सावरकरजी के हिन्दुत्व और नेहरूजी की ‘हिन्दुस्तान की कहानी’ का सच

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Nehru ji ki jayanti 27 Mai per Vishesh
नेहरू जी की जयंती 27 में पर विशेष

स्वतंत्रता आंदोलन के काल में हमारे क्रांतिकारी जब भी कोई ‘आतंकी घटना’ कर ब्रिटिश सरकार को हिलाने का प्रशंसनीय कार्य करते थे तभी हमारे कांग्रेसी नेताओं की कंपकंपी छूट पड़ती थी। उस कंपकंपी से मुक्ति पाने के लिए गांधीजी की कांग्रेस तुरंत एक ‘माफीनामा’ निंदा प्रस्ताव के रूप में पारित करती। ऐसा करके वह स्पष्ट करती थी कि ब्रिटिश सत्ताधीश मुझे किसी प्रकार से दंडित न करें। कांग्रेस ने ऐसे ‘माफीनामे’ अपने जन्मकाल से लेकर स्वतंत्रता प्राप्ति तक निरंतर लिखे।

कांग्रेस वीर सावरकरजी के जिस ‘माफीनामे’ की बात कहती है, उसके विषय में सावरकरजी स्वयं स्पष्ट कर चुके थे कि यह ‘माफीनामा’ उन्होंने अंग्रेजों को झांसे में डालने के लिए लिखा था। उधर अंग्रेज थे कि वे वीर सावरकर के व्यक्तित्व से और कृतित्व से भली प्रकार परिचित थे। फलत: उन्होंने सावरकर के ‘माफीनामे’ को ‘रद्दी की टोकरी’ में फिंकवा दिया था। उन्होंने चुपचाप उनके ‘माफीनामे’ की जांच करायी थी कि क्या उनका हृदय परिवर्तन वास्तव में हो गया है? जिसमें पाया गया था कि वीर सावरकर का हृदय परिवर्तन नही हुआ है। यही कारण रहा कि अंग्रेजों ने उनके ‘माफीनामे’ से सावरकर को जेल से मुक्त नही किया। सावरकरजी संसार के मायामोह से ऊपर उठकर सार्वजनिक जीवन में आये थे। एक बार जेल में मिलाई करने पहुंची अपनी पत्नी की आंखों में अश्रुधारा देखकर उन्होंने उनसे कहा था-

‘‘धीरज रखो! केवल संतान पैदा करना और खाना-पीना, मौज करना-यही मात्र मानव जीवन का उद्देश्य नही है। ऐसा जीवन तो पशुपक्षी भी बिता रहे हैं। हमें तो समाज और देश की दुर्दशा को मिटाना है और भारत माता की गुलामी की बेडिय़ों को चूर-चूर करना है। इसी उद्देश्य से हमने अपने व्यक्तिगत सुखोपभोगों का त्यागकर यह कंटकाकीर्ण मार्ग स्वेच्छा से अपनाया है। हमने स्वयं अपने हाथों अपने व्यक्तिगत स्वार्थ को तिलांजलि दे दी है, जिससे कि भारत के करोड़ों लोगों के कष्ट दूर हों।’’

इस पर पत्नी ने कह दिया था-‘‘आप चिंता न करें। मुझे क्या यह कम सुख है कि मेरा वीर पति मातृभूमि की सेवा के लिए कठोर साधना कर रहा है।’’

सावरकरजी शिवाजी महाराज से किस सीमा तक प्रभावित थे, इसका पता हमें उनके ‘अभिनव भारत’ नामक संगठन की उस शपथ से चलता है जो प्रत्येक सदस्य द्वारा ली जाती थी। शपथ इस प्रकार थी-‘‘छत्रपति शिवाजी के नाम पर, अपने पवित्र धर्म के नाम पर और अपने प्यारे देश के लिए पूर्व पुरूषों की कसम खाते हुए मैं यह प्रतीक्षा करता हूं कि अपने राष्ट्र की पूर्ण स्वतंत्रता के लिए अंतिम सांस तक संघर्ष करता रहूंगा मैं न तो आलस्य करूंगा और न अपने उद्देश्य से हटूंगा। मैं ‘अभिनव भारत’ के नियमों का पूर्णरूपेण पालन करूंगा तथा संस्था के कार्यक्रम को बिल्कुल गुप्त रखूंगा।’’

सावरकरजी अपने भाषणों में अक्सर युवाओं को उत्तेजित और प्रेरित करने के लिए ‘छत्रपति शिवाजी की संतानो’-ऐसे शब्दों का प्रयोग किया करते थे। अब जो व्यक्ति अपने संगठन की शपथ को छत्रपति शिवाजी के नाम से प्रारंभ करे अपने भाषण का शुभारंभ उन्हीं के नाम से करे तो उसके जीवन पर छत्रपति शिवाजी के जीवन का उनके व्यक्तित्व और कृतित्व का प्रभाव ना हो भला यह कैसे संभव था? जैसे सुभाष चंद्र बोस अंग्रेजों की स्थानबद्घता से निकल भागे थे, वैसा ही प्रयास सावरकरजी ने समुद्र में छलांग लगाकर किया था। वह चाहते थे कि जेलों में सडऩे के स्थान पर सक्रिय जीवन जीते मरा जाए तो उत्तम होगा। अपने इसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए उन्होंने उस समय कोई कथित ‘माफीनामा’ लिख दिया तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है? जब सावरकरजी को जेल ले जाने की तैयारी की जा रही थी तब उन्होंने अपने साथियों के सामने बड़े ओजपूर्ण शब्दों में कहा था-‘‘मेरी लाश कहीं पर भी गिरे, चाहे अण्डमान की अंधेरी कालकोठरी में, अथवा गंगा की परम पवित्र धारा में, वह हमारे संघर्ष को प्रगति ही देगी। युद्घ में लडऩा तथा गिर पडऩा भी एक प्रकार की विजय ही है। अत: प्यारे मित्रो! विदा! ’’

जेल के भीतर अकेले सावरकर ही ऐसे थे जिन्होंने वहां भी कैदियों को स्वतंत्रता संग्राम के लिए प्रेरित करते हुए ‘स्वाध्याय मंडल’ की स्थापना कर दी थी। जिसमें वह उन कैदियों को भारत के गौरवमयी इतिहास, संस्कृति, साहित्य और राजनीति की विशेष जानकारी देते थे। वही एकमात्र ऐसे बंदी थे जो जेल के हिंदू बंदियों पर किसी मुस्लिम वार्डर या ईसाई अधिकारी के अत्याचारों के विरूद्घ हिंदू कैदियों को उकसाते थे और उसके कष्टकर परिणाम स्वयं भोगते थे। अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए उन्होंने जेल में भी 25 हजार पुस्तकें एकत्र कर ली थीं।

मन्मथनाथ गुप्त सावरकर जी के विषय में लिखते हैं :-‘‘भारतीयों ने अपने इस वीर देशभक्त को एक दिन के लिए भी नही भुलाया था। उनके साहसिक कृत्यों की जनता में सर्वत्र प्रशंसा की जाती थी। समाचार पत्रों एवं सार्वजनिक सभाओं में इनकी शीघ्र रिहाई के लिए अनवरत प्रयास किये जाते रहे। इनकी मुक्ति के लिए ‘सावरकर सप्ताह’ मनाया गया और लगभग सत्तर हजार हस्ताक्षरों से एक प्रार्थना पत्र सरकार के पास भेजा गया। उस समय तक किसी नेता की रिहाई के लिए इतना बड़ा आंदोलन कभी नही हुआ था।’’

अंग्रेज सरकार ने जब देखा कि एक सावरकर को जेल में डालने के उपरांत भी जेल से बाहर कितने सावरकर हैं तो उसे पसीना आ गया था। फलस्वरूप 21 जनवरी 1921 को सावरकर जी को कालापानी से भारत के लिए रवाना कर दिया गया। यहां भी उन्हें रत्नागिरि में स्थानबद्घ कर दिया गया। जिससे कि वह किसी प्रकार की राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेने एवं भाषण देने से निषिद्घ रहें। रत्नागिरि आकर सावरकर जी ने ‘श्रद्घानंद’ और ‘हुतात्मा’ नामक साप्ताहिक पत्रों का प्रकाशन किया। जिनमें अपने छह नामों से लेख एवं रचनाएं प्रकाशित करते थे। 1924 में जब उन्हें रत्नागिरि से नासिक ले जाया गया तो वहां उनके लिए हजारों की संख्या में लोगों ने एकत्र होकर स्वागत की तैयारियां की थीं। इन लोगों के नायक थे-डा. मुंजे, जगतगुरू शंकराचार्य व डा. कुर्तकोटिजी महाराज। लोगों ने अपने नायक के लिए अभिनंदन पत्र प्रस्तुत किया जिसमें उनकी देशभक्ति को नमन किया गया था।

वीर सावरकरजी की उत्कृष्ट देशभक्ति और उनकी लोकप्रियता का ही परिणाम था कि वे 1937 में जेल से जैसे ही रिहा किये गये तो भारत के विभिन्न राजनीतिक दलों ने उन्हें अपने साथ आने का निमंत्रण दिया था। कांग्रेस में लाने के लिए उनके पास स्वयं पंडित जवाहरलाल नेहरू पहुंचे थे। जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें कांग्रेस में लाकर ‘ऊंचा पद’ देने का प्रस्ताव भी रखा था। कितने आश्चर्य की बात है कि जिसे कांग्रेस आज ‘गद्दार’ बता रही है उसी सावरकर को कभी उसका एक बड़ा नेता ‘ऊंचा पद’ देने का विश्वास दिलाकर अपने संगठन में लाने के लिए लालायित था। उधर सावरकरजी थे जिन्होंने उस समय कांग्रेस के इस प्रस्ताव को इन शब्दों में ठुकरा दिया था-‘‘मैं अहिंसा के सिद्घांतों में विश्वास नही करता। मैं सशस्त्र क्रांति के द्वारा ही स्वतंत्रता प्राप्ति करने का समर्थक हूं। अत: मैं किसी ऐसे दल से संबंध नही रखना चाहता जो मेरे सिद्घांतों के विपरीत हो।’’

गुजरात में कर्णावती (अहमदाबाद) में 31 दिसंबर 1937 को हिंदू महासभा का अधिवेशन संपन्न हुआ। दूसरे दिन वहां के महाराष्ट्र मंडल ने उनका स्वागत किया। तब-‘आप कांग्रेस में क्यों नही गये?’ प्राध्यापक श्री रा.ब. आठवले के इस प्रतिनिधिक प्रश्न का उत्तर देते हुए उन्होंने कहा-‘‘कुछ लोगों को ऐसा लगता है कि यदि मैं कांग्रेस में जाता तो कांग्रेस का भी अध्यक्ष बनता किंतु वर्तमान दास्यता में अध्यक्ष क्या कांग्रेस का, क्या हिंदू महासभा का! उसमें क्या सम्मान है? दोनों ही गोबर के कीड़े हैं, एक ऊपर के स्तर का तो दूसरा नीचे के स्तर का। और उधर हमारी माता बहनों पर अत्याचार चलते रहने पर भी उसके विरूद्घ चूं तक निकालते नही अथवा यूं कहिए कि जो ऐसे कृत्यों को मूक सम्मति ही देते हैं उनकी पंक्ति में मैं क्यों जाकर बैठूं? केवल ‘जी हां’ कहकर मिलने वाला बड़प्पन नही चाहिए मुझे। मैं मार्सेलिस से खिसककर यदि अमेरिका पहुंच सकता तो शायद अमेरिका का भी प्रेसिडेंट बनता। किंतु उसके लिए वहां जाकर रहना, यह क्या वीरता का लक्षण होगा?’’

अंत में हम कांग्रेस को ‘गद्दारों का मठ’ इसलिए भी मानते हैं कि इसने सदा ही भारत के ऋषि-मुनियों, वीर पुरूषों और वेदादि धर्मग्रंथों की उपेक्षा की है, इसने भारत को मारकर ‘इण्डिया’ खड़ी करने का राष्ट्रघाती प्रयास किया है। जबकि 30 दिसंबर 1937 को अहमदाबाद में हिंदू महासभा के अधिवेशन में अध्यक्षीय भाषण देते हुए वीर सावरकर ने कहा था-‘‘इस भारत भूमि को हम इसलिए पुण्यभूमि मानते हैं कि यह हमारे ऋषि मुनियों-देवताओं वीर पुरूषों और संत महात्माओं की जन्मभूमि है-कर्मभूमि है। इससे हमारी वंशगत और सांस्कृतिक आत्मीयता के संबंध जुड़े हुए हैं।’’

कांग्रेस ने इस देश का जन्म 15 अगस्त 1947 से माना है, इसलिए उसने किसी को इस देश का ‘‘राष्ट्रपिता तो किसी को ‘चाचा’ बताना आरंभ कर दिया। यह उसका स्वयंभू अधिकार था, जिसके लिए उसने कभी इस देश की आम स्वीकृति प्राप्त करने का प्रयास नही किया। सारा देश स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात से कांग्रेस के इन स्वयंभू विश्वासघातों से लड़ता-जूझता चला आ रहा है। कुछ भी हो आज जब इस देश का युवा ‘सावरकर प्रकाश’ के माध्यम से अपने देश के विषय में जान रहा है कि ‘‘दो ढाई हजार वर्ष पूर्व के काल में सिंधु नदी के उस पार ईरान की सीमा तक भारतीयों की बस्तियां और राज्य फैले हुए थे आज जिसे ‘हिन्दूकश’ पर्वत कहते हैं, उसे ग्रीक लोक ‘पेरोपनिसस’ कहते थे। आज जिसे हम अफगानिस्तान कहते हैं उसे उस समय गांधार कहा जाता था। अफगानिस्तान का प्राचीन नाम ‘अहिगण स्थान’ था। काबुल नदी का तत्कालीन नाम कुंभा था। हिंदूकुश पर्वत तक व्याप्त इन सभी क्षेत्रों में भारतीयों के छोटे बड़े राज्य फैले हुए थे यहां इन राज्यों से लेकर उस स्थान तक जहां सिंधु नदी समुद्र का आलिंगन करती है, सिंधु के दोनों तटों पर वैदिक धर्मानुयायी राज्य फैले हुए थे। इनमें से अधिकांश राज्यों में जनतंत्र था। उस काल में उन्हें गणराज्य कहा जाता था।’’

(भारतीय इतिहास के छ: स्वर्णिम पृष्ठ भाग-1)

राहुल गांधी की कांग्रेस को चाहिए कि वह ‘हिंदुस्तान की कहानी’ पढऩे के लिए सावरकर की चेतना का प्रयोग करे क्योंकि देश की जनता नेहरू की ‘हिंदुस्तान की कहानी’ के सच को समझ चुकी है और उसे रद्दी की टोकरी में फेंककर सावरकर के हिंदुत्व से और अपने स्वर्णिम अतीत से ऊर्जा लेने लगी है, ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ की ओर बढ़ चुकी है। इसी से पता चल जाता है कि देश में ‘सावरकर की जय’ और इंडिया बसाने वालों की पराजय हो चुकी है। 26 मई 2014 को मोदीजी देश के प्रधानमंत्री बने, संयोग से 27 मई को नेहरू का मरण दिन और 28 मई को सावरकरजी का जन्मदिन था। क्या अद्भुत संयोग था-एक गया तो दूसरा आ गया।

डॉ राकेश कुमार आर्य

संपादक : उगता भारत
lekhak ka yah lekh purv prakashit ho chuka hai
Desh ka vastvik Gaddar Kaun Gandh Nehru ya Savarkar

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