ओ३म
xxxxxxxxxxxx
वैदिक धर्म एक सम्पूर्ण उत्कृष्ट जीवन शैली है। इसमें पर्वों को मनाने पर किसी प्रकार की रोक नहीं है। पर्व प्रसन्नता एवं उल्लास का एक अवसर होता है। इसके लिये हमारे कुछ प्राचीन मनीषियों ने वर्ष की कुछ तिथियां निर्धारित की हुई हैं जिन पर इन पर्वों को मनाया जाता है। इसका यह लाभ भी होता है कि ऐसे अवसरों पर हम धर्म, संस्कृति तथा स्वस्थ मनोरंजक गीत व संगीत को सुनते हैं जिससे हमारे जीवन में जो शंकायें अथवा कुछ निराशा की स्थिति होती है, वह दूर हो जाती है। वैदिक धर्म का सन्देश है कि किसी भी परिस्थिति में मनुष्य को निराश नहीं होना चाहिये। उसे हर विपरीत परिस्थिति का अपनी पूरी सामथ्र्य एवं बल से सामलना करना चाहिये। हमारा धर्म अपने सभी अनुयायियों को यह आदेश भी करता है कि किसी भी प्रतिकूल परिस्थितियों में फंसे व्यक्ति की हर प्रकार की सहायता करनी चाहिये जिससे उसका दुःख, कष्ट आदि दूर हो सके। यही कारण है कि हमारा सारा जीवन व्यतीत हो जाता है और हमें कभी कोई बड़ी समस्या अथवा कष्ट आता ही नहीं है। यदि आता भी है तो परिवार, मित्रजनों व पड़ोसियों के सहयोग से दूर हो जाता है। इसके साथ ही वैदिक घर्म व संस्कृति में कुछ नियम ऐसे बनाये गये हैं जिनका पालन करने से मनुष्य के ऊपर समस्यायें व विपदायें आती नहीं या बहुत ही कम जाती हैं। हम प्रतिदिन प्रातः व सायं सन्ध्या करते हैं। इससे हमारा सृष्टि के बनाने व पालन करने वाली सत्ता परमात्मा से मेल व मित्रता होती है। सर्वशक्तिमान ईश्वर का सहाय हमें प्राप्त होता है। ऐसी स्थिति में हमारे ऊपर आने वाली अनेक विपदायें जो सन्ध्या आदि शुभ कार्य न करने पर आ सकती हैं, आती नहीं हैं। ईश्वर उनको आने ही नहीं देता। ईश्वर की सन्ध्या करने से हमारी आत्मा व मन में ईश्वर से अनेक प्रेरणायें प्राप्त होती हैं। इन प्रेरणाओं को जानने व समझने से हमें बहुत लाभ होता है। हम गायत्री मन्त्र के पाठ व जप में ईश्वर से बुद्धि को श्रेष्ठ प्रेरणायें करने का अनुरोध करते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि ईश्वर हमें प्रेरणा देकर हमारा मार्गदर्शन करते हैं जो हमारे व हमारे परिवार के लिये हितकर व उपयोगी होता है।

हमारे जितने भी पर्व व उत्सव होते हैं उन सबमें हम ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना व उपासना सहित अग्निहोत्र यज्ञ का अनुष्ठान अवश्य करते हैं। इस अवसर पर कुछ भक्ति गीत गाने और अज्ञान दूर करने वाले वेदज्ञान से युक्त किसी ग्रन्थ का स्वाध्याय करने का भी विधान होता है। हम अपने विद्वानों से वार्तालाप कर उनसे उनके अनुभवों से भी लाभ उठाते हैं। उत्सव में नाच व अभद्र गानों का कोई स्थान नहीं होना चाहिये। नैतिकता एवं जीवन को सन्मार्गगामी बनाने के लिये ऐसा करना आवश्यक होता है। हम जो देखते व सुनते हैं उनका हमारे मन व हृदय सहित आत्मा पर संस्कार होता है। उसी से हमारा अच्छा व बुरा निर्माण होता है। जो व्यक्ति अच्छे काम कम और बुरे काम अधिक करते हैं उसका कारण उनका संगति-दोष एवं ज्ञानार्जन में ध्यान न देना होता है। संगति के गुण व दोष दोनों ही मनुष्य के जीवन में आते हैं। अतः हमें अच्छे लोगों की ही संगति करनी चाहिये। बुरे लोग वह होते हैं जो असत्य बोलते हैं तथा स्वार्थ सिद्धि के लिये उचित व अनुचित का विचार नहीं करते। इन स्वार्थी लोगों में ऐसे भी होते हैं जो कई प्रकार से देश व समाज सहित मानवता का अहित करने वाले काम भी करते हैं। हमारे देश में ऐसे लोगों की विगत कई शताब्दियों से कमी नहीं है। अतः ऐसे लोगों की संगति से बचना चाहिये। इनके विपरीत गुणों वाले सज्जन, चरित्रवान, समाज व देश को महत्व देने वाले तथा उसकी उन्नति के काम करने वाले, दान की प्रवृत्ति वाले, वैदिक धर्म व संस्कृति सहित इसके गौरवमय आदर्श महापुरुषों राम, कृष्ण, दयानन्द आदि के जीवनों से प्रेरणा लेनी चाहिये। आर्यसमाज के सत्संगों में जाने से भी वहां वेदों व शास्त्रों के अच्छे विचार सुनने को मिलते हैं जिनसे हमारे ज्ञान में वृद्धि होने सहित हमें सत्कर्मों को करने की प्रेरणा मिलती है। अतः हमें अपने जीवन को ऊंचा उठाने, उसे सम्मान दिलाने तथा जीवन में दूसरों का मार्गदर्शन करने सहित उनको ऊपर उठने में सहायता करने का मार्गदर्शन भी हमें उत्सवोें के अवसर पर की जाने वाले सामूहिक सामाजिक सभाओं आदि गतिविधियों के माध्यम से मिलता है। हमें जीवन को लाभ पहुंचाने वाले इन कार्यों को अवश्य ही करना चाहिये और पर्वों को मनाते समय जो कार्यक्रम आयोजित हों उनमें इन लाभों को सम्मुख रखकर कार्यक्रम बनाने चाहियें।

होली वैदिक धर्म के चार प्रमुख पर्वों में एक एक मुख्य पर्व है। इस पर्व का आगमन शरद ऋतु के समाप्त होने तथा वातावरण एवं ऋतु परिवर्तन के साथ होता है। इससे पूर्व शीत ऋतु में सभी प्राणी शीत से त्रस्त रहते हैं। शीत ऋतु में अनेक रोग भी होते हैं। उत्तर भारत के लोगों को वृद्धावस्था तथा हृदय, बी.पी, व कोलेस्टराल के रोगियों को विशेष कठिनाईयां होती हैं। ऐसा देखा गया है कि अन्य ऋतुओं की तुलना में शीत ऋतु में अधिक लोग मरते हैं। शीत ऋतु के समाप्त होने पर सभी के लिये जीवनयापन आसान हो जाता है। गेहूं सभी अन्नों में प्रमुख अन्न है। अन्न ही हमारा भोजन होता है तथा शरीर को शक्ति प्राप्त कराने का साधन होता है। होली के समय गेहूं व जौ की फसल में नवान्न से युक्त बालियां आ जाती हैं। अब इस अनन को सूर्य की गर्मी में पकना होता है। होली के अवसर पर कुछ ग्रीष्मों प्रदेशों में फसल की कटाई आरम्भ हो जाती है और कहीं कुछ दिन बाद में होती है। इस पर्व का महत्व दोनों की कारणों से है। शीत की समाप्ती, ग्रीष्म ऋतु का आगमन व उसका स्वागत तथा गेहूं व यव की नई फसल का स्वागत एवं इस उपकार के लिए ईश्वर का धन्यवाद। मनुष्य जीवन पर विचार करें तो उसका शरीर अन्नमय है। शरीर का पोषण अन्न से होता है और गेहूं व यव अन्न में प्रमुख अन्न हैं। यह गेहूं आदि अन्न पूरे वर्ष भर व उससे कुछ अधिक समय तक हमारी क्षुधा की निवृत्ति करने सहित शरीर का पोषण भी करता है। अतः मनुष्य जीवन के आवश्यक एवं अपरिहार्य पदार्थ अन्न के स्वागत व उसके लिये हमारे ईश्वर का धन्यवाद करने के लिये हमारे देश के कृषक व अन्य सभी लोग भी इस पर्व को मनाते हैं।

होली का पर्व फाल्गुन मास की पूर्णमास को मनाया जाता है। पूर्णमास ऋतु परिवर्तन का दिन होता है। ऋतु परिवर्तन पर मनुष्य के शरीर में तापक्रम की दृष्टि से कुछ परिवर्तन होता है। शरीर उस परिवर्तन में सहज रूप से ढल जाये इस कारण होली के दिन वृहद यज्ञों को करने का विधान प्राचीन काल से चला आ रहा है। यज्ञ से हानिकारक किटाणुओं का दुष्प्रभाव दूर होता है। वृहद यज्ञ से घर के भीतर की दूषित वायु भी बाहर निकल जाती है और बाहर की शुद्ध वायु घर के भीतर प्रविष्ट होकर यज्ञ की आहुतियों से युक्त होकर गुणकारी एवं स्वास्थ्य के लिये हितकार होती है। ऐसे बहुत से लोग होते हैं जो यदाकदा ही अग्निहोत्र यज्ञ करते हैं। उन बन्धुओं व परिवारों द्वारा होली के दिन यज्ञ करने से विशेष लाभ होता है। किसान अन्न को अपने लिये भी प्रयोग करता है और उसे बाजार में बेच कर अपनी अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। इस फसल से उसे लगभग 6 माह के अपनी आवश्यकता की पूर्ति और अन्य कार्यों के लिये धन प्राप्त होता है। अतः किसान का अपनी फसल के स्वागत में खुशियां व प्रसन्नता मनाना उचित ही है। यह कारण होली पर्व को मनाने की परम्परा प्राचीन काल से जारी है।

होली का आगमन शीत ऋतु के वसन्त ऋतु में होता है। इस अवसर पर यव व गेहूं आदि की नई फसल भी तैयार हो जाती है। हमारे कृषक व अन्य सभी जन ईश्वर प्रदत्त मनुष्य की प्रमुख आवश्यकता भोजन की वर्ष भर के लिए प्राप्ति पर स्वाभाविक रूप से प्रसन्न व आनन्दविभोर होते हैं और ईश्वर का धन्यवाद करने के लिये कोई विशेष आयोजन करना चाहते हैं। उसी पर्व व उत्सव की अभिव्यक्ति होली पर्व के रूप में होती है। प्राचीन काल में इस अवसर पर वृहद यज्ञ करके तथा विद्वानों के ईश्वर के मनुष्य जाति पर उपकारों का व्याख्यान सुनकर लोग ईश्वर की उपासना में मग्न हो जाते थे। नये अन्न से आहुतियां देकर ईश्वर के प्रति आभार प्रकट करते थे। हम समझते हैं कि ऐसा करने में किसान का जो सात्विक भाव होता है उससे अन्न उत्पादन में कुछ वृद्धि भी होती है। सभी लोग एक दूसरे को पर्व की शुभकामनायें देते थे। घरों में पकवान बनते थे। इन पकवानों का अपने इष्ट मित्रों व सभी पड़ोसियों में वितरण किया जाता है। एक दूसरे के घर जाकर उनके हालचाल पूछते और अपने व्यंजन उन्हें देकर उनके व्यंजनों का स्वाद लेते थे। सामूहिक भोज के आयोजन भी यत्र-तत्र होते हैं और इस अवसर पर मंगल गान व संगीत आदि के आयोजन भी किये जाते थे। आज इस पर्व के स्वरूप व आयोजन पद्धति में कुछ विकार आ गया है। आर्यसमाज के सभी लोग वेदानुगामी होने से अन्धविश्वासों व कुपरम्पराओं को अपने जीवन में स्थान नहीं देते परन्तु वह अपने ही बन्धुओं को नशा करते देखते हैं जो कि सर्वथा अनुचित होने के साथ वैदिक धर्म एवं संस्कृति में निन्दनीय एवं त्याज्य है। यह मनुष्य की जीवन की उन्नति में बाधक है और हमें ईश्वर से दूर कर उसकी कृपाओं से भी वंचित करता है। इसके सेवन से मनुष्य अपमानित व लज्जित होने सहित रोगी एवं अल्पायु भी होते हैं। हमारी संस्कृति विश्व की श्रेष्ठ एवं सबके लिए वरणीय संस्कृति है। हमें इसके आदर्श रूप को ही देश, समाज सहित विश्व के सम्मुख उपस्थित करना चाहिये। इसी में हमारा, देश व विश्व का कल्याण निहित है। वर्तमान में हमारा धर्म एवं सुरक्षित नहीं है। इसे विदेशी मत-मतान्तरों एवं नास्तिक विचारों वाले लोगों से अनेक खतरे हैं। यदि आलस्य प्रमाद और धर्म की अवहेलना व उसकी उपेक्षा से वैदिक धर्म व संस्कृति लुप्त हो गई तो हम पाप के भागी होंगे और हमारी सन्ततियां दीर्घ काल तक दुःख भोगेंगी। उसके बाद पता नहीं ऋषि दयानन्द की तरह से वैदिक धर्म का उद्धार करने वाला कोई ऋषि होगा या नहीं? अतः हमें कर्तव्य को पहचान कर धर्म रक्षा के सभी उपाय करने चाहियें। फाल्गुन पूर्णमास वा होली पर्व की सभी देशवासियों को शुभकामनायें एवं बधाई। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

Comment:

grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betnano giriş
betpark giriş
betpark giriş
betvole giriş
betvole giriş
fenomenbet
betvole giriş
betkanyon
betvole giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
imajbet giriş
vaycasino giriş
imajbet giriş
vaycasino giriş
safirbet giriş
safirbet giriş
betvole giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
timebet giriş
timebet giriş
maxwin
realbahis giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
timebet giriş
timebet giriş
betpuan giriş
betpuan giriş
vaycasino giriş
meritking giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
kulisbet giriş
mariobet giriş
realbahis giriş
vaycasino giriş
grandbetting giriş
hititbet giriş
norabahis giriş
grandpashabet giriş
betnano giriş
betvole giriş
grandpashabet giriş
betnano giriş
betnano giriş
norabahis giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
betwild giriş
betwild giriş
imajbet giriş
damabet
betnano giriş
betnano giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
vaycasino giriş
betvole giriş
betpark giriş
betvole giriş
betpark giriş
celtabet giriş
betpipo giriş
norabahis giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
superbahis giriş
perabet giriş
perabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet
betpark giriş
betnano giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betgaranti giriş
betnano giriş
maxwin giriş
maxwin giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
betpas giriş