ट्रंप नहीं अमेरिका का अतीत बोल रहा है

अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने पिछले दिनों कश्मीर के संबंध में अपना यह बयान देकर कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी उनसे कश्मीर समस्या का समाधान कराने के लिए मध्यस्थ होने के लिए कहा था , अपनी स्थिति को खराब कर लिया है । भारत में बड़ी तेजी से ट्रंप के प्रति एक ऐसा परिवेश बनता जा रहा था जिसमें उन्हें भारत के प्रति एक अच्छा दृष्टिकोण रखने वाला राजनेता माना जा रहा था । परंतु अब भारत के लोगों के मन में उनके प्रति वैसी ही शंकाएं फिर से पैदा हो गई हैं जैसी अमेरिकी नेतृत्व के प्रति उनसे पहले रहती थीं। अमेरिका की प्रमुख पत्रिका ‘ फॉरेन पॉलिसी : ने लिखा है कि ट्रंप ने “अज्ञानता का परिचय दिया है और दशकों पुराने कश्मीर विवाद में घुस गए । ”
यदि कश्मीर को लेकर अब से पूर्व के अमेरिकी नेतृत्व की नीतियों पर विचार किया जाए तो इतिहास हमें यही बताता है कि कश्मीर के प्रश्न पर प्रारम्भ से ही संयुक्त राज्य अमेरिका ने पाकिस्तान का समर्थन किया है। अमेरिकी नीति के कारण ही कश्मीर के प्रश्न का संतोष जनक समाधान अब तक नहीं हो सका है , यद्यपि अभी कुछ दिन पहले तक भारत में ऐसी सोच बनती जा रही थी कि कश्मीर का समाधान चीन के कारण नहीं हो पा रहा है।
सर्वप्रथम कश्मीर विवाद ने अमेरिका द्वारा अपनाया गया एकपक्षीय दृष्टिकोण भारतीय हितों पर कुठाराघात का ज्वलन्त उदाहरण है। कोरिया, ग्रीक तथा हंगरी के प्रश्नों को लेकर अमेरिका ने जो उत्तेजना और रोष दर्शाया वह कश्मीर के संदर्भ में पूर्णतया विपरीत दृष्टिकोण प्रदर्शित करने वाला ही था। इसके विपरीत कश्मीर में पाक सेनाओं द्वारा की गयी लूटपाट, बलात्कार और हत्याओं को उपेक्षित कर पाकिस्तान के पक्ष में जो समर्थन दिया, उसे भारतीय जनता भी कभी भूल नहीं पायी ।
इतना ही नहीं कश्मीर में अमेरिकी नागरिकों और कतिपय सैनिक तत्वों ने पाकिस्तान की ओर से सक्रिय रूप से भाग भी लिया था। कश्मीर नरेश स्वर्गीय हरिसिंह द्वारा कश्मीर के विलीनीकरण प्रलेखन पर हस्ताक्षर करने के बाद यह क्षेत्र अक्टूबर 1947 में भारत का अंग बन गया था।
विलय की इस प्रक्रिया के दौरान ही पाकिस्तानी शासकों ने एक सुनियोजित ढंग से इस प्रदेश पर धावा बोलने का षंडयंत्र रच दिया था। अक्टूबर में जब यह योजना कार्यान्वित हुई तो भारत ने आक्रमण को विफल करने के लिए सैनिक कार्यवाही के साथ-साथ भूतपूर्व वायसराय माउण्टबेटन के आग्रह पर संयुक्त राष्ट्र संघ के समक्ष प्रस्तुत किया। अमेरिका ने आक्रमण की वस्तुस्थिति को उपेक्षित कर ‘जनमत’ पर अधिक बल दिया। संयुक्त राष्ट्र संघ में अमेरिका के प्रतिनिधि वारन आस्टिन ने कश्मीर पर भारत की सार्वभौमिकता स्वीकार करते हुए भी पाकिस्तान को आक्रमणकारी घोषित करने से इंकार किया। अमेरिका ने कश्मीर समस्या की तुलना, जूनागढ़ से करके इसे हिन्दू-मुस्लिम संघर्ष कहकर और भी उलझन में डाल दिया।
थोडे़ समय के बाद अमेरिकी प्रशासकों ने कश्मीर विभाजन को स्थाई बनाकर उसे स्वतंत्र स्थान बनाने के पक्ष को अपना समर्थन देकर स्थिति को और भी गंभीर बनाने का प्रयास किया।
अमेरिका के लिए साम्यवादी, जगत को नियंत्रित करने की योजना में यही व्यवस्था अधिक हितकर थी, किन्तु भारत की एकता और सुरक्षा की दृष्टि से उससे अधिक खतरनाक प्रस्ताव और क्या हो सकता था ? कश्मीर पर अमेरिका के एकपक्षीय और स्वार्थपरक दृष्टिकोण ने भारत-अमेरिकी सम्बन्धों को सामान्य बनाये जाने में बड़ा अहित किया है।
कश्मीर के पूर्व हैदराबाद राज्य के प्रसंग को लेकर भी अमेरिका ने हर स्तर पर भारत को उत्पीड़ित करने का प्रयास किया । उसका कहना था कि हैदराबाद एक राजनीतिक मामला है और शक्ति का प्रयोग उसकी कानूनी हैसियत को समाप्त कर सकता है । भारत का प्रत्युत्तर बहुत ही सटीक था, उसका कहना था कि चूंकि हैदराबाद सार्वभौमिक राज्य नहीं है, अतः उसे यहाँ शिकायत करने का अधिकार नहीं है।
पाकिस्तानी आक्रमण की वस्तुस्थिति को देखते हुए भारत ने 3 जनवरी 1948 को संयुक्त राष्ट्र का दरवाजा खटखटाया । गांधी जी इस कार्यवाही से अप्रसन्न थे उनका कहना था कि संयुक्त राष्ट्र संघ में ‘‘बन्दरों को न्याय’’ मिलेगा। गांधी जी की यह बात समय के साथ सही होती गयी। कश्मीर का प्रश्न संयुक्त राष्ट्र संघ में अनेक शक्तियों, विशेषकर अमेरिका की स्वार्थ सिद्धी का माध्यम बन गया। भारत सरकार ने संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर की धारा 34 और 35 के अन्तर्गत सुरक्षा परिषद से शिकायत की कि आक्रमण बन्द करने के लिए कदम उठायें। दूसरी ओर पाकिस्तान भारत पर आरोप लगाते हुए कहा कि भारत में कश्मीर का विलय अवैध है। इस प्रकार सुरक्षा परिषद में एक ऐसा मामला आया जिसका इतिहास पश्चिमी राष्ट्रों विशेषकर संयुक्त राज्य अमेरिका की बेईमानी और अन्याय की कहानी थी।
भारत की शिकायत पर सुरक्षा परिषद को कोई निश्चित निर्णय लेना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। बात यह थी की सुरक्षा परिषद में आंग्ल-अमेरिकी गुट का बहुमत था और भारत शत युद्ध के इस दौर में असंलग्नता की नीति का आवलम्बन कर रहा था , जो अमेरिका को फूटी आँख नहीं सुहाता था। इसके विपरीत पाकिस्तान इस गुट का एक पिछलग्गू था।
हमने अमरीकी और पाक संबंधों की उस मिली भगत की हल्की सी झलक यहां दिखाने का प्रयास किया है जो भारत के हितों के विपरीत प्रारंभ से ही कार्य करती आई है। यह झलक इसलिए दिखानी भी आवश्यक थी कि इतिहास इतिहास होता है और उसकी प्रतिच्छाया वर्तमानV को प्रभावित किए बिना कभी नहीं रह सकती । अमेरिका का अतीत वर्तमान में बोल रहा है इसलिए भारत को सावधान रहने की आवश्यकता है।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

Comment:

betpark
betpark giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
savoycasino giriş
savoycasino giriş
savoycasino giriş
savoycasino giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
holiganbet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
Grandpashabet giriş
betpark giriş
betpark giriş
grandpashabet
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
holiganbet güncel giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
holiganbet güncel
holiganbet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
bettilt giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
klasbahis giriş
grandpashabet giriş
klasbahis giriş
klasbahis
holiganbet güncel
imajbet güncel
bettilt giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
grandpashabet giriş
holiganbet güncel giriş
grandpashabet giriş