क्रांतिकारी संन्यासी और भारत की राजनीति

क्रांतिकारी संन्यासी और भारत की राजनीति

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लेकर कई बार चर्चाओं आ चुके हैं। उनकी मानें तो योगी आदित्यनाथ जैसे भगवाधारी साधु संतों को राजनीति में नहीं रहना चाहिए। अब इस बात को कहकर खड़गे अपनी राजनीतिक हताशा का प्रदर्शन कर रहे हैं या वह वास्तव में इस बात के प्रति गंभीर हैं कि भगवाधारी साधु संन्यासियों को राजनीति में नहीं होना चाहिए? वास्तव में खड़गे जैसे नेताओं को इस प्रकार की सोच देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू से विरासत में प्राप्त हुई है। नेहरू जी के द्वारा लिखी गई ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ नामक पुस्तक में भारतीय राज्यपरंपरा और सामाजिक एवं धार्मिक व्यवस्थाओं के प्रति इसी प्रकार का निराशाजनक प्रदर्शन किया गया है। भारत के पहले प्रधानमंत्री द्वारा लिखी गई इस पुस्तक को पढ़ने से पता चलता है कि नेहरू जी भारत को सही संदर्भ में समझ नहीं पाए। वास्तव में उन्होंने पुस्तक के माध्यम से ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ न लिखकर ‘नेहरू डॉक्ट्रिन’ को पेश करने का काम किया है। जब वह देश के पहले प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने अपनी इसी नेहरू डॉक्ट्रिन के आधार पर भारत को गलत दिशा में हांकने का निर्णय लिया।

कांग्रेस के वर्तमान अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे सहित राहुल गांधी, सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी सभी इसी नेहरू डॉक्ट्रिन से प्रेरित होकर राजनीति कर रहे हैं। कहने का अभिप्राय है कि इन सभी को यह बात रास नहीं आती कि राजनीति में साधु संन्यासी भी होने चाहिए? इसके विपरीत इनकी मान्यता है कि इनका काम राजनीति नहीं है।

यदि भारतीय राजनीति के संदर्भ में बात की जाए तो पता चलता है कि प्राचीन काल से ही राजनीति साधू संन्यासियों के शुद्ध अंतःकरण से निकले चिंतन से प्रेरित होकर चलती रही है। लोक कल्याण की जितनी समझ साधु संन्यासियों को हो सकती है, उतनी किसी भी राजसिक प्रवृत्ति के व्यक्ति से अपेक्षा नहीं की जा सकती? पूर्णतया सात्विक भाव में ही चिंतन पवित्रता को प्राप्त होता है । स्पष्ट है कि सात्विक भाव किसी सच्चे साधु का ही हो सकता है। उसके चिंतन में किसी के प्रति पक्षपात नहीं होता। वे पूर्ण न्यायप्रियता का प्रदर्शन करते हुए राजा को शुद्ध सात्विक भाव से सही परामर्श दिया करते थे। जिससे लोककल्याण सधता था। हम सभी जानते हैं कि लोक कल्याण करना ही राजनीति का सर्वोत्तम धर्म है।

इसी को हमारा वर्तमान संविधान लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना करने की अपनी अवधारणा के माध्यम से प्रस्तुत करता है। नेहरू जी भी इसी प्रकार के लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना की बात करते थे। यद्यपि उनके लोक कल्याणकारी राज्य और भारत के प्राचीन साधू संन्यासियों के लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा में जमीन आसमान का अंतर है।
जहां भारत का प्राचीन राजनीतिक चिंतन अपनी लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को क्रियान्वित करने के लिए धर्मगत नीतियों का अनुकरण करता था, वहीं आज का कथित धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दलों का नेहरूवादी चिंतन किसी काल्पनिक राजनीतिक दर्शन का अनुगमन करता हुआ दिखाई देता है। जिसमें राजनीतिक स्वार्थों को साधने की अंतहीन लड़ाई संघर्ष की योजना तो दिखाई देती है, परंतु लोक कल्याण होता हुआ दिखाई नहीं देता। रामायण काल में हम देखते हैं कि उस समय गुरु वशिष्ठ प्रधान न्यायाधीश के पद पर रहकर राष्ट्र नीति का संचालन किया करते थे। जिसे वह पंथनिरपेक्ष बनाए रखने के लिए पूर्णतया सजग होकर कार्य करते थे। उनके चिंतन में कहीं पर भी ऐसा दिखाई नहीं देता कि वह राजनीति को स्वार्थपरक बनाते हुए राष्ट्र के विध्वंस का कार्य कर रहे हों? उनके साथ गुरु विश्वामित्र भी हमें दिखाई देते हैं। जिन्होंने रामचंद्र जी को वन में ले जाकर सैनिक प्रशिक्षण दिया। उनके साथ अगस्त्य मुनि, महर्षि भारद्वाज, ऋषि शरभंग जैसे अनेक ऋषि हमें दिखाई देते हैं जिन्होंने रामचंद्र जी और उनके भाई लक्ष्मण को किसी भी आपातकाल से संघर्ष करने के लिए अस्त्र-शस्त्र प्रदान किये। वास्तव में उन्होंने इन दोनों राजकुमारों का निर्माण उस समय की राक्षस प्रवृत्तियों से लड़ने के लिए करना आरंभ किया। वह क्रांति की एक बुनियाद रख रहे थे। इस क्रांति के माध्यम से वे सभी लोग उस समय की राक्षस प्रवृत्तियों का विनाश करने में सफल हुए। इस प्रकार उनकी क्रांति योजना राष्ट्र निर्माण में प्रमुख भूमिका निभाने वाली सिद्ध हुई। जिसके परिणाम स्वरूप रावण जैसी दुष्ट प्रवृत्तियों वाले शासक का अंत हुआ।

उसके पश्चात निरंतर इसी प्रकार राष्ट्र संतों, संन्यासियों, साधु महात्माओं की पवित्र बुद्धि से संचालित होता रहा। महाभारत काल में भी हमें ऐसा ही समन्वय बना हुआ दिखाई देता है। जब संत और सिपाही, माला और भाला मिलकर राष्ट्र निर्माण के कार्य में लगे हुए दिखाई देते हैं। इसको हमारे ऋषि महात्मा और राजनीतिक मनीषी लोग शस्त्र और शास्त्र का राष्ट्रहित में किया गया समन्वय कहकर संबोधित करते थे।

जब-जब राजनीति पथभ्रष्ट होती थी तब तब हमारे साधु संन्यासियों ने उसके लिए पथ प्रदर्शक का कार्य किया। यदि आवश्यकता हुई तो शासन को सीधे अपने हाथों में लेकर लोगों का नेतृत्व करने में भी किसी प्रकार का संकोच नहीं किया। वैसे भी हमें यह याद रखना चाहिए कि प्राचीन काल में जब राज्य और राजा की आवश्यकता पड़ी तो उस समय मनु महाराज जैसे ब्राह्मण क्षत्रिय को ही यह दायित्व सौंपा गया था, जो कि एक संन्यासी योगी पुरुष थे।

हमें चंद्रगुप्त के समय को भी स्मरण करना चाहिए। जब उन्हें राजनीति के गुर सिखाने के लिए चाणक्य जैसे महामनीषी राष्ट्र संत का साथ प्राप्त हुआ। चाणक्य विद्वान पुरुष थे। उन्होंने अपनी संत बुद्धि का परिचय देते हुए उस समय राष्ट्र और राजा का मार्ग प्रशस्त करने का कार्य संभाला। जिसका परिणाम यह हुआ कि गिरता लड़खड़ाता हुआ भारत एक शक्ति संपन्न राष्ट्र के रूप में स्थापित होने में सफल हुआ। उसके पश्चात मौर्य काल रहा हो या फिर गुप्त काल, हर्षवर्धन के राजवंश का काल या फिर गुर्जर प्रतिहार शासकों का काल रहा हो हर काल में साधू संन्यासियों और राजनीतिक लोगों अर्थात ब्रह्म शक्ति और क्षत्रशक्ति के समन्वय से राष्ट्र का संचालन होता रहा।

हम सभी जानते हैं कि 1528 ईस्वी में जब राम मंदिर गिराया गया तो उस समय रानी जय राजकुमारी, उनके पति रणविजय सिंह का मार्गदर्शन एक संन्यासी गुरु महेश्वरानंद स्वामी जी कर रहे थे। जिन्होंने उस समय बड़ी संख्या में क्रांतिकारियों की सेना का गठन कर विदेशी आक्रमणकारी बाबर का सामना किया था और अपने सर्वोच्च बलिदान दिए थे। इस समय देवीदीन पांडे नामक एक क्रांतिकारी योद्धा और अंबेडकर नगर की भीटी रियासत के राजा मेहताब सिंह का मार्गदर्शन भी संन्यासी विद्वान लोग कर रहे थे। उन्होंने भी लाखों की संख्या में लोगों का बलिदान दिया और मातृभूमि की रक्षा के अपने कर्तव्य धर्म को पहचान कर ऐतिहासिक कार्य किया। इसी परंपरा का निर्वाह समर्थ गुरु रामदास ने छत्रपति शिवाजी महाराज का निर्माण करने में किया था। इससे पहले सल्तनत काल में जिस विजयनगर राज्य की स्थापना की गई थी , उसमें भी हरिहर बुक्काराय के गुरु पूर्णानंद जी का विशेष योगदान था। हम सभी जानते हैं कि राणा संग्राम सिंह को भी संत रविदास जी का मार्गदर्शन यदि नहीं मिला होता तो वह भी महाराणा संग्राम सिंह के रूप में इतिहास में एक अमर बलिदानी के रूप में अपना नाम नहीं लिखवा सकते थे।

इसी संन्यासी परंपरा में स्वामी दयानंद जी महाराज का नाम भी अग्रगण्य है। जिन्होंने 1857 की क्रांति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाकर अनेक क्रांतिकारियों को देशभक्ति के लिए प्रेरित किया था। उनकी प्रेरणा से न केवल 1857 की क्रांति हुई अपितु उसके पश्चात देश में एक क्रांतिकारी आंदोलन स्थाई रूप से आरंभ हो गया। जिसके परिणाम स्वरुप 1947 में अंग्रेजों को देश छोड़कर भागना पड़ा। यदि इतिहास को इस दृष्टिकोण से पढ़ा समझा जाएगा तो पता चलेगा कि हमारा देश क्रांतिकारी संन्यासियों का मार्गदर्शन लेकर ही आगे बढ़ता रहा है। देश की इसी परंपरा को नेहरू डॉक्ट्रिन अर्थात डिस्कवरी ऑफ इंडिया में नकारा गया है। इसी तथ्य को नकारते हुए कांग्रेस ने देश के वर्तमान इतिहास को लिखवाने का प्रयास किया है। इसी प्रयास के चलते देश के स्वाधीनता आंदोलन से भी क्रांतिकारियों को निकाल कर बाहर फेंक दिया गया है। ऐसे में खड़गे जी से कैसी उम्मीद की जा सकती है कि वह योगी आदित्यनाथ जैसे क्रांतिकारी संन्यासी राजनीतिज्ञ को अपने साथ राजनीति में सफल होते हुए देख पाएंगे ?

लेकिन अब कांग्रेस के सभी बड़े नेताओं को यह बात समझ लेनी चाहिए कि देश का युवा जाग चुका है और वह अपने देश के वास्तविक इतिहास से परिचित हो चुका है। इसलिए इतिहास की समझो एक परिक्रमा पूर्ण हो चुकी है। उसकी फलश्रुति के रूप में योगी आदित्यनाथ जैसे संन्यासी हमें राजनीति में सफल होते हुए दिखाई दे रहे हैं। यह स्पष्ट हो चुका है कि अब राष्ट्र नीति का समय आ चुका है और राजनीति के दिन लग चुके हैं। इस राष्ट्र नीति के उत्कृष्ट उदाहरण के रूप में योगी आदित्यनाथ जी हमारे समक्ष हैं।

– डॉ राकेश कुमार आर्य
(लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं)

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