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दुनिया में संतुलन कायम करने के लिए ब्रिक्स का विस्तार समय की आवश्यकता

ललित गर्ग

ब्रिक्स ने अपने गठन से लेकर अब तक जो तरक्की की है उसकी उपलब्धि इसके क्षेत्रों की वह आपसी समझदारी रही है जिसके तहत उन्होंने आपसी हितों की सुरक्षा करते हुए विश्व को नया शक्ति सन्तुलन चक्र देने का प्रयास किया है।
ब्रिक्स समिट दक्षिण अफ्रीका के जोहान्सबर्ग में काफी सफल एवं निर्णायक रहा है। भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस समिट में महत्वपूर्ण मुद्रा में दिखाई दिये। उन्होंने एक बार फिर इसके विस्तार की बात की और सदस्य देशों से भी आग्रहपूर्ण ढंग से दबाव बनाया कि कि ब्रिक्स का विस्तार होना चाहिए। ब्रिक्स यानी बी से ब्राजील, आर से रूस, आई से इंडिया (भारत), सी से चीन और एस से दक्षिण अफ्रीका- ये दुनिया की पांच सबसे तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों का एक समूह है जिसमें अब छह देशों की सदस्यता देने पर सहमति बनी है, जिसमें सउदी अरब, यूएई, मिस्र, इथोपिया, अर्जेंटीना और ईरान शामिल हैं। इन शक्ति सम्पन्न पांचों देशों का वैश्विक मामलों पर महत्वपूर्ण प्रभाव है और दुनिया की लगभग 40 फीसदी आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं। चीन इसे अपने हित के लिए इस्तेमाल करना चाहता है, जबकि भारत इसे सही मायनों में लोकतांत्रिक संगठन बनाना चाहता है। भारत चाहता है कि ब्रिक्स समूह मिलकर दुनिया में शांति, सह-जीवन, अहिंसा, लोकतांत्रिक मूल्य, समानता एवं सह-अस्तित्व पर बल देते हुए दुनिया को युद्ध, आतंक एवं हिंसामुक्त बनाया जाये।

फिलहाल दुनिया की 40 प्रतिशत आबादी ब्रिक्स देशों में रहती है। एक क्वार्टर दुनिया की जीडीपी ब्रिक्स में है। इन्हीं सब वजहों से दुनिया के देशों को यह आकर्षित करता है और अभी फिलहाल 22 देशों ने इसका सदस्य बनने के लिए आवेदन किया है। भारत का मानना था कि समान सोच वाले देशों को साथ लेकर चला जा सकता है। आने वाले समय में ब्रिक्स दुनिया की आधी जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करने लगेगा। रूस और चीन की यह मंशा कही जा रही थी कि अमेरिका या पश्चिम को यह संदेश दिया जा सके कि पश्चिमी दुनिया को ब्रिक्स चुनौती देगा। निश्चित ही ब्रिक्स की ताकत से एक संतुलन स्थापित हो रहा है और पश्चिमी देशों के अहंकार एवं दुनिया पर शासन करने की मंशा पर पानी फिरा है। हमारा भविष्य सितारों पर नहीं, जमीन पर निर्भर है, वह हमारा दिलों में छिपा हुआ है, दूसरे शब्दों में कहें तो हमारा कल्याण अन्तरिक्ष की उड़ानों, युद्ध, आतंक एवं शस्त्रों में नहीं, पृथ्वी पर आपसी सहयोग, शांति, सह-जीवन एवं सद्भावना में निहित है। ’वसुधैव कुटुम्बकम का मंत्र इसलिये सारी दुनिया को भा रहा है। इसलिये बदलती हुई दुनिया में, बदलते हुए राजनैतिक हालात में सारे देश एक साथ जुड़ना चाहते हैं।

अब ब्रिक्स देशों में छह नए देशों के शामिल हो जाने से ब्रिक्स देशों की वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद में हिस्सेदारी 26 प्रतिशत हो जाएगी। ब्रिक्स के विस्तार का उद्देश्य पश्चिमी देशों के प्रभुत्व वाली वैश्विक व्यवस्था में एक काउंटरवेट के रूप में उभरना है। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की पेचीदगी कह लीजिए या खूबसूरती, इसमें कदम-कदम पर विडंबनाएं और विरोधाभास देखने को मिलते हैं। सोचिए, एक तरफ चीन से मुकाबले के लिए भारत और अमेरिका साथ आए हैं, तो दूसरी तरफ ब्रिक्स में चीन और भारत, उन पश्चिमी देशों के दबदबे के खिलाफ एकजुट हैं जिनका प्रतिनिधित्व अमेरिका करता है।

ब्रिक्स (ब्राजील, भारत, चीन, रूस व दक्षिण अफ्रीका) का संगठन ऐसा सपना है जिसे भारत रत्न स्व. प्रणव मुखर्जी ने भारत के विदेश मन्त्री के तौर पर 2006 में देखा था। सितम्बर 2006 में संयुक्त राष्ट्र महासंघ की साधारण सभा में भाग लेने गये प्रणव दा ने तब इस सम्मेलन के समानान्तर बैठक करके भारत, रूस, चीन व ब्राजील का एक महागठबन्धन तैयार किया था जिसे शुरू में ‘ब्रिक’ कहा गया था। प्रणव दा बदलते विश्व शक्ति क्रम में उदीयमान आर्थिक शक्तियों की समुचित व जायज सहभागिता के प्रबल समर्थक थे और पुराने पड़ते राष्ट्रसंघ के आधारभूत ढांचे में रचनात्मक बदलाव भी चाहते थे। इसके साथ ही वह बहुधु्रवीय विश्व के भी जबर्दस्त पक्षधर थे जिससे विश्व का सकल विकास न्यायसंगत एवं लोकतांत्रिक तरीके से हो सके। अब इसमें इन्हीं महाद्वीपों के छह नये देश शामिल किये गये हैं। अब नरेन्द्र मोदी ने इसमें सराहनीय भूमिका निभाई है। उनके दूरगामी एवं सूझबूझ भरे सुझावों का ब्रिक्स देशों ने लोहा माना है।

ब्रिक्स ने अपने गठन से लेकर अब तक जो तरक्की की है उसकी उपलब्धि इसके क्षेत्रों की वह आपसी समझदारी रही है जिसके तहत उन्होंने आपसी हितों की सुरक्षा करते हुए विश्व को नया शक्ति सन्तुलन चक्र देने का प्रयास किया है। जबकि रूस, यूक्रेन के बीच पिछले डेढ़ वर्ष से चल रहा वह युद्ध है जिसे पश्चिमी देशों के सामरिक संगठन ‘नाटो’ ने अनावश्यक रूप से पूरी विश्व अर्थव्यवस्था के लिए खतरा बना दिया है। इस युद्ध के चलते पश्चिमी यूरोपीय देशों व अमेरिका ने रूस पर जिस तरह आर्थिक प्रतिबन्ध लगाये हैं उनसे दुनिया के देशों में आपसी कारोबारी भुगतान की नई समस्या ने जन्म लिया है जिसकी वजह से ये देश डॉलर के स्थान पर अपनी-अपनी मुद्राओं में भुगतान की व्यवस्था की सार्थकता को खोज रहे हैं। इसी वजह से ब्रिक्स सम्मेलन की समाप्ति पर दक्षिण अफ्रीका के मेजबान राष्ट्रपति श्री सिरिल रामाफोसा ने घोषणा की कि सम्मेलन में इस बात पर सहमति बनी है कि संगठन के देशों के विदेश मन्त्री व उनके केन्द्रीय बैंकों के गवर्नरों की एक बैठक बुलाकर यह विचार किया जाये कि क्या कारोबारी भुगतान के लिए देश अपनी- अपनी मुद्रा का प्रयोग कर सकते हैं? ऐसी वित्तीय प्रणाली विकसित होने से दुनिया में जिस नये वित्तीय ढांचे का निर्माण होगा उससे इन देशों की अर्थव्यवस्थाएं सीधे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकेंगी जिसके असर से ‘डॉलर’ की ताकत को भी झटका लगेगा। ब्रिक्स का विस्तार होने के बाद दुनिया के दूसरे देशों के लोगों को भी विश्व विकास में अपनी हिस्सेदारी के प्रति ज्यादा विश्वास पैदा होगा और यकीन बनेगा कि दुनिया केवल पश्चिमी यूरोप व अमेरिका के बताये गये सिद्धान्तों पर ही नहीं चलेगी बल्कि इसके संचालन में उनकी भूमिका भी उल्लेखनीय होगी क्योंकि विभिन्न आय व मानव स्रोतों पर उनका भी हक है।

भारत पहले ही साफ कर चुका था कि वह ब्रिक्स के विस्तार के खिलाफ नहीं है। अन्य मुद्दों की तरह इस मामले में भी उसका रुख किसी खास देश या लॉबी के आग्रह या शंका आशंका से नहीं बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों से निर्देशित हो रहा था। ध्यान रहे, भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद समेत तमाम वैश्विक संगठनों और मंचों के विस्तार और उनमें समय के मुताबिक सुधार की वकालत करता रहा है। ब्रिक्स के विस्तार के ताजा फैसले से उस एजेंडे को आगे बढ़ाने में आसानी होगी। ब्रिक्स के विस्तार की घोषणा ऐसे समय में हुई है जब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में बदलाव की बातचीत लंबे समय से अटकी हुई है। ब्रिक्स के सदस्य देश चाहते हैं कि यूएनएससी में स्थायी सदस्यता के लिए और अधिक सीटें हों, ताकि पश्चिमी देशों के प्रभुत्व को कम किया जा सके। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ब्रिक्स के विस्तार का स्वागत किया है और कहा कि इससे यह संदेश भी जाएगा कि सभी अंतरराष्ट्रीय संस्थानों को बदलते समय और परिस्थितियों के अनुकूल होना चाहिए। उन्होंने कहा कि हम मानते हैं कि नए सदस्यों के शामिल होने से ब्रिक्स मजबूत हो जाएगा और हमारी साझा कोशिशों को भी बढ़ावा मिलेगा।

ब्रिक्स संगठन में भारत का वर्चस्व प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की दूरदर्शिता एवं कूटनीति से बढ़ा है। भारत चाहता है कि ब्रिक्स के विस्तार में भारत के रणनीतिक साझीदारों को भी जगह मिले। तो, आने वाले समय में भारत शायद इंडोनेशिया, वियतनाम और बांग्लादेश जैसे देशों की सदस्यता के लिए सिफारिश करे और उनको भी लेकर आए। इसलिए, अगर चीन यह सोच रहा है कि ब्रिक्स के प्लेटफॉर्म को वह अपने मन-मुताबिक इस्तेमाल कर सकेगा, तो वह शायद गलत समझ रहा है। भारत दुनिया में रणनीतिक दांव-पैंतरों से वाकिफ है और उसे अपने कार्ड सजाने और समय की नजाकत को देखते हुए रखने भी आ गए हैं। ग्लोबल साउथ का विश्वास चीन से घटा है और भारत पर बढ़ा है तो आनेवाले समय में नेतृत्व भी भारत ही करे तो कोई आश्चर्य नहीं है।

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