वैदिक सम्पत्ति भाग- 345 जाति,आयु और भोग

Devendra singh arya

(यह लेख माला हम पंडित रघुनंदन शर्मा जी की पुस्तक वैदिक सम्पत्ति नामक से अपने सुधि पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं।)
प्रस्तुति -देवेंद्र सिंह आर्य
चैयरमेन- ‘उगता भारत’

गतांक से आगे ….

बृहदारण्यक उपनिषद् में लिखा है कि ‘तेन धीरा अपि यन्ति ब्रह्मविदः स्वर्गलोकमित ऊष्य विमुक्ताः’ अर्थात् ब्रह्मज्ञानी पुरुष मुक्त होकर ऊपर की ओर स्वर्गलोक को जाते हैं। इसी वर्ग को ब्रह्मलोक भी कहा गया है और सूर्य से ही उसका भी सम्बन्ध बतलाया गया है। मुण्डक उपनिषद् में लिखा है कि-

एह्य होति तमाहुतयः सुवर्चसः सूर्यस्य रश्मिभिर्यजमानं वहन्ति ।
प्रियां वाचमभिवदन्त्योऽचंयन्त्येष वः पुण्यः सुकृतो ब्रह्मलोकः ।।
एतेषु यश्चरते भ्राजमानेषु यथाकालं चाहुतयो ह्यावदायन् ।
तनयन्त्येताः सूर्यस्य रश्मयो यत्र देवानां पतिरेकोऽधिवासः ।। (मु० उ० 1।2।6)

अर्थात् आइये ! आइये !! यही ब्रह्मलोक है, यह कहती हुई यज्ञाहुतियाँ सूर्य की किरणों के द्वारा यजमान को ब्रह्मलोक में ले जाती हैं। जो समय पर अग्निहोत्रादि उत्तम कर्मों को करता है, उसको सूर्य की किरणें वहीं पहुंचा देती हैं, जहाँ वह देवाधिदेव परमात्मा रहता है। इन प्रमाणों से यह स्पष्ट हो गया कि अग्निहोत्री को अग्नि की सातों ज्वालाएं सूर्य की सातों किरणों के द्वारा उस स्वर्ग अर्थात् ब्रह्मलोक में पहुँचा देता है, जो सूर्य के ऊपर है। यजुर्वेद में परमात्मा स्वयं कहता है कि ‘योऽसावादित्ये पुरुषः सो असावहम् ‘ अर्थात् जो सूर्यद्वार से निर्मल और अमृत पुरुष दिखलाई पड़ता है, वह मैं ही हूँ। कहने का मतलब यह कि स्वर्ग और ब्रह्मलोक एक ही स्थान के नाम हैं और यह स्थान सूर्य के ऊपर है तथा इसी में मुक्त पुरुष ब्रह्मानन्द का रसास्वादन करते हैं। उपनिषदों ने बहुत ही स्पष्ट रीति से वर्णन कर दिया है कि स्वर्ग और ब्रह्मलोक में मुक्तात्माएँ किस प्रकार का आनन्द प्राप्त करती हैं। यहां इम थोड़ी सी श्रुतियों को उद्धृत करते हैं, यथा-

**स्वरों लोके न भयं किचनास्ति न तत्र त्वं न जरया बिमेति ।*
उसे तीर्खाशनायापिपासे शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ।।
*
स मृत्युपाशान् पुरतः प्रणोद्य शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके । स्वर्गलोका अतमृत्व भजन्ते ।

एवं तत्प्रज्ञानेत्रं प्रज्ञाने प्रतिष्ठितं ।
प्रज्ञानेश्रो लोकः प्रप्ता प्रतिष्ठा प्रज्ञानं ब्रह्म ।
स एतेन प्रज्ञानात्मनास्माल्लोकावूथ्वं उत्क्रम्यामुष्मिम् स्थगें लोके सर्वान् कामानाप्त्वामृतः समभवत् समभवत् ।
स तेजसि सूर्य सम्पन्नः ।
यथा पादोदररत्वचा विनिषुच्यत एष ह वं स पाप्मना विनिर्मुक्तः स सामभिः सन्नीयते ब्रह्मलोकं स एतस्माज्जीवधनात्परात्परं पुरिशयं पुरुषमीक्षते ।।
तेषु ब्रह्मलोकेषु परापरावतो वसन्ति तेषां न पुनरावृत्तिः ।
एवं वर्तयन्यावदायुषं ब्रह्मलोकमभिसम्पद्यते न च पुनरावर्तते न च पुनरावर्तते । (उपनिषद्वचन)
अर्थात् स्वर्गलोक में न भय ही है और न वहाँ वृद्धावस्था का ही डर है। वहाँ तो क्षुषा, तृषा के दुःखों से छूटकर केवल आनन्द ही आनन्द है। स्वर्गलोक को जानेवाला मृत्यु के पाशों को तोडकर वहाँ आनन्द करता है। स्वर्ग- लोक में अमृतत्व को प्राप्त होता है और सब कामनाओं को प्राप्त होकर आनन्द करता है। जिस तरह सर्प अपनी केचुली का परित्याग कर देता है, उसी तरह जीवन्मुक्त सब पापों से छूटकर ब्रह्मलोक में आनम्दघन परमात्मा को प्राप्त होता है। इस प्रकार से जो ब्रह्मलोक में जाते हैं. वे फिर लौटकर नहीं आते। अर्थात् जो ब्रह्मलोक को जाते हैं, वे वापस नहीं आते ! नही आते !! इन उपर्युक्त समस्त प्रमाणों से स्वर्ग और ब्रह्मलोक से सम्बन्ध रखनेवाली तीनों शर्तों की पूर्ति प्रमाणित होती है। अर्थात् ब्रह्मविद् स्वर्ग को जाते हैं, वे हर प्रकार के भय, शोक और जरा-मृत्यु आदि दुःखों से छूट जाते हैं और समस्त कामनाओं से निवृत्त होकर आनन्दित हो जाते हैं। यही मोल है और यही आर्यों की अन्तिम अभिलाषा है, किन्तु इस पर लोग यह आपत्ति करते हैं कि गीता और उपनिषदों में स्वर्ग और ब्रह्मलोक से वापस आना भी लिखा है, इसलिए स्वर्ग और ब्रह्मलोक मोक्षधाम नहीं हो सकते और न स्वर्ग तथा ब्रह्मलोक के जाने वाले मुक्त ही समझे जा सकते हैं। वे अपने इस आरोप की पुष्टि में निम्न प्रमाण उपस्थित करते हैं-

नाकस्य पृष्ठे ते सुकृतेऽनुभूवेमं लोकं होनतरं चाविशन्ति ।
(मु० उ० 1।2।10)
ततो भुक्त्या स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मृत्युलोकं विशन्ति ।
ते ब्रह्मलोकेषु परान्तकाले परामृताः परिमुच्यन्ति सर्वे।
(मु० उ० 3/216)
आग्रह्मभुवमाहल्लोकाः पुनरावतिनोऽर्जुन । (गी० 8।16)

अर्थात् सूर्य के पृष्ठभाग स्वर्ग में आनन्द भोग कर प्राणी हीनतर लोकों में जाते हैं। स्वर्गलोक का सुख भोगकर मृत्युलोक को प्राप्त करते हैं। परान्तकाल में ब्रह्मलोक से भी हट जाना पड़ता है और ब्रह्मलोक से भी पुनरावर्तन होता है। आरोपकर्ता कहते हैं कि इन प्रमाणों में स्पष्ट ही स्वर्ग और ब्रह्मलोक से वापस आना कहा गया है, इसलिए स्वर्ग और ब्रह्मलोक मोक्षधाम नहीं हो सकते।
क्रमशः

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