खुद को ईमानदार बताने वाले मनीष सिसोदिया को डर और बौखलाहट किस बात की है?

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ललित गर्ग

वैसे तो चोरी बहुत घृणित अपराध है, लेकिन जब कोई अमीर या पैसे वाला छोटी चोरी करते देखा जाता है तो चर्चा ऐसे होती है कि मानो बिल्ली ने कुत्ते को काट लिया है। वैसे समाज में चोरी बहुत सामान्य बात है, जगह-जगह सरकार स्वयं लिखती है कि अपने सामान की रक्षा स्वयं करें।

किसी वकील, डॉक्टर या राजनेता को ढूंढ़ना कठिन नहीं, जो अपने विषय के विशेषज्ञ हों और ख्याति प्राप्त हों, पर ऐसे मनुष्य को खोज पाना कठिन है जो वकील, डॉक्टर या राजनेता से पहले मनुष्य हो, नैतिक हो, ईमानदार हो, विश्वस्त हो। पर राष्ट्र केवल व्यवस्था से ही नहीं जी सकता। उसका सिद्धांत पक्ष यानी नैतिकता भी सशक्त होनी चाहिए। किसी भी राष्ट्र की ऊंचाई वहां की इमारतों की ऊंचाई से नहीं मापी जाती बल्कि वहां के नागरिकों के चरित्र से मापी जाती है। उनके काम करने के तरीके से मापी जाती है। हमारी सबसे बड़ी असफलता है कि आजादी का अमृत महोत्सव मनाने के बाद भी राष्ट्रीय चरित्र नहीं बन पाया। सशक्त भारत-नया भारत को निर्मित करते हुए भी राष्ट्रीय चरित्र का दिन-प्रतिदिन नैतिक हृस हो रहा है। हर गलत-सही तरीके से हम सब कुछ पा लेना चाहते हैं। अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए कर्त्तव्य को गौण कर दिया है। इस तरह से जन्मे हर स्तर पर भ्रष्टाचार, बेईमानी एवं चरित्रहीनता ने राष्ट्रीय जीवन में एक विकृति पैदा कर दी है। इस विकृति के दो ताजा एवं ज्वलंत उदाहरण हैं आम आदमी पार्टी के उपमुख्यमंत्री-शिक्षामंत्री मनीष सिसोदिया की शराब घोटाले में गिरफ्तारी, जो भ्रष्टाचार के खिलाफ देश में चले अन्ना आन्दोलन की निष्पत्ति है। दूसरा उदाहरण है जी-20 शिखर सम्मेलन से पहले गुरुग्राम के सौंदर्यीकरण के लिए रखे गये गमलों की समृद्ध लोगों द्वारा शर्मनाक चोरी का मामला।

आज प्रबुद्ध मत है कि गांधीजी ने नैतिकता दी, पर व्यवस्था नहीं। जो नैतिकता दी वह एक महान् राष्ट्रीय मुक्ति के संघर्ष की नैतिकता थी, लेकिन नैतिक एवं चरित्रसम्पन्न राष्ट्र बनाने की नहीं। हालांकि गांधीजी ने उस नैतिकता को स्थायी जीवन मूल्य बनाया था। पर सत्ता प्राप्त होते ही वह नैतिकता खिसक गई। जो व्यवस्था आई उसने विपरीत मूल्य चला दिये। हमारी आजादी की लड़ाई सिर्फ आजादी के लिए थी- व्यवस्था के लिए नहीं थी, चरित्र एवं नैतिकता सम्पन्नता राष्ट्र बनाने के लिये नहीं। यह बात मनीष सिसोदिया के शराब घोटाले से स्पष्ट सामने आती है। भ्रष्टाचार मिटाने का दावा करने वाली आम आदमी पार्टी कितनी अधिक भ्रष्टाचार में डूबी है, मनीष सिसोदिया एवं सतेन्द्र जैन की गिरफ्तारी से साफ उजागर होता है। बिना आग के कहीं धुआं नहीं उठता। सिसोदिया की गिरफ्तारी के विरोध में आप के कार्यकर्ता एवं नेताओं द्वारा जिस तरह का आक्रामक रुख अपनाया हुआ है, वे जनजीवन को अस्त-व्यस्त करने पर तुले हैं, ईमानदार हैं तो यह विरोध क्यों? दूध का दूध, और पानी का पानी हो जाने दें। मोदी सरकार पर केन्द्रीय एजेंसियों का दुरुपयोग करने का आरोप लगाया जा रहा है, जबकि लंबी पूछताछ, जांच और साक्ष्य जुटाने के बाद ही कोई एजेंसी इस प्रकार का कड़ा निर्णय ले पाती है। खासकर मामला किसी कुर्सी पर विराजित बड़े नेता का हो, बड़ी राजनीतिक हस्ती का हो। यदि सिसोदिया बेगुनाह हैं, तो उनमें न डर होना चाहिए एवं न ही बौखलाहट। क्रांति करने एवं क्रांतिकारी भ्रष्ट मूल्यों पर शराब घोटाला करने में जमीन-आसमान का अंतर है, जो जनता भलीभांति समझती है।

आज हमारी व्यवस्था चाहे राजनीति की हो, सामाजिक हो, पारिवारिक हो, धार्मिक हो, औद्योगिक हो, शैक्षणिक हो, चरमरा गई है। दोषग्रस्त हो गई है। उसमें दुराग्रही इतना तेज चलने लगे हैं कि गांधी रूपी नैतिक मूल्य बहुत पीछे रह जाते हैं। जो सद्प्रयास किए जा रहे हैं, वे निष्फल हो रहे हैं। प्रगतिशील कदम उठाने वालों ने और समाज सुधारकों ने अगर व्यवस्था सुधारने में मुक्त मन से सहयोग नहीं दिया तो ….कहीं हम अपने स्वार्थी उन्माद में कोई ऐसा धागा नहीं खींच बैठें, जिससे पूरा कपड़ा ही उधड़ जाए। यह पूरा कपड़ा उघाड़ने का ही, सम्पूर्ण पीढ़ी को भ्रष्ट बनाने का जरिया। वरना तीन दिन से जेल के शिकंजों में जकड़े व्यक्ति के नाम पर दिन भर रेडियो पर सन्देश प्रसारित करते हुए परीक्षा दे रहे बच्चों को प्रेरणा देने की कुचेष्टा न होती। बात सिसोदिया या जैन तक ही सीमित नहीं है, यह भ्रष्टाचार एवं अनैतिकता का जहर नीचे तक पहुंच रहा है। मुख्य बात है राष्ट्रीय चरित्र केवल शिक्षा एवं प्रतीकों के माध्यम से नहीं बनाया जा सकता बल्कि समाज और राष्ट्र के नेतृत्व वर्ग की कथनी और करनी एक होनी चाहिये, नीति एवं नीयत एक होनी चाहिए, तभी राष्ट्रीय जीवन में आदर्शों के मूल्य स्थापित होंगे और आदर्श सदैव ऊपर से आता है। आज के युग में सभी क्षेत्रों में ऐसे व्यक्तियों की आवश्यकता है जो सत्य की रेखा से कभी दाएं या बाएं नहीं चलें। जो अपने कार्य की पूर्णता के लिए छलकपट, चोरी एवं बेईमानी का सहारा न लें।

वैसे तो चोरी बहुत घृणित अपराध है, लेकिन जब कोई अमीर या पैसे वाला छोटी चोरी करते देखा जाता है तो चर्चा ऐसे होती है कि मानो बिल्ली ने कुत्ते को काट लिया है। वैसे समाज में चोरी बहुत सामान्य बात है, जगह-जगह सरकार स्वयं लिखती है कि अपने सामान की रक्षा स्वयं करें। लोग तो अपने सामान की रक्षा के लिए हर पल सजग रहते हैं, लेकिन सरकार सार्वजनिक सामान के लिए कहां-कहां सतर्कता बरत सकती है? चोरों एवं बेईमानों के रहते नया भारत- सशक्त भारत कैसे बनेगा? गुरुग्राम में इतना बड़ा आयोजन हो रहा है, सबको पता है, दुनिया से एक से बढ़कर एक बड़े एवं शक्तिशाली राष्ट्रों के प्रतिनिधि आएंगे तो अतिरिक्त सजावट स्वाभाविक है लेकिन अगर कोई पैसे वाला व्यक्ति सजावटी गमलों को चुन-चुनकर उठा ले जाए तो इससे निंदनीय, विडम्बनापूर्ण एवं त्रासद और क्या हो सकता है? भला हो किसी ने इस कृत्य का वीडियो बना लिया जिसमें बहुत आराम से दो शख्स फूल वाले गमले चुनकर लाखों के वाहन में रखते दिख रहे हैं। चोरी करते हुए भी उन्हें लग ही नहीं रहा था कि वे कुछ गलत कर रहे हैं।

क्या ऐसी चोरी को नजरअंदाज कर दिया जाए? क्या इसका मतलब यह निकाला जाए कि जो जरूरतमंद है उसे भी चोरी करने का हक दिया जाए और जो सक्षम है, उसे भी सार्वजनिक वस्तुओं में से अपनी पसंद का चुन लेने दिया जाए? शायद ऐसी चोरियां बढ़ी ही इसीलिए हैं क्योंकि लंबे समय तक उन्हें नजरंदाज किया गया है। क्या छोटे-छोटे बड़े चोरों की ऐसी जमात देश में मजबूत हो गई, जो सरकारी सामान या धन को निजी मानकर चलती है? कुछ सरकारी सामान की चोरी करते हैं तो कुछ सरकार के नियमों को धत्ता बताते हुए नियमों की चोरी करते हैं। ऐसे चोरों के नाम पर मत जाइए, उनकी बुनियादी मानसिकता को समझने की कोशिश कीजिए। अमीर गमला चोर को पुलिस ने पकड़ लिया है और कानून अपना काम करेगा, पर यह मनोवैज्ञानिक रूप से भी अध्ययन का विषय है कि ऐसे लोग आखिर कैसे और क्या सोचते हैं? रोटी के लिए बहुत मजबूरी में चोरी करते गरीबों के प्रति कुछ सहानुभूति हो सकती है हालांकि कानून में ऐसी किसी सहानुभूति के लिए कोई गुंजाइश नहीं है। अगर हमारा संविधान गरीबों को भी कोई सामान उठा ले जाने की इजाजत नहीं देता है, तो भी अमीर सार्वजनिक सामान उठा ले जाते हैं, उन्हें तो कतई नहीं छोड़ा जाना चाहिए। अब देश विकसित और समृद्ध हो रहा है तो सार्वजनिक सामान की चोरी अक्षम्य अपराध माना जाना चाहिए।

अभी पिछले दिनों आगरा में भी जी-20 के आयोजन के लिए लगाए गए गमले भी चोरी हुए थे तो पुलिस का पहरा बिठाना पड़ा था। पूर्व में दिल्ली में शीला दीक्षित ने मुख्यमंत्री रहते बस स्टैण्ड पर स्टील के चमचमाते बैठने एवं सिर ढंकने की छतों को निर्मित किया था। लेकिन गरीब के साथ-साथ समृद्ध लोगों ने उन स्टैण्ड को भी उखाड़े डाले एवं स्टील बेच खायी। वास्तव में सरकारी या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की विकृति एवं चोरी की मानसिकता सरकारी कार्यालयों से लेकर स्कूलों तक पसरी है। बच्चों के दोपहर के भोजन की शिक्षकों के द्वारा चोरी की अनेक घटनाएं हैं, अब उनका शिक्षा मंत्री स्कूल-भवनों एवं शराब के घोटालों में लिप्त पाया जाये तो कौन-सा बड़ा आश्चर्य है। ऐसे शिक्षक एवं शि़क्षा मंत्री भला बच्चों को कैसी शिक्षा एवं प्रेरणा दे सकते हैं? गुरुग्राम में गमलों की सुरक्षा के लिए 100 सुरक्षा गार्ड लगा देना ही र्प्याप्त नहीं है।

नैतिकता का देश का एकमात्र अणुव्रत आन्दोलन संचालित करने वाले आचार्यश्री तुलसी कहते रहे हैं, ”आज के मनुष्य को पद, यश और स्वार्थ की भूख नहीं, व्याधि लग गई है, जो बहुत कुछ बटोर लेने के बाद भी शांत नहीं होती।“ यह स्थिति एक संयम एवं नैतिकताविहीन समाज की रचना करती है, जहां नीचे से ऊपर तक सभी कुछ अमर्यादित एवं अनैतिक होता है। पद, यश और स्वार्थ की लालसा की व्याधि से पीड़ित है राष्ट्रीय जीवन। अब समय आ गया है कि सोच को सुनियोजित ढंग से बदला जाए, नैतिकता एवं ईमानदारी को बल दिया जाये। निजी व सार्वजनिक संपत्ति, दोनों की चोरी को एक जैसा समझा जाए। सरकार यह न बताए कि अपने सामान की रक्षा स्वयं करें, सरकार यह कहे कि आइए, मिलकर नैतिक एवं ईमानदार समाज की संरचना करें।

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