“सत्यार्थप्रकाश अविद्या का विनाशक एवं विद्या का प्रसारक है”

-मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।
सत्यार्थप्रकाश ऋषि दयानन्द द्वारा लिखित सत्य और विद्या का प्रचारक व प्रसारक ग्रन्थ है जिसमें लोगों को सत्यासत्य का ज्ञान कराने के लिये असत्य और अविद्या का खण्डन भी किया गया है। अविद्या को दूर करने के लिये खण्डन बहुत आवश्यक होता है। खण्डन का उद्देश्य यदि किसी का हित करना हो तो वह प्रशंसनीय गुण कहा जा सकता है। माता, पिता तथा आचार्य अपनी सन्तानों व शिष्यों का ह

ित करना चाहते हैं अतः वह उन्हें बुरा काम करने पर डांटते तथा अच्छे काम करने पर उनकी प्रशंसा करते हैं। डाक्टर भी रोगी के रोग को जानकर उसको स्वस्थ करने के लिये कड़वी दवा देते हैं और अति आवश्यक होने पर शल्य क्रिया भी कर देते हैं। यह सब कार्य एक प्रकार से खण्डन ही कहा जा सकता है जिसका मूल उद्देश्य सन्तान, शिष्य व रोगियों का हित करना होता है। संसार में ईश्वर के स्वरूप, उसके गुण, कर्म व स्वभाव को लेकर अज्ञान फैला हुआ है। उस अज्ञान को दूर करने के लिये विद्वान सत्य ज्ञान का प्रकाश करते हैं। सत्य ज्ञान का प्रकाश करने के साथ उन्हें अज्ञान के कारण को जड़ से समाप्त करने के लिये खण्डन करना भी आवश्यक होता है। ऋषि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश में देश, समाज व मानव के हित को सर्वोपरि रखकर सत्य मान्यताओं के मण्डन के साथ खण्डन भी किया है जिससे अध्येता वा पाठक को लाभ होता है। खण्डन से मनुष्य की तर्कणा शक्ति बढ़ती है और सत्य को स्थापित करने में सुभीता होने के साथ अन्यों के असत्य मतों, विचारों व मान्यताओं का खण्डन करना आवश्यक होता है।

ऋषि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश की रचना अविद्या के नाश तथा विद्या के प्रचार सहित देशवासियों के दूरगामी हित को ध्यान में रखते हुए की थी। उनका उद्देश्य अपनी प्रतिभा व वेद विषयक ज्ञान को प्रदर्शित करना नहीं था। लोगों के अनुरोध करने पर उन्होंने ऐसा किया था। इससे पूर्व वह मौखिक उपदेश द्वारा वैदिक ज्ञान का प्रचार करते थे। उनके समय में लोग वेदों को भूल चुके थे। वेदों का अध्ययन व अध्यापन बन्द हो चुका था। वेदों के अंग शिक्षा, व्याकरण व निरुक्त का भी यथावत व आवश्यकतानुसार अध्ययन सुलभ नहीं था। ऋषि दयानन्द को वेदों के अध्ययन में प्रविष्ट होने के लिये अनेक लोगों से प्रार्थना करनी पड़ी थी। उनको बताया गया था कि मथुरा में स्वामी विरजानन्द सरस्वती व्याकरण के देश के उच्च कोटि के विद्वान हैं। उनकी शरण में जाने से वह वैदिक ज्ञान को सीख सकते हैं। उन्होंने ऐसा ही किया था और सन् 1860 से सन् 1863 तक प्रज्ञाचक्षु विरजानन्द सरस्वती जी के सान्निध्य में रहकर उनसे व्याकरण का अष्टाध्यायी-महाभाष्य पद्धति से अध्ययन किया था। अध्ययन पूरा होने पर गुरु जी की प्रेरणा से वह अविद्या को दूर करने तथा सत्य वेद विद्या के प्रचार के कार्य में प्रवृत्त हुए थे। आरम्भ में उन्होंने मौखिक प्रचार किया था। धीरे धीरे उनका अभ्यास बढ़ता गया था और उन्हें अपने वैदिक ज्ञान में परिपक्वता प्राप्त होती गई।

ऋषि दयानन्द को वेद प्रचार के लिये अवैदिक मूर्तिपूजा का खण्डन भी आवश्यक प्रतीत हुआ था। अतः उन्होंने प्रमुख अवैदिक व मिथ्या मान्यताओं मूर्तिपूजा, अवतारवाद, फलित ज्योतिष, जन्मना जाति व्यवस्था, मृतक श्राद्ध आदि का पुरजोर खण्डन किया था तथा तर्क व युक्त्यिों सहित वेद प्रमाणों से भी निष्पक्ष विद्वदजनों को अपने विचारों से सहमत कराया था। ऋषि दयानन्द ने 16 नवम्बर, सन् 1869 को काशी के आनन्द बाग में 50 हजार लोगों की उपस्थिति में मूर्तिपूजा के समर्थक 30 से अधिक पौराणिक सनातनी विद्वानों से अकेले शास्त्रार्थ किया था। इस शास्त्रार्थ में पौराणिक विद्वान मूर्तिपूजा को वेदानुकूल व वेदविहित सिद्ध नहीं कर सके थे। इससे ऋषि दयानन्द जी की प्रसिद्धि देश विदेश में फैल गई थी और देश के अनेक भागों के लोगों ने उनके प्रचार से प्रभावित होकर मूर्तिपूजा को छोड़कर सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ, अनादि, अनित्य, अविनाशी, सर्वाव्यापक, सर्वान्तर्यामी तथा सृष्टिकर्ता ईश्वर की उपासना ऋषि प्रणीत वैदिक सन्ध्या के द्वारा करनी आरम्भ कर दी थी। आज करोड़ों लोग उनके अनुयायी हैं जो वेदों का स्वाध्याय करते हुए पौराणिक मिथ्या मान्यताओं से दूर रहकर सत्य पथ का अनुगमन कर रहे हैं। अन्धविश्वासों, मिथ्या व हानिकारक सामाजिक कुप्रथाओं को दूर करने में भी महर्षि दयानन्द सरस्वती का महत्वपूर्ण योगदान है। ऋषि दयानन्द ने ही महाभारत के बाद विलुप्त वेदों व उनके सत्यार्थों का पुनरुद्धार किया था। वेद संसार के सभी लोगों की ईश्वर प्रदत्त बौद्धिक सम्पदा है। इसकी रक्षा, सुरक्षा व आचरण संसार के सभी स्त्री व पुरुषों का परम धर्म है। ऋषि दयानन्द का लिखा व प्रकाशित सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ देश व संसार से अविद्या को दूर करने का प्रमुख साधन है। जिस प्रकार किसी पदार्थ का स्वाद बिना स्वयं उस पदार्थ को चखे वा भक्षण किये पता नहीं चलता, इसी प्रकार से सत्यार्थप्रकाश का महत्व व लाभ बिना इसका आद्योपान्त अध्ययन कर इसको समझे बिना नहीं होता। जिन लोगों ने इस ग्रन्थ को पढ़ा व समझा है, उन्होंने अपने जीवन को इसके अध्ययन से लाभान्वित माना है। पं0 गुरुदत्त विद्यार्थी जी ने इस ग्रन्थ का 18 बार अध्ययन करने पर कहा था कि यह ग्रन्थ इतना महत्वपूर्ण हैं कि यदि उन्हें इस ग्रन्थ को खरीदने के लिये अपनी संचित समस्त सम्पत्ति वा पूंजी का भी व्यय करना पड़ता तो वह अवश्य ऐसा करते। सत्यार्थप्रकाश के महत्व को सम्पत्ति का उदाहरण देकर नहीं समझाया जा सकता। हमने भी सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ का अनेक बार पाठ किया है और हम भी पं0 गुरुदत्त विद्यार्थी जी ने जो कहा है, उनकी बात की पुष्टि करते हैं। अन्य सभी अध्येता विद्वानों की भी यही राय प्रतीत होती है।

मनुष्य अल्पज्ञ प्राणी है। यह पूर्ण ज्ञानी कदापि नहीं हो सकता। पूर्ण ज्ञानी तो केवल परमात्मा है। परमात्मा पूर्ण ज्ञानी इसलिये है क्योंकि वह सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान, सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, अनादि, नित्य, जन्म-मरण के बन्धनों से रहित आदि अनेक गुणों से युक्त है। जीवात्मा अल्पज्ञ है जिसका कारण उसका एकदेशी, ससीम, जन्म-मरण धर्मा व कर्म-फल बन्धनों में फंसा होना आदि हैं। जिस प्रकार अज्ञानी को ज्ञान ज्ञानी की संगति से प्राप्त होता है उसी प्रकार से अल्पज्ञ जीव सर्वज्ञ परमात्मा के सान्निध्य से ही ज्ञान प्राप्त कर सकता है। परमात्मा ने सृष्टि के आरम्भ में अमैथुनी सृष्टि में उत्पन्न मनुष्यों को चार वेद ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद का ज्ञान दिया था। ईश्वर से चार ऋषियों और ब्रह्मा जी को वेद ज्ञान की प्राप्ति का पूर्ण विवरण ऋषि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश में दिया है। अतः वेदों को पढ़कर व उसके शब्दार्थ एवं भावार्थ को जानकर ही मनुष्य अपना अज्ञान दूर कर ज्ञान से पूर्ण हो सकता है। हमारे सभी ऋषि मुनि ज्ञान प्राप्ति के लिये व्याकरण ग्रन्थों को पढ़ने के बाद योगाभ्यास करते हुए वेद एवं ऋषियों के ग्रन्थों का अध्ययन करते थे। ऋषि दयानन्द जी ने भी ऐसा ही किया था। उन्होंने संसार को कोई नया सिद्धान्त नहीं दिया। उन्होंने वही कहा व लिखा है जो वेद व ऋषियोें के ग्रन्थ प्रक्षेप-वियुक्त मनुस्मृति, दर्शन, उपनिषद आदि में लिखा था। इन ग्रन्थों की भी वही बातें ऋषि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश में लिखी हैं जिनकी उन्होंने अपनी ऊहा, तर्क व युक्ति से परीक्षा की थी।

अतः वेद वा सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ का अध्ययन कर मनुष्य ईश्वर, जीव, प्रकृति, कार्य सृष्टि, मनुष्य के कर्तव्य व अकर्तव्य तथा सामाजिक ज्ञान के सभी विषयों सहित कृषि, आयुर्वेदीय चिकित्सा, संगीत, भवन निर्माण आदि सभी विषयों का भी ज्ञान प्राप्त करता है। हमारे वर्तमान के मनीषियों व वैज्ञानिकों ने अपने चिन्तन, मनन, अध्ययन, अभ्यास आदि से इस ज्ञान को काफी बढ़ाया है। उनका यह कार्य प्रशंसा योग्य है। परमात्मा ने हमें बुद्धि दी ही इसलिये है कि हम वेद पढ़कर संक्षिप्त वा बीज रूप में अनेकानेक वा समस्त विषयों के ज्ञान को प्राप्त करें तथा अपने अध्ययन व चिन्तन-मनन आदि के द्वारा उसमें वृद्धि करें। यही कारण है कि आर्यसमाज विज्ञान के नियमों व कार्यों को भी तर्क, युक्ति, विवेचन, विश्लेषण तथा अनुभव पर आधारित होने के कारण स्वीकार करता है। यह भी लिख दें कि वेद ज्ञान तथा विज्ञान के नियमों में कहीं किसी प्रकार का विरोध नहीं है। दोनों परस्पर पूरक हैं। वेद के बिना ज्ञान का आविर्भाव नहीं हो सकता। भाषा का आविर्भाव भी वेद के आविर्भाव के साथ सृष्टि के आरम्भ में हुआ था। वैज्ञानिकों ने उसी ज्ञान व विज्ञान का विस्तार आधुनिक समय में अपने पुरुषार्थ सहित तर्क व वैज्ञानिक प्रयोगों से किया है। सभी वैज्ञानिक इन कार्यों के लिये प्रशंसा के पात्र हैं। एक बात में विज्ञान भी पीछे है। वह विषय ईश्वर व जीवात्मा से सम्बन्धित है। विज्ञान को ईश्वर व जीवात्मा के ज्ञान के लिये वेद, उपनिषद, दर्शन व योग की शरण लेनी चाहिये। इससे वह अध्यात्मक एवं विज्ञान को भली प्रकार से समझ पायेंगे। ओ३म् शम्।

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