उन्नीसवीं सदी के आरंभ में एक नवचेतना प्रस्फुटित हुई। शासन की ओर से दमन का विकराल चक्र अपनी तीव्रगति से चल रहा था। उधर देशवासी उस चक्र से अपना पिंड छुड़ाने के प्रयत्न में थे। देश की राजनीति प्रार्थना व याचना से आगे बढ़कर लोकमान्य तिलक के नेतृत्व में दबाव डालने की नीति तक पहुंच चुकी थी और वीर सावरकर जैसे प्रखर देशभक्त नवयुवकों के संसर्ग ने उसे दबाव डालने की नीति से भी आगे बढ़कर, गोलियों की धांय धांय की ओर अग्रसर किया था। दादाभाई नौरोजी जैसे अतीव सज्जन शांतिप्रिय नेता भी विद्रोह की बात सोचने पर विवश हो गये। स्वदेशी व बायकॉट का चहुं ओर प्रचार होने लगा।
इन्हीं दिनों सेनापति बापट, होतीलाल वर्मा तथा हेमचंद्र दास जैसे कुछ क्रांतिकारी विदेशों से भारत पहुंच गये थे। वे अपने साथ एक बम मैन्युल ले आए थे । उसमें बम बनाने की बडी सुन्दर उपयोगी विधि लिखी थी। उस मैन्युल की साईलोस्टाइल प्रतियां सभी क्रांतिकारी केन्द्रों को भेज दी गयीं। यह विधि बड़ी उपयोगी सिद्घ हुई। बड़े शक्तिशाली बम बनने लगे।
बम तैयार हो जाने के बाद उसके प्रयोग करने की आवश्यकता पड़ी। बंगाल में वीरेन्द्र के दल ने चंद्रनगर स्टेशन के समीप गवर्नर की गाड़ी पर 1857 में बम फेंका पर वह प्रयोग असफल रहा। एक स्टेशन को उखाडऩे का एक और प्रयत्न भी सफल न हुआ। तीसरा प्रयोग गवर्नर की गाड़ी पर किया गया। गाड़ी उड़ गयी। नीचे कई फुट गहरी खाई हो गई। गवर्नर किसी प्रकार बच गया। उन दिनों फ्रांस की बस्ती चंद्रनगर से अस्त्र-शस्त्र प्राप्त करना बड़ा सरल था। कन्हाईलाल दत्त नामक एक युवक वहां देख रेख पर नियुक्त था। बंगाल में उन दिनों अरविंद घोष की अनुशीलन समिति यौवन पर थी।
बंगाल में किंग्जफोर्ड नाम का एक मैजिस्टे्रट था। उसका हृदय बड़ा कठोर था। देश भक्त नवयुवक जब अपराधी बनाकर उसकी अदालत में लाए जाते थे तो वह भी आवश्यकता से अधिक जोश दिखाकर उन्हें बड़ी सजाएं देता था। उसकी कलम के झटकों से कितने ही नवयुवक यमलोक का रास्ता देख चुके थे। क्रांतिकारी युवकों से यह देखा न गया। उन्होंने साम्राज्यवाद के इसस पिट्ठू के आतंक का उत्तर आतंक से देने का निश्चय किया। इस योजना की गंध कहीं से सरकारी गुप्तचरों को मिल गयी। प्राणों का मोह किसे नही होता। किंग्जफोर्ड ने अपनी तब्दीली बिहार के मुजफ्फर नगर में करवा ली। वहां पपर वह जिला जज होकर गया। उस समय तक किंग्जफोर्ड बंगाली नवयुवकों की आंखों का कांटा बन चुका था। सरकार इस बात को जानती थी। अत: उसकी रक्षा का सब प्रबंध किया गया। दो सिपाही सदा उसके साथ रहते।
क्रांतिकारियों ने किंग्जफोर्ड के नाम पुस्तकों का एक पार्सल भेजा। उसमें एक पुस्तक में छिपाकर एक बम रखा गया था। वह इस प्रकार का बम था कि ज्यों ही किंग्जफोर्ड महोदय पार्सल को खोलता, वह भयंकर बम फटकर उसे सदा की नींद सुला देता। पर भाग्य उसके साथ था। उसने न जाने क्या सोचकर उस पार्सल को कभी खोला ही नही।
पार्सल का निशाना खाली गया। जब अनुशीलन समिति ने दो नवयुवक खुदीराम बोस और प्रफुल्लचंद्र चाकी को पिस्तौल, बम आदि सेस लैस करके यह काम करने के लिए नियुक्त कर दिया। दोनों युवक दल की आज्ञा पाकर मुजफ्फरपुर पहुंच गये। स्टेशन के पास ही एक धर्मशाला थी। उसी में दोनों अपने सामान सहित ठहर गये। वे वहां पर 10-12 दिन तक रहे। यह समय उन्हें किंग्जफोर्ड की गतिविधियों का पता लगाने में लगा। उन्होंने ठीक पता कर लिया कि सांय के समय सभी अंग्रेज अधिकारी एक क्लब में आकर मिलते हैं। किंग्जफोर्ड किस विशेष रंग की गाड़ी में बैठकर जाता है-यह भी उन्होंने पता लगा लिया था।
मुजफ्फपुर में एक अंग्रेज वकील पी.कैनेडी भी रहता थ। उसकी गाड़ी का रंग भी वही था, जो किंग्जफोर्ड की गाड़ी का था। पर इस बात का पता इन नवयुवकों को न लग सका।
1908 की 30 अप्रैल थी। रात के लगभग साढ़े आठ बजे थे। प्रफुल्ल व खुदीराम क्लब के फाटक के बाहर वृक्षों की ओट में छिपे अपने शिकार की प्रतीक्षा कर रहे थे। सामने फाटक से एक फिटन निकली। उन्होंने ध्यान से देखा। उसकाा रंग वही था, जिस रंग की फिटन पर किंग्जफोर्ड चलते थे। बस फिर क्या था। निशाने की दूरी पर आते ही बम गाड़ी पर दे मारा। गाड़ी चकनाचूर हो गयी। पर दुर्भाग्य कि उनका शिकार उस गाड़ी में न था। वह गाड़ी उस अंग्रेज वकील की थी। उसमें उसकी पत्नी व लड़की ध्ज्ञर जा रही थीं। दोनों घायल हो गयीं। कुमारी कैनेडी तो एक घंटे बाद ही मर गयी, पर श्रीमति कैनेडी की मृत्यु दो मई को हुई।
चारों ओर कत्ल कत्ल की आवाज से कोलाहल मच गया। खून से लथपथ दो निर्दोष रमणियों की लाशें सड़क पर पड़ी ब्रिटिश साम्राज्यवाद पर हंस रही थी। व्यक्तिगत दृष्टिï से वे रमणियां निर्दोष थी, इसमें कोई संदेह नही। पर भारत के भाग्य से खिलवाड़ करके यहां के सर्वस्व को लूटने वाली उस नृशंस अंग्रेज जाति की वे सदस्या तो थीं। कई बार के सामूहिक पापों का फल निर्दोष सदस्यों को भी भुगतना पड़ता है।
किंग्जफोर्ड की प्राणरक्षा का उन दिनों खूब प्रबंध किया गया था। उस दिन उनकी रक्षा के लिए दो सिपाही, तहसीलदार खां व फैजउद्दीन नियुक्त थे। इन दो सिपाहियों ने सांय के समय प्रफुल्ल चाकी व खुदीराम को क्लब के सामने की सड़क पर घूमते हुए देखा था। सिपाहियों ने उनको वहां से चले जाने को भी कहा था। बम के धमाके की आवाज सुनकर तहसीलदार खां आगे बढ़ा। उसने उन दिनों को भागते हुए भी देख लिया था। तब तक वे उसकी पकड़ से बाहर निकल चुके थे।
हत्या के एकदम बाद नगर में पुलिस का जाल बिछ गया। चारों ओर पुलिस ही पुलिस नजर आ रही थी। नगर को घेर लियाा गया। सबकी तलाशियां ली जाने लगीं। दोनों का यथासंभव हुलिया सब पुलिस चौकियों को भेज दिया गया। सब ओर हत्यारों को पकडऩे के प्रयत्न हुए। अंग्रेजी राज्य की छाती पर यह प्रहार बड़ी प्रबल था। क्रांतिकारियों द्वारा बम प्रयोग करने का यह प्रथम अवसर था। बम के द्वारा यह प्रथम राजनैतिक हत्या थी।
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