देश का वास्तविक गद्दार कौन ? भाग — 11

गांधीजी ने जानबूझकर नही बचाया था भगतसिंह को फांसी से

गांधीजी ने अपने प्रभाव का प्रयोग कभी उन मुस्लिमों पर नही किया जो किसी भी प्रकार से देश की मुख्यधारा के साथ चलने को तत्पर नही थे। यद्यपि ऐसे कई अवसर आये जब गांधीजी अपने प्रभाव का प्रयोग करते हुए मुस्लिमों को हिंदुओं और हिंदुस्तान के साथ चलने को प्रेरित कर सकते थे। बात नवंबर 1919 की है। स्वामी श्रद्घानंदजी की अध्यक्षता में हिंदू मुस्लिमों की एक संयुक्त सभा गोरक्षा को लेकर की गयी। हकीम अजमल खां और आसफ अली की ओर से गांधीजी को भी निमंत्रित किया गया। इसमें गोरक्षा के साथ-साथ खिलाफत पर भी विचार किया जाना था। सरकार उन दिनों प्रथम विश्वयुद्घ की समाप्ति पर विजयोत्सव मना रही थी। अत: बैठक में यह भी निश्चित किया जाना था कि इस विजयोत्सव में सम्मिलित हुआ जाए या नही। खिलाफत के प्रश्न पर उस समय मुस्लिम समुदाय की अंग्रेजों से दूरी बन गयी थी। ऐसे में गांधीजी के लिए यही उचित था कि वे हिंदू-मुस्लिम दोनों समुदायों को एक साथ लाने का सच्चा प्रयास करते और मुस्लिमों से स्पष्ट करते कि यदि वे वास्तव में खिलाफत के बिंदु पर हिंदुओं का सहयोग चाहते हैं तो गोहत्या निषेध पर वे भी हिंदुओं का सहयोग करें। स्वामी श्रद्घानंद जी का मंतव्य यही था और सुखद बात यह थी कि मुस्लिम नेता मौलाना अब्दुलबारी ने भी अपने भाषण में यह स्पष्ट कर दिया था कि-‘‘मुसलमानों को हिंदुओं की भावना का सम्मान करके गोवध बंद कर देना चाहिए।’’ परंतु उससे पहले गांधीजी ने बात का गुडग़ोबर कर दिया था। उन्होंने गोवध निषेध और खिलाफत दोनों पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा-‘‘दोनों प्रश्नों पर उनके गुण-दोष की दृष्टि से विचार होना चाहिए। यदि खिलाफत के प्रश्न में तथ्य है, उसमें सरकार की ओर से अन्याय होता है तो हिंदुओं को मुसलमानों का साथ देना चाहिए। हिंदू यदि कोई ऐसी शर्त करें कि इसके साथ गोरक्षा को जोडऩा चाहिए तो वह उन्हें नही करनी चाहिए। ऐसी शर्त उन्हें शोभा नही देगी। मुसलमान खिलाफत में मिलने वाली मदद के बदले गोवध बंद करें तो यह उन्हें भी शोभा न देगा।’’

गांधीजी ने स्पष्ट कुछ नही किया। जबकि उस समय उन्हें मुस्लिमों से गोरक्षा के लिए स्पष्ट कहना चाहिए था कि तुम्हें इस देश को अपना देश मानते हुए इसकी परंपराओं के साथ भी तारतम्य स्थापित करना चाहिए। मुसलमानों को उस समय हिन्दुओं की सहायता की आवश्यकता थी, इसलिए वह गौवध निषेध पर अपनी सहमति दे सकते थे। पर उन्होंने बिना सोचे-समझे गोहत्या पर निषेध के प्रश्न को पीछे छोड़ अपनी ओर से ‘खिलाफत’ के बिंदु पर मुस्लिमों का सहयोग करना स्वीकार कर लिया।

गांधीजी का अंग्रेजों के प्रति भी दृष्टिकोण कुछ ऐसा ही था। उनके हर वायसराय से मित्रतापूर्ण संबंध रहे। मनु बहन ‘गांधी की डायरी’ में गांधीजी के विषय में लिखती हैं :-‘‘(गांधीजी का कहना था कि) लार्ड माउंटबेटन के विषय में कुछ भी झूठ कहना उनके साथ अन्याय करना है। वह चाहे हिंसा की शक्ति में विश्वास करते हैं, पर ईश्वर को मानते हैं?’’ कहने का तात्पर्य है कि एक हिंदू यदि ईश्वर विश्वासी होकर हिंसा करता है तो गांधी के लिए वह घृणित अपराध करता है पर यदि अंग्रेज ऐसा करता है तो वह मानवीय है। मानवता की ऐसी ही परिभाषा थी गांधीजी की। द्वितीय विश्व युद्घ के समय गांधीजी पर वायसराय की कौंसिल के एक भारतीय सदस्य ने आरोप लगा दिया था कि वह जापान से मिल गये हैं, तो इस पर गांधीजी को बहुत बुरा लगा। इस सदस्य का नाम न बताकर गांधीजी ने शाम को घूमते समय कहा था-‘‘…ऐसा कहता है तो और किसी को मैं क्या कहूं?….का और मेरा पुराना संबंध रहा है। वायसराय को मैंने ही कहा था….को अपनी कौंसिल में बुलाओ।’’ (‘बापू की कारावास कहानी’)

इस विश्वासपात्र व्यक्ति को लॉर्ड वेवल ने गांधीजी के कहने पर अपनी कौंसिल में रखा था। यह अधिकार भारत के किसी अन्य नेता को प्राप्त नही था। इसका अभिप्राय है कि गांधीजी और ब्रिटिश सरकार दोनों एक दूसरे की गुप्त बातों को जानते थे। सरदार भगतसिंह को फांसी से न बचाने में गांधीजी ने जिस प्रकार की शिथिलता का प्रदर्शन किया था वह एकप्रकार से राष्ट्र के साथ विश्वासघात ही था। उस प्रकरण में जब बाद में कुछ तथ्य सामने आये तो पता चला कि गांधीजी अंग्रेजों के साथ कितना मिलकर चल रहे थे।

महात्मा गांधी और ब्रिटिश सरकार की पारस्परिक समन्वय की भावना को देखकर तो यह लगता था कि गांधीजी का संघर्ष अंग्रेजों से न होकर हमारे क्रांतिकारियों से था और ब्रिटिश सत्ताधीशों का संघर्ष गांधी से न होकर भारत की जनता से था।

हंसराज रहबर लिखते हैं कि इर्विन से समझौते के समय गांधीजी ने भगतसिंह और उनके साथियों को फांसी से बचाने के लिए क्या प्रयत्न किया? इस विषय में बहुत सी अफवाहें फैली हुई हैं। इन अफवाहों को फेेलाने में गांधी और वायसराय दोनों की दिलचस्पी थी, लेकिन राष्ट्रीय लेखागार की फाइलों से कुछ नये तथ्य प्रकाश में आये हैं, जिन्हें मन्मथनाथ गुप्त ने ‘नवनीत’ में प्रकाशित करके उद्घृत किया है। जैसे लॉर्ड इर्विन ने अपने रोजनामचे में लिखा है :-

‘‘दिल्ली में जो समझौता हुआ, उससे अलग और अंत में मिस्टर गांधी ने भगतसिंह का उल्लेख किया है, उन्होंने फांसी की सजा रद्द कराने के लिए कोई पैरवी नही की। पर साथ ही उन्होंने वर्तमान परिस्थितियों में फांसी को स्थापित करने के विषय में कुछ नही कहा। (फाइल नं. 5-45/1931 के मध्य डब्ल्यू-2 गृहविभाग राजनीतिक शाखा)

20 मार्च को गांधीजी वायसराय के गृहसदस्य हर्बर्ट इमरसन से मिलेंगे। इमरसन ने भी अपनी दैनन्दिनी (रोजनामचा) में लिखा है :-‘‘मिस्टर गांधी की इस मामले में अधिक रूचि ज्ञात नही हुई। मैंने उनसे यह कहा था कि यदि फांसी के उपरांत अव्यवस्था नही हुई तो वह बड़ी बात होगी। मैंने उनसे यह कहा कि वह सब कुछ करें जिससे कि (भगतसिंह की फांसी के पश्चात बने परिवेश में) अगले दिनों में सभायें न हों, और लोगों के उग्र व्याख्यानों को रोकें। इस पर उन्होंने अपनी स्वीकृति (कितना बड़ा विश्वासघात था, देश के साथ) दे दी और कहा जो कुछ भी मुझसे हो सकेगा मैं करूंगा।’’ (फाइल नं. 33/1/1931)

कहने का अभिप्राय है कि गांधीजी न केवल इस बात के प्रति संकल्पबद्घ थे कि वे भगतसिंह और उनके साथियों की फांसी नही रूकवाएंगे, अपितु इससे भी बढक़र वह अंग्रेजों की सहायता करने के उद्देश्य से यह भी सुनिश्चित कर रहे थे कि भारत में भगतसिंह की फांसी को लेकर कोई सभा या शोकसभा भी न की जाए। ऐसे गांधीजी से आप अपने देशभक्तों को श्रद्घांजलि की अपेक्षा भी नही कर सकते।

भगतसिंह की फांसी से मात्र तीन दिन पूर्व गांधीजी ने इमरसन के लिए एक पत्र लिखा था। पत्र की भाषा इस प्रकार थी-‘‘प्रियवर इमरसन, अभी-अभी आपका जो पत्र मिला इसके लिए धन्यवाद। आप जिस सभा का उल्लेख कर रहे हैं, उसका मुझे पता है। हर ऐहतियात ले ली है और आशा करता हूं कि कोई गड़बड़ नही होगी। मैं सुझाव देता हूं कि पुलिस शक्ति का कोई दिखावा न किया जाए, और सभा में किसी प्रकार का हस्तक्षेप न हो। रही उत्तेजना, सो तो होगी। इस उत्तेजना को सभाओं के जरिए से निकल जाने दिया जाए यही उचित होगा।’’ (फाइल नं. 4-21/1931)

गांधीजी यहां स्पष्ट कर रहे हैं अपने चरित्र को। उन्होंने ब्रिटिश सरकार की भलाई के लिए उसे यह सुझाव दिया कि भगतसिंह आदि की फांसी के पश्चात यदि कोई सभा हो तो उसे होने दिया जाए, उसे बाहर रहकर हम संभाल लेंगे। यदि आपने पुलिस बल नियुक्त किया और शक्ति दिखाई तो अनावश्यक ही मामला बढ़ जाएगा। विरोध को शांतिपूर्वक सभाओं के माध्यम से निकल जाने दिया जाए। यही उचित होगा। अब यदि कहीं भगतसिंह की फांसी पर गांधीजी या किसी अन्य कांग्रेसी ने उस समय मुंह भी लटकाया हो तो वह केवल नाटक था, सच तो यही था कि भगतसिंह जैसे लोग उनके लिए मर जाने ही ठीक थे। गांधीजी ने 1930 में वायसराय के नाम एक पत्र लिखा था-जिसमें उन्होंने क्रांतिकारियों को क्रांतिकारी न कहकर ‘हिंसक दल’ के लोग कहा है। (‘आज का भारत’ पृष्ठ 240) शहीद सुखदेव ने स्पष्ट शब्दों में गांधी पर यह आरोप लगाया था कि-‘‘आप क्रांतिकारी आंदोलन को कुचलने में नौकरशाही का साथ दे रहे हैं।’’

पंजाबी पत्रिका ‘हेम ज्योति’ मार्च 1971 में सुखदेवजी का एक लेख लिखा गया, जिसमें उन्होंने गांधीजी से पूछा-‘‘समझौता करके आपने अपना आंदोलन रोक लिया है। इसके परिणामस्वरूप सत्याग्रह के सारे कैदी रिहा हो गये हैं। पर क्रांतिकारी बंदियों के बारे में आपका क्या कहना है? 1915 में ‘गदर पार्टी’ के कैदी आज भी जेलों में पड़े सड़ रहे हैं। जबकि उनकी सजाएं पूरी हो चुकी हैं। मार्शल लॉ के सैकड़ों कैदी आज भी जीवित होते हुए कब्रों में दफनाए हुए हैं।….इन सबके विषय में आपको क्या कहना है? लाहौर साजिश केस ने तीन कैदी जिन्हें फांसी की सजा मिली है, और जिन्होंने संयोग से देश में बड़ी प्रतिष्ठा प्राप्त कर ली है, क्रांतिकारी दल के सब कुछ नही है। दल के समक्ष केवल उन्हीं की किस्मत का सवाल नही है। वास्तव में उनकी सजा में परिवर्तन से देश का कुछ नही संवरना जितना उन्हें फांसी पर चढ़ा देने से संवरेगा।’’

गांधीजी के पास सुखदेव के इस पत्र का कोई उत्तर नही था। उनका मौन बता रहा था कि वह हर स्थिति में क्रांतिकारियों को फांसी चढ़ जाने देना चाहते थे। वह नही चाहते थे कि उनके रहते देश में किसी अन्य की जय जयकार हो।

उधर वीर सावरकर थे। 23 मार्च 1931 को स्वतंत्रता का यह परमोपासक वरवड़े नामक गांव में उसकी पाठशाला के वार्षिकोत्सव में सम्मिलित थे। बंदरगाह पर आने वाले जहाज से एक समाचार पत्र ज्ञात हुआ कि भगतसिंह, राजगुरू को फांसी हो गयी है। उस समाचार को पढ़ते ही क्रांतिवीर की आंखें नम हो गयीं। वहां से वह लौटे तो रत्नागिरि में उन हुतात्माओं को समर्पित एक गीत की रचना की। गीत के भाव थे-‘‘भगतसिंह हाय हाय! तुम हमारे लिए फांसी हो गये। राजगुरू हाय हाय! जूझते-जूझते समरभूमि पर वीरो तुमने वीरगति पायी है। हुतात्माओं जाओ, तुम्हारी सौगंध लेकर हम प्रण करते हैं कि-तुम्हारा कार्य करने के लिए हम शेष रहे हैं।’’

यह अंतर था सावरकर और गांधी में। गांधी जहां अपने ‘शेरों’ की स्मृति में कोई सभा भी न होने देने या हो जाने पर भी उन्हें मरने देने की योजना अंग्रेजों से मिलकर बना रहे थे-वहीं सावरकर उनकी स्मृतियों को लेकर सौगंध उठा रहे थे कि तुम्हारा शेष कार्य हम पूर्ण करेंगे।

डॉ राकेश कुमार आर्य

संपादक : उगता भारत

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