‘संस्कृति नाशकों’ के विरुद्ध हिन्दू राजवंशों का ‘राष्ट्रीय संकल्प’ 

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भारत के 1235 वर्षीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास (भाग-1) वे थमे नहीं, हम थके नहीं

अध्याय – 2

  • डाँ० राकेश कुमार आर्य

हिंदू शक्ति के बिखराव के इस काल को यद्यपि हम अच्छा नहीं मानते, पर फिर भी इस काल में विदेशी ‘संस्कृति नाशक’ इस्लामिक आक्रांताओं को देश में न घुसने देने का ‘राष्ट्रीय संकल्प’ तो अवश्य जीवित था। इसी संकल्प ने सदियों तक देश की हस्ती नहीं मिटने दी और देश की हर प्रकार से रक्षा की। हमारे लिए उचित होगा कि हिंदू शक्ति के इस ‘राष्ट्रीय संकल्प’ को भी स्वतंत्रता संघर्ष का एक ‘सांझा स्मारक’ माना जाए। यह स्मारक देश में उस समय की उन सभी शक्तियों और राजाओं को या राजवंशों को समर्पित होना चाहिए, जिन्होंने किसी भी प्रकार से विदेशी संस्कृतिनाशकों का प्रतिरोध और विरोध किया।

जिन लोगों ने ‘हिंदू इतिहास’ के इस उज्ज्वल पृष्ठ को अथवा काल को अथवा स्मारक को भारतीय इतिहास से लुप्त करने का या इसे कम महत्व देने का प्रयास किया है, उनके उस प्रयास के पीछे कारण यही है कि इस देश का इतिहास किसी भी प्रकार के ‘राष्ट्रीय संकल्प’ से हीन करके प्रस्तुत किया जाए. जिससे कि हिंदू जाति में अपने अतीत के प्रति कोई जिज्ञासा अथवा श्रद्धा भाव उत्पन्न न हो। इसीलिए रघुनंदन प्रसाद शर्मा ने लिखा है-

‘भारत का इतिहास आज जिस रूप में सुलभ है, उस पर दृष्टि से विचार करने पर निराशा ही हाथ लगती है, क्योंकि उससे वह प्रेरणा मिलती ही नहीं, जिससे भावी पीढ़ी का कोई मार्गदर्शन हो सके। रोथ, वेबर, व्हिटलिंग, कूहन आदि लेखक इस बात के लिए कृतसंकल्प हैं कि जिस प्रकार से भी हो, भारत का प्राचीन गौरव नष्ट किया जाए। उनके लिए यह असहाय और अन्याय की बात ही रही है कि जब उनके पितृ वनचरों के समान गुजारा कर रहे थे, उस समय हिंदुओं के भारतवर्ष में पूर्ण सभ्यता और आनंद का डंका बज रहा था।’

कदाचित इसी मानसिकता के कारण भारत का इतिहास कुछ इस प्रकार प्रस्तुत किया गया है कि जैसे ही यहां मोहम्मद बिन कासिम आया तो यह देश मानो तुरंत ही भर गया था, फिर उसके पश्चात कभी उठा ही नहीं और मरे हुए को ही लगभग तीन सौ वर्ष पश्चात महमूद गजनवी के द्वारा आकर रौंद दिया गया। स्वतंत्रता के स्मारकों की इस उपेक्षा को अंततः यह राष्ट्र कब तक सहन करेगा? जीवितों को मारने का या अपनी जीवन्तता को अपनी मृत्यु समझने की आत्मप्रवंचना से हम कब आंखें खोलेंगे? तीन सौ वर्ष के लंबे इतिहास के लंबे घपले को सहन करना राष्ट्र की निजता, देश के सम्मान और हिंदुत्व के गौरव को तिलांजलि देने के समान है। संसार में सचमुच एक हम ही हैं, जिन्होंने धर्मनिरपेक्षता जैसी एक मानवताविहीन, धर्मविहीन, आस्थाविहीन और राष्ट्रीय गौरव के प्रति सर्वथा मूल्यविहीन विचारधारा को पकड़‌कर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने का आत्मघाती प्रयास किया है। नहीं तो क्या बात है कि हमारे पास अपने राष्ट्रीय गौरव के कथ्य, तथ्य और सत्य होने के उपरांत भी हम उन्हें एक माला में पिरोकर ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ का हनुमान चालीसा बनाकर प्रत्येक बच्चे के हाथ में सौंपने से बचते जा रहे हैं? हिंदुत्व इस देश का राष्ट्र धर्म है, जो इसकी गौरवमयी सांस्कृतिक जीवन पद्धति होती है और उस संस्कृति का प्रतीक कोई एक ऐसा शब्द प्रत्येक देश अपने लिए चुनता है, जिससे उस देश की महानता और उस देश का गौरव स्पष्ट होता हो। पता नहीं भारत इस विषय में चुप क्यों है?

(1) हो गए तीन से आठ

भारतीय राजनीतिक शक्तियां हर्ष के पश्चात एक से तीन हो गई। यह सारी की सारी शक्तियां भारत में प्रतापी चक्रवर्ती साम्राज्य स्थापित करने के लिए संघर्ष करने लगीं। इनकी संघर्ष की यह भावना ही हमारे लिए कष्टकारी बनी। गुर्जर प्रतिहार शासक, पाल शासक और राष्ट्रकूट शासक परस्पर उलझने लगे। फलस्वरूप इनको शक्ति का पतन और क्षरण होने लगा। तब देश के विभिन्न भागों में कई राजवंश उभरे। इन सारे राजवंशों में से प्रमुख राजवंशों की संख्या आठ थी। इस प्रकार शक्ति का एकीकरण होने के स्थान पर विघटन होने लगा। सार्वभौम सत्ता राष्ट्रीय एकता के संदर्भ में आवश्यक होती है, जिसका इन आठ राजवंशों की उपस्थिति के कारण अब अभाव-सा हो गया, परंतु हमारा मूल विषय है कि हमारा देश कभी पूर्णतः गुलाम नहीं रहा, तो इसी विषय पर प्रकाश डालने का प्रयास किया जाएगा।

सर्वप्रथम हम नए आठ राजवंशों के विषय में सूक्ष्म-सी जानकारी लेते हैं। गुर्जर प्रतिहार वंश के पतन अथवा हास काल में इस वंश के भग्नावशेषों पर ही नए आठ राजवंशों में से कई ने अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के स्वर्णिम सपने बुनने प्रारंभ किए थे। इनमें जेजाकभुद्धि (आजकल का बुंदेलखण्ड) का चंदेल राजवंश सर्वप्रमुख है। इसका प्रथम शासक नन्नुक था। यह राजवंश प्रारंभ में गुर्जर प्रतिहार वंश का सामंत था। गुर्जर प्रतिहारों से मुक्त होकर इस वंश ने गोपगिरि (ग्वालियर) भास्वत (भिलसा) काशी को भी अपने साम्राज्य में मिलाया। महमूद गजनी ने 10वीं शताब्दी के अंत में जब भारत पर आक्रमण करने आरंभ किए तो उस समय राजा धंग चंदेल इस राज्य का स्वामी था।

(2) चंदि का कल्चूरि राज्य

इस वंश की राज्य की स्थिति आजकल के मध्य प्रदेश के जबलपुर के आसपास थी। इनकी राजधानी का नाम त्रिपुरी था। यह राजवंश प्राचीन है, परंतु गुर्जर प्रतिहार शासकों के काल में इसकी स्थिति केवल एक सामंत की सी थी। इस वंश की स्थापना कोकल्ल प्रथम ने की थी। गजनी के आक्रमण के पूर्व इस वंश के कई शासक आए। गजनी के आक्रमण के समय कोकल्ल द्वितीय शासन कर रहा था। चेदि के अलावा कलचूरि वंश का एक अन्य राज्य भी था, जिसे इतिहास में ‘सरयूपार का कल्चूरि राज्य’ कहा जाता है। इसकी स्थिति सरयू और गण्डक नदियों के मध्य थी।

(3) मालवा का परमार वंश

चेदि के पश्चिम में ‘धारा नगरी’ में मालवा का परमार वंश शासन कर रहा था। परमार राजपूत आबू पर्वत के समीपवर्ती चंद्रावती तथा अचल गढ़ के क्षेत्र में निवास करते थे। कालांतर में वे वहां से मालवा आ बसे थे। प्रारंभ में यह लोग भी गुर्जर प्रतिहार शासकों के अधीन थे, परंतु इस वंश की शक्ति क्षीण होने पर अन्य वंशों की भांति यह वंश भी स्वतंत्र हो गया। इस वंश का प्रतापी शासक मुंज था, जो कि 973 ई. के लगभग राजसिंहासन पर आरूढ़ हुआ था। उससे पूर्व सीयम का इस राज्य पर शासन रहा था। सीयम का मुंज (मूंज के खेत में मिलने से) दत्तक पुत्र था। सीयम के संन्यास लेने पर मुंज ही शासक बना।

इसने अपने राजवंश की सीमाओं में वृद्धि की। 995 ई. के लगभग इसके शासन का अंत हो गया। बाद में इसके भाई सिंधुराज ने शासन किया। सिंधुराज अपने पिता के द्वारा मुंज के गोद लेने के उपरांत उत्पन्न हुआ था। इसी सिंधुराज का लड़का राजा भोज था। गजनी के तुर्कों के आक्रमण के समय अपने राजवंश का शासक यही भोज ही था। उसका नाम भारतवर्ष में प्रचलित दन्तकथाओं में अब तक बड़े सम्मान से लिया जाता है।

(4) राजपूताना के राज्य

राजपूताना के अनेक राजपूत राज्य आठवीं-नौवीं शती में गुर्जर प्रतिहार सम्राटों के आधिपत्य में रहे थे। इनमें चाहमानों का शाकम्भरी का राज्य (वर्तमान साम्भर) चित्तौड़ का गुहिल या गहलोत राजवंश (जिसमें आगे चलकर महाराणा प्रताप उत्पन्न हुए) धनवर्गता का गुहिलवंश वर्तमान हरियाणा और दिल्ली (ढिल्लिका) का तोमरवंश, इत्यादि प्रमुख थे। यह सभी राजवंश गुर्जर प्रतिहार वंश के कभी सामंत थे।

गुर्जर प्रतिहारों के पतन के काल में इन वंशों ने अपना-अपना राज्य विस्तार करना आरंभ किया। शाकम्भरी का प्रथम शासक आठवीं शती के आरंभ में चंद्रराज था। इस वंश में आगे चलकर दुर्लभराज शासक बना, उसका उत्तराधिकारी गोविंद राज बना, जो कि गुर्जर शासक नागभट्ट (795-833 ई.) की राजसभा में सम्मानपूर्ण स्थान रखता था। इसके काल में सिंध के शासक बशर ने आक्रमण किया था, जिसे इस राजा ने असफल किया था। शाकम्भरी का पूर्ण स्वतंत्र राजा सिंहराज था। गजनी के तुकों के आक्रमण के समय सिंहराज का उत्तराधिकारी विग्रहराज शाकम्भरी पर शासन कर रहा था। चौहान (चाहमान) वंश की एक शाखा नडोल पर दूसरी धौलपुर तथा तीसरी प्रतापगढ़ के प्रदेशों पर शासन कर रही थी। यह तीनों चाहमान शासकों की शाखाएं थीं, जो कि कभी गुर्जर प्रतिहार सम्राटों की सामंत थीं।

राजपूतानों का एक अन्य महत्वपूर्ण राजवंश गुहिलोत था, इसकी दो शाखाएं मेदपाट (मेवाड़) और धावगर्ता (चित्तौड़) थीं। मेदपाट के प्रतापी शासक बप्पारावल का उल्लेख हमने पूर्व में किया है। मेदपाट की राजधानी कभी आधार नगरी (उदयपुर के पास) थी। कालांतर में चित्तौड़ बनी। बहुत संभव है कि अकबर के आक्रमण के समय जब राणा उदयसिंह मेवाड़ छोड़कर भागने को विवश हुए तो पुरानी राजधानी आधार नगरी को ही उदयपुर के नाम से बसाया हो। 10वीं शती में इस वंश ने स्वतंत्र शासकों के रूप में कार्य करना आरंभ किया।

दिल्ली के तोमर भी प्रारंभ में गुर्जर प्रतिहार वंश के सामंत थे। तोमर राजा गोग्य ने पृथूदक (वर्तमान पिहोबा) में तीन विष्णु मंदिरों का निर्माण कराया था। यह राजा गुर्जर प्रतिहार वंश के महेन्द्रपाल प्रथम (885-908) का समकालीन था और उसके प्रभुत्व को स्वीकार करता था। यह वंश 12वीं शताब्दी के मध्य तक दिल्ली पर शासन करता रहा। हां, बाद के दिनों में यह राज्य चाहमानों के आधिपत्य में चला गया था। चाहमान विशाल देव ने तोमरों की सत्ता दिल्ली से समाप्त की थी. जिससे दिल्ली और हरियाणा पर चाहमानों या चौहानों का शासन स्थापित हो गया।

(5) गुजरात और कठियावाड़ के राज्य

गुजरात और काठियावाड़ के कई राजवंश प्रारंभ में कभी राष्ट्रकूटों के तो कभी गुर्जर प्रतिहारों के सामन्त रहे थे। परंतु राष्ट्रकूटों तथा गुर्जन प्रतिहार वंश के दुर्बल होने पर वहां भी कई स्वतंत्रत राज्य वंशों ने शासन करना आरंभ कर दिया था। इनमें अनहिलपाटक का चौलुक्य राज्य और सौराष्ट्र का सैंधव राज्यवंश प्रमुख हैं। अनहिलपाटक को आजकल अन्हिलवाड़ा कहा जाता है। सौराष्ट्र के सैंधव राज्य वंश की राजधानी भूताम्बिलिका (वर्तमान भुमिली) थी। इन दोनों राज्यवंशों के कई राजाओं ने देर तक शासन किया। जिनके विषय में पर्याप्त जानकारी हमें इतिहास से मिलती है।

(6) उत्तर पश्चिमी भारत के राज्य

कन्नौज के पतन के पश्चात उत्तर पश्चिमी भारत में भी कई राज्यवंश उभर कर ऊपर आए। इनमें उत्तर पश्चिमी भारत का हिंदू शाही राज्यवंश सर्वप्रमुख हैं। गुप्तवंश में इस राज्यवंश को गुप्त शासकों ने उभरने नहीं दिया था। कश्मीर के राजा ललितादित्य ने भी इन्हें अपने अधीन रखा, पर अब अवसर आते ही इन्होंने अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित कर ली थी। इसके शासक कल्लर या लल्लिय का राज्यक्षत्र काबुल तक के फैल गया था। यद्यपि 870 में काबुल को अरब सेनापति याकूब ने जीत लिया। लल्लिय ने अपनी राजधानी सिंध नदी के पश्चिमी तट पर अटक 15 मील उत्तर की ओर स्थित उदभाण्डपुर को बनाया था। लल्लिय के पुत्र कमल वर्मा या कमलुक ने अरब अक्रांताओं को कई बार परास्त किया था, वह 904 ई. में गद्दी पर बैठा था। इसके रहते अरब के मुस्लिम आक्रांता भारत में घुसपैठ नहीं कर पाये थे। इसी राज्यवंश में अगले शासक भीमपाल, जयपाल आदि थे। तुकों के आक्रमण के समय इस वंश का शासक जयपाल था। वह अत्यंत पराक्रमी था। उदभाण्डपुर से काबुल तक परचम फहराने वाले और देश की स्वतंत्रता के लिए सदा सजग रहने वाले इस राज्यवंश के प्रति भी इतिहास में उपेक्षा भाव अपनाया गया है। आज का कबुल यदि हिंदूसाही राज्यवंश को या उसके जयपाल सरीखे राजाओं को भूलता है तो बात समझ में आ सकती है लेकिन उसे भारत भी भूल जाए, यह समझ नहीं आता।

(7) सिन्ध का राज्य

सिन्ध का अपना केन्द्र बजनाकर अरब के आक्रांता भारत के गुजरात, काठियावाड़, राजपूताना और उत्तर भारत के अन्य राज्यों पर आक्रमण करते रहे।

जिनका उल्लेख पूर्व में हो चुका है। नौवी शताब्दी में अरब राज्य भी दो भागों में विभक्त हो गया-मंसूर और मुल्तान में। मंसूर का राज्य सिंध की राजधानी अलोर से लेकर समुद्र तट तक फैला था जबकि उत्तरी भाग मुल्तान राज्य के आधीन था।

(8) सूर्य मंदिर बना दुर्बलता

मुलतान में उस समय एक प्राचीन सूर्य मंदिर था। भारत वर्ष के गुर्जर प्रतिहार शास्कों ने कई बार मुलतान के मुस्लिम शासक को परास्त कर मुलतान को अपने राज्य में मिलाने का प्रयास किया था, लेकिन मुस्लिम शासकों ने सूर्य मंदिर को नष्ट करने की धमकी देकर गुर्जर प्रतिहारों से अपना पीछा छुड़ाने में सफलता प्राप्त की। इस प्रकार एक मंदिर के टूटने का डर हमारे शासकों से मुस्लिम आक्रान्ताओं की रक्षा कराता रहा।

(9) कश्मीर

कश्मीर में नागककोर्ट वंश का राज्य था। जिसका अंत 855 ई. में माना गया है। यहां शासक ललितापीड़ एक जयादेवी नामक कन्या के प्रेमजाल में ऐसा फंसा कि उसी के भाईयों द्वारा उसका अंत (855 ई. में) कर दिया गया। जयादेवी के भाई उत्पल के लड़के अवन्ति वर्मा ने इस वंश को समाप्त कर उत्पल वंश की स्थापना की। इस वंश में अवन्ति वर्मा (855 ई.-883 ई.) स्वयं एक प्रतापी शासक था। उसने अवन्तिपुर नामक नगर बसाया तथा नहरें आदि निकालकर जनहित के बहुत से अच्छे कार्य भी किये। अवन्ति वर्मा के बाद उसका लड़‌का शंकर वर्मा (855 ई.-902 ई.) काश्मीर की गद्दी पर बैठा। उसने त्रिगर्त (कांगड़ा) तक अपना राज्य विस्तार किया। इस राजा की मृत्य के पश्चात उत्पल वंश धीरे-धीरे पतन की ओर बढ़ने लगा था। इसके पश्चातवर्ती शासक क्रूर और प्रजा पीड़क सिद्ध हुए, तब ब्राह्मणों की एक सभा ने यशस्कर को कश्मीर का राजा नियुका किया। यशस्कर एक योग्य और न्यायप्रिय शासक सिद्ध हुआ। उसने 936 ई. से 948 ई. तक कश्मीर पर शासन किया। उसके मंत्री पर्वगुप्त ने उसकी हत्या कर दी और राजसिंहासन पर अधिकार कर लिया था। परंतु अगले ही वर्ष पर्वगुप्त की मृत्यु हो गयी तो उसका पुत्र क्षेमगुप्त सिंहासन पर बैठा। वह भी अयोग्य सिद्ध हुआ। 958 ई. में उसकी मृत्यु हो जाने पर उसका पुत्र अभिमन्यु काश्मीर का राजा बना। लेकिन अभिमन्यु अभी अल्पव्यस्क ही था इसलिए राजमाता दिक्षा ने उसके नाम पर राज्य संचालन किया। दिद्दा महारानी एक योग्य शाप्तिका थी परंतु अपने ही दरबारी तुग के साथ उसके अनैतिक संबंध थे। इसलिए वह अधिक लोकप्रिय सिद्ध न हो सकती। उसने अपने ही बेटे अभिमन्यु की मृत्यु (972 ई.) हो जाने पर शासन सूत्र अपने हाथों में ले लिया और पूर्ण शासक बनकर राजा करने लगी। प्रेमासक्ता रानी ने अपने पौत्रों को भी मरवा दिया, जिससे कि वह निष्कंटक राज्य कर सकें। 980 ई. में वह पूर्ण शासिका बनी थी। 1003 ई. में उसकी मृत्यु हुई तो उससे पूर्व अपने भतीजे संग्राम राज को उसने अपना उत्तराधिकारी बना दिया था। जिसने कश्मीर में लोहरवंश की स्थापना की। इसने गजनी के विरुद्ध शाही राजा त्रिलोचन पाल की सहायता के लिए महामंत्री तुंग के नेतृत्व में सेना भेजी थी।

(10) पर्वतीय क्षेत्र के अन्य राजा

हिमालय के पर्वतीय क्षेत्रों में उस समय राजपुरी दार्वाभिसार, कीर चम्बा और कुलूत (कुल्लू) में विभिन्न राज्यों की सत्ता स्थापित थी। इसी प्रकार वर्तमान उत्तराखण्ड के गढ़वाल तथा कुमायूं क्षेत्रों के भी अलग-अलग राजा थे। इसी प्रकार अलमोड़ा के बैजनाथ नामक स्थान पर उस समय कात्तिकेयपुर नामक नगर था जो कि अल्मोड़ा के राजाओं की राजधानी रही थी।

(11) हमारा आशय क्या है

गुर्जर प्रतिहार वंश के पतन के पश्चात भारत में विभिन्न राजवंशों का जिस प्रकार उल्लेख हमें उपलब्ध होता है उसे स्पष्ट करने का या उसका यहां वर्णन करने का हमारा आशय मात्र इतना है कि गजनी के आक्रमण के समय तक भारत की राजनीतिक शक्तियों में विखण्डन तो था पर राष्ट्रीयता का भाव पूर्णतः जीवित था। तभी तो इस्लामिक आक्रांताओं के विरुद्ध वे परस्पर एक दूसरे की सहायता करते रहे। शत्रु हमारी सीमा पर घात लगाये बैठा रहा और हमारे शासक निरंतर तीन सौ वर्षों तक उनके आक्रमणों के प्रति जागरूक रहे। शत्रु ताक में बैठा था कि कब हम सो जाएं और वह अपना काम कर जाए, पर हम थे कि सो ही नहीं रहे थे। एक तो हम इस तथ्य को स्थापित करना चाहते हैं।

दूसरे जिस गुर्जर प्रतिहार वंश ने अपना प्रतापी विशाल राज्य स्थापित किया और समकालीन इतिहास में राष्ट्रीय एकता का पवित्र स्मारक स्थापित किया उस वंश के साथ इतना अन्याय क्यों किया गया कि उसे अपेक्षित सम्मान और स्थान इतिहास में दिया ही नहीं गया? यही स्थिति अन्य शासकों की है। जब पूरा भारत स्थानीय राजाओं के राज्य में स्वाधीन था तो 712 ई. में मौहम्मद बिन कासिम के आक्रमण के पश्चात से गजनी के आक्रमण के समय (लगभग 1000 ई.) तक पूरे भारत को ऐसा क्यों दिखाया जाता है कि जैसे सारे भारत से ही इस काल में राजनीतिक चेतना की बिजली गुल हो गयी थी और सर्वत्र पूर्णतः
अंधकार छा गया था। विशेषतः तब जबकि राष्ट्रीय एकता के विभिन्न स्मारक इस काल में बड़े ही गौरवमयी ढंग से स्थापित किये गये थे पूरे भारत वर्ष में फैले विभिन्न राजवंशों के इतिहास को समेकित करने की आवश्यकता है। जो इतिहासकार ये कहते हैं कि उस समय के भारतीय राजवंशों में परस्पर समन्वय नहीं था और शत्रु से भिड़कर राष्ट्रीय एकता स्थापित करने का भाव नहीं था वे अंशतः सत्य हो सकते हैं. पूर्णतः नहीं। ऐसे लोगों का यह आरोप या धारणा भी है कि उस समय भारत में राष्ट्र ही नहीं था। इनका यह आरोप या धारणा तो नितांत निर्मूल ही है।

(12) भ्रान्ति निवारण

इन इतिहासकारों का ज्ञान पूर्ण है। भारत में राष्ट्र प्राचीन काल से रहा है। राष्ट्र एक अमूर्त भावना होती है। जिसे उस देश के सांस्कृतिक, सामाजिक, भौगोलिक, ऐतिहासिक, धार्मिक और नैतिक मूलय बराबर क्रियाशील थे। हां, राजनीतिक रूप से विभिन्न राजवंश परस्पर संघर्षरत अवश्य थे। परंतु वह संघर्ष भी सम्राट बनने के लिए था, जिसका अर्थ था पूरे देश में राजनीतिक एकता लाना, राजनीतिक मूल्यों से अलग ऊपरिलिखित मूल्य हैं वे सब तो कार्य करते रहे पर राजनीतिक व्यवस्था छिन्न भिन्न हो गयी। फिर भी एक बात संताषजनक थी कि बाहरी आक्रामकों के विरुद्ध अधिकांश राजवंश एक थे और यह भाव भी राष्ट्र होने के भाव को ही इंगित करता है। परस्पर संघर्ष करते करते इन विभिन्न राजवंशों में से कोई राजवंश सम्राट तो नहीं बन पाया। परंतु लंबे सघर्षों के कारण इनमें परस्पर घृणा का भाव अवश्य विकसित होने लगा। सत्य को स्थापित करने या नकारने में कभी भी अतिरेक नहीं वरतना चाहिए। न्यायपूर्ण दृष्टिकोण अपनाना ही उचित होता है। अब तनिक विचार करें भारत की सीमाओं की चिंता की। हां, कश्मीर का राजा अपने राज्य की सीमाओं के प्रति भी किसी अन्य देशी राजा से यही अपेक्षा करता था कि हमें मत छेड़ना। हम अपनी स्वतंत्रता अलग बनाये रखेंगे। अपनी स्वतंत्रता के प्रति सजग रहना कोई अपराध नहीं था-केवल एक दोष था और यह दोष भी एक दिन में नहीं आ गया था, अपितु बहुत दूर और बहुत देर से क्षरण की वह प्रक्रिया चल रही थी।

(13) अश्वमेध यज्ञ की परंपरा

हमारे यहां अश्वमेध यज्ञ करने की परंपरा रही है। अश्वमेध यज्ञ करने का अधिकार साधु समाज उसी राजा को देता था जिसके राज्य में प्रजा पूर्णतः सुखी, संपन्न और प्रसन्न रहती थी। किसी राजा के राजतिलक के समय वह राजा अपने राज्य की भूमि को तिलक करने वाले पुरोहित को ही दान दे दिया करता था पुरोहत धर्म का प्रतीक था तो राजा दण्ड का प्रतीक था। पुरोहत और राजा का ब्रह्म बल और क्षत्र बल मिलकर राष्ट्र का निर्माण करते थे। अकेले ब्रह्मबल से शासन नहीं चलता, इसलिए ब्रह्मबल का प्रतिनिधि पुरोहित उस राष्ट्र को राजा को देता था कि तुम क्षत्रबल के द्वारा इसका शासन करो। इससे राजा ब्रह्मबल का प्रतिनिधि बनकर धर्मानुसार शासन चलाता था। धर्मानुसार शासन चलाने को ऐसे राजा के राज्य कार्यों की समीक्षा धर्मसभा करती थी और यदि राजा अपनी परीक्षा में सफल हो जाता था तो उसे अश्वमेध यज्ञ की अनुमति दी जाती थी। तब ऐसे राजा के पीछे धर्म की शक्ति होती थी और उसके आभामण्डल के सामने अधिकांश छोटे छोटे राजा स्वयं ही झुक जाते थे। महाभारत के युद्ध के पश्चात सामान्यतः इस उच्च राजनीतिक व्यवस्था में क्षरण होने लगा था। परिण रामस्वरूप राजा अपने राजधर्म से राष्ट्रपति (सम्राट) बनने की भावना उनमें लुप्त हो रही थी और सैनिक अभियानों के प्रजापीड़क कर्मों से वो अपने को ‘राष्ट्रपति’ बनाना चाहते थे। स्पष्ट है कि धर्म की शक्ति तब उनके आभामण्डल से लुप्त होने लगी थी। जिसके कारण संघर्ष की अनैतिकता बढ़ी और उस अनैतिकता ने घृणा का रूप लेकर राष्ट्र की भावना को दूषित व प्रदूषित किया। सत्य को इस प्रकार विवेकपूर्ण ढंग से समझने में ही लाभ है। राष्ट्र की भावना दूषित व प्रदूषित हुई यह कहना ही न्याय संगत है। ये कहना तो सर्वथा अन्यायपरक ही होगा कि भारत में तब राष्ट्र था ही नहीं। विश्व की सबसे प्राचीन जिस संस्कृति में राष्ट्रोपासना प्रारंभ से ही रही है, उसमें राष्ट्र का अभाव देखना समीक्षक के अध्ययन की कमी को स्पष्ट करता है। यह भी एक बौद्धिक राष्ट्रघात ही है।

क्रमशः

(आलोक – डॉक्टर राकेश कुमार आर्य के द्वारा 82 पुस्तकें लिखी व प्रकाशित की जा चुकी हैं। उक्त पुस्तक के प्रथम *संस्करण – 2018 का प्रकाशन डायमंड पॉकेट बुक्स प्राइवेट लिमिटेड दिल्ली – 110020 दूरभाष-011- 40712100 से हुआ है।
यदि आप उपरोक्त पुस्तक के माध्यम से सच्चाई जानना चाहते हैं कि-

संपूर्ण भारत कभी गुलाम नहीं रहा

मुझे बड़ा अटपटा लगता है जब कोई व्यक्ति-यह कहता है कि भारत वर्ष 1300 वर्ष पराधीन रहा। कोई इस काल को एक हजार वर्ष कहता है, तो कोई नौ सौ या आठ सौ वर्ष कहता है। जब इसी बात को कोई नेता, कोई बुद्धिजीवी, प्रवचनकार या उपदेशक कहता है तो मेरी यह अटपटाहट छटपटाहट में बदल जाती है और जब कोई इतिहासकार इसी प्रकार की मिथ्या बातें करता है तो मन क्षोभ से भर जाता है, जबकि इन सारे घपलेबाजों की इन घपलेबाजियों को रटा हुआ कोई विद्यार्थी जब यह बातें मेरे सामने दोहराता है तो भारत के भविष्य को लेकर मेरा मन पीड़ा से कराह उठता है, पर जब कोई कहे कि भारत की पराधीनता का काल पराधीनता का नहीं अपितु स्वाधीनता के संघर्ष का काल है…

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– डॉ राकेश कुमार आर्य
(लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं।)

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