शेष दिवस रहती है विवश, एक दिन मनाते हैं हम हिंदी दिवस

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डॉ. रमेश ठाकुर

वैसे, देखा जाए तो हिंदी समाज खुद हिंदी की दुर्दशा का सबसे बड़ा कारण है। उसका पाखंड है, उसका दोगलापन और उसका उनींदापन? ये सच है कि किसी संस्कृति की उन्नति उसके समाज की तरक्की का आईना होती है। मगर इस मायने में हिंदी समाज बड़ा विरोधाभासी है।
भारत में रोजाना करीब छोटे-बड़े दैनिक, साप्ताहिक और अन्य समयाविधि वाले 5000 हजार से कहीं अधिक अखबार प्रकाशित होते हैं और 1500 के करीब पत्रिकाएं हैं, 400 से ज्यादा हिंदी चैनल हैं। बावजूद इसके हिंदी का ऐसा हाल हुआ पड़ा। मौलिक रूप से या कागजी तौर पर, बेशक हिंदी को बढ़ावा देने की वकालतें हुकूमतें और समाज करता हों? पर, असल सच्चाई तो यही है कि हिंदी एक वर्ग मात्र तक ही सिमटती जा रही है। हिंदी आजादी के 75 वर्ष बाद, यानी अमृतकाल में कहां खड़ी है, उसकी घनघोर तरीके से समीक्षा होनी चाहिए। एक तस्वीर जो इस वक्त उभरी है, वो ये हैं कि हिंदी गरीबों की मुख्य जुबान, कामगारों का आपस में बतियाना, ग्रामीण अंचल की अव्वल भाषा व सामान्य बोलचाल तक ही सीमित हो गई है। अंग्रेजी व अन्य भाषाएं जिस हिसाब से विस्तार ले रही हैं, उससे हिंदी बहुत पीछे पिछड़ती जा रही है। बात ज्यादा पुरीनी नहीं है, मात्र 9-10 पहले की है। 2014 में जब केंद्र की सियासत में नरेंद्र मोदी का प्रधानमंत्री के तौर पर आगमन हुआ तो उन्होंने हिंंदी के चलन को लेकर अप्रत्याशित कदम उठाए। सभी मंत्रालयों में हिंदी को अपनाने का आदेश हुआ। साथ ही हिंदी भाषा के ज्यादा से ज्यादा प्रचलन को लेकर बड़ा अभियान भी छेड़ा। कुछ समय के लिए तो अभियान ने खूब जोर पकड़ा। लेकिन धीरे-धीरे शांत पड़ गया। शांत पड़ने के पीछे लोगों की उदासनीता दिखी। जबकि, प्रधानमंत्री ने बड़ी ईमानदारी से इस ओर कदम उठाया था।

बहरहाल, ज्यादातर सरकारी विभागों और केंद्रीय मंत्रालयों में हिंदी का प्रचलन अब भी अच्छा खासा है। लेकिन जितना होना चाहिए, उस हिसाब से हिंदी भाषा को तवज्जो नहीं मिल रही। कागजी कोशिशें में कोई कमी नहीं है। पर, धरातल पर सब शून्य ही है। केंद्र सरकार हिंदी को बढ़ावा देने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रही, पर समाज साथ नहीं दे रहा। समाज के दिलो-दिमाग पर अंग्रेजी का भूत सवार है। प्रत्येक व्यक्ति अपने बच्चों को अंग्रेजी की शिक्षा दिलवाना चाहता है। सरकारी स्कूलों को छोड़कर, अंग्रेजी वाले स्कूलों की पूछ पकड़ रखी है। अंग्रेजी के नाम पर निजी स्कूल खूब चांदी काट रहे हैं। खैर, इसके पीछे जो कारण हैं, वो हमारे सामने हैं। अव्वल, तो हिंदी बोलने वाले को लोग गंवार और ढेढ देहाती मानते हैं। अंग्रेजी वाले पढ़े-लिखों की जमात से हिंदीभासियों को अपने से दूर समझती है। बेशक, अंग्रेजी बोलने वाला व्यक्ति ज्यादा पढ़ा-लिखा न हो, बस उसे अंग्रेजी आती हो, तो उसे पढ़ा-लिखा और समझदार माना जाता है। हालांकि, अग्रेंजी के बढ़ते चलन से किसी को कोई दिक्कत नहीं है। पर, उसके बढ़ते कदम हिंदी को भी न रोके?

वैसे, देखा जाए तो हिंदी समाज खुद हिंदी की दुर्दशा का सबसे बड़ा कारण है। उसका पाखंड है, उसका दोगलापन और उसका उनींदापन? ये सच है कि किसी संस्कृति की उन्नति उसके समाज की तरक्की का आईना होती है। मगर इस मायने में हिंदी समाज बड़ा विरोधाभासी है। अब हिंदी समाज अगर देश के पिछड़े समाजों का बड़ा हिस्सा निर्मित करता है तो यह भी बिल्कुल आंकड़ों की हद तक सही है कि देश के समद्व तबके का भी बड़ा हिस्सा हिंदी समाज ही है। इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि आज यह भाषा समाज की उपेक्षा का दंश झेल रही है। कह कुछ भी लें, मगर ये सच कि हिंदी की लाज सिर्फ ग्रामीणों से ही बची है। क्योंकि वहां आज भी हिंदी को ही पूजते हैं और मानते-बोलते हैं। वह आज भी हिंदी के मुकाबले अंग्रेजी को उतना भाव नहीं देते। अंग्रेजी का हम विरोध नहीं करते, लेकिन उसके आड़ में हिंदी की खिल्लियां भी नहीं उड़ाई जानी चाहिए।

आधुनिक समय में हिंदी भाषा की सच्चाई क्या है? शायद बताने की आवश्यकता नहीं किसी को? अंग्रेजी के समझ हिंदी खुद को कितना पिछड़ी हुई खुद मानती है, ये भी सभी जानते हैं। बड़े लोग, धनाढ्य वर्ग और विकसित समाज ने जब से हिंदी भाषा को नकारा है और अंग्रेजी को संपर्क भाषा के तौर अपनाया है, तभी से हिंदी के दिन लदने शुरू हुए। इसमें किसी और का दोष नहीं, निश्चित रूप से हम-आप ही जिम्मेदार हैं। एक दैनिक दिहाड़ी मजदूर भी अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूल में पढ़ाना चाहता है। उसे भी हिंदी के मुकाबले अंग्रेजी अच्छी लगती है। दरअसलए ये ऐसा फर्क पैदा हो चुका है, जिसे आसानी से कम नहीं किया जा सकता। बात भी ठीक है, देहाड़ी और रिक्सा चालक के बच्चे भी पीछे क्यों रहे किसी से। उनको भी अंग्रेजी पढ़ने-बोलने का दूयरों की तरह हक है। अपने हक को प्राप्त करेंगे, और जरूर करना चाहिए। इन्हीं सब सामूहिक कारणों के चलते वैश्वीकरण और उदारीकरण के मौजूदा दौर में हिंदी अपने में विवश होती जा रही है। आज हिंदी का दिवस है, लेकिन रोजाना होती है विवश?

जरूरत इस बात की है कि हिंदी दिवस के दिन मात्र रश्मअदायगी न हो,् हमें अपनी देशी भाषा के प्रति संकल्पित होना होगा। शुद्ध हिंदी बोलने वालों को देहाती व गंवार न समझा जाए। बीपीओ व बड़ी-बड़ी कंपनियों में हिंदी जुबानी लोगों के लिए नौकरी नहीं होती। इसी बदलाव के चलते मौजूदा वक्त में देश का हर दूसरा आदमी अपने बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाने को मजबूर है। इस प्रथा को बदलने की दरकार है। वैसे, ये काम हमें पूर्णताः हुकूमतों पर नहीं छोड़ना चाहिए। हमें अपनी भी ज़िम्मेदारी समझनी चाहिए। हिंदी को जिंदा रखने के लिए खुद से भी कोशिशें करनी होंगी। इसके लिए जनांदोलन की जरूरत है। हिंदी के वर्चस्व को बचाने की हमारे सामने बड़ी चुनौती है। जबकि, देखा जाए तो हिंदी को विभिन्न देशों के कॉलेजों में पढ़ाने का प्रचलन बढ़ा है। संदेह है कहीं ऐसा न हो विदेशी लोग हिंदी भाषा के बल पर फिर दोबारा से हमारे देश में घुसपैठ कर जाए। जब वह हिंदी बोल और समझ लेंगे तब वह आसानी से यहां घुस सकेंगे। हमें सतर्क रहने की जरूरत है।

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