वैदिक सम्पत्ति – 308 वेदमंत्रों के उपदेश

 

 

(ये लेखमाला हम पं. रघुनंदन शर्मा जी की ‘वैदिक संपत्ति’ नामक पुस्तक के आधार पर सुधि पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहें हैं )

प्रस्तुतिः देवेन्द्र सिंह आर्य (चेयरमैन ‘उगता भारत’)

गताँक से आगे….
इस प्रकार से आवश्यकता पड़ने पर लड़नेवाला राजा अपने युद्धोपकरणों को मिट्टी के घरों में न रक्खे । इसके लिए वह अच्छे पक्के मकान बनावे। वेद उपदेश करते हैं कि-

मो षु वरुण मृन्मयं गृहं राजन्नहं गमम् । मृळा सुक्षत्र मृळय ।। (ऋ० ७/८६।१)

अर्थात् हे राजन् ! आप मिट्टी के घरों में निवास न करें, क्योंकि मिट्टी के घरों को वर्षाऋतु मिट्टी कर देती है- गिरा देती है। मिट्टी के सादे घरों में तो हम प्रजा को ही रहना चाहिये। इस मन्त्र के अतिरिक्त वेद में राजा के लिए लोहे के किले बनवाने की आज्ञा है। अथर्ववेद में आया है कि-

व्रजं कृणुध्वं स हि वो नृपाणो वर्मा सीव्यध्त्रं बहुला पृथुनि ।
पुरः कृणुध्वमायसीरघृष्टा मा वः सुस्त्रोच्चमसो द्दं हता तम् ।। (अथर्व० १९।५८।४)

अर्थात् हे राजम् ! आप बड़े बड़े व्रज (चरागाह) तैयार करवाइए, बहुत से मोटे मोटे वर्म (कवच) सिलवाइये और अपना पुर बड़े बड़े लोहे के किलों से घेर दीजिये जिससे आपके यज्ञ का चमचा न टपक जाय। उसके दृढ़ करने के लिए यही प्रबन्ध कीजिये। ये चीजें आपकी रक्षा करेंगी। इस मन्त्र में राज्य की इस तैयारी का कारण चमचे की रक्षा बतलाया गया है। जिसका यही मतलब है कि राज्य में छिद्र न होने पावे और वैदिक सभ्यता की रक्षा होती रहे। इसके अतिरिक्त राजा को और क्या क्या तैयारी करना चाहिए, उसका वर्णन इस प्रकार है-

शिरो मे श्रीयंशो मुखं त्विषिः केशाश्च श्मश्रूणि ।
राजा मे प्राणो अमृत सम्राट् चक्षुविराट् श्रोत्रम् ।। ५ ।।
जिह्वा में भद्रं वाङ महो मनो मन्युः स्वराड् भामः ।
मोदाः प्रमोदा अङ्गुलीरङ्गानि भित्रं मे सहः ।। ६ ।।
बाहू में बलमिन्द्रिय हस्ती में कर्ष वीर्यम् । आत्मा क्षत्रमुरो मम ॥ ७ ॥
पृष्ठीमें राष्ट्रमुदरम १५ सौ प्रीवाच श्रोणी ।
ऊरू अरत्नी जानुनी विशो मेऽङ्गानि सर्वतः ।। (यजु० २०१५-८)

अर्थात् श्री मेरा शिर है, यश ही मुत्र है, केश और डाढ़ी मूंछ ही प्रकाश है, राजा ही प्राण है, सम्राट ही चक्षु है, विराट् ही कान है और यही सब अमरता है। भद्रता ही जिव्हा है क्रिति ही वाणी है, क्रोध ही मन है, स्वतन्त्रता ही प्रकाश है, आमोदप्रमोद ही अंगुलियाँ और अङ्ग हैं, तथा सहनशीलता ही मित्र है। बल ही बाहु हैं, कर्म ही इन्द्रियाँ हैं, वीर्य ही हाथ हैं, क्षत्र ही हृदय और आत्मा है। राष्ट्र ही पीठ है, प्रजा ही उदर, ग्रीवा, पैर, जंघा, घुटना और अन्य समस्त अङ्गप्रत्यङ्ग हैं।
इन मन्त्रों में राष्ट्र की विशालता का वर्णन है। पर यह सब विशाल राज्यकार्य बिना धन के नहीं हो सकता, इसलिए वेद कहते हैं कि राजा प्रजा से थोड़ा थोड़ा कर लेकर इस महाकार्य का सम्पादन करे ।

दूरे पूर्णेन वसति दूर ऊनेन हीयते ।

महद् यक्षं भुवनस्य मध्ये तस्मै बॉल राष्ट्रभृतो भरन्ति ।। (अथर्व० १०।८।१५)

अर्थात् पूर्णों के द्वारा दूर तक और अधूरों के द्वारा निकट तक भुवन के मध्य में राज्य का प्रबन्ध करनेवाला बैठा है। उसके लिए समस्त राष्ट्र बलि अर्थात् कर अदा करता है। इस प्रकार का राष्ट्रीय उपदेश करके अन्त में वेद शिक्षा देते हैं कि खण्डराज्यों में सदैव वैमनस्यजन्य उत्पातों का डर बना ही रहता है, इसलिए सबको सार्वभौम राज्य के अन्तर्गत हो जाना चाहिए, अर्थात् सार्वभौम चक्रवर्ती राज्य का प्रयत्न करना चाहिये। यजुर्वेद में लिखा है कि-
स्वराडसि सपत्नहा सत्रराडस्यभिमातिहा ।
जनराइसि रक्षोहा सर्वराडस्यमित्रहा ।। (यजु० ५।२४)

अर्थात् स्वराज्य शत्रुधों का मारनेवाला है, सत्र-राज्य अभिमानियों का मद मारनेवाला है, जनराज्य दुष्टों का मारनेवाला है और सर्वराज्य अमित्र का मारनेवाला है। इस मन्त्र में बतलाया गया है कि सर्वराज्य से शत्रु नहीं रहते। यहाँ स्पष्ट कह दिया है कि शत्रुओं का सर्वथा नाश तो सर्वराज्य अर्थात् सार्वनीमराज्य से ही होता है।
क्रमशः

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