राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य पर बड़े भारी उथल-पुथल की संभावना : कोरोना महामारी के चलते विश्व में ढाई करोड़ नौकरियों के समाप्त होने की संभावना

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साक्षात्कार
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◆ अकेले भारत की अर्थव्यवस्था पर 34.8 करोड़ डालर के नुकसान होने का सीधा अनुमान

★ राकेश छोकर/ नई दिल्ली
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कोरोना वायरस जनित वैश्विक महामारी देर-सबेर हम सबका पीछा छोड़ ही देगी। गंभीर संकट उस भयावह भविष्य से जुझने का है जो कोरोना महामारी के बाद सम्पूर्ण विश्व को अपनी चपेट में लेने वाला है। इस मुददे को लेकर लम्बी बातचीत हुई युवा समाजशास्त्री डा0 राकेश राणा से जो चौ0 चरणसिंह विश्वविद्यालय से संबद्ध एम0एम0एच0 कालेज गाजियाबाद के समाजशास्त्र विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर है।
★ डॉ0 राणा आप इस महामारी को एक समाजशास्त्री की दृष्टि से कैसे देख रहे हो!
◆ ” मैं एक समाज-वैज्ञानिक होने के नाते इस संकट को व्यापक प्रभाव डालने वाले घटनाक्रम के रुप में देख रहा हूं। इस सदी के शुरुआत की यह घटना ऐसी होगी जो शायद इस पूरी सदी को अपने प्रभावों की चपेट में ले । कोरोना महामारी के बाद की दुनियां पूरी तरह बदल चुकी होगी, इसके संकेत साफ दिखायी दे रहे है। कोरोना संक्रमण न सिर्फ सामाजिक-आर्थिक बदलाव लायेगा, बल्कि इससे बड़ राजनीतिक उथल-पुथल के संकेत भी राष्टृय और अंतर्राष्टृय राजनीतिक परिदृश्य पर दर्ज होंगें।”
★ रोजगार के क्षेत्र में और महंगाई को लेकर जो खतरे दुनियां पर मंडरा रहे है उसका क्या होगा!
◆ “यू0एन0ओ0 के एक अनुमान के अनुसार कोरोना संक्रमण की महामारी के चलते विश्व में लगभग 2.5 करोड़ नौकरियां खत्म हो सकती हैं। महामारी के महासंकट से उभरने के बाद जो संकट पैदा होने जा रहा है। उसकी भयावहता का अनुमान लगाना और उन तनावों के समाधान सोचना भी हर जिम्मेदार सभ्य नागरिक की भूमिका बनती है। जिसके लिए वैश्विक साझेदारी की जरुरत सबको है। तभी इस संकट से उभर पाना सबके लिए संभव होगा। अंतरर्राष्ट्रीय स्तर पर समन्वित नीति के जरिए ही वैश्विक बेरोजगारी पर कोरोना वायरस के प्रभाव को कम किया जा सकता है। तभी इस वैश्वीकरण का कोई मतलब भी है। वरना सिर्फ पूंजी के लिए अंतर्राष्टृय कसरते होती रहे और संकट में सब अपने-अपने दरवाजे बंद करके बैठ जाय, यह कैसा भूमंडलीकरण हुआ…?”

★ हमारे देश में कौन से ऐसे क्षेत्र है जो इस महामारी से अधिक और सीधे तौर पर प्रभावित होंगें?
◆”देखिए अब दुनियां एक-दूसरे से पूरी तरह जुड़ी हुई है। एक का प्रभाव दूसरे पर होगा ही। और इस संकट ने तो सबको प्रभावित किया है जैसे चीन कमोबेश पूरी दुनियां की जरुरतों को पूरा करने वाले बहुत से कच्चे-पक्के माल का केन्द्र है। वहां उत्पादन प्रभावित होगा तो उससे जुड़े दुनियां के तमाम देशों में जो उद्योग है वे सब बैठ जायेगें। परिणाम होगा बड़े स्तर पर बेराजगारी बढ़गी। अकेले भारत की अर्थव्यवस्था पर ही इसका क़रीब 34.8 करोड़ डॉलर तक का नुक़सान होने की सीधी संभावना है। ”

★. भारत के किन उद्योगों में चीन में उत्पादन के घटने का प्रभाव अधिक पड़ेगा?
◆”भारत का ऑटोमोबाइल उद्योग जो पहले से ही आर्थिक मंदी का सामना कर रहा है, उस पर चीन की मंदी का सीधा नकारात्मक ढ़क से प्रभाव पड़ेगा। भारत अपने ऑटोमोबाइल उद्योग के लिए जो कल-पुर्ज़ें चीन से खरीदता है उनकी पूर्ति मुश्किल होगी। कुछ तो वहां उत्पादन की कमी के चलते दूसरे संक्रमण के भय से बचाव की रणनीति में मार्केट धीमी गति उभरेगा। जिसका परिणाम होगा भारत के जो 3.7 करोड़ लोग ऑटोमोबाइल सेक्टर से जुड़े है वे सब निश्चित रुप से प्रभावित होगें। इसी तरह भारत का ज्वैलरी उद्योग संकटग्रस्त होगा , जिसके साथ एक बड़ी संख्या जुड़ी है। भारत के ज्वैलरी सेक्टर में इस मंदी का मतलब होगा क़रीब सवा अरब डॉलर का बड़ा नुक़सान। क्योंकि इस भारत अपने इस व्यापार का बड़ा हिस्सा चीन और हांग-कांग के साथ ही करता है। ”
★. आप कोरोना संकट के राजनीतिक प्रभावों पर लगातार लिख रहे है किस दिशा में अंतर्राष्टृय संबंध बदलते समीकरणों के साथ उभरते दिख रहे है थोड़ा संक्षेप में बताईए?
◆”इस महामारी के जो कूटनीतिक प्रभाव नकारात्मक दिशा में दिखायी दे रहे है, वे कुछ नए ढ़ंग के क्षेत्रीय तनाव उभार सकते है। नए समीकरण दुनियां की महाशक्तियों को कई तरह की होड़ में डाल सकते है। जिनके प्रभाव और परिणाम पूरी दुनियां को प्रभावित करने वाले होगें। चीन-अमेरिका जिस तरह से साउथ चाइना सी में आमने-सामने आ खड़े हुए है। अपने-अपने फाइटर जेट लगाए खड़े है ,यह तीसरे विश्व युद्ध के हालात बनने से कम कम कहां हैं। यह कोई अचानक से उभरा तनाव नहीं है। यह निरन्तर उस होड़ का परिणाम है जिसमें विश्व के ये दोनों शक्तिशाली देश लगे हुए है। जिसका सबसे ज्यादा यामियाजा एशियाई देशों को भुगतना पड़ सकता है। भारत की स्थिति भी घर्म-संकट में पड़ने वाली होगी। एक तरफ गत कई वर्षों से अमेरिका से नजदीकी बढ़ी है ,जो हमारे पडौसी राष्टृं रुश और चीन को बहुत चुभती है। अमेरिका भी बहुत से अपेक्षाएं रखेगा कि हम चीन का बायकॉट करे। वहीं हमारी भू-राजनीतिक स्थिति और आर्थिक दशा इसकी छूट नहीं देती है। अब देखना यह है कि हम अपने इन तनावों को कैसे मैनेज करते है।”
★ कुल मिलाकर यह संकट बहुत सारे बदलावों की वजह बन सकता है इस पर आप क्या निष्कर्षात्मक टिपपणी देना चाहेगें।
◆”तकनकी का बाजार शिक्षा, चिकित्सा और संचार क्षेत्र में बड़ स्तर पर बढ़ेगा। विकासशील देशों में इस महामारी के संकट कुछ अतिरिक्त रुप से दर्ज होगें। जैसे भारत में प्रवासी मजदूरों का मामला लम्बें समय तक सामाजिक-राजीनतिक प्रभाव डाल सकता है। जिस तरह से वह पूरा परिदृश्य उभरा और कामकाजी लोगों ने अपने आपकों असहाय और असुरक्षित सा महसूस कर जिस तरह से जोखिम में डाला, लोग हजारों किमी0 सड़कों पर पैदल उतरकर अपने सुरक्षित गंतव्यों की ओर बढ़ने को विवश हुए। यह पूरा परिदृश्य भारत में सरकारों को अपना पुनरावलोकन करने और अपनी नीतियों तथा सुरक्षा कार्यक्रमों पर पुनर्विचार को विवश करगें। हमें अपने शहरों को सुरक्षित और संवहनीय बनाने को मजबूर करेगे। प्रवासी मजदूरों के लिए यह संकट कई तरह की विकट परिस्थितियां खड़ी करने वाला साबित होगा। उनका रोजगार छुट गया, उनके मन में अपने शहरों को लेकर असुरक्षा का भाव बढ़ा, उनमें सरकारों के प्रति उदासीनता उभरेगी, उन पर अपने विस्थापन और पुनःव्यवस्था का अतिरिक्त भार बढ़ेगा। आर्थिक रुप से वे एक चरमरायी स्थिति में जिन्दगी को पुनःगठित करने के दुस्साहसों से जूझते हुए जिन तनावों, अभावों और नकारात्मक प्रभावों के शिकार होगें, वे उनके जीवन को बहुत मुश्किल बनाने वाले साबित होगे। तनाव, निराशा, कलह, और कर्ज जिस तरह का एक उत्पीड़क परिदृश्य विकसित करेंगे वह स्थायी बनेगा तो समाज में ढ़ेरो विकृत्तियां आयेंगी। समाज में दुनियां में आत्महत्या का ग्रॉफ बढ़ेगा। लोगों में पागलपन की बढ़ेतरी दर्ज होगी।”
★ होना क्या चाहिए इस संकट से उभरने के लिए?
◆”भारत की विकास दर के वृद्धि आसार कम ही नजर आ रहे है। क्योंकि देश में महंगाई और बेरोज़गारी दोनों बढ़ेगी। जिसका परिणाम विकास दर पर नकारात्मक पड़ना ही है। भारत सहित विश्व के अधिकांश देशों में पूर्ण लॉकडाउन व्यापार को निम्न स्तर पर ले जा रहा है। जिसके सामाजिक और आर्थिक दुष्परिणाम पूरी दुनियां को झेलने पड़गें। इसका एक ही समाधान हो सकता है , सरकार बेहद आर्थिक दबावों में है और आने वाले समय में गंभीर किस्म के राजनीतिक तनावों में होगी। हमें अपनी सामाजिक-सहयोगात्मक व्यवस्था को मजबूत करना होगा। तभी इस गंभीर संकट का सामना सफलता से किया जा सकता है सोशल-सपोर्ट-सिस्टम ही हमें बचायेगा, सबको एक-दूसरे के काम आना होगा। तभी हम उभर पायेंगे।”

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