औपचारिकताओं के मकड़जाल में फंसते जा रहे राष्ट्रीय पर्व

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A still of Red Fort, during the 62nd Independence Day celebrations, in Delhi on August 15, 2008.

15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस पर विशेष-

      – सुरेश सिंह बैस शाश्वत 

 

भारत के लिये अगस्त का महीना अति महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी माह में 15 अगस्त स्वाधीनता दिवस के रुप में मनाया जाता है। इसके लिये असंख्य लोगों ने अपने जीवन का त्याग व बलिदान किया था। इन शहीदों के आजादी के प्रति योगदान को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। भारत की स्वतंत्रता के लिये सुभाष चंद्र बोस, लाल बहादुर शास्त्री, सरदार पटेल, रफीक अहमद, डॉ. राम मनोहर लोहिया जैसे सेनानियों का नाम अमर हो गया। महान नेताओं के इस महान देश में आज भी उनके नाम पर नगर, कस्बे और सड़कें बने हुये है। स्वाधीनता दिवस पर इन्ही नेताओं की कुर्बानियों का स्मरण कर स्वाधीनता संग्राम के शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है। पर आज जबकि 15 अगस्त सन् 2024 का कैलेन्डर सामने है। साल 2024 में भारत अपना 78वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है ,लाल किले पर फिर जलसा हो रहा है। तरह तरह के लोगों का हुजूम और देश का पूरा फौज फटाका, भाषण देते प्रधानमंत्री भी घर घर में दूरदर्शन के माध्यम से नजर आयेंगे। लेकिन इतने सरकारी आडम्बर के बावजूद भी हमारे स्वाधीनता दिवस का बुढापा छुपाये नहीं छुप रहा। इतना बड़ा राष्ट्रीय पर्व जनता का त्यौहार नहीं बन पा रहा है। होली, रक्षाबंधन, दीपावली, क्रिसमस और ईद नहीं बन पा रहा है। दिल्ली सहित प्रदेश की राजधानियों के कार्यक्रम, जिलों के ब्लाक, ग्रामों के कार्यक्रमों में जो लोग भी शामिल होते हैं, उनमें से अधिकतर ऐसे होते हैं जो बस इस इंतजार में रहते हैं कि कब औपचारिकताएं पूरी हों और घर जाकर छुट्टी मनाएं। जिन शहरों और देहातों के लिये दूरदर्शन पुराना हो चला है, वहां के आम लोगों को भी इसे देखने और मनाने में कोई उल्लास नहीं रह गया है। इस दिन सरकारी प्रतिबंध न हों तो बाजार भी खुल जाते और लोग काम धन्धों में भी लगे रहते।

आखिर इस विरोधाभास की कि वजह क्या है? हमारा स्वाधीनता (स्वतंत्रता) दिवस तफरीह के लिये तय किया गया मेला भी  नहीं है, जिसके साथ हम भावनात्मक रुप से न जुड़ सकें। इस दिन को पाने के लिये  हमने अंग्रेजों से शताधिक वर्षो तक संघर्ष किया है। इस राह में हमारे कितने  महापुरुषों ने धर्म जाति से ऊपर उठकर अंग्रेजों की यातनाएं सहीं है, खून बहाया है, जान की कुर्बानियां दी है। वस्तुतः इसका उत्तर खोजने के लिये हमें बहुत दूर नहीं  जाना पड़ता, कुछ पीछे जाने पर ही इसके प्रति लोगों की उदासीनता का कारण ज्ञात हो जायेगा। बल्कि यह भी ज्ञात हो जायेगा। जिससे पर्व को नया अर्थ मिल  सके। 

 मूलतः इस राष्ट्रीय पर्व के प्रति लोगों की उदासीनता का कारण इस पर्व के साथ जुड़े आडम्बर एवं प्रपंच है। प्रपंच जब तक जीवन के किसी सूत्र से जुड़े रहते हैं तब तक जनमानस को आकर्षित करते हैं, जहां उनका रिश्ता जीवन से टूटा, वे  बेजान हो जाते हैं। फलतः वे ढोये जाते हैं । बस यही कुछ किसी हमारे स्वाधीनता  दिवस के आडम्बर का भी है। इस दिन हमारे लीडरों द्वारा उपलब्धियों का डंका पीटा जाता है। विकास के स्वप्न दिखाये  जाते हैं। देश की सुरक्षा और शक्ति का गुण गान किया जाता है। जबकि यह बात किसी से नहीं छिपी है कि देश की अखण्डता किस कदर खतरे में है। उत्तर पश्चिम से पूर्वोत्तर तक सारी सीमाएं असुरक्षित हैं। ऐसी स्थिति में कोई भी आश्वासन आश्वस्त नहीं कर सकते, जब तक सीमाओं और राष्ट्रीय अखंडता और शांति की गारंटी नहीं मिल जाती। 

वहीं इस पर्व के उपलक्ष्य में आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रमों की झांकी में अथवा कश्मीर से जब गोलियों की आवाज आ है तब डोगरी गीत लोगों को कैसे रास आयेगा। बच्चों की संचालित गतिविधियां भी झूठी लगती हैं, क्योंकि हम इसके प्रति ही आश्वस्त नहीं हैं कि हमारे बच्चे बड़े होकर रोजी रोटी का भी इंतजाम कर पायेंगे। यह बात तो सहज ही है कि जिसका जन्मदिन है, वही बुरी तरह बीमार  हो तो उसके जन्मदिन को कैसे उल्लासपूक मनाया जा सकता है। हमारे धार्मिक त्यौहारों के साथ यही खास बात है। कि वे विरोधाभास खड़ा नहीं करते। वे मनाए ही ऐसे मौसम में जाते हैं जब खेतों में फसल लहलहा रही होती है अथवा धानं खलिहानों से घरों में पहुंच रहा होता है। अतः स्वाधीनता दिवस के दिन उक्त आडंबरों को छोड़ इसे राष्ट्र के मूल्यांकन दिवस के रुप में याद करें और इस दिन उन चुनौतियों का सामना करने की रणनीति तैयार करें जो देश पर मंडरा रही है।

– सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”

एवी के न्यूज सर्विस

 

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