वैदिक संपत्ति 336 वैदिक आर्यों की सभ्यता,चेतन सृष्टि का पारस्परिक सम्बन्ध

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(ये लेखमाला हम पं. रघुनंदन शर्मा जी की ‘वैदिक संपत्ति’ नामक पुस्तक के आधार पर सुधि पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहें हैं)

प्रस्तुतिः देवेन्द्र सिंह आर्य (चेयरमैन ‘उगता भारत’)

गताक से आगे …

चेतन सृष्टि का पारस्परिक सम्बन्ध

जिस प्रकार प्राणियों का जड़ सृष्टि के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध है, उसी प्रकार उनका आपस में भी घनिष्ठ सम्बन्ध है। हम लिख आये हैं कि परमात्मा जीवों के कर्मानुसार प्राणियों के शरीर बनाता है और दण्ड-भोग के साथ साथ दुःख देनेवाले से दुःखप्राप्त को प्रतिफल भी दिलवाता है। यह प्रतिफल एक प्रकार का ऋण होता है। यही कारण है कि अनाचारियों और अत्याचारियों की ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों का संकोच करके वह उनको इस प्रकार का बना देता है कि वे आसानी से उत्कृष्टेन्द्रिय प्राणियों के काबू में आ जाते हैं और उनका भोग्य बनकर ऋण चुकाते रहते है। यही कारण है कि भोग्य पहिले और भोक्ता उनके बाद उत्पन्न होते हैं।

  हम लिख आये हैं कि आदि सृष्टि में पहिले वृक्ष, फिर पशु और पशुओं के बाद मनुष्य हुए । इसका कारण यही है कि पशुओं और वृक्षों ने पूर्वजन्म में अपने मनुष्य शरीर द्वारा अन्य मनुष्यों को नुकसान पहुँचाया है, इसलिए मनुष्यों की अपेक्षा हीनेन्द्रिय होकर और उनके काबू में आकर मनुष्यों का ऋण चुका रहे हैं और वृक्षों ने अपने पूर्वकालीन मनुष्य शरीर द्वारा पशुओं और मनुष्यों दोनों को नुकसान पहुंचाया है, इसलिए वे पशुओं और मनुष्यों के काबू में आकर उनके उपभोग में आ रहे हैं और ऋण चुका रहे हैं। परन्तु पशुओं ने पूर्वजन्म में वृक्षशरीरधारी पूर्व जन्म के पशुओं को नुकसान नहीं पहुँचाया, इसलिए वे इस जन्म में वृक्षों को कुछ भी नहीं देते, प्रत्युत वृक्षों से लेते हैं। इस तरह से वृक्ष और पशु मनुष्यों के ऋणी हैं, पर मनुष्य इन दोनों में से किसी का ऋणी नहीं है। इसी तरह पशु भी मनुष्यों के ऋणी हैं, पर वृक्षों के ऋणी नहीं हैं। परन्तु वृक्ष पशुओं तथा मनुष्य दोनों के ऋणी हैं और उनका ऋणी कोई नहीं है। इसीलिए सब प्राणी परस्पर विना किसी रोक टोक के अपना अपना देना पावना देते और लेते हैं। अर्थात् सब एक दूसरे की सहायता से जीते हैं। हम यहाँ कतिपय प्राणियों का वर्णन करके दिखलाते हैं कि वे किस प्रकार अपने से उत्कृष्टेन्द्रिय मनुष्य की सेवा कर रहे हैं।

गाय, भैंस, बकरी और भेड़ी दूध देकर, भेड़ और वकरियाँ वस्त्रों के लिए ऊन देकर, घोड़े, बैल, गये, ऊँट, खच्चर और हाथी आदि सवारी तथा बारबरदारी का काम देकर और कुत्ते चौकी पहरा तथा एक अच्छे साथी का काम देकर मनुष्य की सेवा कर रहे हैं। जिस प्रकार ये प्राणी अनेक प्रकार के पदार्थों को देकर मनुष्य का ऋण चुका रहे हैं। उसी तरह सिंह, व्याघ्र, श्रृगाल, बिल्ली और गीध आदि मांसाहारी प्राणी मृतक शरीरों का मांस खाकर सफाई का काम कर रहे हैं। यदि ये प्राणी मृतक प्राणियों को खाकर सफाई न करें तो मुर्दों के पहाड़ लग जायें और उनकी सड़ाँद से मनुष्यों का जीना दुर्लभ हो जाय। इसी तरह सुवर, मुर्ग, चील, कौवे और चिउँटी आदि भी मल और सड़े मांस को खाकर और पृथिवी को पवित्र बनाकर मनुष्य की सेवा कर रहे हैं। इनके अतिरिक्त मछलियाँ तथा अन्य सभी जलजन्तु पानी को स्वच्छ करते हैं। समुद्र में यदि मछलियाँ न हों, तो उसका पानी मलिनता के कारण इतना स्थूल हो जाय कि वह सूर्यताप से तप्त ही न हो और वहाँ बादल ही न बन सकें।
अहिंसाषर्मप्रकाश’ के उत्तरार्ध (पृष्ठ ७६) में लिखा है कि तुर्किस्तान के आसपास रक्तसमुद्र में मछलियाँ नहीं हैं, इसलिए वहाँ का पानी बहुत ही गन्दा हो गया है और वहाँ वर्षा एकदम बन्द हो गई है। जिस प्रकार जलजन्तु जल को स्वच्छ करते हैं, उसी प्रकार वायु में उड़नेवाले पक्षी और कृमि भी वायु के मल को खा जाते हैं और वायु को शुद्ध कर देते हैं। इसी तरह सर्प और बिच्छू आदि विषैले प्राणी भी जल, स्थल और वायु के विष को खा जाते हैं और संसार को विषहीन बनाये रखते हैं।

इस सेवा के अतिरिक्त अनेकों पशु, पक्षी और कीड़े मनुष्य को वैज्ञानिक विषयों में भी बड़ी सहायता देते हैं। भेसें ऐसे स्थान में नहीं बैठती, जहाँ जमीन के नीचे पोल होती है। यदि पुराना कुवॉ दीवार के गिर जाने से दब जाता है, तो भेड़ें उतनी गोल जमीन को छोड़ कर बैठती हैं। इससे भूगर्भविद्यासम्बन्धी अनेकों बातें जानी जाती है।
क्रमशः

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