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मांसाहार का दुष्परिणाम विश्व स्तर पर कोरोना वायरस के संक्रमण व मृत्यु दर के माध्यम से समूचे विश्व के सामने आ चुका है कि मांसाहार शरीर की प्रतिरोधक शक्ति को कमजोर करता है, जिस कारण मांसाहार जितना अधिक किया जाता है उन देशों में संक्रमण व मृत्यु दर उतनी ही अधिक है। सिद्धान्त सर्वोपरि होता है। सिद्धान्त के सामने किसी की कोई औकात नहीं होती, चाहे वह कोई भी हो। सिद्धान्त की उपेक्षा करने पर हानि होगी ही, इससे कोई बच नहीं सकता। संक्रमण अधिक होना उसी सिद्धान्त की उपेक्षा का परिणाम है। वह सिद्धान्त है – किसी भी मशीन का ईंधन व किसी भी शरीर का भोजन उसकी बनावट के हिसाब से निर्धारित होता है। उपर्युक्त निर्धारित भोजन वा ईंधन न देने से शरीर या मशीन कम काम करेगा और शीघ्र खराब हो जायेगा। मनुष्य शरीर की बनावट शत-प्रतीशत शाकाहारी शरीरों (गाय, बकरी, घोड़ा, हाथी, ऊँट आदि) के समान है, तो स्वाभाविक है, मांसाहार मनुष्य को नुकसान करेगा। अब मांसाहार के दुष्परिणाम की संक्षिप्त चर्चा करते हैं –

1. शारीरिक – शरीर को संतुलित आहार चाहिये। संतुलित आहार वह है, जिसमें सभी आवश्यक घटक (प्रोटीन, वसा, कार्बोहाईड्रेट, विटामिन्स, खनिज लवण व रेशा तत्व) हों। मांस-मछली-अण्डा अर्थात् मांसाहार में केवल प्रोटीन व वसा ही होता है, शेष घटक नहीं होते, तो मांसाहार शरीर की सभी आवश्यकता पूरी नहीं कर सकता। परिणाम स्वरूप शरीर में कोई न कोई न्यूनता आयेगी। दूसरी हानि यह होगी कि मांस की प्रोटीन व वसा पचाने में बहुत भारी होती है, तो इनका पाचन अधूरा होने व रेशातत्व न होने के कारण पाचन तन्त्र को काफी हानि होती है। तीसरी मुख्य हानि यह है कि मांस प्रोटीन के पाचन से काफी मात्रा में यूरिया व यूरिक अम्ल बनता है, जो जोड़ों में दर्द का कारण बनता है और मांस वसा में काफी कोलेस्ट्राॅल होने से हृदय को नुकसान होता है। मांस किसी जानवर को मार कर प्राप्त होता है। मृत्यु के सामने सभी भयभीत होते हैं। भयभीत अवस्था में शरीर की ग्रन्थियों में हानिकारक रसायन निकलते हैं, जो मांस में अवशोषित हो जाते हैं और मांसाहारी के शरीर में जाकर नुकसान करते हैं। मनुष्य मांस को मांसाहारी जानवरों की तरह कच्चा नहीं खाता, अपितु तल कर खाता है। दूसरी बात यह कि किसी पशु को मारते ही तुरन्त मांस खाने को नहीं मिलता, इसमें एक-दो दिन या अधिक समय लग जाता है। उन दोनों कारणों से मांस की गुणवत्ता काफी गिर जाती है, क्योंकि मांस Decay बहुत तेजी से होता है, तो मांसाहार शरीर को लाभ के स्थान पर हानि ही करता है। अण्डे में तो हानिकारक पदार्थों (कोलेस्ट्राॅल, डी.डी.टी., सालमोनेला, एवीडिन) की काफी मात्रा रहती है, जो शरीर को अनेक प्रकार की बीमारियों का तोहफा देते हैं।

2. आर्थिक – शरीर पर भोजन के प्रभाव के बाद भोजन का आर्थिक पहलु भी काफी महत्वपूर्ण है। कोई आहार बहुत अच्छा है, पर मैं अर्थ अभाव में या उस आहार के बहुत मंहगा होने के कारण खरीद नहीं सकता, तो वह अच्छा आहार मेरा भोजन नहीं हो सकता। मांसाहार में शाकाहार के आर्थिक पक्ष को महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती जी ने ‘गोकरुणानिधि’ पुस्तक में बड़े विस्तार से समझाया है। निष्कर्ष के रूप में एक गाय जीवन भर में 25-26 हजार मनुष्यों को एक बार दूध का भोजन दे सकती है और एक बैल जीवन भर जितना अन्न पैदा करने में सहायक होता है, उससे 42-43 हजार मनुष्यों का एक बार अन्न का भोजन मिल सकता है, जबकि एक गाय या बैल को काट कर मांस खाया जाये, तो 80-90 मनुष्यों का एक बार का भोजन होगा। वैसे भी औसतन 6-7 किलो अनाज किसी पशु को खिलाते हैं, तो एक किलोग्राम मांस बनता है। एक किलो मांस से दिनभर के लिये 2-3 व्यक्तियों का पेट भरेगा, जबकि 6-7 किलो अनाज से 15-17 व्यक्तियों का दिनभर का भोजन बन जायेगा। बाजार में एक किलोग्राम मांस 150-200 रु. का आयेगा और इसको पकाकर खाने पर तीन व्यक्तियों का पेट भरा और पकाकर खाने का खर्च 250-300 रु. हुआ। घर पर 250-300 रु. के शाकाहार से 15-17 का भोजन बन सकता है। इस प्रकार आर्थिक दृष्टि से देखा जाये, तो मांसाहार, शाकाहार की तुलना में 5-6 गुणा मंहगा पड़ता है।

3. पर्यावरण – भोजन पैदा करने में वायु-जल-जमीन का प्रयोग होता है। ये मूलभूत संसाधन हैं। एक किलो सब्जी उत्पादन के लिये 120 लीटर, एक किलो फल के लिये 150 लीटर, एक किलो गेंहू के लिए 350 लीटर, दूध के लिये 480 लीटर और एक किलो मांस उत्पादन के लिये 5000 लीटर पानी, 6-7 किलो अनाज और 70 किलो चारा चाहिये। कहने का अभिप्राय यह है कि जितने जमीन-पानी से मांस पैदा किया जाता है, उसी जमीन-पानी से कई गुणा शाकाहार पैदा किया जा सकता है। कतल खानों से बहुत बड़ी मात्रा में वायु और जल प्रदूषित होते हैं। मांसाहार के लिये पाले जाने वाले जानवरो के मांस के लिये ट्रांसपोर्ट, पशुओं द्वारा उत्सर्जित मिथेन गैस का गणित लगायें, तो ग्लोबल वार्मिंग का लगभग 22-23 प्रतिशत मांसाहार के कारण है, तो मांसाहार पर्यावरण पर भारी बोझ डालता है।

4. सामाजिक – मनुष्य सामाजिक प्राणी है। जीवन ठीक से चले, इसके लिये कुछ मर्यादाओं का पालन आवश्यक है। मर्यादा पालन के लिये मनुष्य का सहनशील, संयमी, सहयोगी, नम्र, दयालु, परोपकारी होना आवश्यक है। मांसाहार मनुष्य में क्रूरता, निर्दयता, स्वार्थ, तामसिकता, आक्रामकता, कठोरता, उग्रता जैसे समाज विरोधी स्वाभाव को बढ़ावा देगा, जिसमें सामाजिक ताने-बाने और मर्यादाओं पर दबाव बढ़ेगा, जिससे सामाजिकता कमजोर होगी। निर्दयी, कठोर, उग्र, तामसिक लोगों के समाज में रहना बड़ा कष्टदायक बन जाता है।

5. धार्मिक – विश्व में जितने भी मत-पंथ, सम्प्रदाय है, उतनी विचारधारायें एक-दूसरे से भिन्न हों, परन्तु मांसाहार की अनुमति किसी भी मत-पंथ-सम्प्रदाय में नहीं है। कोई मन्दिर, मस्जिद, गिरजाघर, गुरुद्वारा, प्रार्थना स्थल, मांसाहार का अनुमोदन नहीं देते, तो मांसाहार सभी मतों-पंथों-सम्प्रदायों की धार्मिक भावनाओं के विरुद्ध होने के कारण मनुष्य की धार्मिक भावना को क्षीण करता है। मांसाहारी व्यक्ति मांस खाने की प्रवृति के कारण भले ही कुछ मत-पंथों के क्रियाकलापों का सहारा लेते हों, पर उन मत-पंथों के धार्मिक ग्रन्थों में मांसाहार का सर्मथन कहीं नहीं है।

6. मनोवैज्ञानिक – यह एक व्यावहारिक तथ्य है कि मनुष्य वह नहीं होता, जो वह कहता है, अपितु वह होता है, जो वह करता है। इसका अभिप्राय यह हुआ कि कार्य का प्रभाव बहुत अधिक होता है। मांसाहारी व्यक्ति का मनोविज्ञान निर्दयी, कमजोर, तामसिक बन जायेगा, चाहे वह समाज, धर्म, परोपकार आदर्श आदि की कितनी ही बातें क्यों न करता रहे। किसी न किसी रूप में मांसाहारी की वृत्ति हिंसक व स्वार्थी बन जाती है। उदारता, परोपकार, दूसरों के दुःख-दर्द की संवेदना आदि विचार कमजोर पड़ते जाते हैं। कुल मिलाकर मानसिकता हिंसक पशुओं जैसी बनती चली जाती है। कोमलता, वात्सल्य, सौंदर्यबोध स्वभाव से हटते चले जाते हैं।

7. आध्यात्मिक – ईश्वर के प्रति कृतज्ञता, ईश्वरकृपा ध्यान, ईश्वर के समीप जाने की इच्छा अर्थात् ईश्वर चिन्तन और सभी जगह सभी प्राणियों को ईश्वरपुत्र सभी रचनाओं को ईश्वरकृत मानना, ये विचार सभी प्राणधारियों के प्रति प्रेमभाव, उनमें अपनी तरह ईश्वर का आवास मानना, आध्यात्मिक जीवन के आवश्यक अंग हैं। मांसाहारी जब मांस के लिये किसी जीव की हत्या करता है, तो उसके मस्तिष्क और हृदय से उपर्युक्त सभी भावनाओं, विचार, दृष्टि समाप्त हो जाती हैं। उसका स्वभाव हिंसक पशु जैसा बनना आरम्भ हो जाता है। एक मांसाहारी का आध्यात्मिक व्यक्ति होना किसी भी प्रकार सम्भव नहीं है। मांसाहार और आध्यात्म सिद्धान्त रूप में विपरीत चीजें हैं। आध्यात्मिक जीवन होना मनुष्य की सबसे बड़ी उपलब्धि है, यह केवल मनुष्य शरीर के माध्यम से ही सम्भव है, तो मनुष्य शरीर धारण करके मांसाहार द्वारा हिंसक पशुओं का व्यवहार करना, ईश्वर द्वारा मनुष्य रूपी शरीर मिलने के सौभाग्य को मूर्खतापूर्वक ठुकराने से भी बड़ी मूर्खता है।

मांसाहार का मनुष्य के लिये किसी भी दृष्टि से औचित्य नहीं बनता। विश्व स्तर पर स्पष्ट रूप से कोरोना ने मांसाहार को गलत सिद्ध कर दिया है, इतना कुछ स्पष्ट होने पर भी यदि मनुष्य आदत का गुलाम होकर मांसाहार करता है, तो इससे ज्यादा गिरी हुई स्थिति और क्या हो सकती है।

✍️ डाॅ. भूपसिंह
रिटायर्ड एसोशिएट प्रोफेसर, भौतिक विज्ञान
भिवानी (हरियाणा)

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