चाहती थी। खींचने की कोशिश का कोई नतीजा नहीं निकला। गाय किसान से ज्यादा भारी भरकम होती है और चलने से इनकार कर दे तो रस्सी खींचने का कोई फायदा नहीं निकलता। किसान ने एक दो डंडे जड़ने की कोशिश भी की लेकिन किसान कब अपने पालतू पशु को मार पाता है? तो किसी भी कोशिश का नतीजा नहीं निकल रहा था।

किसान की छोटी सी बेटी वहीँ खड़ी किसान की कोशिशें देख रही थी। जब उसे लगा कि उसके पिता प्रयास करके थक गए हैं और उसे भी उनकी मदद करनी चाहिए तो वो भी आगे बढ़ी। उसने गाय को छुआ भी नहीं। वो आराम से टहलती हुई गाय के बछड़े के पास गयी। उसने आराम से बछड़े के मुंह में एक ऊँगली डाल दी। बछड़ा भी ऊँगली चूसने लगा। अब लड़की आराम से घर की तरफ चल पड़ी। ऊँगली चूसता बछड़ा भी उसके साथ चला और जैसे ही गाय ने अपने बछड़े को जाते देखा, वो भी लड़की के पीछे चुपचाप चल पड़ी। बच्चे के पीछे आ जाने को लेकर लड़की की समझदारी जैसे कई नीति वचन जोड़े जाते हैं मगर वो कभी बाद में।

फ़िलहाल बच्चों की बात निकली है तो स्कूलों और उनकी शिक्षा की बात भी होगी। अगर डीआईएसई(DISE) के डाटा के आधार पर देखें तो 2009-10 में कुल स्कूलों का 80.37% सरकारी स्कूल थे और बाकी निजी मगर 2013-14 पहुँचते पहुंचते ये 75.51% स्कूल ही सरकारी थे। निजी विद्यालयों की गिनती तेजी से बढ़ रही है और सरकारी स्कूल ख़त्म होते जा रहे हैं। ये बदलाव अचानक तेज नहीं हुए हैं। सन 1970 के दौर में ही मध्यम वर्ग की जनता के बच्चों को बेहतर शिक्षा दिलाने के लिए निजी स्कूलों की गिनती तेजी से बढ़ने लगी थी।

शुरुआत में एक वजह अलग किस्म की शिक्षा देना भी रहा। इनमें से कुछ ने कम आय वाले वर्गों को भी शिक्षा मुहैया करवाने की कोशिश की। जब संविधान में मौजूद शिक्षा के अधिकार को डायरेक्टिव प्रिंसिपल से निकाल कर मौलिक अधिकारों में शामिल किया गया, तब आरटीई एक्ट 2009 में धारा 12 (1) C भी अस्तित्व में आ गयी। इस कानून के जरिये हर निजी स्कूल के लिए, चाहे वो सरकारी सहायता लेता हो या नहीं, अपने पास 25% आर्थिक रूप से कमजोर या पिछड़े वर्गों के छात्र रखना अनिवार्य हो गया। बाद में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले से माइनॉरिटी संस्थानों को इस धारा से मुक्त कर दिया गया।

चूँकि शिक्षा नीति पर सरकार बहादुर ने आम, गरीब-गुरबा लोगों से उसकी राय मांगी है, जिसके पास नेतागण पांच साल में कभी एक बार चले जाते हैं, तो मौके का फायदा उठाकर इसपर राय भी रखनी चाहिए। सोचिये कि स्कूल के नाम पर अपने शहर का कौन सा बड़ा स्कूल याद आता है? सेंट थॉमस, पीटर, अल्बर्ट, ज़ेवियर जैसा कोई नाम याद आया क्या? जाहिर है वो तो अल्पसंख्यक होगा। फिर सवाल है कि कौन से निजी विद्यालयों को इस कानून के तहत 25% ऐसे छात्र रखने होंगे जो फीस नहीं देते?

ऐसे पच्चीस फीसदी छात्र-छात्राएं हों तो जाहिर है स्कूल पर आर्थिक बोझ भी बढ़ेगा और वो इसकी वसूली अपनी जेब से नहीं, बाकी के बच्चों की फीस बढ़ाकर ही करेंगे। इतना समझने के लिए भी किसी राकेट साइंस का जानकार होने की जरूरत नहीं। एक बार में ये कानून 1.6 करोड़ बच्चों पर असर डालेगा। अभी ये किसी भी राज्य में पूरी तरह लागू नहीं है, मगर 2025 तक इसका असर कितना व्यापक होगा इसका अंदाजा लगाना नामुमकिन भी नहीं है। मोहल्ले के छोटे स्कूलों को जब ज्यादा फीस लेनी पड़े तो या तो वो बंद होंगे, या अच्छे शिक्षक या संसाधन जुटाने की स्थिति में नहीं होंगे।

इसकी तुलना में वो माइनॉरिटी स्कूल जो कई बार चंदे के रूप में विदेशी फण्ड भी पाते हैं और शिक्षकों के लिए भी कम खर्च में काम चलाने में समर्थ हैं, वो बेहतर स्थिति में आते जायेंगे। जैसे गरीब और ज्यादा गरीब, और अमीर और ज्यादा अमीर होता जाता है, कुछ वैसी ही स्थिति होगी। डीएवी, डीपीएस, या गोएंका जैसे एक्का-दुक्का बड़े नाम छोड़ दें तो बाकी भारतीय लोगों के लिए विकल्पहीनता की स्थिति बन जाएगी। “कानून सबके लिए बराबर होता है” का जुमला असली था भी या दिल बहलाने को ग़ालिब का ख़याल अच्छा था, ये सोचने लायक बात होगी।

स्कूल का पाठ्यक्रम पहले ही मौजूदा सरकार बहादुर के नियंत्रण में नहीं हैं। स्कूल जाते अपने घर के बच्चों से उनके स्कूल की प्रार्थनाएं दोहराने कह कर देखिये तो पता चलेगा कि आपके धार्मिक भजन-स्त्रोतों का भले उन्हें एक शब्द न पता हो, हालेलुइया वो अच्छी तरह दोहरा सकते हैं। त्योहारों के नाम पर होली उन्हें पानी की बर्बादी लगती है, दिवाली पटाखों का शोर। हाँ मगर किसी त्यौहार पर पेड़ काटकर उसपर रौशनी सजाना उन्हें पर्यावरण का नुकसान नहीं लगता, न ही एक जनवरी की आतिशबाजी से प्रदुषण फैलता है। यानी आपके बच्चे क्या सीखेंगे ये न आपके नियंत्रण में है, न आपकी सरकार बहादुर के!

बाकी शुरुआत वाला जो किस्सा रह गया था, वहां फिर से आते हैं। बच्चे के मुंह में ऊँगली डालते ही गाय के पीछे पीछे चले आने जैसा इंसानों में होगा या नहीं ये सोचने लायक है। सोचियेगा, फ़िलहाल सोचने पर जीएसटी नहीं लगता।
✍🏻आनन्द कुमार जी की पोस्टों से संग्रहित

ऋग्वेद 1.29 के अनुसार वैदिक शिक्षा पद्धति में कोई भी व्यक्ति शिल्प शिक्षा विहीन नहीं रहता था । जर्मनी की शिक्षा पद्धति में यह व्यवस्था आश्वस्त करती है कि कोई भी जर्मन नागरिक साधन इहीन और दरिद्र नहीं रहता , जैसा वैदिक काल में भारत देश में था ।

ऋषि: आजीर्गति: शुन: शेप: सकृत्रिम: विश्वामित्र: देवरात: = संसार के भोग विलास के कृत्रिम साधनों के अनुभवों के आधार पर विश्व के मित्र के समान देवताओं के मार्ग दर्शन कराने वाले ऋषि।
देवता:- इंद्र:
छंद: पंक्ति:
ध्रुव पंक्ति; आ तू न॑ इन्द्र शंसय॒ गोष्वश्वे॑षु शु॒भ्रिषु॑ स॒हस्रे॑षु तुवीमघ
Veterinary & skill development, education
1.यच्चि॒द्धि स॑त्य सोमपा अनाश॒स्ताइ॑व॒ स्मसि॑।
आ तू न॑ इन्द्र शंसय॒ गोष्वश्वे॑षु शु॒भ्रिषु॑ स॒हस्रे॑षु तुवीमघ॥RV1.29.1॥
1. राष्ट्र में उपयुक्त धन, भौतिक, आर्थिक साधनों, और शिक्षकों की व्यवस्था से गौ अश्वादि लाभकारी पशुओं के सम्वर्द्धन, उनके पालन और अन्य शिल्प इत्यादि के बारे में विस्तृत प्रशिक्षण की व्यवस्था करो । ऋ1.29.1
स्त्रियों का गोपालन में योगदान
2. शिप्रि॑न् वाजानां पते॒ शची॑व॒स्तव॑ दं॒सना॑।
आ तू न॑ इन्द्र शंसय॒ गोष्वश्वे॑षु शु॒भ्रिषु॑ स॒हस्रे॑षु तुवीमघ॥ RV1.29.2॥
2. [शिप्रिन्‌] ज्ञान से युक्त स्त्री [शचीव: तव] तुम अत्यंत कार्यकुशल [वाजानाम्‌ पते] बड़ी बड़ी कठिन समस्याओं से निपटने के लिए [दंसना] शिक्षा का उपदेश दे कर, गौ अश्वादि लाभकारी पशुओं के सम्वर्द्धन, उनके पालन और अन्य शिल्प इत्यादि के बारे में विस्तृत प्रशिक्षण की व्यवस्था करो ।( गौ इत्यादि पशुओं के प्रजनन के समय स्त्री जाति का दायित्व अधिक वांछित माना जाता है और तर्क सिद्ध भी है । )ऋ1.29.2
शूद्रों का योगदान
3. नि ष्वा॑पया मिथू॒दृशा॑ स॒स्तामबु॑ध्यमाने।
आ तू न॑ इन्द्र शंसय॒ गोष्वश्वे॑षु शु॒भ्रिषु॑ स॒हस्रे॑षु तुवीमघ॥ RV1.29.3॥
3.[मिथूदृशा] विषयासक्त और[अबुध्यमाने] अपने ज्ञान को न बढ़ाने वाले [सस्ता] आलसी सोते रहने वाले जन अर्थात- शूद्र वृत्ति के जनों को गौ अश्वादि लाभकारी पशुओं के सम्वर्द्धन, उनके पालन और अन्य शिल्प इत्यादि के बारे में विस्तृत प्रशिक्षण की व्यवस्था करो । ऋ1.29.3
क्षत्रिय वृत्ति वालों का प्रशिक्षण
4. स॒सन्तु॒ त्या अरा॑तयो॒ बोध॑न्तु शूर रा॒तयः॑।
आ तू न॑ इन्द्र शंसय॒ गोष्वश्वे॑षु शु॒भ्रिषु॑ स॒हस्रे॑षु तुवीमघ॥ RV1.29.4॥
4.[अरातय: ससन्तु] समाजसेवा के लिए दान न देने की वृत्ति का विनाश होता है| [बोधन्तु शूर रातय:] उपयुक्त दान आदि धार्मिक कार्यों की पहचान से बाधाओं, सामाजिक शत्रुओं को नष्ट करने की क्षमता उत्पन्न होती है | गुण युक्त गौओं और अश्वों से निश्चित ही [गोषु] सत्य भाषण और शास्त्र और शिल्प विद्या की शिक्षा सहित वाक आदि इंद्रियों तथा [अश्वेषु] ऊर्जा और वेग से युक्त चारों ओर से अच्छे उत्तम सहस्रों साधनों से अनेक प्रकार की प्रशंसनीय विद्या और धन से सम्पन्नता प्राप्त होती है । ऋ1.29.4
गर्दभ के समान कटु व्यर्थ शब्द बोलने वालों का प्रशिक्षण
5. समि॑न्द्र गर्द॒भं मृ॑ण नु॒वन्तं॑ पा॒पया॑मु॒या।
आ तू न॑ इन्द्र शंसय॒ गोष्वश्वे॑षु शु॒भ्रिषु॑ स॒हस्रे॑षु तुवीमघ॥ RV1.29.5॥
5.[ गर्दभम्‌ अमूया] गर्दभ के समान कटु और व्यर्थ वचन बोलने वालों को [पापया नुवन्तम्‌] पापाचरण करने से सुधार कर , गौ अश्वादि लाभकारी पशुओं के सम्वर्द्धन, उनके पालन और अन्य शिल्प इत्यादि के बारे में विस्तृत प्रशिक्षण की व्यवस्था करो । ऋ1.29.5
जीवन में लक्ष्यहीन जनों का प्रशिक्षण
6. पता॑ति कुण्डृ॒णाच्या॑ दू॒रं वातो॒ वना॒दधि॑।
आ तू न॑ इन्द्र शंसय॒ गोष्वश्वे॑षु शु॒भ्रिषु॑ स॒हस्रे॑षु तुवीमघ॥ RV1.29.6॥
6.[ कुन्डृणाच्य:] लक्ष्यहीन कुटिल गति से [पताति वात: वनात्‌] वनों से चलते हुए वायु के समान आचरण वाले जनों को भी गौ अश्वादि लाभकारी पशुओं के सम्वर्द्धन, उनके पालन और अन्य शिल्प इत्यादि के बारे में विस्तृत प्रशिक्षण की व्यवस्था करो । ऋ1.29.6
7. सर्वं॑ परिक्रोशं ज॑हि ज॒म्भया॑ कृकदा॒श्व॑म्।
आ तू न॑ इन्द्र शंसय॒ गोष्वश्वे॑षु शु॒भ्रिषु॑ स॒हस्रे॑षु तुवीमघ॥ RV1.29.7॥
7. [ सर्वं॑] सब को [परिक्रोशं कृकदा॒श्व॑म्] सब प्रकार से रुला कष्ट देने वाले [ज॑हि ज॒म्भया॑] जो हैं उन के ऐसे आचरण को नष्ट करके गौ अश्वादि लाभकारी पशुओं के सम्वर्द्धन, उनके पालन और अन्य शिल्प इत्यादि के बारे में विस्तृत प्रशिक्षण की व्यवस्था करो । ऋ1.29.7

भारत वर्ष में ऐसी शिक्षा व्यवस्था बनाने और वैद पढ़ाने में क्या कठिनाई हैं?

दुनिया में सबसे बेहतर शिक्षा व्यवस्था फिनलैंड की मानी जाती है। यहां की व्यवस्था की मुरीद पूरी दुनिया है, क्योंकि यहां पढ़ाई का तरीका बिल्कुल अलग और अनोखा है। दरअसल, फिनलैंड की शिक्षा व्यवस्था कई लोगों को अटपटी भी लग सकती है। लेकिन यहां पढ़ाई के तरीकों पर रोज नए प्रयोग किए जा रहे हैं। इन्हें स्कूलों में अपनाया भी जा रहा है, ताकि बच्चे पढ़ाई के बोझ तले दबे नहीं बल्कि बिना किसी दबाव के उनमें निखार आए।

यहां बच्चों को वैज्ञानिक तरीके से पढ़ाने पर जोर दिया जाता है। उनकी क्षमता व योग्यता को अंक के आधार पर नहीं आंका जाता है, ना ही बच्चों के तुलनात्मक विकास पर चर्चा होती है। दुनिया भर के शिक्षक फिनलैंड के शैक्षणिक तरीके से सबक ले रहे हैं। लेकिन इन सब में यहां शिक्षकों की विशेष ट्रेनिंग का बड़ा योगदान है। आपको बता दूं कि फिनलैंड में अध्यापन को सबसे सम्मानजनक पेशा माना जाता है।

1. भारत में जहाँ एक तरफ गरीबी ने समान शिक्षा व्यवस्था की नींव हिला दी है। वहीं फिनलैंड की कामयाबी यही समान शिक्षा व्यवस्था बनी है। फिनलैंड एक ऐसा मुल्क जिसने अपने छात्रों के लिए 16 साल तक शिक्षा सौ फीसदी मुफ्त कर दी है।

2. दूसरी बड़ी बात ये है कि यहाँ स्कूलों में कोई इम्तिहान नहीं लिया जाता है। छात्रों को क्लास 6 से पहले किसी भी तरह का कोई इम्तिहान नहीं देना पड़ता है। सिर्फ एक स्टैन्डर्ड देश व्यापी इम्तिहान होता है जो 16 साल की उम्र में स्कूल पास करने के बाद ही लिया जाता है।

3. फिनलैंड में भारत की तरह शिक्षा में गैरबराबरी देखने को नहीं मिलती। यहाँ के गाँव और शहरों की शिक्षा व्यवस्था एक जैसी होती है।

4. बच्चों की प्राइमरी तालीम ही उसकी असली शिक्षा होती है। यही प्राइमरी शिक्षा छात्रों के जीवन की दशा और दिशा तय करती है। और इसी लिए यहाँ सरकार की तरफ से स्कूलों को निर्देश हैं कि वो अपने स्कूल के हर छात्र की तालीम पर ध्यान दें बजाए इसके कि सिर्फ चंद टॉपर छात्र पैदा करके स्कूल का नाम रौशन करने की जुगत लगाए।

5. फिनलैंड में प्राइमरी शिक्षा प्राइवेट स्कूलों और सरकारी स्कूलों दोनों में एक समान ही है। कमाल की बात है कि मुल्क के 99 फीसदी बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं। दूसरी तरफ कोई प्राइवेट ट्युशन इंडस्ट्री भी नहीं है क्योंकि छात्रों ने इसकी जरूरत ही नहीं है। ट्युशन के बजाए 30 फीसदी छात्रों को नौवीं क्लास तक टीचरों के द्वारा अलग से पढ़ाई में मदद दी जाती है।

6. यहाँ छात्रों पर सुबह जबरदस्ती स्कूल जाने का दबाव नहीं होता है बल्कि वो अपनी मर्जी से खुशी खुशी स्कूल जाते हैं। बच्चों को अपने ढंग से पढ़ाई करने की छूट दी जाती है। बच्चे क्लास में बांसुरी बजाते हैं। उनको अंग्रेजी भी मस्ती के अंदाज में सिखाई जाती है। यहाँ के स्कूलों में फिनीश और स्वीडिश बोली जाती है इसीलिए इनको अंग्रेजी सिखाने के लिए अंग्रेजी गाने सिखाए जाते हैं।

7. कुछ लोगों के लिए फिनलैंड में तालीम हासिल करना एक सपने की दुनिया में जाकर शिक्षा प्राप्त करने जैसा है।यहाँ एक दिन में बच्चों को सवा घंटे का लंच ब्रेक मिलता है। वहीं टीचर एक दिन में सिर्फ 4 घंटे एक क्लास में पढ़ाते हैं। शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह सरकारी है।

8. यहाँ दुनिया के सबसे तेज़ और सबसे कमजोर छात्रों के बीच का फासला सबसे कम है। स्कूलों में सिर्फ मेधावी छात्रों को जगह नहीं मिली है बल्कि कमजोर छात्रों पर भी पूरा ध्यान दिया जाता है। कुछ छात्र जो पढ़ाई में कमजोर हैं उनकी ज्यादा मदद की जाती है। और यही वजह है कि यहाँ 93 फीसदी छात्र हाई स्कूल ग्रेजुएट हैं।

9. शिक्षक किसी भी शिक्षा व्यवस्था की सबसे अहम कड़ी होते हैं। इसीलिए फिनलैंड में टीचर बनना सबसे सम्मानित प्रोफेशन माना जाता है। यहाँ लोग डाक्टर या इंजीनियर नहीं बल्कि टीचर बनना सबसे शान की बात समझते हैं। सभी शिक्षकों के लिए मास्टर डिग्री होना अनिवार्य है।

10. यहाँ टीचरों के पास दिन में इतना समय होता है कि वो आपस में मिल बैठकर सिलेबस से जुड़ी बातों पर नई रणनिति तैयार कर सकें। किसी भी क्लास में 15 मिनट से ज्यादा पढ़ाया नहीं जा सकता है ताकि वो बाकी वक्त अपने हिसाब से गुजार सकें। लंच ब्रेक भी कम से कम सवा घंटे का होता है। शिक्षकों को सिलेबस का केवल एक मोटा मोटा खाका ही दिया जाता है और शिक्षक अपने हिसाब से ही तय करते हैं कि वो छात्रों को किस ढंग से पढ़ाएंगे।
✍🏻सुबोध कुमार

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