लोकसभा के आम चुनाव और उनका संक्षिप्त इतिहास देश की पहली लोकसभा के चुनाव: 1951- 52

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आजादी से पहले भारत की संसद को ‘केंद्रीय विधानसभा’ के नाम से जाना जाता था। जब देश का नया संविधान बनने लगा और उसके लिए पूरे देश से सदस्य चुनकर आए तो इसे ‘संविधान सभा’ के नाम से पुकारा गया। 26 जनवरी 1950 को जब देश का संविधान लागू हो गया तो इसका नाम ‘संसद’ हुआ। 10 दिसंबर 2020 को नए संसद भवन का शिलान्यास किया गया। 28 मई 2023 को नए संसद भवन का उद्घाटन भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा किया गया। यह संसद भवन 19 सितंबर 2023 से खोल दिया गया। 18 सितंबर 2023 तक देश अपने पुराने संसद भवन से ही संचालित होता रहा। निश्चित रूप से उस भवन ने अनेक ऐतिहासिक पल देखे थे। जब देश स्वाधीन हुआ तो उस दिन का साक्षी भी पुराना संसद भवन बना। अनेक महत्वपूर्ण हस्तियों को उस संसद भवन में बैठने का अवसर प्राप्त हुआ। कुल मिलाकर पुराने संसद भवन के पास एक बहुत शानदार इतिहास था। जिसे बड़ी सहजता से भुलाया नहीं जा सकता था। यही कारण रहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने 18 सितंबर 2023 को जब पुरानी संसद से नई संसद के लिए प्रस्थान करने से पहले उस संसद भवन में अपना अंतिम भाषण दिया तो उन्होंने सदन के समक्ष अपनी ओर से प्रस्ताव रखा कि
इस संसद भवन का नाम बदलकर अब ‘संविधान सदन’ कर दिया जाए। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि ‘मेरी प्रार्थना और सुझाव है कि जब हम नए संसद भवन में जा रहे हैं तो इसकी ( पुराने संसद भवन) गरिमा कभी भी कम नहीं होनी चाहिए। इसे सिर्फ पुराना संसद भवन कहकर छोड़ दें, ऐसा नहीं होना चाहिए। अगर आप सब की सहमति हो तो इसे भविष्य में संविधान सदन के नाम से जाना जाए।’

पहली लोकसभा के चुनाव के तथ्य

 1947 में जब देश आजाद हुआ तो संविधान सभा के चुने हुए प्रतिनिधि ही देश की सरकार चलाने लगे। प्रधानमंत्री के रूप में पंडित जवाहरलाल नेहरू को यह दायित्व प्रदान किया गया।  देश की पहली लोकसभा की कुल सीटें 499 थीं। देश में अपने नए संविधान के अनुसार पहले चुनाव 1952 में हुए थे । इन चुनावों की प्रक्रिया का शुभारंभ 25 अक्टूबर 1951 से हो गया था जो 21 फरवरी 1952 तक चलता रहा। 4 महीने तक वह लोकसभा चुनाव चलता रहा था। उस समय कई प्रकार की चुनौतियां देश के सामने थीं। लगभग 85% मतदाता ऐसे थे जो अशिक्षित थे और उनसे यह अपेक्षा नहीं की जा सकती थी कि वह चुनावी प्रक्रिया में सही ढंग से भाग ले सकेंगे। यद्यपि इस सब के उपरांत भी लोगों में पहली बार चुनाव में भाग लेने के प्रति विशेष प्रकार का उत्साह देखा जा रहा था। पहले चुनाव को 68 चरणों में मतदान के माध्यम से संपन्न किया गया। उस समय हिमाचल प्रदेश की चीनी और पंजी तहसीलों में सबसे पहले मतदान आरंभ हुआ था। इस चुनाव में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की कुल 4500 सीटों के लिए चुनाव हुआ था। जिनमें से 489 सीट लोकसभा की थीं। रामचंद्र गुहा अपनी पुस्तक 'इंडिया आफ्टर गांधी' में इस संबंध में लिखते हुए हमें बताते हैं कि :- 'पूरे भारत में कुल 224000 मतदान केंद्र बनाए गए थे। इसके अतिरिक्त लोहे की 20 लाख मतपेटियां बनाई गई थीं। जिनके लिए 8200 टन इस्पात का इस्तेमाल किया गया था। कुल 16500 लोगों को मतदाता सूची बनाने के लिए 6 महीने के अनुबंध पर रखा गया था। ' 

डॉ अंबेडकर को हरा दिया गया था चुनाव

 उस चुनाव में कांग्रेस को कुल डाले गए मतों में से 45 प्रतिशत के लगभग मत प्राप्त हुए थे। पंडित जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस ने इस चुनाव में 364 सीटों पर विजय प्राप्त की थी। इसके अतिरिक्त भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी 16 सीट प्राप्त करके दूसरे स्थान पर रही थी। पहले चुनाव में सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) ने जयप्रकाश नारायण और राम मनोहर लोहिया के साथ मिलकर 12 सीटें प्राप्त की थीं। इसके अतिरिक्त डॉ. बी0 आर0 अंबेडकर के 'शेड्यूल कास्ट फेडरेशन' को मात्र दो सीटों पर ही विजय प्राप्त हुई थी। अंबेडकर स्वयं चुनाव हार गए थे। यद्यपि उन्होंने अपनी हार के लिए कांग्रेस के नेता पंडित जवाहरलाल नेहरू को दोषी माना था। उस समय नेहरू पर चुनाव में धांधली करवाकर डॉ बी0 आर0 अंबेडकर को लोकसभा में जाने से रोकने का आरोप लगाया गया था। सचमुच, देश के एक महान विधि विशेषज्ञ , संविधानविद और लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास रखने वाले राष्ट्रवादी डॉ अंबेडकर को इस प्रकार रोकना बहुत गहरी साजिश की ओर संकेत करता है। जो नहीं होना चाहिए था उसे डॉ. अंबेडकर के साथ पूर्ण कर दिया गया था। 

पहली संवैधानिक सरकार का हुआ गठन

नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस सत्ता में आई। देश के संविधान से चलने वाली पहली सरकार का विधिवत गठन 13 मई 1952 को हुआ । नेहरू के नेतृत्व बनने वाली यह पहले संवैधानिक सरकार थी इसे संवैधानिक सरकार इसलिए भी कहेंगे कि देश के लोगों ने पहली बार अपने मताधिकार का प्रयोग करते हुए अपनी मर्जी की सरकार बनाई थी। सरकार के साथ लोकशक्ति जुड़ी हुई थी। इसलिए इस सरकार को लोकशक्ति की प्रतीक सरकार भी कहा जा सकता है। बहुत देर के पश्चात लोगों ने लोकतंत्र के माध्यम से अपना नायक चुना था। यही कारण था कि इस सरकार के अस्तित्व में आने पर सर्वत्र प्रसन्नता की अनुभूति हो रही थी।
देश की स्वाधीनता के समय जिस सरकार को काम करने का दायित्व दिया गया था, उसमें सरदार वल्लभभाई पटेल जैसे महान व्यक्तित्व का विशेष महत्व था। इसी प्रकार डॉक्टर भीमराव अंबेडकर भी उसे सदन और सरकार के एक प्रमुख स्तंभ थे। अब जब देश में पहले चुनाव हुए तो सरदार वल्लभभाई पटेल संसार छोड़ चुके थे, जबकि डॉ भीमराव अंबेडकर के साथ कथित रूप से धांधली और बेईमानी करके उन्हें चुनाव हरा दिया गया था। जब नया सदन आरंभ हुआ तो उसमें सरदार वल्लभभाई पटेल जैसी हस्तियों के साथ-साथ डॉ. बी0 आर0 अंबेडकर जैसे विद्वान सदस्यों की अनुपस्थिति कई लोगों को अखर रही थी। दादा साहब के नाम से प्रसिद्ध गणेश वासुदेव मावलंकर पहली लोकसभा के अध्यक्ष अर्थात स्पीकर बनाए गए थे। श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नेतृत्व में जनसंघ ने उस समय तीन सीट प्राप्त की थीं। पहली लोकसभा के समय देश के राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद थे।

पहले चुनाव मतपेटियां बनीं धांधली का आधार

  लोकसभा के लिए आयोजित किए गए पहले चुनाव में 1,949 उम्मीदवारों ने चुनाव में प्रत्याशी के रूप में नामांकन किया।   इस चुनाव की विशेषता थी कि मतदान केंद्र पर प्रत्येक उम्मीदवार को अलग-अलग रंग की मतपेटी आवंटित की गई थी, जिस पर उम्मीदवार का नाम और चुनाव चिन्ह लिखा हुआ था। जब लोग अपना मतदान करने के लिए आए तो उन्होंने उम्मीदवार की मतपेटी के रंग, प्रत्याशी के नाम और चुनाव चिह्न के आधार पर उस मतपेटी में अपना मतदान कर दिया था। बाद में यदि इस प्रकार की मतपेटियों में से मत निकाल कर उन्हें दूसरी मतपेटी के मतों में मिला दिया जाए तो फिर यह अनुमान लगाना असंभव था कि मिलाई गई वोट किस मत पेटी की थीं ?

इस प्रकार की व्यवस्था वास्तव में पहले लोकसभा चुनाव की सबसे बड़ी विडंबना थी। जिसका लाभ तत्कालीन नेतृत्व ने अपने विरोधियों को हराने और अपने चहेते लोगों को संसद में भिजवाने के लिए भी किया था। नेतृत्व की इसी सोच के कारण डॉक्टर बी0 आर0 अंबेडकर को चुनाव हरा दिया गया था। इसी प्रकार हिंदू महासभा के एक प्रत्याशी विशन चंद्र सेठ जी को रामपुर से चुनाव हराकर तत्कालीन नेतृत्व अपने खास मित्र मौलाना अबुल कलाम आजाद को संसद में ले आया था।

देश की जनसंख्या और मतदाता

  मतदाता सूची को तैयार करने और मिलान करने के लिए छह महीने के अनुबंध पर 16,500 क्लर्कों को नियुक्त किया गया था। इस चुनाव में नामावली को मुद्रित करने के लिए 380,000 रीम कागज का उपयोग किया गया था। 1951 में संपन्न की गई जनगणना में हमारे देश की कुल जनसंख्या 361,088,090 थी। देश की कुल जनसंख्या में से जम्मू कश्मीर की जनसंख्या को छोड़कर कुल 173,212,343 मतदाता पंजीकृत किए गए थे। विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का स्थान भारत को (इतनी बड़ी मतदाता सूची के साथ) पहली बार में ही प्राप्त हो गया। इतनी बड़ी संख्या में मताधिकार प्राप्त कर लोगों ने पहले चुनाव को एक उत्सव के रूप में मनाया। 
  सुकुमार सेन को पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 1950 में पहला चुनाव आयुक्त नियुक्त किया था। उनके द्वारा देश का पहला चुनाव संपन्न कराया गया था। 21 वर्ष से अधिक के प्रत्येक मतदाता को मतदान करने का अवसर प्राप्त हुआ। लोकसभा के इस चुनाव में  कुल 196,084 मतदान केंद्र स्थापित किए गए थे, जिनमें से 27,527 बूथ महिलाओं के लिए विशेष रूप से आरक्षित थे। वास्तव में यह बहुत बड़ी तैयारी थी। जिसे देश पहली बार अनुभव कर रहा था। लोकतंत्र का उत्सव मनाने की तैयारी इस प्रकार की गई जिस प्रकार किसी बड़े पर्व को मनाने की तैयारी की जाती है। पहले चुनाव से ही देश ने चुनाव को राष्ट्रीय पर्व के रूप में अपनी स्वीकृति प्रदान कर दी थी।

महिलाओं ने नहीं बताया था अपने पति का नाम

 इस चुनाव के समय 80 लाख महिलाओं का नाम मतदाता सूची में आने से इसलिए रह गया था कि उन्होंने संबंधित कर्मचारियों को अपना नाम बताने से ही इनकार कर दिया था। हमें इस संबंध में जानकारी देते हुए 'इंडिया आफ्टर गांधी' के लेखक रामचंद्र गुहा बताते हैं कि ये महिलाएं अपने पिता या पति  के नाम के साथ अपने आप को जोड़कर देखने में अधिक प्रसन्नता अनुभव करती थीं। वे लोकतंत्र के उत्सव में सम्मिलित तो होना चाहती थीं पर अपनी मान मर्यादाओं का भी पूरा ध्यान रखना अनिवार्य समझ रही थीं। उन्हें उसे समय नहीं पता था कि नया दौर आरंभ हो गया है और अब उन्हें कुछ नई मान्यताओं के साथ समझौता करना पड़ेगा। मान मर्यादाओं को और भी ऊंचाई देने के लिए उन्हें शिक्षित बनाने की पूरी स्वतंत्रता देते हुए देश का संविधान लागू हो चुका था। देश का नया संविधान अब देश की महिलाओं को देश के शासक के चुनाव में भी अपनी भागीदारी सुनिश्चित करने का महत्वपूर्ण अवसर उपलब्ध करवा रहा था। 

रामचंद्र गुहा जी कहते हैं कि “चुनाव करवाने के लिए लगभग 56000 लोगों को पीठासीन अधिकारी के तौर पर चुना गया था । उनकी मदद के लिए 2 लाख 28 हजार सहायकों और 224000 पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया था।”
कांग्रेस के स्टार प्रचारक और देश के प्रधानमंत्री के रूप में पंडित नेहरू ने इस चुनाव प्रचार के समय कुल 25000 मील की यात्रा तय की थी। जिसमें 18000 मील हवाई मार्ग से, 5200 मील कारों से, 1600 मील रेल से और यहां तक कि 90 मील का रास्ता उन्होंने नावों में बैठकर तय किया था।’ पंडित नेहरू देश के पहले प्रधानमंत्री के रूप में इस चुनाव में भाग ले रहे थे। लोग उन्हें सुनने के लिए बड़ी संख्या में आते थे। यद्यपि पंडित नेहरू अच्छे वक्ता नहीं थे। उनकी भाषा शैली भी विद्वानों की सी नहीं थी, परंतु इस सब के उपरांत भी वह लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र थे। इसका कारण यह था कि देश के लोग अपने उस पहले प्रधानमंत्री को देखना चाहते थे जो अंग्रेजों के बाद पहली बार हिंदुस्तान का नेतृत्व करते हुए देश का नेता बन चुका था। देश के लोग सदियों के बाद पहली बार देश की माटी से चुने गए किसी व्यक्ति को देश का नायक बना देखकर गदगद थे। नेहरू जहां भी जाते थे, लोग उन्हें अत्यधिक सम्मान की दृष्टि से देखते थे। पर इसका अभिप्राय यह कदापि नहीं था कि नेहरू सर्वमान्य नेता थे और उनकी लोकप्रियता सिर चढ़कर बोल रही थी। वास्तव में लोगों की अज्ञानता, अशिक्षा , गरीबी और फटेहाली की स्थिति ने नेहरू को उन सब के बीच सबसे बड़ा बना दिया था।

रामपुर सीट पर हुई धांधली

लोकसभा के इसी चुनाव में कांग्रेस ने रामपुर सीट से चुनाव लड़ रहे अपने प्रत्याशी मौलाना अबुल कलाम आजाद को हिंदू महासभा के प्रत्याशी विशन चंद्र सेठ के सामने उतारा था। विशन चंद्र सेठ चुनाव जीत चुके थे। वह चुनाव जीतकर अपने प्रशंसकों के साथ मतगणना स्थल से चल भी दिए थे अचानक वहां के जिलाधिकारी ने उन्हें वापस बुलवाया। कहते हैं कि हिंदू महासभा के प्रत्याशी ने जब पूछा कि उन्हें क्यों बुलवाया गया है तो जिलाधिकारी ने उनकी उपस्थिति में ही उनके मतों को मौलाना अबुल कलाम आजाद के मतों के साथ मिला दिया और कहा कि अब आपके मतों की दोबारा गिनती होगी। इस पर हिंदू महासभा के प्रत्याशी हक्के - बक्के रह गए थे। उन्होंने पूछा कि ऐसा क्यों ? तब जिलाधिकारी ने उन्हें बड़ा निराशाजनक उत्तर दिया और कह दिया कि मेरी मजबूरी है कि मैं अपनी नौकरी बचाने के लिए ऐसा करूं।
पंडित नेहरू के हस्तक्षेप से उस समय उन्हें हरा दिया गया और कांग्रेस के हारते हुए प्रत्याशी मौलाना अबुल कलाम आजाद को विजयी घोषित कर दिया गया। इसी प्रकार देश के एक अन्य नेता डॉ बी0 आर0 अंबेडकर के साथ भी ऐसा ही हुआ था। उन्हें भी कांग्रेस और कम्युनिस्टों ने मिलकर चुनाव में पराजित कर दिया था। इन दोनों घटनाओं का उल्लेख हम ऊपर भी कर चुके हैं। पुनः दोहराने का अभिप्राय है कि देश के संसदीय लोकतंत्र के पहले चुनाव में ही यदि ऐसी बेईमानी देश के तत्कालीन नेतृत्व ने कराई थी तो इससे पता चलता है कि वह लोकतांत्रिक विचारधारा में विश्वास नहीं रखते थे। उनकी विचारधारा तानाशाही थी और अपने सामने आने वाले किसी भी व्यक्ति की चुनौती को वह अलोकतांत्रिक ढंग से दूर कर देना चाहते थे। वास्तव में नेहरू जी को यह विचारधारा गांधी जी से विरासत में मिली थी। गांधी जी भी अपने राजनीतिक विरोधियों को पचा नहीं पाते थे।

पहली लोकसभा का गठन

 17 अप्रैल 1952 को भारत की पहली लोकसभा का विधिवत गठन किया गया था । इस लोकसभा में विपक्ष के नेता ए0के0 गोपालन थे। जबकि प्रधानमंत्री के रूप में पंडित नेहरू सदन के नेता बने । लोकसभा के प्रधान सचिव एम0 एन0 कौल रहे। इस लोकसभा को अपना कार्यकाल पूरा होने पर 4 अप्रैल 1957 को भंग कर दिया गया। देश की पहली लोकसभा का पहला सत्र 13 मई 1952 को आरम्भ हुआ। इसीलिए 13 मई को भारत के संसदीय इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना के रूप में स्मरण किया जाता है।

जब देश पहले चुनाव देख रहा था तो उस समय देश की आर्थिक परिस्थितियां बहुत विषम थीं। 1947 में देश की स्वाधीनता के पश्चात देश के राजकोष में अपने कर्मचारियों को वेतन देने के लिए भी पैसा नहीं था। यही कारण था कि जब गांधी जी पाकिस्तान को 55 करोड़ रूपया भारत के राजकोष से दिलाने के लिए अनशन पर बैठ गए थे, तो उनका इस प्रकार का अड़ियल दृष्टिकोण सरदार वल्लभभाई पटेल तक को भी अच्छा नहीं लगा था। उस समय देश के प्रधानमंत्री को भी हवाई जहाज से चुनाव प्रचार करने के लिए आलोचना का शिकार बनना पड़ा था। यद्यपि सुरक्षा की दृष्टिकोण से यह बहुत आवश्यक था। उस चुनाव में निर्वाचन आयोग ने प्रति मतदाता 60 पैसे खर्च किए थे।

नेहरू जी की पंचवर्षीय योजना

पंडित जवाहरलाल नेहरू ने सोवियत संघ के नेता जोसेफ स्टालिन की नीतियों को अपना आदर्श मानकर देश में पंचवर्षीय योजनाओं का शुभारंभ किया। ज्ञात रहे कि जोसेफ स्टालिन ने अपने देश सोवियत संघ में 1928 में अपनी पहली पंचवर्षीय योजना को लागू किया था। पंडित नेहरू ने भी इसी प्रकार देश के आर्थिक विकास के लिए पंचवर्षीय योजनाओं को आधार बनाकर 1951 में अपनी पहली पंचवर्षीय योजना को लागू किया। इस पंचवर्षीय योजना में देश के कृषि उत्पादन पर विशेष ध्यान दिया गया । साथ ही साथ देश के औद्योगिकरण का भी शुभारंभ किया गया। उन्होंने उदारवादी समाजवादी विचारधारा को अपनाया और उसके अनुसार देश को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया। वास्तव में उन्हें यह विचारधारा रूस के समाजवाद से उधार में मिली थी। उन्होंने इस उधारी विचारधारा से भारत की वैदिक विचारधारा के साथ कभी तुलनात्मक अध्ययन करने का प्रयास नहीं किया। इसका कारण यह था कि उनकी सोच भारत के बाहर से आने वाले विचारों के प्रति कहीं अधिक गंभीर थी। वह मानते थे कि भारत का अपने पास ऐसा कोई विशेष कुछ नहीं है, जिसे आज के समय में लागू किया जा सके। उनका दृष्टिकोण मुगलो और अंग्रेजों के उपकारों में ही अटका भटका रहा। वह हिंदू राजाओं या आर्य सम्राटों की ओर उतने चाव भाव से आकर्षित और प्रेरित नहीं थे जितने मुगल बादशाहों के प्रति प्रेरित थे।
पंडित नेहरू देश के पहले प्रधानमंत्री बने । उनके बारे में माना जाता है कि उन्होंने संसदीय लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी को प्रोत्साहित करने का निर्णय लेकर भारत को नवनिर्माण की ओर धकेलने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनके समर्थकों के द्वारा उन्हें आधुनिक भारत के निर्माता के रूप में स्थापित किया जाता है। उनके समर्थकों की मान्यता है कि अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में नेहरू जी ने भारत को शीत युद्ध से बचाकर दूर रखने का प्रशंसनीय कार्य किया। पंडित जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री के रूप में अपने अंतिम क्षणों तक अर्थात 27 मई 1964 तक कार्य करते रहे थे।

डॉ राकेश कुमार आर्य
(लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं। )

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