pakistan sponsor of terrorism

वर्तमान में भारत-पाकिस्तान की सीमा पर जिस प्रकार के हालात बने हुए हैं ,उनके दृष्टिगत सारे देश की मांग यही है कि पाकिस्तान को इस बार पाठ पढ़ा ही देना चाहिए। प्रधानमंत्री श्री मोदी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत की सेना ही यह तय करेगी कि उसे पाकिस्तान को किस प्रकार, कब , कहां और कैसे पाठ पढ़ाना है ? इस समय दोनों ओर ही सोशल मीडिया पर वाक युद्ध छिड़ा हुआ है। कागजी शेर कागजी बम फोड़ने में लगे हुए हैं। इस समय युद्ध को लेकर सोशल मीडिया पर गंभीर चिंतन नहीं आ रहा है। भावुकता के बयान सोशल मीडिया पर दिखाई दे रहे हैं। देश के प्रधानमंत्री को क्या करना चाहिए या सेना को क्या करना चाहिए और किस प्रकार हम अपने देश की कम से कम हानि करके भी शत्रु को सही रास्ते पर ला सकते हैं ?- ऐसा चिंतन निकलता हुआ दिखाई नहीं दे रहा।

ऐसा तो नहीं कहा जा सकता कि हमारे देश के रणनीतिकारों ने कोई लक्ष्य निर्धारित नहीं किया होगा। निश्चित रूप से लक्ष्य निर्धारण का कार्य किया जा चुका है- ऐसा माना जा सकता है। क्योंकि बिना लक्ष्य के कभी भी कोई भारत जैसा गंभीर देश किसी दिशा में आगे बढ़ने का निर्णय नहीं कर सकता। फिर भी मीडिया में इस प्रकार के लेख स्पष्ट रूप से आने चाहिए कि यदि हम इस समय पाकिस्तान के साथ युद्ध करते हैं तो वह किस लक्ष्य को लेकर किया जाएगा ? क्या हमारा लक्ष्य आतंकी ठिकानों को समाप्त करना मात्र होगा या पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर को जितना होगा या पाकिस्तान के टुकड़े करना हमारा लक्ष्य होगा या पाकिस्तान में घुसकर पाकिस्तान को पाकिस्तान की औकात दिखाना हमारा उद्देश्य होगा ?

सर्वप्रथम पाकिस्तान पोषित आतंकवाद के संदर्भ में हमें यह बात ध्यान रखनी चाहिए कि यह आतंकवाद कल परसों की बात नहीं है। जिस समय पाकिस्तान का जन्म भी नहीं हुआ था, उस समय से ही भारत इस प्रकार के इस्लामिक आतंकवाद को झेलता आ रहा है। पाकिस्तान का जन्म ही इस बात को लेकर हुआ था कि उसे भारत को समाप्त करने के लिए एक शिविर के रूप में प्रयोग किया जाएगा। आज पाकिस्तान के बड़े अधिकारी या कोई नेता जब यह कहता है कि हम पिछले 30 वर्ष से आतंकवाद का गंदा काम करते आ रहे हैं तो इसका अभिप्राय यह नहीं है कि पाकिस्तान के नेताओं का हृदय परिवर्तन हो गया है और उन्होंने सच को स्वीकार कर लिया है। वास्तव में ऐसा कहना केवल समस्या की वास्तविकता से ध्यान बंटाना माना जाना चाहिए । ऐसा कहकर वे यह दिखाना चाहते हैं कि हम गलती स्वीकार कर रहे हैं और आगे से ठीक रहेंगे। जबकि भारत को पाकिस्तान के पिछले इतिहास पर चिंतन करना चाहिए। जिस समय पाकिस्तान के साथ लाल बहादुर शास्त्री जी युद्ध कर रहे थे तो युद्ध हारने के बाद रूस द्वारा आहूत की गई ताशकंद बैठक में हुए ताशकंद समझौता के समय पाकिस्तान की तब भी यही भाषा थी कि अब कभी हम भारत के साथ युद्ध नहीं करेंगे। ऐसा कहकर पाकिस्तान तब हमारे देश के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी से भारत द्वारा जीते गए क्षेत्र को वापस लेने में सफल हो गया था। हमारे प्रधानमंत्री ने बड़े भारी दिल से रूस के दबाव में आकर उस दस्तावेज पर हस्ताक्षर कर दिए थे।

6 वर्ष पश्चात ही 1971 में पाकिस्तान ने भारत के साथ फिर युद्ध करने की हिमाकत की। उस समय पाकिस्तान के प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो ने हमारे देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के सामने नाक रगड़ते हुए यह कहा था कि “मैडम ! इस बार छोड़ दो। अब हम कभी भारत की ओर पैर करके भी नहीं सोएंगे ।” यह कहकर ही वह चालाक भुट्टो भारत से अपनी 93 हजार की गिरफ्तार सेना छुड़वा कर ले गया था। जबकि यह सही समय था, जब हम 93 हजार सेना के बदले में पाकिस्तान से अपना कश्मीर वापस ले सकते थे। यह वही भुट्टो था जो युद्ध से पहले कहा करता था कि भारत से हम 1000 वर्ष तक युद्ध लड़ेंगे। युद्ध के बाद अपनी औकात मालूम होते ही उसने रंग बदल दिया था, और हमारे देश की प्रधानमंत्री के सामने गिड़गिड़ाकर अपना उल्लू सीधा कर गया था। इतना ही नहीं, 1999 में कारगिल के समय में भी इसी पाकिस्तान ने अमेरिका के तलवे चाटकर युद्ध विराम के लिए भारत को मनवा लिया था । तब भी इसने लगभग यही भाषा बोली थी कि गलती हो गई और आगे से अब और नहीं करेंगे।

कुल मिलाकर पहली बात तो यह है कि हम पाकिस्तान की किसी भी प्रकार की गिड़गिड़ाहट पर ध्यान न दें। इसकी गिड़गिड़ाहट में भी धोखा होता है। हम सब एकता का परिचय दें और एक ही लक्ष्य को निर्धारित कर अपने देश की सरकार व सेना के पीछे आकर खड़े हो जाएं। दूसरे, इस बार हम सबका मनोयोग केवल एक होना चाहिए कि पाकिस्तान को हराना भी है और मिटाना भी है। उसके जितने टुकड़े हो सकते हैं कर दिए जाने चाहिए। तीसरे,अपना पीओके वापस लेना है।

हमारा ऐसा मानने का एक ही कारण है कि पाकिस्तान और उसके नेता भली प्रकार जानते हैं कि इतिहास हमेशा विजेता का होता है । यदि वह भारत को मिटाने की योजना पर यदि कुछ काम कर रहा है तो बहुत सोच समझकर कर रहा है। वह जानता है कि जो जीतेगा वही मुकद्दर का सिकंदर कहलाएगा। उनकी सोच बड़ी साफ है कि काम करते रहो, जिस दिन लक्ष्य प्राप्त कर लोगे अर्थात जिस दिन हिंदुस्तान का इस्लामीकरण करने में सफल हो जाओगे, उस दिन इतिहास भी अपना होगा और भूगोल भी अपना होगा। वह जानते हैं कि किस प्रकार भारत का मूर्ख बनाकर उन्होंने अपना देश प्राप्त कर लिया था ! उन्हें यह भी पता है कि जब एक बार कोई क्षेत्र देश के रूप में अपने पास आ जाता है तो फिर उसे भारत उल्टा नहीं ले पाता। यहां तक कि कश्मीर से आजादी के बाद भी मुसलमानों ने यदि हिंदुओं को भगा दिया था तो आज तक भारत की सरकारें वहां पर पलायन कर गए कश्मीरी पंडितों का पुनर्वास नहीं करा पाई हैं।

इधर हम हैं कि विदेशियों से भरपूर ताकत के साथ लड़ने के उपरांत भी मनोवांछित फल प्राप्त नहीं कर पाए। हमने पुरुषार्थ भी किया, पराक्रम भी दिखाया। परंतु मनोवांछित फल प्राप्त नहीं कर पाए। इसका कारण है कि हमारा अभियान हम सबका अभियान बनकर आगे नहीं बढ़ा । हम भूल गए कि कभी महाराणा कुंभा ने जातिवाद को मिटाने के लिए चित्तौड़ में एक सभा आयोजित कर सभी क्षत्रिय जातियों को अपने नाम के सामने लिखने के लिए ‘राजपूत’ शब्द दिया था ।उनका यह चिंतन भारतीय समाज को एकता के सूत्र में बांधने के लिए आया था, जातिवाद और गोत्रवाद को मिटाने के लिए आया था, परंतु हमने क्या किया ? हमने ‘ राजपूत’ भी एक जाति बना दी और आज हम सभी क्षत्रिय जाति के होकर भी आपस में लड़ रहे हैं। कोई किसी को गद्दार बता रहा है तो कोई किसी को गद्दार बता रहा है ? हम कल भी अपने सांझा शत्रु को सब का शत्रु नहीं मान रहे थे और आज भी हम वही भूल कर रहे हैं। जातियों की जूतियों में हमने दाल बांटनी छोड़ी नहीं है।

इसी प्रकार कभी संभाजी ने भी संगमेश्वर में एक बैठक आहूत कर वहां पर यह निर्णय लिया था कि सब मिलकर मुगल विहीन भारत बनाएंगे। 28 मार्च 1737 को मुगलों से भारत को छीनकर शिवाजी के वंशज अपने संकल्प में सफल भी हो गए, परंतु हमारे ही लोगों ने उन्हें मराठा समझकर निपटाने का काम करना आरंभ कर दिया। अपने ही लोगों ने संभाजी महाराज की औरंगजेब से दर्दनाक हत्या करवा दी। इस प्रकार मुगल विहीन भारत बनाने का सपना संभाजी के साथ ही विदा हो गया। आज भी यदि किसी नेता के द्वारा ऐसा कहीं संकल्प व्यक्त किया जाता है कि हम मुगलों के वंशज अर्थात उस विचारधारा के लोगों का सफाया करेंगे जो भारत को तोड़ना चाहते हैं या भारत का इस्लामीकरण करना चाहते हैं तो उसे दबाने वाले अधिकांश वे चेहरे होते हैं, जिन्हें हम अपना मानते हैं । कदाचित यही वह स्थिति है जो भारत के लिए सर्वथा प्रतिकूल कही जा सकती है। इस सबके उपरांत भी हमें आज एकजुट होने की आवश्यकता है। भारत के पराक्रमी इतिहास को स्मरण कर आज उस सोच से भारत को मुक्त करना है जो मुगलिया सोच कहलाती है। आतंकवाद भारत की जमीन पर विदेशी मानसिकता और विदेशी सोच की देन है। जिसे मिटाना समय की आवश्यकता है। सनातन तभी फूलफल सकता है जब प्रत्येक प्रकार का आतंकवाद और जिहाद समाप्त होगा।

डॉ राकेश कुमार आर्य
(लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं )

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