28 मई जयंती पर विशेष: गांधीजी से चार गुणा अधिक जेल में रहे सावरकरजी

images (40)

हमारे क्रांतिकारियों ने हर वर्ष की भांति 1933 के प्रारंभ से ही कई स्थानों पर बम विस्फोट कर करके सरकार की नाक में दम कर दिया था। सरकार का उन दिनों वश चलता तो वह एक क्रांतिकारी को भी छोड़ती नही। परंतु क्रांतिकारियों के पीछे जनता जनार्दन का व्यापक समर्थन था, इसलिए सरकार पूर्णत: क्रूर और आततायी होते हुए भी कुछ करने से पहले कई बार सोचती थी। इसका एक कारण यह भी था कि भारत में उन दिनों अंग्रेजों की कुल संख्या अधिकतम तीन लाख ही थी। इतनी संख्या के बल पर भारत में शासन करना ‘फूट डालो और राज करो’ की उनकी नीति के आधार पर ही संभव था। इसके लिए एक सबसे बड़ी बाधा उनके सामने यह थी कि सारे क्रांतिकारियों में से उन्हें कोई संगठन या व्यक्ति (एक दो अपवाद को छोडक़र) ऐसा नही मिलता था जो उन्हें भारत के स्वातंत्रय समर की क्रांतिकारी गतिविधियों को शिथिल कराने में सहायक हो जाए। पर हां, गांधीजी अंग्रेजों को अवश्य समय-समय पर अपनी ओर से ‘सहायता’ करने का कार्य करते रहते थे।

1933 की क्रांतिकारी गतिविधियों के दृष्टिगत गांधीजी ने 8 मई 1933 से अनशन प्रारंभ किया। इस पर सरकार ने उन्हें कारागृह से मुक्त कर दिया। तब उन्होंने बाहर आकर जो लिखा वह आंखें खोलने वाला है:-‘‘इस आंदोलन के साथ-साथ गुप्त मार्गों का इस आंदोलन के प्रवाह में जो चञ्चु प्रवेश होता जा रहा है, वह बड़ा ही घातकारक रहेगा। सरकार को मैं आश्वस्त करता हूं कि मेरी मुक्ति का गलत प्रयोग मैं कभी नही होने दूंगा। (कहने का तात्पर्य है कि मैं ऐसा कोई कार्य नही होने दूंगा जो ब्रिटिश सरकार के हितों के विपरीत हो) अपने अनशन के बाद देशभर की स्थिति वर्तमान जैसी ही रहेगी तो मैं सरकार से प्रार्थना करूंगा कि मुझे फिर यरवदा के (यहां गांधीजी कहना चाहते हैं कि यदि मेरे बाहर रहते हुए भी क्रांतिकारी गतिविधियां यथावत जारी रहीं तो) कारागृह में लेके रखा जाए।’’ सावरकर जी गांधीजी की अहिंसा के तीव्र आलोचक थे। वह नही चाहते थे कि गांधीजी की अहिंसावादी नीतियों को इस देश के स्वतंत्रता आंदोलन की मुख्यधारा घोषित कर दिया जाए, या उसे इस रूप में मान्यता दी जाए। क्योंकि इस अहिंसावादी आत्मघाती नीति ने सावरकरजी की दृष्टि में भारत के स्वातंत्रय समर को ही तेजोहीन कर दिया था।

सावरकरजी ने लिखा था-‘‘स्वर्गीय लोकमान्य जी के पश्चात शीघ्र ही खिलाफत जैसा अत्यंत आत्मघातक आंदोलन चला और एक वर्ष के भीतर-भीतर चरखा चला-चला के एवं अहिंसा और सत्यपूर्ण असहयोग से स्वराज्य पाएंगे। पर सत्य और अहिंसा की विपरीत परिभाषाओं से तेजोहीन तथा तेजनाशक असहयोग से स्वराज्य प्राप्ति की आकांक्षा आत्मवंचक उन्माद अर्थात बुद्घि भ्रम जैसा आतंक फैलता गया।’’

गांधीजी की आलोचना करना सावरकरजी के लिए इसलिए भी आवश्यक हो गया था कि गांधीजी का मुस्लिम प्रेम देशघातक होता जा रहा था और उसके उपरांत भी गांधीजी थे कि इस सत्य को मानने को तैयार नही थे। जिस मुगल या तुर्क सत्ता से हिंदू सदियों से संघर्ष करते आये थे, गांधीजी का मुस्लिम प्रेम सारे हिंदू समाज को फिर उसी मुगल बादशाहत की कैद में डालने को भी तैयार था। यह आश्चर्य की बात थी कि गांधीजी देश को पुन: मुगलों का गुलाम बनाने को भी आजादी ही मान रहे थे। उनकी यह अनोखी धर्मनिरपेक्षता थी कि देश को मुस्लिम शासन के अधीन रखने पर तो उन्हें लगता था कि हम उसमें धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक भारत का निर्माण कर लेंगे पर हिंदू राज्य में ऐसा नही हो पाएगा। जबकि सावरकर का मानना था कि भारत में पंथनिरपेक्षता का वास्तविक स्वरूप तभी बच सकता है जब भारत को ‘हिंदू राज्य’ घोषित किया जाएगा।

गांधीजी का कहना था-‘‘हिंदू-मुस्लिम एकता की खातिर जो भी मुस्लिमों को चाहिए उन्हें दे देना चाहिए। ….. अंग्रेज सरकार अगर तमाम हिंदुस्तान की सत्ता मुस्लिमों को सौंप दे तो भी हमें कोई एतराज नही। निजाम अगर तख्तनशीन बादशाह भी बने तो भी मैं समझूंगा कि वह सौ टका स्वराज्य ही है।’’

गांधीजी के इस चिंतन ने महाराणा प्रताप, शिवाजी, गुरू गोविन्दसिंह, वीर बंदा वैरागी आदि वीरों की उस परंपरा के पौरूष को तेजोहीन कर दिया जो भारत को मुगलकाल में विदेशी सत्ताधीशों के अत्याचारों से मुक्त करने के लिए कठोर परिश्रम करते रहे थे। इन महान वीरों की उपेक्षा का दोष भी इस प्रकार गांधीजी के उपरोक्त विचारों को ही दिया जा सकता है। यह भी गांधीजी ही थे जिन्होंने सुभाष को कांग्रेस से केवल इसलिए निकाल बाहर किया था कि नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने जनवरी 1939 में कांग्रेस के अध्यक्ष पद का चुनाव गांधीजी के प्रत्याशी पट्टाभिसीता रमैया को परास्त कर 1375 मतों के मुकाबले 1580 मत प्राप्त करके जीत लिया था। इस पर गांधीजी नेताजी सुभाषचंद्र बोस को अपने सामने से स्थायी रूप से हटाने का निर्णय लिया। उधर नेताजी ने सारी परिस्थितियों को समझकर कांग्रेस के अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया। परंतु गांधीजी को इतने से भी चैन नही मिला, इसलिए उन्होंने नेताजी सुभाषचंद्र बोस को बाहर का रास्ता दिखाने के लिए तीन वर्ष के लिए कांग्रेस से निकालने संबंधी प्रस्ताव कांग्रेस से पारित करा दिया। कारण केवल यह था कि नेताजी सुभाषचंद्र बोस अंग्रेजों को हिंसा के बल पर अपने देश से बाहर भगाने के समर्थक थे और कांग्रेस के लोगों का बहुमत उनके साथ था। इसलिए अपने विचार और अपनी नीतियों में बाधक नेताजी सुभाषचंद्र बोस को एक ‘महात्मा’ अपने साथ रखने के लिए ‘सहिष्णुता’ का प्रदर्शन नही कर सका।

1940 में जब ऊधमसिंह ने लंदन में जाकर ओ. डायर को मार डाला तो गांधीजी ने कहा था-‘‘मैं इसे बहके हुए पगले (व्यक्ति) का कृत्य मानता हूं।’’ उधर सावरकरजी थे, जिन्होंने ऊधमसिंह द्वारा ओ. डायर के मार डालने का समाचार पाते ही लिखा-‘‘सशस्त्र क्रांतिकारी अंग्रेज अधिकारियों की बलि लेते ही सारी जनता एवं ब्रिटिश राजसत्ता डर के मारे कांप उठती थी। कुछ देशभक्त वीरों को फांसी मिलती थी तो यह भी सुनिश्चित था कि ब्रिटिश राजसत्ता को पहुंचे हुए आघात से हिंदुस्तान का लोकमत शांत करने के लिए कुछ सुधार का चारा दे दिया जाता था।’’

15 सितंबर 1940 को गांधीजी ने मुंबई में कांग्रेस महासमिति के समक्ष कहा-‘‘मैं यह बिलकुल नही चाहता हूं कि इंगलैंड को (द्वितीय विश्वयुद्घ) परास्त होना पड़े। या उसकी मानहानि होकर उसे मुंह की खानी पड़े। इंगलैंड सशस्त्र युद्घ करता है और मैं पूर्णतया अहिंसावादी हूं फिर भी अंग्रेजों के प्रति मेरे मन में सहानुभूति की भावना है।’’

यह दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जाएगा कि गांधीजी की सहानुभूति अपने क्रांतिकारियों के साथ न होकर अंग्रेजों के साथ थी। वह अंग्रेजों की अहिंसा को भी अहिंसा नही मानते थे। इस प्रकार की बातों को देखकर ही 20 जनवरी 1942 को सावरकरजी ने एक पत्र में बताया कि-‘‘जब तक कांग्रेस की बागडोर गांधीजी जैसे (नायक) के हाथों में है तब तक ब्रिटिश सरकार के लिए डरने की कोई आवश्यकता नही है। मैं अच्छी तरह से जानता हूं कि ब्रिटिश सरकार के तथा ब्रिटिश जनता के वे शुरू से ही हितचिंतक रहे हैं। वे यद्यपि कहते हैं कि ब्रिटेन और फ्रांस ही बड़े लोकतांत्रिक राष्ट्र हैं। ब्रिटिश राज्य के ऊपर युद्घ जैसी विपत्ति आते ही कांग्रेस ने प्रांतिक सत्ता स्थान भी छोड़ दिया। किंतु अब, राजनैतिक सरकार में काम करने के लिए कांग्रेस तरसती है, इसलिए शासन उससे (कुछ तरस खाये और) चर्चा करे।’’

सावरकरजी ब्रिटिश सत्ताधीशों को जहां भी दांव लगता था और जहां भी वे उचित मानते थे लताडऩे से चूकते नही थे और गांधीजी अंग्रेजों की चापलूसी के किसी अवसर को जाने देना नही चाहते थे। वीर सावरकर के कठोर दृष्टिकोण और स्पष्टता लिए हुए राष्ट्रवाद के दृष्टिगत अंग्रेजों ने अपनी ओर से हिंदू महासभा उनकी किसी चाल को सफल नही होने देगी। हां, कांग्रेस को वे जैसे चाहें, मूर्ख बना सकते थे। जून 1945 में डा. खरे ने भारत के वायसराय से निवेदन किया कि वह शिमला परिषद में हिंदू महासभा के नेताओं को भी निमंत्रण दें। तब वायसराय लॉर्ड वेवल ने कहा था-‘‘मैं हिंदूमहासभा के नेताओं को कभी नही बुलाऊंगा। चूंकि कांग्रेस की अपेक्षा हिंदू महासभा ब्रिटिश साम्राज्यशाही के विरोध में बड़ी कड़ाई रखती है।’’

आज के कांग्रेसी अक्सर यह भी कह दिया करते हैं कि देश का विभाजन हिंदू साम्प्रदायिक नेताओं की देन है। इसमें भी पता चलता है कि वे इतिहास के तथ्यों का किस प्रकार ‘शवोच्छेदन’ कर रहे हैं? उन्हें 3 जून 1947 को कांग्रेस के नेहरूजी की यह टिप्पणी तनिक ध्यान से पढऩी चाहिए, जो उन्होंने आकाशवाणी पर जाकर व्यक्त की थी-‘‘हिंदू भूमि का ‘पार्टीशन’ करना पड़ रहा है, यह हम सबके लिए अफसोस की बात है लेकिन वह घर हमेशा के लिए खून से रंगता रहे इसकी अपेक्षा प्राप्त परिस्थितियों में उस पर ‘शस्त्रक्रिया’ करना ही ठीक रहेगा। इस विचार को सामने रखकर देश विच्छेदन को स्वीकार किया गया है।’’

4 जून को गांधीजी ने कहा-‘‘देश विच्छेदन के लिए माउण्टबेटन को दोषी नही ठहराया जाएगा। मुस्लिम लीग के हठ को पूरा करने के लिए कांग्रेस खड़ी है। ….खून खराबा टालने के लिए उभय पक्षों की स्वीकृति से विभाजन किया गया है।’’

कांग्रेस के दोनों बड़े नेताओं ने किसी क्रांतिकारी को या किसी हिंदूवादी दल को विभाजन के लिए दोषी नही माना। दोनों ने ही हिंदूभूमि के विभाजन के लिए मुस्लिम लीग के साम्प्रदायिक दृष्टिकोण को ही प्रमुख रूप से दोषी माना है।

1 जुलाई 1947 को वीर सावरकरजी ने एक‘पत्रक’ में लिखा कि हिंदुओं यदि आप आत्मघात करेंगे तो आपका भविष्य उज्ज्वल है। निराश न होइये। प्रण कीजिए कि हम हिंदू ही राष्ट्र हैं। अखण्ड हिंदुस्थान ही हमारी पितृभूमि एवं पुण्यभूमि है। भ्रांत राष्ट्रवादी कांग्रेस वालों ने विश्वासघात करके (अर्थात नेहरू-गांधी ने गद्दारी करके) देश के विच्छेदन को स्वीकार किया है तो भी पाकिस्तान से अलग फूटने वाले प्रांतों को भारत में पुन: सम्मिलित करते हुए हम अखण्ड हिंदुस्तान बना देंगे। इसके लिए राजनीति का हिंदूकरण और हिन्दुओं का सैनिकीकरण इस मार्ग का अनुसरण करते रहेंगे।’’ दुर्भाग्यवश आज हिंदू महासभा पर उन लोगों का कब्जा है जो स्वार्थ में डूबे हैं। ‘जय हिंदू राष्ट्र’ कहते हैं ‘भारत देश अखण्ड हो’ का नारा भी लगाते हैं-परंतु स्वयं खण्ड-खण्ड हैं। सावरकर के सपने कैसे साकार होंगे? बालाराव सावरकरजी ने गांधीजी और सावरकरजी के विषय में लिखा है कि कुल मिलाकर सावरकरजी को 5545 दिन प्रत्यक्ष कारागार में तथा 4865 दिन स्थानबद्घता में रहना पड़ा। दोनों को मिलाकर 10,410 दिन अर्थात 28 वर्ष 200 दिन उन्हें अंग्रेजों की जेल या स्थानबद्घता में व्यतीत करने पड़े। जबकि गांधीजी को 905 दिन का कारावास और 1365 दिन के लिए स्थानबद्घ किया गया। कुल मिलाकर यह अवधि 7 वर्ष 10 महीनों की बनती है। पाठकवृन्द अनुमान लगायें कि कष्ट किसने अधिक सहे और अधिक कष्ट सहकर भी कौन अधिक आत्माभिमानी रहा? यदि मैं और आप एक ही निष्कर्ष के हों तो बोलिए-‘‘स्वातंत्रय वीर सावरकर की जय।’’ और ‘‘सावरकर का मंत्र महान-हिन्दी, हिन्दू, हिन्दुस्थान।’’ फिर भी गांधीजी के प्रति भी हम उचित सम्मान अवश्य रखें।

(गांधी और सावरकर नमक लेखक की पुस्तक से)

डॉ राकेश कुमार आर्य

Comment:

Latest Posts

hititbet giriş
hititbet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
hititbet giriş
hititbet güncel giriş
vdcasino giriş
vdcasino güncel giriş
vdcasino giriş
hititbet giriş
hitit medya
Hititbet Giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
tuzla cilt bakım merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet
hititbet güncel adres
hititbet 2026
hititbet giriş
Tuzla Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
solobet giriş
hititbet giriş
hititbet
hititbet
Tuzla Cilt Bakım
İstanbul Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet Giriş
Hititbet Giriş
betnano
Hititbet Giriş
Hititbet App
hititbet giriş
hititbet
betnano
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betorder giriş
betgaranti giriş
Hititbet Giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
hititbet
hititbet
betgaranti giriş
betpark giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
betpark giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
Hititbet
Hititbet Güncel Giriş
Hititbet Yeni Giriş
Hititbet Resmi Gİriş
betgaranti giriş
hitbet giriş
hitbet giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
xslot giriş
xslot giriş
sahabet
sahabet
hititbet
meritbet
bets10
meritbet
bets10
betnano
bets10
bets10
betnano
betnano
atlasbet
atlasbet
betnano