*”महाव्यक्तित्व का महाप्रयाण*”

Screenshot_20240804_211805_WhatsApp

“1- बाल्यकाल एवं शिक्षा-
स्व. पुण्यात्मा श्री डाॅ. गणेशराम जी शर्मा का दिव्य जन्म पूज्य पिता श्री पं. रामचरन शर्मा दंडौतिया एवं पूज्या माताजी श्रीमती बैकुंठी देवी के पावन गृह के अंदर 1932 में ग्राम- मोहनपुरा,गोरमी, जिला- भिंड में हुआ था।
आपके बचपन में अपने पूज्य ताऊ श्री हरिगोविन्द जी के संस्कारों के प्रबल प्रभाव से रामायण और महाभारत की कथा के आधार पर लोक गीतों और भजनों की रचना करने और मधुर कंठ से गाने का परम कौशल प्राप्त किया।
आपकी प्राथमिक शिक्षा- मोहनपुरा,माध्यमिक शिक्षा- मेंहगाँव,उच्चशिक्षा- भिंड में हुई।
” 2- मध्यप्रदेश शासन में सर्विस-
आपने मध्यप्रदेश शासन के पशुचिकित्सा विभाग में एक सुप्रसिद्ध डॉक्टर के रूप में 37 वर्ष सर्विस की।
आप शासकीय सेवा में अपने उत्तरदायित्व और कर्तव्य का पालन पूर्ण निष्ठा, ईमानदारी और कर्तव्यपरायणता के साथ पूर्ण की।आपने अपने महान कार्यों से ग्रामीण किसानों एवं नगरीय जनमानस के साथ अपने विभाग में विश्रुति अर्जित की।आप गोसदन ओरछा में मैनेजर के पद से सेवा निवृत्त होकर गोमाता के सच्चे सेवक,गोभक्त एवं गोमाता के परम पालक बने।
” 3- भारतीय सनातन वैदिक संस्कृति के समुपासक”
आप भारतीय सनातन वैदिक संस्कृति के सच्चे समुपासक और समाराधक थे।
आपने अपने सतत स्वाध्याय के संकल्प से वेद,उपनिषद् ,रामायण,गीता,महाभारत के साथ वैदिक साहित्य का गूढ़तम चिंतन,मनन एवं प्रवचन किया।
आपको संपूर्ण रामचरितमानस कंठस्थ थी और वाल्मीकिरामायण के प्रसंगों का विशद चिंतन करते थे।
आप प्रतिभाशाली और विलक्षण बुद्धि के धनी थे।
आप गीत,भजन एवं लेख आदि के लेखन कौशल में परम निपुण थे।
आप हिंदी साहित्य के स्वाध्याय में विशेष अभिरुचि रखते थे।
आपने लोकगीत गायनकला में मोहनपुरा,गोरमी और भिंड जिले में प्रसिद्धि प्राप्त की।
” 4- सन्त सत्संग एवं साधु सम्मान तथा सेवा-
आपने अपनी बाल्य अवस्था से ही अपने ग्रामीण क्षेत्र में अनेक सन्तों का समागम किया और साधुओं की दूध एवं भोजन आदि द्वारा सेवा तथा सम्मान का काम किया।
जीवन की प्रारंभिक अवस्था में आदि शंकराचार्य जी के अद्वैतवाद दर्शन का बहुत प्रभाव रहा।अद्वैतवादी साहित्य का अध्ययन किया।अद्वैतवादी विचारक साधुओं का सत्संग किया।कालान्तर में आर्यसमाज की विचारधारा से प्रभावित होने पर आर्य सन्यासियों- स्वामी ब्रह्मानन्द जी दण्डी,स्वामी शंकरानन्द जी, स्वामी वेदानन्द जी,स्वामी व्रतानन्द जी,स्वामी ओमानन्द जी,स्वामी आनन्द बोध जी,स्वामी जगदीश्वरा नन्द जी,स्वामी सत्यपति जी,स्वामी प्रणवानन्द जी आदि महान संन्यासियों के साथ आपका श्रद्धाभाव था।श्री आचार्य ज्योतिस्वरूप जी,श्री आचार्य रामदत्त जी,श्री आचार्य वागीश जी,श्री आचार्य भीमसेन जी वेदवागीश,श्री आचार्य यज्ञदेव जी वेदवागगीश,श्री आचार्य सत्यानन्द जी वेदवागीश,श्री आचार्य रमेश चन्द्र जी,श्री आचार्य छविकृष्ण जी,श्री आचार्य कर्णदेव जी,श्री आचार्य महावीर जी मीमांसक, श्री डॉ महेश जी विद्यालंकार,श्री डॉ धर्मेन्द्र जी,श्री डाॅ. भवानीलाल भारतीय,श्री आचार्य विश्वबन्धु जी,श्री आचार्य रामानन्द जी,श्री पं. राजगुरु जी शर्मा आदि अनेक विद्वानों,धर्माचायों और अनेक सुप्रसिद्ध भजनोपदेशकों के साथ आपका सतत संपर्क रहा।
श्री नरदेव जी आर्य भजनोपदेशक को बुलाकर ग्रामीणक्षेत्रों में बहुत प्रचार कराया।सभी के साथ आपका आत्मीय व्यवहार रहा।
” 5- महर्षि दयानन्द सरस्वती के परम भक्त”
महर्षि दयानन्द सरस्वती के वैदिक साहित्य का स्वाध्याय एवं सत्संग करने से आपके जीवन में महापरिवर्तन हुआ।
महर्षि प्रतिपादित गुरुकुल शिक्षा प्रणाली से प्रभावित होकर अपने पुत्रों और पुत्री को गुरुकुल चित्तौड़गढ़,गुरुकुल एटा,गुरुकुल खेड़ाखुर्द, कन्या गुरुकुल राजेन्द्रनगर, दिल्ली,श्री संपूर्णानन्द संस्कृत वि. वि. वाराणसी,श्री लाल बहादुर शास्त्री संस्कृत वि. वि. कटवारिया सराय,नई दिल्ली,जीवाजी वि. वि. ग्वालियर,दिल्ली वि. वि. दिल्ली में पढ़ाकर सुशिक्षित,सुसंस्कारित एवं सुयोग्य बनाया।
पुत्रगण और पुत्री अपनी शाससकीय सेवा के साथ अपने गृहस्थ जीवन में सुखी एवं सम्पन्न हैं।आपके पुत्र आपकी तरह धार्मिक एवं सामाजिक क्षेत्र में काम कर रहे हैं।
” 6- धार्मिक एवं सामाजिक जीवन में योगदान-
आपके जीवन का अधिकतर समय धार्मिक एवं सामाजिक क्षेत्र में कार्य करने में व्यतीत हुआ।
गोरमी क्षेत्र,ओरछा,झाँसी,ग्वालियर और आर्य समाज मंदिर, वसंत विहार,दिल्ली में आपने वैदिक धर्म के प्रचार-प्रसार में अमूल्य योगदान दिया।
आपकी कर्मठता,सरलता,सहजता,कार्यप्रवीणता और योग्यता की सर्वत्र प्रशंसा होती थी।
आपने अपने मोहनपुरा और गोरमी क्षेत्र के स्नेही मित्रों के साथ मिलकर अनेक सामाजिक कार्य किये।
” 7- जातिप्रथा और दहेजप्रथा के प्रबल विरोधी-
आप जीवनभर जातिप्रथा के निवारण और उन्मूलन के लिए काम करते रहे।
दलित समाज के जनमानस को सम्मान देने के लिए बहुत कार्य किया।
अपने पुत्रों के विवाह में दहेज प्रथा को दूर करने और दहेज न लेने का प्रबल संकल्प आपने जीवनभर निभाया।
” 8- ज्ञानयोग एवं कर्मयोग की प्रतिमूर्ति-“
आपने अपने जीवन में ज्ञानयोग और कर्मयोग की सतत साधना की।
आपने बाल्यावस्था,युवावस्था और वृद्धावस्था पर्यन्त ज्ञानमय एवं कर्ममय जीवन यापन किया।आप सदा परोपकार और परहित सेवा के कार्य करते रहे।
आपके जीवन का अंतिम अवसान उदात्तभावों और प्रभुभक्ति के साथ पूर्ण हुआ।
” परोपकाराय सतां विभूतयः

Comment:

betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
holiganbet güncel giriş
holiganbet güncel
holiganbet giriş
bettilt giriş
betpark giriş
klasbahis giriş
klasbahis giriş
holiganbet güncel
imajbet güncel
holiganbet güncel giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
bettilt giriş
betpark giriş
casinolevant giriş
casinolevant giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betyap güncel
betpark giriş
betpark giriş
betyap giriş
betpark giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
vaycasino giriş
bettilt giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
casinolevant giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş