मनुस्मृति या संविधान किसे चुने

manusmriti and sanvidhan

लेखक – आर्य सागर

आज साधारण जन की तो बात ही छोड़िए तथाकथित प्रबुद्ध बुद्धिजीवी वर्ग के सम्मुख जब यह प्रश्न आता है की मनुस्मृति या संविधान इन दोनो में किसको चुने या कौन श्रेष्ठ है तो जो मनुस्मृति की विषय वस्तु अध्ययन से अनभिज्ञ हैं वह तपाक से संविधान का चयन करता है और जो संविधान से अनभिज्ञ है वह मनुस्मृति को सर्वोपरि मानता है भले ही उसने मनुस्मृति का अध्ययन ना किया हो बहुत सी निज आस्था धार्मिक सांस्कृतिक विश्वासो से प्रेरित होकर वह ऐसा करता है एक तीसरा वर्ग है जो संख्या में बहुत कम है जिसने यथार्थ मनुस्मृति व संविधान दोनों का ही तुलनात्मक अध्ययन किया है वह भी संविधान व मनुस्मृति के बीच मनुस्मृति का चयन करेगा लेकिन उसके चयन में संविधान का भी चयन निहित रहता है यह आगे भली भांति स्पष्ट हो जायेगा।

मनुस्मृति व संविधान में किसका चयन किया जाए कौन ज्यादा उपयोगी है यह प्रश्न ही ईमानदार नहीं है यह प्रश्न दुराग्रहों से प्रेरित होकर लंबे समय से विशेष तौर पर स्वाधीनता के उपरांत से तथाकथित बुद्धिजीवियों के वैचारिक अहंकार भाव की तुष्टि या उनके निजी विश्वासों के सार्वजनिकरण के लिए एक हथियार के तौर पर प्रयोग किया जाता है ऐसे प्रश्न मनुस्मृति ना ही संविधान दोनों में किसी के भी के आदर को स्थापित नहीं करते । मनुस्मृति मानव धर्म या कर्तव्य शास्त्र या मानव संविधान है जो उपलब्ध संहिताबद्ध ग्रंथों में विश्व का सर्वाधिक प्राचीन लिखित विधान शास्त्र भी है। जब मैं यहां भी शब्द का प्रयोग कर रहा हूं तो यह केवल विधान शास्त्र मात्र ही नहीं मनुस्मृति आचार शास्त्र, मोक्ष शास्त्र भी है मनुस्मृति के 12 अध्यायों में विषयों की व्यापकता है इसका प्रथम अध्याय सृष्टि की उत्पत्ति व विभिन्न जीवो की कैसे उत्पत्ति हुई इसकी भी तार्किक मीमांसा करता है मनुस्मृति के विषय की तुलना आधुनिक भारतीय संविधान से कभी भी नहीं की जा सकती संविधान जो एक लोकतांत्रिक गणराज्य देश को चलाने की सर्वोच्च विधि या कुंजी है उसका आविर्भाव भी परंपरागत मनुस्मृति के राजधर्म या राजव्यवस्था से जैसे जुड़े अध्याय 7,8,9 इनमें विवेचित विषयों में ही हो जाता है ।

जब हमसे कोई यह पूछे की आत्मा या मन की शुद्धि व आचार की पवित्रता के लिए हमें किस ग्रंथ में शाब्दिक समाधान खोजना होगा एक अच्छा मानव बनने की मार्गदर्शक शिक्षाएं हमें कहां मिलेगी तो वहां आधुनिक संविधान में इसका कोई उल्लेख नहीं है आध्यात्मिक उत्कर्ष के लिए मनुस्मृति मार्गदर्शक के रूप में हमें दिखाई देगी वहां संविधान मौन है मौन ही नहीं एक कदम आगे बढ़कर संविधान वहां अध्यात्म धर्म के प्रति उदासीन है या तुष्टीकरण के नाम पर उसे कर दिया गया है , जब मनु यह कहते हैं कि आचारहीन को कोई पवित्र नहीं कर सकता तो उस व्यक्ति को आधुनिक संविधान भी अपने संवैधानिक प्रशासनिक कर्तव्य के प्रति सजग नहीं कर सकता भारतीय संविधान में शिक्षा के अधिकार को मौलिक अधिकार बहुत बाद में माना गया जबकि मनु सभ्यता के आदिकाल से ही बिना भेदभाव के समान शिक्षा व्यवस्था की स्थापना प्रत्येक बालक बालिका के लिए राज व्यवस्था की ओर से करते हैं । जहां एक व्यक्ति के लिए राजा या राजकार्य के लिए किसी पद पर स्थापित होने के लिए मनु की व्यवस्था में उसका आस्तिक जितेंद्रिय चरित्रवान तपस्वी शराब आदि दुर्व्यसन से रहित होना आवश्यक है तो वही आधुनिक संविधान में किसी व्यक्ति के विधायक सांसद मुख्यमंत्री बनने के लिए केवल यही अहर्ता है कि वह भारत का नागरिक हो, 25 वर्ष से अधिक आयु का हो दिवालिया ना हो अब आप ही विश्लेषण करें कौन से मानदंड उच्च व पवित्र है।

मनु की व्यवस्था में पढ़ने पढ़ने वाले चरित्रवान तपस्वी हो मनु की व्यवस्था में शिक्षक को आचार्य मानते हुए पिता माना गया है जो अपने ज्ञान अनुभव से अपने विद्यार्थियों की रक्षा करता है लेकिन आज की आधुनिक व्यवस्था में शिक्षक क्या-क्या अपने छात्र-छात्राओं के साथ नहीं करते अनेकों शर्मनाक घटनाएं सामने आती है। मनु की शिक्षा व्यवस्था में पूरे देश में एक ही अध्ययन अध्यापन की प्रणाली थी एक समान ही विषय पढ़ाए जाते थे चाहे भौतिक उन्नति की बात हो या आध्यात्मिक उन्नति की आज की शिक्षा व्यवस्था में अध्यात्म तो उपेक्षित ही रहा क्या पठन-पाठन में एकरुपता है क्या सभी राज्यों में एक ही पाठ्यक्रम है मनु की व्यवस्था में पठन-पाठन व्यवस्था में विद्या सभा का हस्तक्षेप होता था जो राज सभा से भी सर्वोपरि थी जिससे शिक्षा व्यवस्था का पतन ना हो लेकिन आज यहां प्राइवेट स्कूलों पर क्या कोई लगाम है जो मनमानी फीस बढ़ाते हैं नर्सरी की किताबें मेडिकल इंजीनियरिंग की किताबों से महंगी मिलती है प्राइवेट स्कूलों में।

मनु की व्यवस्था में एक बुद्धिमान के मत का मूल्य हजार मूर्खों के मत से अधिक है लेकिन आज की व्यवस्था में एक मूर्ख व एक बुद्धिमान नागरिक दोनों के मत की समान गणना की जाती है। ऐसी परस्पर तुलना के एक नहीं हजारों विचारणीय बिंदु है यह तो केवल उदाहरण मात्र प्रस्तुत किए गए हैं कोई यह भी अर्थापति ना निकले कि संविधान की कोई आलोचना करने का हमारा उद्देश्य है स्वाधीनता के उपरांत देश को एकजुट करने के लिए भारत संघ की स्थापना के लिए उपलब्ध संसाधनों परिस्थितियों के आधार पर संविधान सर्वाधिक उपयोगी रहा है संविधान में जो जो आदर्श व्यवस्थाएं हैं इस विशाल हमारे इस विभिन्न संस्कृतिक भाषायी विविधता युक्त देश को चलाने के लिए उन सभी में मनुस्मृति की मूल व्यवस्था कार्य कर रही है इसमें भी खुद संविधान का महत्व कम नहीं है। मनुस्मृति और संविधान की कोई तुलना नहीं हो सकती क्योंकि मनुस्मृति के विषय बहुत व्यापक हैं जिनमें पति-पत्नी के विवाद पिता पुत्र के विवाद भाई-भाई के विवाद शासन व प्रजा के विवाद किसान व शिल्पियों के विवादों के लिए व्यवस्था है तो वहीं सन्यासियों वानप्रस्थीयो ब्रह्मचारियों आचार्यों के कर्तव्यों की भी गहन मीमांसा मनुस्मृति में की गई है ।मनुस्मृति एक ऐसे दिव्य मानव का निर्माण करने की प्रेरणा देती है जो देश काल मत पंथ जाति में निहित राग से जिसका चिंतन लघुता को प्राप्त नहीं होता।

मनुस्मृति बताती है क्या पाप है क्या पुण्य है यह हमें बताती है भले ही आप वेद को ना माने खुद मनुस्मृति या अन्य स्मृतियों को ना माने लेकिन आप अपने पूर्वजों या वर्तमान में जो महापुरुष है उनके आचरण को भी नहीं मानते उनका अनुसरण नही करते तो आपकी आत्मा को जो प्रिय है उसे कसौटी पर तो आप चलें सत्य में श्रद्धा झूठ में अश्रद्धा तो प्रत्येक व्यक्ति को है हिंसा किसी भी मनुष्य को प्रिय नहीं है यही आत्मा की कसौटी है मनु इसको भी प्रमुखता देते हैं मार्गदर्शक सिद्धांत में। मनु धर्म व कर्तव्यों के नाम पर हमें टोने टोटका नाम जप पाठ गंडा ताबीज को धार्मिक पाखंड आंडबर में नहीं फसाते मनु तो धर्म के नाम पर पाखंड करने वालों से मनुष्य मात्र को सावधान करते हैं पाखंडियों के लक्षण खुद मनु ने अपने अनेक श्लोकों में लिखे हैं ।जीवन के मार्गदर्शन का इतने सरल महान उपदेश क्या कहीं मिल पाएंगे। निष्कर्ष यही निकलता है जो मनुस्मृति को जानकर पढ़कर मनुस्मृति की शिक्षाओं को जो अपने जीवन में लागू करता है वही सच्चे अर्थों में आधुनिक संविधान के मौलिक अधिकारों की प्राप्ति व कर्तव्यों का पालन कर पाएगा। मनुस्मृति में जो विषय उठाए गए हैं वह विषय देश काल की दृष्टि से सार्वभौमिक सर्वजनीन है पृथ्वी के मनुष्य मात्र के लिए उपयोगी है तो वही आधुनिक हमारे देश का संविधान केवल भारत गणराज्य की सीमाओं में ही लागू होता है यह पाकिस्तान नेपाल बांग्लादेश आदि में लागू नहीं होता संविधान के विषय में मानवता समता बंधुता की मूल भावना की जो बात की जाती है उसका मूल स्रोत भी मनुस्मृति की आचार परक शिक्षा ही है मनुस्मृति के अध्याय 2 ,3 व 4 में पूरी व्यापकता से इसका उल्लेख है।

जो मनुस्मृति को मानेगा वह अपने निहित निस्वार्थ के लिए राष्ट्र की संपत्तियां को नहीं जलाएगा ना ही हिंसा करेगा न हीं राष्ट्र के प्रति द्रोह का भाव रखेगा अपितु वह सार्वजनिक सर्वहितकारी नियमों को पालन करेगा लेकिन दोगलापन तो देखिए बात-बात पर आधुनिक संविधान की दुहाई देने वाले संविधान की हत्या कर परमऋषि मनु और मनुस्मृति जैसे आदर्श मानव कर्तव्य शास्त्र को पानी पी पीकर कोसते हैं बदनाम करते हैं मनुस्मृति जहां स्त्रियों का आदर करने से दिव्या लाभों की प्राप्ति की बात करती है परिवार राष्ट्र की समृद्धि स्त्रियों के सम्मान में ही निहित है यह मनुस्मृति कहती है तो वही आज आधुनिक संविधान की दुहाई देने वाले देश की संसद में 33 फ़ीसदी महिला आरक्षण का एक स्वर में विरोध करते हैं ।मनुस्मृति कहती है परिवार के लिए एक व्यक्ति को त्याग दें गांव के हित के लिए एक परिवार को त्याग दें जनपद के लिए उस गांव को भी त्याग दे और राष्ट्र के हित के लिए जनपद को भी तक दें तो वहीं यह परिवारवादी लोग या राजनैतिक दल आज अपने परिवारों को बचाने के लिए देश हित त्याग में भी कभी परहेज नहीं करते। निष्कर्ष यही निकलता है मनुस्मृति व संविधान की कोई तुलना नहीं हो सकती आधुनिक संविधान राज व्यवस्था को चलाने की केवल कुंजी मात्र है और उस राज व्यवस्था की कर व्यवस्था सहित विधान मनुस्मृति के सातवें आठवी नवे अध्याय में है , वह भी उसे काल से जब दुनिया में भारतवर्ष को छोड़कर कहीं भी अरब यूनान रोम यूरोप में राजनीतिक व्यवस्थाओं राजधर्म लोकतंत्र शासन न्याय व्यवस्था की किसी व्यवस्था या विधान का कोई उल्लेख नहीं था ।

पश्चिमी राजनीतिक विचारको दार्शनिकों अरस्तु ,प्लूटो व मांटेस्गयू आदि जैसे विचारको से भी हजारों वर्ष पहले मनु न्यायसभा, राज्यसभा, विद्यासभा, धर्म सभा जैसी व्यवस्थाओं का गठन कर चुके थे। मनु की मनुस्मृति केवल विधान शास्त्र ही नहीं है आचारशास्त्र मोक्ष शास्त्र आरोग्य शास्त्र दिनचर्या शास्त्र भी है मनुस्मृति के 12 अध्यायों में विषयों की व्यापकता है आधुनिक पूरा संविधान तो केवल मनुस्मृति के तीन अध्याय की शिक्षाओं की आधी अधूरी झलक मात्र है, उसमें भी मनुस्मृति का पूरा आदर्श नहीं लिया गया है राज व्यवस्था के मामले में भी। मनुस्मृति जिस मानव का निर्माण करती है वह कानून व दंड विधान को आदर प्रदान करता करता है वह अपने को विधि के अधीन मानता है ना की विधि से ऊपर मनु का मानव अधिकारों से पहले कर्तव्य की बात करता है और दंड के विषय में खुद मनु ने कहा दण्डः शास्ति प्रजा: अर्थात दंड ही सब पर शासन करता है जब सब प्रजा सो जाती हैं तो अकेला दंड ही जागता है दंड जो सोते हुए हैं उनका भी रक्षक बना रहता है इसलिए बुद्धिमान लोग दंड को राजा का प्रमुख धर्म मानते हैं।हम कह सकते हैं मनुवादी ही सच्चा संविधानवादी होता है।

लेखक – आर्य सागर
तिलपता ग्रेटर नोएडा

Comment:

hititbet
betwoon giriş
betwoon giriş
betasus giriş
imajbet güncel
betpipo giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
Vdcasino
imajbet güncel giriş
vaycasino giriş
Betzula giriş
kralbet giriş
safirbet güncel
bettilt giriş
bettilt giriş
vdcasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
kralbet giriş
kralbet giriş
imajbet güncel
imajbet güncel
imajbet giriş
betpark
vdcasino giriş
katlabet giriş
katlabet giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betpark giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
vdcasino giriş
vdcasino
betorder
milanobet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
meritking giriş
mrking giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
milanobet
milanobet
betorder giriş
milanobet
milanobet
cratosroyalbet giriş
cratosroyalbet giriş
cratosroyalbet giriş
vaycasino
vaycasino giriş
kralbet giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
holiganbet giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
cratosroyalbet giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
artemisbet giriş
artemisbet giriş
artemisbet giriş
artemisbet giriş
avvabet giriş
avvabet giriş
avvabet giriş
avvabet giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
kolaybet
Kolaybet
betpark giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
imajbet giriş
imajbet güncel
holiganbet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
meritking giriş
mrking giriş
meritking giriş
mrking giriş