सुविधाओं के अभाव में जूझती उत्तराखंड राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था

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नितिन बिष्ट

नैनीताल, उत्तराखंड

राज्य के तौर पर उत्तराखंड के गठन को 22 वर्ष पूर्ण हो चुके हैं. इन वर्षों में राज्य में कई सुधारों की बातें कही जाती है. जिसमें स्वास्थ्य सुविधाएं प्रमुख है. परंतु यह पहाड़ी राज्य लम्बे समय से डाक्टरों की कमी से जूझ रहा है. पहाड़ों में स्वास्थ्य सुविधाएं सुधारने के लिये सरकारें भले ही प्रयास करती रही हों, लेकिन हालात हैं कि सुधरने का नाम ही नहीं ले रहे हैं. पहाड़ों की भौगोलिक परिस्थितियों के कारण बाॅण्ड के बावजूद डाॅक्टर यहां टिकने को तैयार नही हैं, जिससे दूरस्थ ग्रामीण इलाकों में मरीजों को खासी परेशानी झेलनी पड़ती है. पर्वतीय क्षेत्रों में डाॅक्टरों की कमी के पीछे सरकार चिकित्सकों के पहाड़ पर तैनाती की अनिच्छा को सबसे बड़ा कारण मानती है.

उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में डाॅक्टरों की कमी व स्वास्थ्य सुविधाओं के खस्ताहाल के चलते राज्य में ऐसी कई कहानियां है, जिनमें मरीजों को सही समय पर एम्बुलेंस न मिलने, उचित उपचार की कमी, डाक्टरों की सीमित उपलब्धता तथा कई और कारणों के चलते अपनी जान से हाथ धोना पड़ा है. राज्य के स्वास्थ्य विभाग में 11479 राजपत्रित और अराजपत्रित पद स्वीकृत है, जिनमें वर्तमान में 5198 पद रिक्त हैं, जो कुल स्वीकृत पदों का करीब 45 प्रतिशत है. यह आकड़ें वर्ष 2022-23 के बजट में दिये गये हैं. इसी प्रकार से रूरल हेल्थ स्टेटिस्टिक्स रिपोर्ट 2021-22 के आकड़ो पर गौर करे तो राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में कुल 1785 उपकेन्द्र हैं, जिनमें से 416 उपकेन्द्र ऐसे हैं, जिनके पास अपनी बिल्डिंग तक नही है. अगर बात करे इन सेंटरों के स्टाफ की, तो ग्रामीण इलाकों में स्थित उपकेन्द्रों एवं प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों को मिलाकर स्वाथ्य कर्मचारी (महिला) एवं एएनएम के 573 पद रिक्त हैं. वही राज्य के ग्रामीण इलाकों में स्थित 52 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में 208 स्पेशलिस्ट डॉक्टरों की आवश्यकता है, जिसमें कुल 162 पद स्वीकृत है, इनमें मात्र 36 पदों पर ही विशेषज्ञ डाॅक्टर नियुक्त हैं, बाकि के 126 पद रिक्त है, जो कि कुल स्वीकृत पदों का 77 प्रतिशत है.

इंडियन पब्लिक हेल्थ स्टैंडर्ड (आईपीएचएस) के मानकों के अनुसार एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) को पैरामेडिकल और अन्य स्टाफ द्वारा समर्थित चिकित्सा अधिकारी द्वारा देखा जाना है. एनआरएचएम के तहत पीएचसी पर दो अतिरिक्त स्टाफ नर्स के लिये प्रावधान है. यह 6 उपकेन्द्रों के लिये एक रेफरल इकाई के रूप में कार्य करता है. वहीं प्रत्येक सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र में चार चिकित्सा विशेषज्ञों (सर्जन, चिकित्सक, स्त्री रोग विशेषज्ञ और बालरोग विशेषज्ञ) तथा उनकी सहायता के लिये पैरा चिकित्सक एवं अन्य कर्मचारी अपेक्षित हैं. इसमें एक ओटी, एक्स-रे, लेबर रूम और प्रयोगशाला सुविधाओं के साथ 30 इनडोर बेड भी शामिल है. यह 4 पीएचसी के लिये एक रेफरल केन्द्र के रूप में कार्य करता है और प्रसूति देखभाल एवं विशेषज्ञ परामर्श के लिए सुविधाएं भी प्रदान करता है. परन्तु उत्तराखंड में शायद ही या फिर बहुत कम ही ऐसे सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र हैं, जिसमें सभी चार विशेषज्ञ कार्यरत हों.

वर्ष 2022 के आकड़ों के अनुसार, उत्तराखंड के ग्रामीण इलाकों में स्थित प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों में डाॅक्टरों के 140 पद रिक्त हैं. इसी प्रकार प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों और सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों को मिलाकर कुल 583 लेबोरेटरी तकनीशियन की आवश्यकता है, जिनमें से केवल 81 पदों पर नियुक्ति की गयी है. नर्सिंग स्टाफ के भी 718 पदों में से 367 पद रिक्त हैं एवं ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों में रेडियोग्राफर के कुल स्वीकृत 34 पदो में से 17 पद खाली पड़े हैं. इस संबंध में ग्राम कमोला के महेश सिंह बताते हैं कि कुमाउ क्षेत्र के लिए हल्द्वानी सबसे उचित स्वास्थय का केन्द्र है, परंतु हल्द्वानी में बढ़ती जनसंख्या स्वास्थ्य विभाग के लिए भी किसी चुनौती से कम नहीं है. स्वास्थ्य केन्द्र कम होते जा रहे हैं, लेकिन मरीज़ों की संख्या दोगुनी बढ़ती जा रही है.

हालांकि सरकार लंबे समय से डाॅक्टरों को पहाड़ में नियुक्त करने की कोशिश कर रही है. लेकिन अधिकांश राजकीय मेडिकल काॅलेजों से पढ़ाई पूरी करने वाले डाॅक्टर भी पहाड़ में पोस्टिंग से कतराते हैं. इस समस्या को दूर करने के लिए सरकार के द्वारा बांड सिस्टम भी शुरू किया गया है, जिसके तहत राजकीय मेडिकल काॅलेज में प्रवेश लेने वाले छात्रों को फीस में छूट दी जाती है. इस छूट के बदले में छात्रों से 5 साल के लिए पहाड़ों में पोस्टिंग के लिये बाॅण्ड भरवाया जाता है. परंतु आज तक इस सिस्टम का व्यापक असर पहाड़ों की स्वास्थ्य व्यवस्था पर देखने को नही मिला है. इस पर किस प्रकार कार्य किया जाए यह सरकार के लिए भी चिंता का विषय बनता जा रहा है. सरकार द्वारा जो नियम बनाए गए हैं उन पर कठोरता के साथ कार्य करने की आवश्यकता है. पहाड़ी क्षेत्रों में संख्या के अनुरूप यदि स्टाफ नियुक्ति किये जाएं, तो स्वास्थय सुविधाएं ग्रामीण स्तर पर ही प्राप्त हो सकते हैं. इससे न केवल ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों को घर पर ही स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध हो सकती हैं, बल्कि शहरों के स्वास्थ्य केंद्रों पर भी बोझ कम हो सकता है. (चरखा फीचर)

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