हिन्दुओं का विश्वास जीतने में शाहजहां भी रहा असफल

‘मेरा भारत महान’ का रहस्य
‘मेरा भारत महान’ का नारा हम और आप अक्सर पढ़ते रहते हैं, और अपनी देशभक्ति के प्रदर्शन के लिए या कभी-कभी मंचों से तालियां बजवाने के लिए तो कभी अन्य लोगों का अनुकरण करने के दृष्टिकोण से भी हम भी इसे बोल देते हैं। पर ना तो बोलने से पूर्व और ना ही बोलने के पश्चात हम कभी इस नारे की गंभीरता पर विचार करते हैं। हम ऐसा इस इसलिए करते हैं, या कर जाते हैं कि हमें अपना इतिहास बोध नही है। हमने दूसरों के द्वारा अपना लिखा हुआ इतिहास सुना और पढ़ा है, और उसे ही ‘ब्रह्मवाक्य’ मानकर आगे बढ़ते जा रहे हैं। इस इतिहास को पढक़र तो ऐसा लगता है कि जैसे ‘मेरा भारत महान’ का अर्थ सबके लात घूंसे सहकर भी सबको गले लगाने की भारत की परंपरा के कारण ही भारत को महान कहा गया है। जबकि सच यह है कि भारत लात घूंसों का सदा प्रतिकार करता रहा और अपने पुरातन वैभव की रक्षार्थ अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ता रहा, और कदाचित इसीलिए भारत महान है। लात-घूंसे खाने वाला कभी महान नही होता, महान तो वही होता है जो लात-घूंसों का न केवल प्रतिकार करे अपितु अपनी अस्मिता और अपने सम्मान की रक्षा के लिए दूसरों को लात-घूंसों का मजा भी चखाये।
भारत की महानता पर विदेशी विद्वानों के मत
भारत की महानता को स्पष्ट करते हुए निमरे लिखते हैं :-”यह (भारतवर्ष) सदैव ही पाश्चात्य जगत की श्रेष्ठतम् भव्य एवं वैभवशाली कल्पनाओं में रहा है, सोने और हीरे मोतियों से जगमगाता रहा है तथा सुगंधित और मोहक गंधों से सुवासित रहा है। यद्यपि इन शानदार बातों में कुछ काल्पनिक और भ्रांतिजनक भी लगता है, परंतु फिर भी भारत का भूलोक में एक असंदिग्ध एवं महत्वपूर्ण स्थान है। इसके महान एवं विविध दृश्यों और इसकी भूमि की मूल्यवान उत्पत्तियों की विश्व में कोई भी तुलना नही है।”
14वीं शताब्दी में भारत के इतिहास ‘ताज्जियात उल अक्सर’ के लेखक अब्दुल्ला वासिफ ने लिखा था-”सभी लेखक इस बात पर एकमत है कि पृथ्वी पर रहने के लिए भारत एक मनोहर एवं संसार का आनंददायक स्थान है। इसकी धूलि वायु से भी शुद्घ और इसकी वायु पवित्रता से भी पवित्र है। इसके आनंददायक मैदान स्वर्ग के उद्यान के तुल्य है।”
कर्नल टॉड ने भारत के विषय में लिखा-”हम ऐसे संतों को कहां ढूंढ़ें जिनके दार्शनिक सिद्घांत ग्रीक दार्शनिकों के प्रतिरूप थे, जिनके गं्रथों को पढक़र प्लेटो, थेल्स तथा पाइथागोरस ने उनका शिष्यत्व ग्रहण किया। हम ऐसे ज्योति विज्ञानियों को कहां पाएंगे जिनका ग्रहों संबंधी ज्ञान आज भी यूरोपीय विद्वानों के लिए प्रेरणाप्रद है, तथा ऐसे वास्तुविद एवं मूत्र्तिकार जिनके कार्यों की आज भी प्रशंसा की जाती है। हमें कहां मिलेंगे ऐसे संगीतकार जो पुरातन सुरताल पर आधारित संगीत के माध्यम से मस्तिष्क को शोक से प्रसन्नता की ओर तथा आंसुओं से मुस्कान की ओर डोलायमान करने में पूर्णतया सक्षम थे।”
जब अपनी महानता की ज्योति में जगमगाते ऐसे दिव्य और महान भारत की खोज की जाएगी और लोगों का भारत की आत्मा से साक्षात्कार होगा तो हर व्यक्ति के विषय में यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि उसकी मान्यता भारत के विषय में ऐसी ही बनेगी जैसी कि कर्नल टॉड के उपरोक्त कथन से स्पष्ट होती है। ऐसे दिव्य और महान भारत की आत्मा की खोज करने वाले ज्ञान-पिपासु की भारत की आत्मा का साक्षात्कार होते ही बहुत सी धारणाएं निर्मूल सिद्घ होकर समाप्त हो जाएंगी, जिन्हें भारत के इतिहास में विदेशी शासकों के विषय में स्थापित कर दिया गया है।
शाहजहां संबंधी भ्रांत धारणा
ऐसी भ्रांत धारणाओं और मान्यताओं में से एक मान्यता यह है कि शाहजहां स्थापत्य कला का बड़ा प्रेमी था और उसने आगरा का ताजमहल तथा दिल्ली का लालकिला जैसी कई ऐतिहासिक कृतियों या भवनों का निर्माण कराया। इस लेखमाला में ऐसी कृतियों या भवनों के निर्माण पर प्रकाश डालना विषय विस्तार हो जाएगा, परंतु प्रसंगवश कुछ बातें स्पष्ट करनी आवश्यक हैं, क्योंकि इन कृतियों या भवनों के निर्माण का श्रेय विदेशी शासकों को दिये जाने से भारत का वैभव पूर्ण हिन्दू इतिहास अपयश का पात्र बना है, या बना दिया गया।
विदेशी विद्वान कहते हैं…..
दिसंबर 1861 ई. में दा कलकत्ता रिव्यू ने लिखा था-”आज अपमानित तथा अप्रतिष्ठित (पाठक ध्यान दें यह उस समय लिखा जा रहा है जब 1857 की क्रांति की स्याही सूख भी नही पायी थी और उस समय अंग्रेजों ने हमारे देशवासियों को भयानक यातनाएं देकर अपमानित किया था) किये जाने पर भी हमें इसमें कोई संदेह नही है कि एक समय था जब हिंदू जाति कला एवं शास्त्रों के क्षेत्र में निष्णात राज्यव्यवस्था में कल्याणकारी, विधि निर्माण में नितांत कुशल एवं उत्कृष्ट ज्ञान से भरपूर थी।”
अत: अब चिंतन का विषय है कि जब भारत की वंदना में विदेशी लोग इस प्रकार के गान उच्चार कर रहे हों कि जिनकी मनोहारी संगीत स्वरलहरियों से भारत का प्रत्येक व्यक्ति झूमने लगे तो उस समय यह कैसे माना जा सकता है कि शाहजहां के काल में यहां अचानक ताजमहल और लालकिलों का निर्माण होने लगा? क्या शाहजहां से पूर्व या विदेशी मुस्लिम आक्रांताओं के भारत आने से पूर्व भारत के पास अपना कुछ नही था? हमें शाहजहां जैसे बादशाहों को भवन निर्माण और कलाप्रेमी मानने या सिद्घ करने से पूर्व इस प्रश्न पर भी विचार करना चाहिए। हमारे पास स्थापत्य कला थी और हमारी कला अपने अप्रतिम रूप में हमारे पास विद्यमान थी। इस बात को भी सबने स्वीकार किया है कि मुस्लिम शासकों के अपने देशों में ना कोई ताजमहल है और ना कोई लालकिला है तो उन्हें भारत में आकर ही इन्हें बनाने की कैसे आवश्यकता पड़ गयी और कहां से उन्हें इन्हें बनाने का ज्ञान मिल गया?
हम कहना चाहते हैं कि भारत की प्राचीन इमारतों भव्य भवनों और ऐतिहासिक स्तर के निर्माणों को अवैध रूप से अपने नियंत्रण में लेकर भारत के वैभव की हत्या कर इन ‘ताजमहलों’ तथा ‘लालकिलों’ को इन ‘शाहजाहों’ द्वारा बलात् और अनैतिक रूप से अपने द्वारा निर्मित बताया गया है।
तनिक देखें ‘द एडिनवर्ग रिव्यू’ (अक्टूबर 1872) आपके विषय में क्या कहता है :-”हिंदू एक बहुत प्राचीन राष्ट्र है, जिसके मूल्यवान अवशेष आज भी उपलब्ध हैं। अन्य कोई भी राष्ट्र आज भी सुरूचि और सभ्यता में इससे बढक़र नही है, यद्यपि यह सुरूचि की पराकाष्ठा पर उस काल में पहुंच चुका था जब वर्तमान सभ्य कहलाने वाले राष्ट्रों में सभ्यता का उदय भी नही हुआ था। जितना अधिक हमारी विस्तृत साहित्यिक खोजें इस ओर प्रविष्ट होती हैं उतने ही अधिक विस्मयकारी एवं विस्तृत आयाम हमारे समक्ष उपस्थित होते हैं।”
पी.एन. ओक महोदय की मान्यता
पी.एन. ओक महोदय ने ताजमहल के एक हिंदू भवन होने और लालकिला के भी हिंदू स्थापत्य कला का एक बेजोड़ नमूना होने संबंधी तथ्यों को लेकर पूरे ग्रंथ ही लिख डाले हैं। वास्तव में ताजमहल राजा जयसिंह की पैतृक संपत्ति थी जो उनसे शाहजहां द्वारा बलात् रूप से हड़पी गयी थी और जिसका दुख राजा जयसिंह को आजीवन सताता रहा था।
कुछ विद्वानों की दृष्टि में ताजमहल राजा परमार्दिदेव के द्वारा तेजोमहालय मंदिर के रूप में स्थापित किया गया था।
राजा जयसिंह से इसे हड़पने का तथ्य शाहजहां के बादशाह नामा के प्रथम भाग के पृष्ठ 403 पर उल्लेखित है कि ताजमहल राजा मानसिंह द्वारा निर्मित था (मानसिंह का पौत्र राजा जयसिंह था) जिसे मुमताज के दफनाये जाने के लिए जयसिंह से (बलात्) ले लिया गया था।
पी.एन. ओक महोदय अपनी पुस्तक ‘भारत में मुस्लिम सुल्तान’ के भाग 2 के पृष्ठ 143 पर लिखते हैं-”शाहजहां के तथाकथित निर्माण संबंधी ब्यौरों की असत्यता से भी प्रमाणित हो जाता है कि ताजमहल हड़पा हुआ हिंदू भवन है। इसके व्यय के आंकलन भी भिन्न-भिन्न है, 40 लाख रूपयों से लेकर 9 करोड़ 17 लाख तक। निर्माण काल भी 10 से 22 वर्ष तक बताया जाता है। इसके रचनाकार का नाम भी विभिन्न नामों से वर्णित है-कहीं रहस्यपूर्ण ऐसा रेफेण्डी तो कहीं मायावी अहमद मेलेण्डीस कहीं फ्रांसीसी आस्तिनदा बार्दों तो कहीं इतालवी जेरीनियो वेरोनियो तो कहीं स्वयं शाहजहां। यह भी कहा जाता है कि इसका डिजाइन उनमें से छांटा गया है जो विश्व निविदा के रूप में संसार भर से आये थे अथवा शाहजहां के अपने दरबार में ही बने थे। इतना ही नही विभिन्न आलेखों में मुमताज की मृत्यु में भी अंतर पाया जाता है। यह नही पता कि उसकी मृत्यु 1630 ई. में हुई या 1631 ई. में और फिर भी यह कहना कि निराश शाहजहां ने मानसिक संतुलन प्राप्त कर उसके आलेखन के लिए विश्व से निविदायें मांगी, उसका चयन किया, हजारों चित्र बनाये, इसका काष्ट का नमूना बनाया, धन की स्वीकृति दी, ईंट संगमरमर तथा अन्य मूल्यवान पत्थरों के लिए आदेश दिया, निर्माण तक प्रारंभ कर दिया, और यह सब 1631 तक शाहजहां का इतना सरदर्द मोल लेना सहस्र रजनी चरित्र की झूठों से भी बड़ा झूठ है।”
लेखक का अपना अनुभव
लेखक एक बार ताजमहल का दर्शन कर रहा था तो एक अंग्रेज से ताजमहल के भीतर ही बातचीत का क्रम आरंभ हो गया। वह अंग्रेज अच्छी हिंदी जानता था, और वह भारत के इतिहास में भी अच्छी रूचि रखता था। उसने बातचीत में लेखक से जो कुछ कहा था, वह आंख खोलने वाला था। उसने कहा कि भारत को लूटा गया-यह बुरी बात नही है, बुरी बात यह है कि इसने अपने आपको लुटा हुआ मान लिया। इसलिए इसने अपने अतीत की गौरवपूर्ण विरासत पर भी अपना अधिकार छोड़ दिया।
वह अंग्रेज निरंतर अपनी बात कहे जा रहा था। इसी क्रम में उसने आगे कहा-मुझे दुख है कि मेरी जाति (अंग्रेज) ने भी इस देश को लूटा और यहां की विरासत की एक सुंदर श्रंखला पर उसने भी अपना अधिकार स्थापित करने में सफलता प्राप्त की। पर अब तो भारत स्वतंत्र है। अब तो उसे अपनी विरासत और अपने इतिहास का संरक्षण करने की ओर उचित कदम उठाने चाहिए। लेखक एक अंग्रेज की इस प्रकार की बातों को सुनकर दंग रह गया।
मैं आश्चर्य चकित भी था और दुखी भी। आश्चर्य इस बात पर कि एक विदेशी हमारे इतिहास के विषय में इतना जानता था कि जितने हम भी नही जानते और दुखी इस बात पर कि हमारे भीतर चेतना अंतत: कब जागृत होगी? ऐसे कितने ही अवसर रहे हैं, जब विदेशियों ने हमें हमारे विषय में बताकर निरूत्तर किया है। हम उसका मुंह ताकते रह गये या बगले झांकते रह गये?
मि. थोरेण्टोन का कथन है कि-‘प्राचीन भारतीयों ने ऐसे भवन बनाये थे, जिनकी मजबूती हजारों वर्ष की उथल पुथल के बाद भी जैसी की तैसी है।’
श्रीमती मैनिंग ने कहा-”भारत की प्राचीन वास्तुकला इतनी आश्चर्य चकित करने वाली है कि जिस किसी यूरोपीय ने उसे देखा होगा उसके पास उनकी विचित्रता एवं प्रशंसा को प्रकट करने के लिए शब्द भी न मिले होंगे, और यद्यपि जितना किसी वस्तु से हमारा अधिक परिचय हो जाता है उतना ही इस प्रकार के भाव कम हो जाते हैं परंतु यहां ऐसी बात नही है। आज भी गंभीरतम आलोचक जब इन्हें देखता है तो कह उठता है-अहा आश्चर्यजनक! अति सुंदर।”
हमारे ज्ञान-विज्ञान का मूलाधार वेद है
भारत के विषय में यह स्पष्ट है कि आदिकाल से यहां ज्ञान विज्ञान के क्षेत्र में उत्कृष्ट अनुसंधान और आविष्कारों ने जन्म लिया। इसका एकमेव कारण है मनुष्य के ज्ञान-विज्ञान का आदिस्रोत वेद का केवल भारत में उपलब्ध होना। निस्संदेह आर्यों का आदि देश आर्यावत्र्त (भारतवर्ष) ही रहा है। इसलिए हर क्षेत्र में ज्ञान विज्ञान के आश्चर्यकारी परिणाम देखने को मिलने स्वाभाविक ही थे। वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक बताकर इसी ओर संकेत कर महर्षि दयानंद ने हमें मानो ज्ञान विज्ञान के विशाल भवन की कुंजी ही थमा दी। हमें उस ओर ध्यान देना चाहिए था और समझना चाहिए था कि महर्षि के कथन का मंतव्य क्या था? जब हमारे पास अपने घर $गृहस्थ और सभ्यता को विकसित करने के लिए एक पूरी व्यवस्था दीर्घकाल तक उपलब्ध रही और मानव की सभ्यता को विकसित करने में वेद का तत्संबंधी ज्ञान उसका पूर्ण मार्गदर्शन करता रहा तो उसके उपरांत भी किसी अन्य की ओर देखने के लिए विवश होना या अपनी विरासत पर दूसरों का अधिकार स्वीकार करना कहां की समझदारी है?
दिल्ली के लालकिले का लेखक का अनुभव
लेखक एक बार दिल्ली के लालकिले में अपने कुछ साथियों के साथ भ्रमण कर रहा था तो अचानक उसकी दृष्टि ‘दीवाने आम’ नामक भवन की मुंडेर पर गयी। जहां से उसकी कली (सफेदी) की परत उतर गयी थी जैसा कि सामान्यतया पुराने भवनों के साथ अक्सर होता है। लेखक के आश्चर्य का उस समय कोई ठिकाना नही रहा जब कली की उस परत के नीचे दिखने वाली परत पर हिंदू शैली के अंकित चित्र दिखाई दिये। लेखक ने वह चित्रकारी अपने अन्य साथियों को भी दिखाई। पर जब अगली बार लेखक वहां गया तो उस समय तक मरम्मत करके वह टूटन-फूटन भर दी गयी थी।
दिल्ली की प्राचीनता को भी ध्यान में रखना होगा
जिस दिल्ली के इंद्रप्रस्थ होने की पूरी-पूरी सूचना हमारे पास उपलब्ध है और जिस इंद्रप्रस्थ के गौरव का गुणगान करने के लिए पुराना किला हमारे मध्य उपस्थित है, उस हजारों वर्ष पुरानी दिल्ली ने कालचक्र के कितने ही सूर्यों को उगते और ढलते हुए देखा है। शाहजहां से हजारों नही लाखों वर्ष पूर्व से इस भारतवर्ष में किलों के बनाने का विज्ञान उपलब्ध रहा है। इसलिए दिल्ली में हजारों वर्ष पुरानी हिंदू कृतियां आज भी उपलब्ध हैं। उन्हीं में से एक दिल्ली का लालकिला भी है। जिसके प्रमाण पृथ्वीराज चौहान के काल में भी मिलते हैं और उसके पूर्व के इतिहास में भी उपलब्ध हैं। इसलिए दिल्ली को शाहजहां द्वारा निर्मित मानना या बतलाना नितांत भ्रामक है। अशोक स्तंभ के विषय में मि. विन्सेंट ए. स्मिथ ने अपनी पुस्तक ‘भारत एवं श्रीलंका की उत्तम कला का इतिहास’ में पृष्ठ 22 पर लिखा है :-
”इतने विशाल आकार के अखण्ड स्तंभ का ढाल सजाना, खड़ा करना इस बात का प्रमाण है कि अशोक के काल में इंजीनियर एवं पत्थर काटने वाले प्रवीण एवं साधनों की दृष्टि से किसी भी काल में और देश के अपने प्रतिपक्षियों से किसी भी दशा में कम नही थे।”
सारनाथ के प्रमुख स्तंभ के विषय में स्मिथ पृष्ठ 60 पर लिखते हैं :-”किसी भी देश में प्राचीन पशु की मूत्र्ति के रूप में बनायी गयी इस सुंंदर कलात्मक कला से श्रेष्ठ या उसके समक्ष मिलना अत्यंत कठिन है, इसमें आदर्श भव्यता एवं वास्तविकता को सफलतापूर्वक समन्वित तथा प्रत्येक विवरण को बहुत ही पूर्णता के साथ प्रदर्शित किया गया है।”
अब प्रश्न है कि मुगलों के मूल देश में तो कोई सारनाथ है नही और ना ही कोई उनके भारत आगमन से पूर्व का लालकिला वहां है तो इन लोगों को भारत में आते ही कैसे स्थापत्य कला में नये-नये कीत्र्तिमान स्थापित करने की सुधि आ गयी और वह भी तब जबकि भारत के हिंदू समाज ने मुगलों सहित प्रत्येक विदेशी शासन के विरूद्घ लगभग हर दिन अपना स्वातंत्रय समर जारी रखा हो।
शाहजहां एक अपव्ययी शासक था
वैसे शाहजहां एक अपव्ययी शासक था जिसने भारत की धन संपदा को इधर-उधर अनावश्यक अपने स्वयं के विलासितापूर्ण जीवन पर व्यय किया। डा. आर.सी. मजूमदार ने उसकी तुलना फ्रांस के अपव्ययी शासक लुई 16वें से की है। वह कहते हैं-”जनता की धनराशि दरबार की शान शौकत को बढ़ाने के लिए खर्च की जा रही थी, इससे आर्थिक स्थिति डांवाडोल हो गयी थी और इस प्रकार राष्ट्र का दिवाला निकलना प्रारंभ हो गया था।”
उसकी अपव्ययी होने की प्रवृत्ति पर पं. जवाहरलाल नेहरू ने लिखा है कि-‘उसका दिल्ली का दरबार मयूर सिंहासन सहित वार्साय से अधिक शानदार तथा ऐश्वर्यपूर्ण था परंतु वार्साय की भांति यह भी जनता की निर्धनता तथा जनशोषण पर टिका था।’
‘भारत का इतिहास’ में डा. श्रीवास्तव लिखते हैं :- ”उसकी धनलोलुपता ने उसे जनता पर कर भार बढ़ाने के लिए बाध्य किया, जिससे जनता में कष्ट की विशेष वृद्घि हुई। उसकी भेंट तथा उपहार स्वीकार करने की प्रथा ने एक प्रकार से रिश्वत को प्रोत्साहन दिया…इससे राज्य प्रबंध में भ्रष्टाचार फैल गया, उसकी विलासप्रियता ने जनता का नैतिक स्तर नीचा करने के लिए एक बहुत ही बुरा उदाहरण प्रस्तुत किया।”
शाहजहां के विषय में इतिहासकारों ने बड़े अच्छे प्रमाण दिये हैं-जिससे उसके विषय में सच का पता चलता है। कहा गया है कि उसने अपने जीवन में कुल 48 युद्घ लड़े पर उन युद्घों में सफलता उसे न के बराबर मिली। स्पष्ट है कि उसे अधिकांशत: विद्रोहों और भारत के स्वतंत्रता प्रेमी लोगों के संघर्ष का सामना करना पड़ा और उनमें उलझ-उलझकर ही वह अपनी ऊर्जा को नष्ट करता रहा, या कहिये कि उसकी ऊर्जा को हिंदू स्वतंत्रता प्रेमी योद्घा नष्ट करते रहे। उसने एक विशाल साम्राज्य खड़ा करने का संकल्प अवश्य लिया पर कई स्थानों पर वह केवल मुंह की खाने के अतिरिक्त और कुछ प्राप्त नही कर पाया था।
इतिहासकारों का यह भी कहना है कि उसे एक इंच भी अपना साम्राज्य बढ़ाने में सफलता प्राप्त नही हो पायी थी। 1648 ई. में उसे कंधार छोडऩा पड़ गया था, यह अभियान पूर्णत: असफल रहा था। कहा जाता है कि अपने कंधार अभियान में उसे चार करोड़ रूपया व्यय करना पड़ा था, जबकि विजित क्षेत्रों से उसे ढाई लाख की वसूली से ही संतोष करना पड़ गया था। मध्य एशिया की ओर वह बढऩा चाहता था, जिसके लिए उसने अपने सैनिक अभियान चलाये परंतु 12 करोड़ की संपदा व्यय करके कुछ भी प्राप्त न कर सका। मुगलों की सैनिक प्रतिष्ठा गिर गयी और अपने हजारों सैनिकों से उसे हाथ धोना पड़ गया।
हमें ध्यान रखना चाहिए कि यदि शाहजहां अपनी हिंदू प्रजा के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार करता और उसके विश्वास को जीत लेता तो उसको सर्वत्र सफलता ही सफलताएं मिलतीं। इस प्रकार उसकी असफलताओं में हिंदू शक्ति की अनास्था का होना एक महत्वपूर्ण कारण था। हिंदू समाज का विश्वास जीतने और उन्हें अपना बनाने में शाहजहां पूर्णत: असफल रहा, जिसके कारण अपनी बादशाहत के पूरे काल में उसके दिन का चैन और रातों की नींद गायब रही।

Comment:

Latest Posts

hititbet giriş
hititbet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
hititbet giriş
hititbet güncel giriş
hititbet giriş
vdcasino giriş
vdcasino güncel giriş
vdcasino giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
hitit medya
Hititbet Giriş
Hititbet Giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
tuzla cilt bakım merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet
hititbet güncel adres
hititbet 2026
hititbet giriş
hititbet giriş
Tuzla Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
solobet giriş
hititbet giriş
kralbet
betnano
betnano
betnano
kralbet
kralbet
kralbet
setrabet
setrabet
kralbet
hititbet
hititbet
Tuzla Cilt Bakım
İstanbul Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet Giriş
Hititbet Giriş
Tuzla Cilt Bakım
Tuzla İpek Kirpik
Tuzla Lenf Drenaj
Kolaybet Giriş
Betgaranti Giriş
kralbet
kralbet
betnano
betnano
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
Hititbet Giriş
xslot giriş
kralbet
betnano
kralbet
Hititbet App
hititbet giriş
hititbet
bettilt giriş
meritking giriş
matbet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
kralbet
kralbet
betnano
betnano
kralbet
kralbet
imajbet giriş
xslot giriş
xslot giriş
betvole giriş
betvole giriş
betvole giriş
betvole giriş
gobahis giriş
betpark giriş
betpark giriş
sahabet giriş
onwin giriş
sahabet giriş
grandpashabet
grandpashabet
betgaranti giriş
betpark giriş