सदा याद रहेगी स्वतंत्रता सेनानी पण्डित राजाराम शर्मा की जीवन गाथा

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आचार्य डॉ.राधेश्याम द्विवेदी

बचपन और शिक्षा और व्यवसाय

संत कबीर नगर जिला मुख्यालय खलीलाबाद से लगभग दस किलोमीटर पश्चिम की ओर गोरखपुर – लखनऊ राष्ट्रीय राजमार्ग पर बसे भुजैनी ग्राम में श्री हर्ष तिवारी के प्रथम पुत्र के रूप में पंडित राजाराम शर्मा का जन्म 17 मई, 1897 ई. को हुआ था। उन्हें उच्च शिक्षा नहीं मिल पाई थी। प्राथमिक और मिडिल स्कूल पास करने के बाद उन्होंने कुछ दिनों तक मगहर तथा बभनान के सरकारी विद्यालयों में अध्यापन कार्य किया था। उनका विवाह श्रीमती अवध राजी देवी के साथ बस्ती जनपद के मूर्हा पट्टी दरियाव में पंडित चंद्रबली दूबे के घर हुआ था। पंडित राजा राम शर्मा के दो पुत्र – श्री सत्य व्रत शर्मा व सत्य देव शर्मा थे। उनके ज्येष्ठ पुत्र श्री सत्य व्रत शर्मा के परमात्मा प्रसाद तिवारी एवं दूसरे पुत्र धर्मात्मा प्रसाद तिवारी नामक दो पुत्र हैं। उनके पौत्र श्री नित्यानंद तिवारी ने भुजैनी में ही अपने बाबा स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्री राजाराम शर्मा की स्मृति में सत्यव्रत शर्मा जनक दुलारी जूनियर हाईस्कूल और इंटर कॉलेज भुजैनी की स्थापना किए हुए हैं।

मित्र का संकट देख छोड़ दी थी नौकरी

बभनान में नौकरी के दौरान उनके मित्र और तत्कालीन वहाँ के पोस्ट मास्टर के पिता जी के अंतिम दिनों में उनके दर्शन के लिए छु‌ट्टी के लिए तार पर तार देने के बावजूद छुट्टी नहीं मिली थी।जब उनके पिता जी मर गए, तब छुट्टी मंजूर हुई । इस घटना से दुखी शर्मा जी परवशता और गुलामी से खिन्न होकर नौकरी से इस्तीफा देकर व्यापार करने लगे थे । उन्हें अपने मित्र का दुःख नहीं देखा गया। इस कष्ट ने उनकी जीवन धारा ही बदल दी।

परिवार को कभी नहीं दिया महत्व

पं. राजाराम शर्मा ने विधायक पद पर रहते हुए अपने परिवार को कभी महत्व नहीं दिया। आज उनके परिजन अपने परिश्रम के बल पर अपने पैरों पर खड़े हैं। कहते थे तुम लोगों के लिए कुछ करेंगे तो लोग ताना मारेंगे कि अपने परिवार के लिए ही किया।

महात्मा गांधी से प्रभावित रहे

महात्मा गांधी के नेतृत्व में स्वराज का आंदोलन जब अपने उत्कर्ष पर था, उसी समय पंडित राजाराम शर्मा ने अपने व्यक्तिगत हितों को तिलांजलि देकर राष्ट्रहित में अपने को पूरी तरह समर्पित कर दिया एवं स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े थे। महात्मा गांधी के प्रति उनके मन में अगाध निष्ठा थी। गांधी जी के प्रति उनके लगाव को देखते हुए स्थानीय लोग उन्हें भी ‘गांधी बाबा’ नाम से पुकारते थे। वे जनता की पीड़ा दूर करने के लिए अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ उनकी आवाज बनकर विरोध करने लगे।गांधी जी की विचारधारा का उन पर ऐसा रंग चढ़ा कि वे आजीवन जनता के हित में समर्पित रहे। देश हित के आगे अपने परिवार के लिए कुछ नहीं किया। 5 फरवरी, 1921 को गोरखपुर में गांधी जी के सान्निध्य में आकर चरखा और सूत के प्रति झुकाव के साथ-ही-साथ राजनीति में भी उतरने से दुकान प्रायः बंद रहती थी। देश-सेवा और दुकान में से उन्होंने देशसेवा को प्राथमिकता देकर व्यापार भी बंद कर दिया। एक दिन उन्हें चरखे से निकले सूत का ताना तानते हुए देखकर उनके एक मित्र ने कहा, “वाह रे शेख फतहू”। जिससे मित्रों में उनका यही नाम प्रसिद्ध हो गया जो अंग्रेजों के विरुद्ध चलाए जा रहे आंदोलन में फरारी की अवस्था में प्रयुक्त होता रहा। जब लोग उन्हें शेख फतहू नाम से पूछते तो उन्हें पता बता दिया जाता, परंतु उनके असली नाम से पूछने पर टरका दिया जाता था।

स्वतंत्रता आंदोलन में सहभागिता

स्वतंत्रता आंदोलन के ‘नमक सत्याग्रह आंदोलन’ में अपनी सहभागिता निभाने के कारण 20 जून 1930 को श्री शर्मा जी को भारतीय दंड संहिता की धारा 117 के अंतर्गत एक वर्ष की सजा और तीन सौ रुपये जुर्माना तथा जुर्माना न देने पर तीन माह की अतिरिक्त सजा मिली थी।सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान 23 जनवरी, 1932 को उन्हें नौ माह की सजा मिली थी।

शाहपुर से उठी थी आजादी की चिगारी

वर्ष 1935 में कांग्रेस के मंत्रिमंडल का गठन हुआ था । मंत्रिमंडल के गठन के बाद कांग्रेस की पहली रैली डुमरियागंज तहसील क्षेत्र के शाहपुर बाजार में आयोजित हुई थी। इससे पूर्व की कांग्रेस रैलियों में स्थानीय किसानों की सहभागिता गोरों के जुल्म के चलते कम हुआ करती थी । इस रैली में रमाशंकर लाल और पंडित राजाराम शर्मा पहुंचे हुए थे, जिसके बलबूते हजारों किसानों की भीड़ इस रैली में शामिल हुई थी। भारी संख्या में किसानों को रैली में शामिल होने की सूचना मिलते ही ब्रिटिश हुकूमत के कान खड़े हो गए थे और उसने किसानों को परेशान करने के लिए लगान में दोगुने की बढ़ोतरी के आदेश के साथ यह भी निर्देश दिया कि जो किसान लगान नहीं देगा उसकी जमीन जब्त कर ली जाएगी। दोगुना लगान देने के खिलाफ किसान उठ खड़े हुए और अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। इसके बाद एक साथ कई किसानों की जमीन लगान न देने का कारण बताकर अंग्रेजों ने अपने कब्जे में कर लिया। जमीन चले जाने के बाद किसानों पर मानों दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। घर में खाने को कुछ नहीं था, लेकिन किसानों ने हिम्मत हारने की जगह कांग्रेस के पदाधिकारियों से मिलकर अंग्रेजों पर जमीन हड़पने का मुकदमा दायर किया। कलक्टर रफीउल कद्र की अदालत में मुकदमा दर्ज हुआ तो कलक्टर ने यह कहकर मुकदमा खारिज कर दिया कि कांग्रेस के बहकावे में आकर किसान लगान नहीं जमा कर रहे हैं। जिसके चलते उनकी जमीन ले ली गई है। किसानों ने इस आदेश के खिलाफ पुन: यह कहते हुए अपील दायर की कि लगान अचानक दो गुना कैसे बढ़ाया गया? लंबे समय तक यह मुकदमा चला और किसान मीलों पैदल चलकर मुकदमा देखने जाते रहे। वर्ष 1942 में गांधी जी के करो या मरो के नारे के बीच जब यहां के हालात और बिगड़ने लगे तो तत्कालीन कलेक्टर सुधा सिंह ने एक लाख किसानों का लगान माफ करते हुए उन्हें उनकी जमीन वापस कर दी थी । जमीन वापस पाने के बाद यहां के लोगों का हौसला बढ़ा और आजादी की प्राप्ति तक अंग्रेजों की खिलाफत करते रहे।

‘विजय’, ‘पंचमुख’ साप्ताहिक का प्रकाशन

1945 में राजा राम शर्मा ने ‘‘विजय’’ नामक नामक साप्ताहिक का प्रकाशन आरम्भ किया जो गांधी नगर बस्ती के दरिया खां जाने वाली गली के कोने पर मुख्य सड़क पर स्थित विजय प्रेस से छपता था। इस अखबार के पृष्ठ आजादी के आन्दोलन की खबरों से रंगे रहते और तल्ख टिप्पणियां प्रकाशित की जाती थीं। आजादी के बाद 1952 में राजाराम शर्मा और दयाशंकर पाण्डेय ने ‘‘पंचमुख’’ हिन्दी साप्ताहिक का प्रकाशन आरम्भ किया जो 1961 तक श्रीराम प्रेस से छपता रहा। कहना चाहें तो कह सकते है कि ‘‘पंचमुख’’ आजादी के बाद का पहला अखबार था जो 11 वर्षो तक निरन्तर छपता रहा।

घास की रोटी दिखा नहर पास करवाया

बखिरा झील से निकलकर लगभग पांच किमी. बौरव्यास तक जाने वाली ढोढया पक्की नहर जनपद की पहली सिंचाई परियोजना है। इसके निर्माण की पहल मेहदावल के पहले विधायक राजाराम शर्मा ने की थी। इन्होंने प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री पं. गोविंद बल्लभ पंत के समक्ष घास की रोटी प्रस्तुत कर इस नहर की मंजूरी दिलाई थी। बाद में तत्कालीन मुख्यमंत्री सुचेता कृपलानी जो यहां से विधायक थी, ने इस नहर को पूरा कराया था। तीन दशक तक यह नहर ठीक चली और खेतों की सिंचाई होती रही।

अंग्रेजों द्वारा शारीरिक रूप से प्रताड़ित

श्री राजा राम शर्मा जी के पौत्र नित्यानंद तिवारी बताते हैं कि स्वर्गीय बाबा जी को ‘वंदे मातरम्’, ‘अंग्रेजो भारत छोड़ो’ कहने पर गांधी टोपी लगाने तथा चरखा कातने के विरोध में अंग्रेजों ने उन्हें बस्ती कचहरी से दक्षिण अमहट पुल पर जाड़े में प्रातः कुआनो नदी में नहलाकर उनके दाहिने पैर में घुटने पर ऐसा चोट मारा था कि चार स्थानों पर उनकी चमड़ी उधड़ गई थी, जिसका निशान मृत्यु पर्यन्त तक उनके पैर में बना रहा। 9 फरवरी 1922 कोअहिंसक सत्याग्रहियों के गिरफ्तारी के समय अंग्रेजों ने उन्हें इतना मारा था कि वे मरते-मरते बचे थे। यही नहीं उन्हें आन्दोलन के दौरान पकड़े जाने पर गोरखपुर ले जाते समय ट्रेन से ढकेल दिया था। फिर भी भारत माता का यह सपूत मां की सेवा के लिए जिंदा बचा रहा।

अनेक सजाएं भोगे

व्यक्तिगत सत्याग्रह आंदोलन में उन्हें 8 जनवरी, 1941 को 4 माह कैद तथा एक सौ रुपये जुर्माने की सजा मिली थी। ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में भाग लेने के कारण उन्हें 9 अगस्त, 1942 से 2 नवंबर, 1944 तक राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के अंतर्गत कठोर करावास का दंड मिला था।

सार्वजनिक जीवन

स्वर्गीय शर्मा जी 1952 में निर्वाचन क्षेत्र खलीलाबाद से प्रथम बार विधान सभा सदस्य चुने गए। विधायक बनने के बाद भी जीवन सादा रहा। सक्रिय राजनीति के साथ – साथ सामाजिक कार्यों में भी वे सक्रिय रहे । वे जिला परिषद बस्ती के वाइस चेयरमैन, जिला कांग्रेस कमेटी बस्ती के मंत्री तथा प्रांतीय कांग्रेस की कार्यसमिति के सदस्य भी रहे। 4 जुलाई, 1954 को उन्होंने मेंहदावल में डी.ए.वी. इंटर कालेज की स्थापना की। 1962 तक एम.एल.ए. रहने के बाद अस्वस्थ होने के कारण उन्होंने सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लिया तथा अपनी मेंहदावल सीट प्रथम महिला मुख्यमंत्री श्रीमती सुचेता कृपलानी के लिए रिक्त कर दी। श्री चंद्रभान गुप्त अपने मुख्यमंत्रित्व काल में उन्हें स्वतंत्रता संग्राम सेनानी होने के नाते 150 एकड़ जमीन नैनीताल में दे रहे थे, परंतु श्री शर्मा जी ने उनकी भावना का स्वागत करते हुए यह कह उस भूमि को लौटा दिया कि मैं तो खुद जमींदार हूँ। आप इस भूमि को भूमि हीनों में बाँट दीजिए। पंडित शर्मा का देहावसान दिनांक 18 नवंबर, 1980 को उनके पैतृक गाँव भुजैनी में ही हुआ था।

स्काउटिंग में माहिर

रेडक्रॉस सोसायटी से जुड़ने के साथ ही उन्होंने स्काउटिंग भी सीखा था, जिसका प्रभाव उनके जीवन-पर्यंत रहा। अपनी जीवन गाथा ‘मेरे जीवन का सफेद पहलू’ में वे लिखते हैं, “मैं पक्का स्काउट तो नहीं हूँ, किंतु स्काउटों के बहुत से गुण मुझमें हैं। जब मैं कहीं सफर में जाता हूँ तो अपने झोले में चाकू, पेंसिल, नोटबुक, लोटा-डोरी, पोटाश, सूई-धागा और मोमबत्ती आदि जरूर रखता हूँ। अगर हो सका तो अर्क कपूर और अमृत धारा भी रखता हूँ। गर्मी के दिनों में बिच्छू काटने वालों की सेवा करने का सौभाग्य अक्सर मिल जाता है। आग लगने पर अपनी शक्ति से आग बुझाने में काम करता हूँ। किसीको दुख में देखकर मेरे दिल में दर्द उठने लगता है। शक्ति-भर सहायता करने का प्रयत्न करता हूँ। बुड्ढों को देखकर मुझे बड़ा तरस आता है और अपना बुढ़ापा याद आने लगता है। खेत की नाप-जोख, दफ्तरगिरी, प्रूफ रीडरी, सिलाई का काम, साधारण तौर से जानता हूँ। मुझे अपना काम अपने हाथ कर लेने में आनंद आता है। आदमियों से काम लेना मुझे कम आता है।”

पत्रकारिता

पत्रकारिता के क्षेत्र साप्ताहिक ‘विजय’ का प्रकाशन एवं ‘पंचमुख’ के संपादक भी रहे। ‘पंचमुख’ में अंग्रेजों के खिलाफ लिखने से अंग्रेजों ने प्रेस को ही जब्त कर लिया। वे ‘आज’ तथा ‘स्वतंत्र भारत’ के संवाददाता भी वे रहे। 26 जनवरी, सन् 1938 को ‘विजय’ साप्ताहिक का प्रकाशन हुआ, जिसके संपादन का कार्य पं. राजाराम शर्मा ‘अचल’ ही किया करते थे। ‘विजय’ में भी उनकी कविताएँ प्रकाशित होती रही। इसके प्रायः सभी अंकों में तत्कालीन सामाजिक आर्थिक तथा राजनैतिक पक्षी पर – ’घोचवाफेर’ नाम से वे हास्य व व्यंग्य ‘घर घेमन दादा’ नाम से लिखा करते थे। जेल जाने की सूचना पर ‘नंबर आ गया’ नामी अग्र दादा नाम से ‘विजय’ का प्रकाशन अनिश्चित काल के लिए बंद कर जेल चले गए। ‘विजय’ के संबंध में वे लिखते हैं, “यह बात तो जरूर थी कि मुझे विजय के लिए चुर जाना पड़ा, फिर भी ‘विजय’ मेरी अभिलाषाओं में सर्वोच्च स्थान पर था। अब भी उसका स्थान वही है जो पहले था। ‘विजय’ को अब भी लोग याद करते हैं, मुझे तो परस प्रिय था ही।स्मारक स्वरूप ‘विजय प्रेस’ अवश्य है जो सन् 1942 के स्वतंत्रता युद्ध में दो मास तक जप्त रहा। ‘विजय’ चाहे याद रहे या न रहे, किंतु ‘भर घुमन दादा’ का ‘घाँचवाफेर’ सभी पाठकों को याद रहेगा। ‘साक्षरता दिवस’ के लिए लिखी गई उनकी लंबी कविता ‘अपढ़वा’ लोगों में बहुत ही चर्चित रही, जो विजय के दूसरे वर्ष के प्रथम अंक में छपी थी , जिसकी कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं-

तुहरा से बिनती हमार हवे बार-बार,

अबहूँ से अँखिया उघारा ये अपढ़वा।

विद्या क सुंदर सूर्य उदित मुदित मन,

घर-घर भइलें प्रकाश ये अपढ़वा।

चीन और रूस जागे,टरकी जपानजागे,

जागि गईलैं हबसी गुलाम ये अपढ़वा।

तुहरे पड़ोसी अफगान लोगजागि गइलैं,

अबहूँ न जगला तू हाय ये अपढ़वा।

सन् 1943 के ‘बसंत पंचमी’ के पावन पर्व पर भारत माता की गुलामी से मुक्ति न हो पाने के अपने मानसिक भाव को उन्होंने एक पद के द्वारा व्यक्त किया है-

माता की बंदि कटी नहिं हाय रे,

शोक करें या कि मोद मनावैं।

भारत भाग्य खटाई पर्यो,भगवान !

कहो केहि को गोहरावैं।

रंग में भंग भयो भरपूर,

कहो कइसे अब रंग उड़ावैं।

काली घटा उनई चहुँओर,

बसंत मनावैं कि सावन गावें।

उत्कृष्ट छंदकार रहे श्री शर्मा:-

पंडित राजाराम शर्मा एक सचेत और जुझारू स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, देशभक्त और स्वाभिमानी व्यक्ति होने के साथ-साथ एक सहृदय कवि भी थे। पराधीन भारत की कुछ-कुछ सोई और कुछ-कुछ जागती हुई जनता को लोकगीतों और लोक-धुनों के जरिये गा-गाकर क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर झकझोरकर जगाया एवं आजादी के मैदान-ए-जंग में कूद पड़ने के लिए देशवासियों का आह्वान भी किया। उनके गीतों में पराधीनता की यातना, देश की दुर्दशा, जनता का दुख-दर्द तथा क्रांति के स्वर बहुत मुखर रूप में प्रकट हुए हैं। पहले वे ‘द्विजदीन’ उपनाम से कविताएँ लिखा करते थे, किंतु इस उपनाम से वीर रस की कविताएँ ठीक नहीं जँचती थीं। इसलिए इस उपनाम को ‘अंचल की अभिलाषा’ शीर्षक कविता लिखने के बाद ‘अचल’ उपनाम से कविता करने लगे। उक्त कविता इस प्रकार है-

‘अचल’ तुम्हारी भक्ति अचल रहे सदैव,

विचल न जाए कहूँ लालच में परि के।

दरके करेजा दुख देखि के दरिद्रन के,

लख ने अनीति नाथ! अंग-अंग फरके।

करके गुलामी, नित खारबनिआँखन में,

देश को जगा दें हम जी के और मर के।

पर के न सोवैं,तौलों,विरत न होवें कबौं,

जौं लौं न देखि लें स्वतंत्र देश करि के ॥

देश को स्वतंत्र कराने के लिए आंदोलन में भाग लेने के कारण उन्हें बार- बार जेल जाना पड़ता था, लेकिन स्वतंत्रता-प्राप्ति हेतु वे अपने लक्ष्य के प्रति दृढ़ संकल्पित थे। बार-बार जेल जाना और छूटने के अनुभव को भी उन्होंने अपने कार्य में इस तरह वर्णित किया है-

जब देश ही जेल बना हुआ है,

क्या यहाँ रहना, क्या है बाहर जाना।

मानी स्वदेश पुजारियों का,

इस राज में है कहाँ और ठिकाना।

जब आना ही जाना लगा हुआ है,

तब जेल कहाँ? है मुसाफिर खाना।

ठाना है पै प्रण, सौंह प्रताप की,

प्यारे स्वदेश पै सीस चढ़ाना ॥

रचनाएँ :-

पंडित शर्माजी की कई रचना ‘हृदयोद्‌गार’, ‘उद्धार’ और काव्य रचनाओं का विशाल संग्रहं देखने को मिला।उनकी कुछ रचनाएँ ‘बस्ती गजट’, ‘पंचमुखी’, ‘कृष्ण वाणी’ आदि पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। अपनी रचनाओं का काल तथा स्थान भी उन्होंने कविताओं के नीचे लिखा है। उनकी अधिकांश रचनाएँ नैनी जेल, बहराइच जेल, गाजीपुर जेल तथा बस्ती जेल में कारावास के दौरान लिखी गई हैं। उनकी रचनाओं के संग्रह को देखने से मैं इस निर्णय पर पहुँचा हूँ कि वह पराधीन भारत की आजादी के लिए छटपटाते हुए एक सच्चे लोक गायक, खरे देशभक्त और स्वदेशी के बाना में सिर से पाँव तक रमे हुए उद्बोधक थे। उन्हें लोकगीतकार के रूप में साहित्य में स्थापित किया जा सकता है। उनके गीत लोक प्रचलित धुनों एवं विभिन्न रागों तथा रागिनियों पर आधारित हैं। दादरा, चैताल, पद, धमारि, सवैया, भैरवी, कजली, कहरवा, पूर्वी, चैता, झूमर, गजल, लावनी, भजन, झूला, बिरहा, गारी, नकटा, होली आदि उनके प्रिय राग एवं दोहा, कुंडलिया, कवित्त, घनाक्षरी, छप्पय आदि उनके प्रिय छंद रहे हैं। ‘समस्या पूर्ति’ विधा की भी अनेक रचनाएँ उन्होंने की हैं। उनकी रचनाओं में राष्ट्रप्रेम, गांधीवाद, चरखा प्रेम, भक्ति भावना, स्वदेशी विचार, अखंड देशभक्ति, सामाजिक एवं राष्ट्रीय एकता, निरंकुश अंग्रेजी सत्ता के प्रति खुला विद्रोह और महात्मा गांधी के प्रति अनन्य निष्ठा के स्वर प्रमुख रूप से देखने को मिलते हैं। उदाहरणार्थ-

करिहौं स्वदेश सेवा भरिहौं भलाई तैं, जारि हौ विदेश वस्त्र खद्दर सिर धरिहौं।

धरिहौं सुपथ को, निगरिहौं बेगारी को, फोरि फूट घट, छूत पापिन बिहारिहौं।

दरिहों कोदो सौं दरिद्र तेरी छाती पै, दारुण विपत्ति दुर्व्यसन मारि डरिहौं।

डरिहीँ न काल हू तें, सत्य सपथ गांधी जी को,

ले के स्वराज, सरकार छारि करिहौं।

6 मई, 1944 को साढ़े आठ बजे दिन में उन्होंने नैनी जेल से महात्मा गांधी जी के छूटने पर एक कविता लिखी थी, जो इस प्रकार है-

छूट गया कारा से गांधी,

मुक्त हुआ अब अपना देश।

युग-युग जिए वृद्ध सेनानी,

हो स्वतंत्र चिर रहे स्वदेश ॥

शासक वर्ग द्वारा धर्म, भाषा आदि के आधार पर ‘फूट डालो और राज्य करो’ की कूटनीति से सचेत करते हुए उन्होंने पंथगत एकता और सांप्रदायिक स‌द्भाव को भी अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बार-बार बनाया है। वे कहते हैं-

मिल के हिंदू मुस्लिमों

सर फूट का अब फोड़ दो,

एकता के सूत्र के सूत्र में

अपनी अपनी गर्दन जोड़ दो।

सत्य के पथ पर चलो,

अन्याय से डरते रहो,

औ सदा अन्यायियों का

धरके मुखड़ा मोड़ दो॥

चुनाव चाहे वर्तमान राजनीति का हो या स्वतंत्रता-प्राप्ति के पूर्व का रहा हो, राजनेता प्रायः इसी सिद्धांत के रहे हैं कि उन्हें उनकी सिद्धि चाहिए, साधन चाहे जैसे हों। अपनी इस सिद्धि के लिए वे चुनाव में जीत हासिल करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। मत दाताओं को लुभाने के लिए वे विभिन्न प्रकार के झूठे आश्वासन देते हैं। राज नेताओं की इस चालाकी से मतदाताओं को सचेत करने के लिए 12 अक्टूबर, 1936 को ‘अचल’ जी ने एक लंबी कविता ‘वोटरवा’ लिखी थी, जिसकी कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं-

हाथ जोरि पइयाँ लागि, अरज करत बाटी,तनी सुनु बतिया हमार रे वोटरवा।

मघवा महिनवाँ में कौंसिल चुनावहोइहैं,

ओटवा समुझि बूझि दियो रे वोटरवा ॥

ओटवा का हक जौन तुहँके मिलल बाटै,ओके जनि पनियाँ में फेक्यों रे वोटरवा।

जौन तोहर दुखवा और सुखवा में साथ रहैं, अइसन के मेंबर बनायो रे वोटरवा।

X X X X X X X X X X X X X X X

जौन सरकारी चापलूस वोट माँगै अइहैं,बड़ाबड़ा रूपदिखलइहैंरेवोटरवा।

जाई कँवसिलवा में बइठि जम्हाई लीहैं, सरकारी हाँ में हाँ मिलइहैं रे वोटरवा ॥

तुहरी भलइया में कुछ न उपाय करिहैं, अपने हैं मतलब के यार रे वोटरवा।

कपटी कुटिल बहु कल बल छल करि, तहँके फँसाई लीहैं सुनु रे वोटरवा ॥

इनके घुड़िकियाऔ रोबवामें आयो जनि,सकिंहैं न कुछकरि तोररे वोटरवा।

वोटवा और बिटिया पवित्र चीज होखें, बाबूजानिके सुपात्रपात्रदिहौ रे वोटरवा।

भारत छोड़ो आंदोलन(1942) में गिरफ्तार किए जाने पर और बस्ती जेल से नैनी जेल के लिए आंदोलनकारियों को स्थानांतरित किए जाने का एक दृश्य प्रासंगिक है-

हम वा दिन की गति काव कहैं, बरियात चली सजि कै जब रेल में।

आठ नवंबर को पहुँचे,

जमुना वहि वार के सेंट्रल जेल में।

अगुआनी में साहब लोगफिरें,

जस भागत जात हैं ऊँट नकेल में।

रासन बासन एक मिलै नहिं,

नात गरीब मिला यदि जेल में॥

दिनांक 05 सितंबर, 1939 को बहराइच जेल में लिखी गई ‘जेल की रोटी’ नामक कविता में भूखे और बंदी आदमी तथा जेल की दुर्व्यवस्था पर यह कविता एक दस्तावेज है-

जेल की बात बतावें कहा,

कफनी-सी मिलै जहाँ एक लँगोटी।

तेल व नून पे लूट परै,

मरचे के लिए नित छीना घसोटी।

घस को साग छ मास मिले,

नित दाल मिलै भल काली कलूटी।

पूछो ना भाई सोहारी सी लागत,

भूख लगे पर जेल की रोटी।।

स्वराज आंदोलन में ‘चरखा आंदोलन’ की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। वह स्वदेशी का मात्र प्रतीक ही नहीं, बल्कि एक महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय आंदोलन भी रहा है। लोक जीवन में ‘चरखा आंदोलन’ का स्वर वह सामने लाते हैं-

अलबेलवा चरखा खूब चलै।

धुनि-धुनि रुइया मैं पिउनी बनायउँ,

काते सूत्त अधिक निकलै।

सुतवा मैं काति-काति खद्दर बनायउँ,

देखि विदेसिया हाथ मलै।

ओहि रे कपड़वा कै कुर्ता बनायउँ, नौकरशाही देखि जलै।

जो दूँ मनबौं गांधी कै बतिया,

भारत माँ कै बिपति टलै ॥

पराधीन भारत में आजादी और स्वदेशी पर दीवानगी की हद तक आह्वान गीत गानेवाले और आजादी के पश्चात राष्ट्रीय एकता और गरिमा के ध्वजवाहक समाज सेवी पंडित राजाराम शर्मा के कृतित्व का ऋण इस समूचे अंचल पर है। आज के बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दबावऔर सामाजिक राष्ट्रीय विघटन के प्रति चिंतित और सचेत वे आजीवन एक संघर्षशील नागरिक बने रहे। उनकी रचनाओं का विपुल भंडार भी प्रायः अप्रकाशित है, किंतु इस धुंध भरे समय में राजाराम शर्मा जैसे समर्पित देशभक्तों के विलोपन की कृतघ्नता आजादी की स्वर्ण जयंती पर एक धब्बे जैसा है। आशा है कि इसे नए सिरे से उनके योगदान का मूल्यांकन करके ऐसे सपूत को अब से सही श्रद्धांजलि दे सकेंगे। हम उन्हीं की निम्नांकित रचना से उन्हें समझ सकते हैं-

मानवता मेरी माता, प्यार मेरे पिता, आस्था मेरी बहिन, श्रम मेरा बंधु।

वेदना बहु रंगिनी मेरी जीवन संगिनी, सुख-दुख के गीत, मेरे सच्चे मीत।

इस भरे-पूरे परिवार में बड़े मजे के साथ जी रहा हूँ।

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं।)

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