भारत को दासता की बेड़ियों से मुक्त कराने हेतु प्रयासरत महानायक नेताजी सुभाष चंद्र बोस

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प्रस्तावना – आजाद हिंद फौज का नाम लेते ही आंखों के सामने दिखाई देते हैं, देश की स्वतंत्रता के लिए पूरे विश्व में घूमने वाले नेताजी सुभाष चंद्र बोस, ‘चलो दिल्ली ‘की गर्जना करते हुए स्वतंत्रता संग्राम की कल्पना से उत्साहित सेना एवं देश के लिए प्राण अर्पण करने के लिए आतुर हिंदुस्तानी स्त्रियों की ‘झांसी रानी पलटन’। नेताजी का प्रभाव एवं योगदान इतना बड़ा था की कुछ जानकार कहते हैं कि यदि उस समय नेताजी भारत में उपस्थित होते तो शायद भारत का विभाजन न होता । भारत एक संघ राष्ट्र रहता । स्वतंत्रता संग्राम में अपना बलिदान देने वाले स्वतंत्रता सेनानियों में नेताजी सुभाष चंद्र बोस का नाम सर्वप्रथम आता है। नेताजी के विचारों में एक अलग ही ऊर्जा थी, जिससे अनेक देश प्रेमी युवकों के मन में जोश का निर्माण हुआ। दृढ़ संकल्प एवं अपने विचारों से कभी भी समझौता न करना, ऐसी सुभाष चंद्र बोस की पहचान थी। वे केवल भारत के लिए ही नहीं, अपितु पूरे विश्व के लिए प्रेरणादायक हैं।” तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा” इस नारे ने प्रत्येक भारतीय के मन में राष्ट्र प्रेम की ज्योत जला दी । अंग्रेजों से लड़ने के लिए बल दिया, परंतु भारत के इस महान नेता के विषय में स्वतंत्र भारत के नागरिक के रूप में हमें कितनी जानकारी है यह बड़ा प्रश्न है। सुभाष चंद्र बोस के संबंध में अनेक प्रसंग हैं। 23 जनवरी को उनकी जयंती के निमित्त उनसे संबंधित कुछ प्रसंग इस लेख के माध्यम से देने का अल्प प्रयास किया गया है, इससे प्रत्येक भारतीय को निश्चित ही प्रेरणा मिलेगी।

“शिक्षा एवं विद्यार्थी जीवन ” – सुभाष चंद्र बोस का जन्म कटक में 23 जनवरी 1897 को एक बंगाली परिवार में हुआ । वे इंग्लैंड में आई-सी-एस परीक्षा उत्तीर्ण हुए। उन्होंने आई-सी-एस डिग्री का त्याग किया तथा जो अंग्रेज हमारे देशवासियों को यातना देते हैं, उनकी नौकरी कभी नहीं करना, ऐसा उन्होंने निश्चय किया। बचपन में सुभाष चंद्र बोस जिस विद्यालय में पढ़ रहे थे उस विद्यालय के शिक्षक वेणीमाधव दास ने सुभाष चंद्र बोस की सुप्त देशभक्ति जागृत की। उसके बाद स्वामी विवेकानंद जी का साहित्य पढ़कर सुभाष चंद्र बोस उनके शिष्य बने। महाविद्यालय में पढ़ते समय अन्याय के विरुद्ध प्रतिकार करने की उनकी प्रवृत्ति जागृत हुई। कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज में अंग्रेज प्रोफेसर ओटेन भारतीय विद्यार्थियों से बदतमीजी से व्यवहार करते थे, इसलिए सुभाष चंद्र ने महाविद्यालय में हड़ताल का आवाहन किया।

“स्वतंत्रता संग्राम में प्रवेश एवं कार्य” – कोलकाता के प्रमुख स्वतंत्रता सैनिक देशबंधु चित्तरंजन दास के कार्य से प्रभावित होने के कारण सुभाष बाबू की दास बाबू के साथ काम करने की इच्छा थी। इसके लिए उन्होंने इंग्लैंड से दास बाबू को पत्र लिखकर उनके साथ काम करने की इच्छा व्यक्त की थी। 1922 में दास बाबू ने कांग्रेस के अंतर्गत स्वराज दल की स्थापना की। आगे निर्वाचन में जीतने पर स्वयं दास बाबू कोलकाता के महापौर बने। उन्होंने सुभाष बाबू को महापालिका का प्रमुख कार्यकारी अधिकारी बनाया। सुभाष बाबू ने अपने कार्यकाल में महापालिका का काम बहुत अच्छी  तरह से किया। कोलकाता में रास्तों के अंग्रेजी नाम बदलकर उन्हें भारतीय नाम दिए। स्वतंत्रता संग्राम में प्राण अर्पण करने वाले क्रांतिकारियों के परिवार जनों को महापालिका में नौकरी दिलाई।

भारतीय स्वतंत्रता संगठन एवं आजाद हिंद रेडियो की स्थापना, नाजी जर्मनी में निवास एवं हिटलर से भेंट – बर्लिन में सुभाष बाबू सर्वप्रथम रिबेन ट्रोप एवं जर्मनी के अन्य नेताओं से मिले । उन्होंने जर्मनी में भारतीय स्वतंत्रता संगठन एवं आजाद हिंद रेडियो इन दोनों की स्थापना की। इस अवधि में सुभाष बाबू को ‘नेताजी’ इस नाम से पहचाने जाने लगा । जर्मन सरकार के एक मंत्री एडम फाॅन ट्रॉट सुभाष बाबू के बहुत अच्छे मित्र बन गए। 1937 में जापान ने चीन पर आक्रमण किया तब सुभाष बाबू की अध्यक्षता में कांग्रेस ने चीनी जनता की सहायता करने के लिए डॉक्टर द्वारकानाथ कोटनीस के नेतृत्व में डॉक्टरों का दल भेजने का निर्णय लिया। आगे जब सुभाष बाबू ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में जापान की मदद मांगी तब उन्हें जापान के गुलाम एवं फासिस्ट कहा गया ,परंतु उपरोक्त घटना से यह सिद्ध होता है कि सुभाष बाबू ना तो जापान के गुलाम थे और नहीं फासिस्ट विचारधारा से सहमत थे।

फारवर्ड ब्लाक की स्थापना – 3 मई 1939 को सुभाष बाबू ने कांग्रेस के अंतर्गत फॉरवर्ड ब्लॉक नाम से अपने दल की स्थापना की । कुछ दिनों के बाद सुभाष बाबू को कांग्रेस से निकाल दिया गया । आगे फारवर्ड ब्लाक यह एक स्वतंत्र दल बना। द्वितीय महायुद्ध शुरू होने के पूर्व ही फारवर्ड ब्लाक ने भारत का स्वतंत्रता संग्राम अधिक तीव्र करने के लिए जनजागृति शुरू की। अंग्रेज सरकार ने सुभाष बाबू सहित फारवर्ड ब्लाक के सभी प्रमुख नेताओं को कैद किया। द्वितीय महायुद्ध जब चल रहा था तब जेल में निष्क्रिय रहना सुभाष बाबू के लिए संभव नहीं था । स्वयं को जेल से मुक्त करने हेतु अंग्रेज सरकार को विवश करने के लिए सुभाष बाबू ने जेल में आमरण अनशन शुरू किया। तब सरकार ने उन्हें छोड़ दिया, परंतु युद्ध काल में अंग्रेज सरकार सुभाष बाबू को स्वतंत्र रखना नहीं चाहती थी। इसलिए सरकार ने उन्हें उनके घर में ही नजर बंद कैद में रखा।

आजाद हिंद फौज की स्थापना – स्वराज्य स्थापना के प्रमुख उद्देश्य से नेताजी ने आजाद हिंद की सक्रिय सरकार स्थापित करने का निर्णय लिया। 21 अक्टूबर 1943 को नेताजी ने सिंगापुर में ‘अर्जी हुकूमत ए आजाद हिंद’ (स्वाधीन भारत की अंतरिम सरकार) की स्थापना की। वे स्वयं इस सरकार के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री एवं रक्षा मंत्री बने। इस सरकार को 9 देशों ने मान्यता दी। नेताजी आजाद हिंद फौज के प्रधान सेनापति भी बने थे। आजाद हिंद फौज में जापानी सेना द्वारा अंग्रेजी फौज में से पकड़े गए भारतीय युद्ध बंदियों को भर्ती किया गया । आजाद हिंद फौज में स्त्रियों के लिए झांसी की रानी रेजिमेंट भी बनाई गई। पूर्व एशिया में नेताजी ने अनेक भाषण देकर वहां के भारतीय लोगों को आजाद हिंद फौज में भर्ती होने के लिए तथा उन्हें आर्थिक सहायता करने के लिए आवाहन किया। यह आवाहन करते समय उन्होंने “तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा” ऐसा नारा दिया । आजाद हिंद सेना ने बंगाल के उपसागर के अंडमान व निकोबार यह द्वीप जीत लिए एवं उनका नामकरण शहीद एवं स्वराज ऐसा किया।

लापता होना एवं मृत्यु का समाचार – 18 अगस्त 1945 के दिन नेताजी हवाई जहाज से मंचूरिया की ओर जा रहे थे । इस यात्रा के दौरान वे लापता हुए। इस दिन के बाद वह कभी भी किसी को नहीं दिखे। 23 अगस्त 1945 के दिन जापान की दोमेई समाचार संस्था ने विश्व को बताया कि 18 अगस्त के दिन नेताजी का हवाई जहाज ताइवान की भूमि पर दुर्घटनाग्रस्त हुआ एवं उस दुर्घटना में बुरी तरह से जले हुए नेताजी का अस्पताल में निधन हो गया। नेता जी की अस्थियां जापान की राजधानी टोक्यो में रेनकोजी नामक बौद्ध मंदिर में रखी गईं। 18 अगस्त 1945 इस दिन नेताजी सुभाष चंद्र कैसे एवं कहां लापता हुए तथा आगे उनका क्या हुआ यह भारत के इतिहास का सबसे बड़ा अनुत्तरित रहस्य बना हुआ है।

भारत रत्न पुरस्कार – 1992 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस को मरणोपरांत भारत रत्न प्रदान किया गया, परंतु सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई एक जनहित याचिका का आधार लेकर नेताजी को दिया गया यह पुरस्कार वापस ले लिया गया। उस याचिका में नेताजी की मृत्यु का कोई भी सबूत उपलब्ध न होने के कारण उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न पुरस्कार देना अवैध है, ऐसा प्रतिवाद किया गया। सुप्रीम कोर्ट के आदेश से नेताजी को दिया गया यह पुरस्कार वापस लिया गया। प्रदान किया गया भारत रत्न पुरस्कार वापस लेने की इतिहास की यह एकमात्र घटना है।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस के विषय में इस जानकारी से प्रेरणा लें एवं राष्ट्र प्रेम जागृत करें। – जय हिंद जय भारत !

आपका विनम्र,

श्री सुरेश मुंजाल
हिन्दू जनजागृति समिति, दिल्ली 
संपर्क : 9811414247

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