स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात हिंदी को भारत की राष्ट्रभाषा का स्तर दिया गया। हिंदी को ही राजभाषा भी माना गया। संविधान के अनुच्छेद 343 (1) के अनुसार हिंदी भारत की राजभाषा तथा देवनागरी इसकी लिपि है। यह दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है कि व्यवहार में हमारा यह संवैधानिक अनुच्छेद हमारा राष्ट्रीय संकल्प न बनकर केवल कागज का टुकड़ा मात्र बनकर रह गया है। हमने अपने संवैधानिक दायित्व और वचन का निर्वाहन नहीं किया।
संविधान के अनुच्छेद 341 के अनुसार राजभाषा का विकास करना तथा उसके प्रचार-प्रसार का उपाय करना केन्द्रीय सरकार का उत्तरदायित्व है। भारत की लोकसभा में 18 जनवरी सन 1968 को सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया गया था कि केन्द्रीय सरकार का समस्त कार्य राजभाषा हिंदी में होगा।
हमारे संविधान में ऐसी कई बातें उपलब्ध हैं, जो दिखायी देने में बड़ी ही सुंदर लगती हैं, किंतु व्यवहार में हमारे नेताओं की अक्षमताओं के कारण वह हमारे लिए उतनी ही कष्टदायी हैं। हिन्दी के विषय में उपरोक्त व्यवस्था और इच्छाशक्ति से हीन नेतृत्व की 18 जनवरी सन 1968 की उपरोक्त शपथ सब कुछ व्यर्थ सी ही सिद्घ हुई है। ऐसा होने के पीछे कुछ कारण रहे हैं, जैसे-संविधान सभा में ऐसे लोगों का आधिपत्य रहा जो हिंदी के स्थान पर अंग्रेजी को वरीयता देते रहे। चूंकि वह स्वयं या तो अंग्रेजी कान्वेंट स्कूलों में पढ़े थे अथवा अंग्रेजी से उनका मोह इतना हो गया था कि उससे छुटकारा मिलना उन्हें असंभव लग रहा था। उन लोगों की मान्यता थी कि भारत का वैज्ञानिक विकास केवल अंग्रेजी के माध्यम से ही होना संभव है। यही कारण था कि हमारे संविधान निर्मात्ताओं ने-
ीअंग्रेजी को आधुनिकता के दृष्टिकोण से सर्वाधिक वैज्ञानिक और उन्नतिशील भाषा माना।
ीसंविधान सभा में कई लोग ऐसे थे जो इस भाषा के कारण भारत की उन्नति होना असंभव मानते थे।
ीजो लोग भारत की राजनीतिक बागडोर अंग्रेजों से संभालने के लिए तैयार बैठे थे, उनका भारत और भारतीयता से कोई दूर का भी लेना देना नहीं था।
ीउनका भारत में स्वतंत्रता के पश्चात अंग्रेजों की एक नई फौज खड़ी करके भारत की पुरानी सड़ी-गली परम्पराओं और आस्थाओं को मिटा देना ही एक मात्र लक्ष्य था।
ीइन सड़ी-गली परम्पराओं में भारत की महान सांस्कृतिक विरासत भी सम्मिलित थी।
दुर्भाग्यवश स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात ‘गांधी-नेहरू एण्ड कंपनी’ ने मिलकर भारतीयों को अंग्रेज बनाने का प्रयास प्रारंभ कर दिया। फलस्वरूप भारत से भारतीयता मिटती चली गयी और अंग्रेजियत यहां प्रसार पाने लगी। यही कारण है कि आज भारत में ही सन 1941 में जिन ईसाइयों की संख्या मात्र 79 लाख थी वह अब बढक़र ढाई करोड़ हो गयी है। स्पष्ट है कि जितना काम अंग्रेज नहीं कर पाये, उससे अधिक उनके उत्तराधिकारियों ने बड़े ही सहज ढंग से पूरा कर दिया। सचमुच ये काले अंग्र्रेज घृणा के पात्र हैं। नेहरू जी के चाटुकार ‘गोपाल स्वामी अयंगर’ की व्यवस्था थी कि हिंदी राजभाषा और राष्ट्रभाषा तो रहे किंतु अगले पंद्रह वर्ष के लिए (अर्थात सन 1965 तक के लिए) अंग्रेजी को सहायक संपर्क भाषा का स्थान दिया जाए। तब तक हमारे अधिकारीगण हिन्दी में काम करना सीख लेंगे।
सरदार पटेल व डा. अंबेडकर सहित पूरी संविधान सभा अयंगर के इस झांसे में आ गयी। अगले पंद्रह वर्षों में अंग्रेजी का बड़े अच्छे ढंग से प्रचार-प्रसार भारत में हुआ। धीरे-धीरे वह पटरानी बन बैठी और हिन्दी उसकी नौकरानी बनकर झाड़ू पौंछा करने की भूमिका में आ गयी। ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति किसी अन्य देश की राष्ट्रभाषा की नहीं है, जैसी भारत में हिन्दी की बना दी गयी है।
आज स्थिति यह आ गयी है कि अंग्रेजी के सामने हिन्दी की बोलने की शक्ति ही नहीं है। घर को घर के चिरागों ने ही आग लगा दी है। देश की संसद में भी राष्ट्रभाषा की दुर्गति पर विचार करने के लिए किसी भी जनप्रतिनिधि के पास समय नहीं है।
राष्ट्रीय दायित्व के प्रति इतनी नीरसता इनकी मुंह छिपाव नीति को दर्शाती है। जबकि इन्हें ज्ञात होना चाहिए कि यह मुंह छिपाव की नीति भीष्म को कितनी महंगी पड़ी थी? आज द्रोपदी रूपी हिन्दी का चीरहरण हो रहा है और हमारे यह जननायक चुप हैं। ये समझ नहीं पा रहे हैं कि मर्यादाओं का हनन राष्ट्र में भारी विप्लव और उपद्रव का कारण बना करता है। वास्तव में हमारे वर्तमान नेतृत्व ने भाषा को केवल संपर्क का एक माध्यम मान लिया है, उन्हें नहीं पता कि भाषा संपर्क के एक माध्यम से बढक़र भी कुछ होती है, और उसके वैज्ञानिक, धार्मिक और राष्ट्रगत अर्थ भी होते हैं।
(लेखक की पुस्तक ‘वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?’ से)

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