क्रांतिकारियों का वो वन्दनीय आध्यात्मिक राष्ट्रवाद

वीरता का निन्दन और कायरता का वंदन केवल भारत में ही होता है। 1947 के क्षितिज पर तनिक मेरी आंखों में आंख डालकर देखो तो सही अनेकों वीर क्रांतिकारी और राष्ट्रभक्त  बलिदानी पर्दे के पीछे से उचक उचक कर हमसे कहे जा रहे हैं- हमें याद रखना, भूल मत जाना। जितनी दूर हमसे 1947 होता जा रहा है, उतना ही हम अपने महान क्रांतिकारियों को भूलते जा रहे हैं। हम तथ्यों के सत्य से पीठ फेर कर कांग्रेसी चाटुकारों द्वारा तैयार किये गये झूठे इतिहास को पढक़र उसकी माला जितनी फेरते जा रहे हैं उतनी ही क्रांतिकारियों की यह आवाज धीमी पड़ती जा रही है। लेकिन अब भी बहुत लोग हैं जिनके लिए 1947 पुरानी बात नहीं है। उनके कानों में अनहद के शोर की तरह एक बात रह रहकर गूंज रही है-हमें याद रखना।
जो लोग हमें याद रखना-की आवाज लगा रहे हैं उन्हें पता है कि 1947 में उनके प्रयत्नों से आयी सत्ता सुंदरी का वरण उन लोगों ने कर लिया जिनका उनकी नीतियों से दूर दूर का भी वास्ता नहीं था। सचमुच ये वही कांग्रेसी थे जिन्होंने शहीद भगत सिंह की फांसी पर शोक प्रस्ताव तक पास नहीं किया था और कह दिया था कि हमारा हिंसा में कोई विश्वास नहीं है। इन लोगों की कायरतापूर्ण अहिंसा की परिणति 1962 में चीनी आक्रमण के समय देखी गयी जब तेजपुर का जिलाधिकारी डा. दास जनता को उसी के रहमोकरम पर छोडक़र भाग गया था और अपनी जिम्मेदारी से मुंह फेर गया था, टेलीफोन एक्सचेंज छोडक़र और बैंक वाले नोट जलाकर मैदान छोडक़र भाग निकले थे। हमारी अहिंसावादी नीति हमारे लिये जी का जंजाल बन गयी थी। तब हमें ज्ञात हुआ कि बलिदानी परंपरा किसी राष्ट्र की जीवंतता के लिए कितनी आवश्यक है। तब हमारे नेताओं को अहसास हुआ कि कुछ याद उन्हें भी कर लो जो लौट के घर ना आये।
हम कहते हैं कि 1962 के बलिदानियों को ही याद मत करो। 1948 के भारत पाक बंटवारे में मरे लाखों लोगों को भी याद करो, 1943 के सैनिक विद्रोह को भी याद करो, काकोरी केस को भी याद करो, मैनपुरी केस को, दिल्ली षडयंत्र, गदर पार्टी, बंगभंग आंदोलन, कूका विद्रोह, 1857 की क्रांति और उससे पहले के सन्यासी विद्रोह (1761) को भी याद करो। कितने लोग थे जो लौट के घर ना आये, कितने शहीद थे जिनके लिए ना तो द्वीप जले और ना पुष्प चढ़े। फिर भी हम आजादी के जश्न मनाते जा रहे हैं- क्या इन्हें मनाने के हम वास्तव में हकदार हैं? आज तो स्थिति बड़ी ही भयावह है, अब राजनीति के साथ धर्म और अध्यात्म की बात करना साम्प्रदायिकता कही जाती है। जबकि सम्प्रदाय की राजनीति करना अपने अधिकारों की रक्षा के लिए लड़ी जाने वाली लड़ाई कही जाती है। परिभाषाएं पलट दी गयीं, सारी व्यवस्था उलट दी गयी। ऐसा क्यों हुआ? क्योंकि हमने अपने महान क्रांतिकारियों की बलिदानी परंपरा और उनकी उच्च और दिव्य भावनाओं की कद्र करनी छोड़ दी, हमारे क्रांतिकारी धार्मिक और आध्यात्मिक पहले होते थे बाद में वह कुछ और थे, उनके विषय में यह भी सत्य है कि उनकी धार्मिकता और आध्यात्मिकता ही उनके आत्मबल को ऊंचा रखती थी और वह पहाड सी कठिनाई को भी आराम से लांघ जाते थे। क्रांतिकारियों के विषय में यह सर्वमान्य सत्य है कि उन्हें क्रांति की खुराक केशव चंद सेन, स्वामी दयानंद, रामकृष्ण परमहंस, विवेकानंद जैसी कितनी ही दिव्यात्माओं के प्रेरक उदबोधनों से, लेखों से और पुस्तकों से मिली। क्रांतिकारियों के इन धर्मगुरूओं के विचारों में कहीं संकीर्णता नहीं थी, कहीं सांप्रदायिकता नहीं थी, था तो विशुद्घ राष्ट्रवाद  था, या विशुद्घ आध्यात्मवाद था। इन धर्मगुरूओं के विचारों के मंथन से क्रांतिकारियों ने आध्यात्मिक राष्ट्रवाद  की मशाल जलाई और लोगों को बताया कि जीवन के कल्याण के लिए धर्म चिंतन दो बातों पर केन्द्रित रहना चाहिए एक तो राष्ट्रवाद पर और दूसरे अध्यात्मवाद पर। राष्ट्र में यदि अध्यात्मवाद नहीं रहा तो वह जैसे बिना आत्मा के शरीर मृत हो जाता है उसी प्रकार मृत्यु को प्राप्त हो जाएगा। इसलिए राजनीति अध्यात्म प्रेरित रहनी चाहिए तभी उसमें नैतिकता रहेगी और वह अपने राजधर्म का यथोचित पालन कर सकेगी। कम्युनिस्ट शचीन्द्र नाथ सान्याल ने लिखा है-मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि संसार की भलाई के लिए भारतीय अध्यात्मवाद परम कल्याणप्रद है। हमको यह समझना चाहिए कि राष्ट्रशक्ति को दूसरी संस्थाओं के हाथ में जाने न देकर उसे अपनी कार्यकुशलता के जरिये सुनियंत्रित और संगठित शक्ति के द्वारा अपने हाथों में करना चाहिए। बटुकेश्वर दत्त जैसे क्रांतिकारी को कौन नहीं जानता? उन्होंने लिखा है -दिनांत के पश्चात इस कर्म व्याप्त जगत के कोलाहल तथा जीवन धारा की इस विषम प्रतियोगिता से कुछ क्षुब्ध होकर जब हम घर पहुंचते हैं और स्वयं को सुख निंद्रा में विलीन कर देने की चेष्टïा करते हैं तो ठीक उसी क्षण मनुष्य मात्र के हृदय से एक करूण क्रंदन स्वर फूट पड़ता है। मुक्ति! मुक्ति! मुक्ति! मुक्ति दो!
काकोरी केस के अभियुक्त रोशन सिंह का अध्यात्मवाद गीता के पुनर्जन्मवाद से पूर्णत: अभिभूत का। इसलिए फांसी की सजा देने वाले जज हैमिल्टन से उन्होंने कहा था मुझे पुन: जीवन देने के लिए आपको धन्यवाद है। फांसी पर जाने से पूर्व रामप्रसाद विस्मिल ने लिखा :-
मालिक तेरी रजा और तू ही तू रहे,
बाकी न मैं रहूं और न मेरी आरजू रहे,
जब तक कि तन में जान रंगों में लहू रहे,
तेरा ही जिक्र पार तेरी जुस्तजू रहे।।
अश्फाक उल्ला खान ने कुरान का बस्ता गले में लटकाया और फांसी पर जाने से पूर्व कहा-मेरा इंसाफ खुदा करेगा। उन्होंने लिखा था-
कुछ आरजू नहीं है, है आरजू तो यह है,
रख दे कोई जरा सी खाके वतन कफन में।
गीता से प्रभावित शहीद राजेन्द्र लाहिड़ी ने गोंडा जेल से फांसी के पूर्व पत्र लिखा-हमारे लिये मृत्यु शरीर का परिवर्तन मात्र है, पुराने कपड़ों को त्यागकर नये कपड़े पहन लेना है। मृत्यु आ रही है, मैं प्रसन्नचित और प्रसन्न मुख से उसका आलिंगन करूंगा।….. वंदेमातरम।
वास्तव में स्वतंत्र भारत में हमें अपने महान क्रांतिकारियों के जीवन पथ को अपना आदर्श पथ स्वीकार कर उस पर आगे बढऩा चाहिए था। स्वतंत्रता बलिदानों से आती है और बलिदान ही चाहती है। कश्मीर, पंजाब, आसाम आदि अशांत क्षेत्रों में हम चुपचाप कितने ही बलिदान दे चुके हैं। ये बलिदान हमें बता रहे हैं कि अहिंसा की रक्षार्थ हिंसा भी आवश्यक है। हम इससच को समझते भी हैं परंतु गांधी की अहिंसा ने हमारी जुबान पर ताले डाल रखे हैं। इसलिए समझी समझायी बात को भी बोलने से डरते हैं। यहां संत भिंडरांवाला को मारने वाले मार दिये जाते हैं और संत भिंडरांवाले जीवित हो जाते हैं। शहीदों को शहीद ना कहना यहां अहिंसा भी रक्षार्थ सही माना जाता है अब भी समय है कि हम अपनी उल्टी नीतियों की उल्टी परिणतियों से कुछ सीखें और भविष्य के लिए सावधान होकर वर्तमान का सही परिपे्रक्ष्य में आंकलन, परीक्षण और अनुशीलन करें।

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