होली का पर्व एक प्राचीन वैज्ञानिक पर्व* *भाग- २*

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डॉ डी के गर्ग

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होली सृष्टि के प्रारम्भ होने के साथ ही शुरू हो चुका था क्योंकि इसका मूल कारण कोई व्यक्ति विशेष या घटना विशेष नहीं है, इसका मूल कारण है नई फसल का आगमन और उस फसल के स्वागत के लिए किसान उत्सव मनाता है।
प्रश्न : क्या होली पर गोबर की बुरकली जलने से ,सामूहिक यज्ञ से ,चना और जौ की बलिया अग्नि में भुनने से पर्यावरण प्रदूषित होता है?

प्रदूषण गलत वस्तुओं के जलने से होता है।इसलिए ये भ्रांति निकाल दे।

आयुर्वेद के अनुसार दो ऋतुओं के संक्रमण-काल में मानव शरीर रोग और बीमारियों से ग्रसित हो जाता है। आयुर्वेद के अनुसार शिशिर ऋतु के प्रभाव से शरीर में कफ की अधिकता हो जाती है और बसंत ऋतु में तापमान बढने पर कफ के शरीर से बाहर निकलने की क्रिया में कफ दोष पैदा होता है, जिसके कारण सर्दी खांसी, सांस की बीमारियों के साथ ही गंभीर रोग जैसे खसरा, चेचक आदि होते हैं। इनका बच्चों पर प्रकोप अधिक दिखाई देता है। इसके अलावा बसंत के मौसम का मध्यम तापमान तन के साथ मन को भी प्रभावित करता है। यह मन में आलस्य भी पैदा करता है। इसलिए स्वास्थ्य की दृष्टि से होलिकोत्सव को विधानों में आग जलाना, अग्नि परिक्रमा, नाचना-गाना, खेलना आदि शामिल किये गए। शरीर की ऊर्जा और स्फूर्ति कायम रहती है।
होलिका दहन करने की परंपरा कारण गाँव-गाँव को संक्रमित रोगों से बचाने का था।
भारतवर्ष में होलिकादहन इन्हीं कारणों से होता था ताकि होलिका दहन से निकली वायु पूरे गांव को लाभान्वित कर सके। होलिका दहन से पूरे गाँव का वातावरण सुगन्धिम पुष्टि वर्धनम हो सके।

होलिका दहन– होलिका दहन यज्ञ का ही दूसरा रूप है। इसकी सामग्री वैज्ञानिक रूप से तैयार की जानी चाहिए।
सर्दी की समाप्ति के साथ ही वातावरण में कीट का प्रकोप प्रारंभ हो जाता है।इसके परिणामस्वरूप नई बीमारियां अपना रूप दिखाने लगती हैं। इसलिए यज्ञ सामग्री ऐसी हो जिसके द्वारा कीटाणुओं का नाश हो।
हवन सामग्री में गाय के सूखे गोबर, गाय का घी, कपूर कचरी, नीम के पत्ते, नागरमोथा सुगंध-कोकिला, सोमलता, जायफल, जावित्री, जटामांसी अगर तगर चिरायता, हल्दी, गिलोय, गूगल, जौं, तिल आदि जड़ी-बूटियों का प्रचुर मात्रा में प्रयोग किया जाए।विभिन्न प्रकार के औषधीय जड़ी-बूटियाँ आदि सामग्री डालने से इनके अंदर के रसायन भी सूक्ष्म रूप में निकलते हैं जो पूरे गांव को वायु के कण के रूप में पोषण व सुगन्ध प्रदान करते है। होली के यज्ञ में जावित्री की आहुति वायरस का काल है। जावित्री केवल सुगंधीकारक ही नहीं रोग नाशक भी है। जब जावित्री को यज्ञ सामग्री में मिलाकर व खेतों में उगे हुए गेहूं, जौं की बालियों को मिलाकर यज्ञ किया जाए तो यह खतरनाक वायरस मानव शरीर तो क्या गाँव की सीमाओं में भी नहीं घुस सकते।
जावित्री कोई बहुत महंगा मसाला नहीं है 170 रूपए में 100 ग्राम मिलती है अर्थात् 1700 रूपए किलो है 1 किलो जावित्री से एक गांव को वायरस से मुक्त किया जा सकता है यदि विधिवत यज्ञ किया जाए । साथ ही ऋतु अनुकूल सामग्री इस्तेमाल में लाई जाए।
शायद गांव के बाहर मुहाने में यह होलिका दहन करने की परंपरा इन्हीं कारणों से थी ताकि इन से निकली हुई वायु पूरे गांव को लाभान्वित कर सके एवं पूरे गाँव का वातावरण सुगन्धिम पुष्टि वर्धनम हो सके, इस यज्ञ में लकड़ी का प्रयोग न करें तो अच्छा होगा।
होली के अगले दिन यज्ञ की राख को शरीर पर मलने की परम्परा : वर्ष में एक बार इस भस्म को हमारे शरीर में अच्छे से लगा लेने से शरीर के अंदर की नकारात्मक उर्जा भी समाप्त होती है। गौ के गोबर के उपलों की राख को शरीर पर मलने से शरीर शुद्ध होता है। इसमें छिपा बैक्टीरिया नष्ट होता है। चर्म-रोग ठीक होते हैं और शरीर को सर्दी ऋतु से गर्मी ऋतु में प्रवेश करना आसान हो जाता है।
शरीर पर रख मलने के उपरांत ढ़ाक के फूलों से तैयार किया गया रंगीन पानी शुद्ध रूप में अबीर और गुलाल डालने से शरीर पर इसका सुकून देने वाला प्रभाव पड़ता है और यह शरीर को ताजगी प्रदान करता है। जीव वैज्ञानिकों का मानना है कि गुलाल या अबीर शरीर की त्वचा को उत्तेजित करते हैं और पोरों में समा जाते हैं और शरीर के आयन मंडल को मजबूती प्रदान करने के साथ ही स्वास्थ्य को बेहतर करते हैं और उसकी सुदंरता में निखार लाते हैं।
होली के मौके पर अपने घरों की भी साफ-सफाई करते हैं जिससे धूल गंद मच्छरों और अन्य कीटाणुओं का सफाया हो जाता है। एक साफ-सुथरा घर आमतौर पर उसमें रहने वालों को सुखद अहसास देने के साथ ही सकारात्मक ऊर्जा भी प्रवाहित करता है।
प्रश्न एवं उत्तर
प्रश्न-१ होली पर उत्तर भारत में जौ की बालियाँ अग्नि में क्यों भूनते हैं ?
उत्तरः इसका वैज्ञानिक महत्व है। होली पर्व से पूर्व कभी-कभी वर्षा का डर बना रहता है। आपने देखा होगा कि इसके बाद गेहूं की फसल पक रही होती है और यदि वर्षा हो जाये तो गेहूं की फसल को भारी नुकसान होगा। यदि जौ की बालियां अग्नि में भूनी जाये तो वर्षा हट जाती है।कृषक इस कार्य के लिए खेत से जौ की बालि तोड़ कर अपने मित्रों को आवश्यकता के अनुसार दे देते हैं। जिनको होली दहन में भून कर लाते हैं,
इसलिए इस दिन अग्नि में जौं की बालियाँ भूनने का प्रभाव फसल की रक्षा से जुड़ा हुआ है ।
प्रश्न-2. होलिका दहन में अग्नि में लकड़ी का प्रयोग वर्जित क्यों है ?
उत्तरः- आजकल यह दहन लकड़ियों को जलाकर किया जाता है जो कि परंपराओं का विकृत स्वरूप है।
होलिका में लकड़ी न लगाने के पीछे बहुत से वैज्ञानिक कारण है जैसे कि-
1. उस दिन बहुत मात्रा में लकड़ी की आवश्यकता होगी जिसके लिए आम आदि के पेड़ काटने पड़ेंगे जिन पर इस समय बौर आया होता है। इस से फसल के नुकसान के साथ प्राकृतिक संसांधन को अनुचित दोहन होगा।
2. यदि होलिका में लकड़ी का प्रयोग किया जायेगा तो लकड़ी का कोयला शरीर पर नहीं मल सकते, इस से उल्टा घाव इत्यादि का डर बना रहेगा, इसके विपरीत उपले की राख मुलायम और शीघ्र शरीर पर लिपट जाती है।
होलिका यज्ञ में गौ के उपलों के प्रयोग का कारण :आज भी हमारे गावों में सभी परिवारों का हर व्यक्ति छोटी-छोटी गोबर के कंडों की माला बनाकर शाम तक होलिका दहन वाले स्थान पर जाकर डालते है ,ये सामूहिक योगदान है जिसके द्वारा वहा गोबर के कंडां का विशाल पहाड़ बन जाता है। होलिका दहन हमेशा से गाय के गोबर के कंडों पर किया जाता है। इसके साथ घी (घृत) की आहुति दी जाती थी। इसके उपरांत जो की बालियां भूनते थे और आपस में बांटकर सबसे गले मिलते थे एक दूसरे के घर जाकर गले मिलना और आशीर्वाद लेने की अच्छी परम्परा विरासत में मिली।
यह कार्य ग्राम के बाहर सामूहिक होती थी जिससे पूरा गांव शुद्ध और पवित्र हो जाता था। शाम को इसके चारों तरफ वेद मंत्रों से यज्ञ द्वारा अग्नि प्रज्वलित करके और यज्ञ किया जाता था लेकिन अब इसका यज्ञ होता ही नहीं है इसको पंडो ने अपने अनुसार बदल दिया है ।
1. गाय के गोबर में इन्डॉल, फिनॉल और फॉर्मेलिन होता है।
प्रकृति के नियम के अनुसार जो भी तत्व जलता है जलने पर वह सूक्ष्म होकर ऊपर आता है जैसे कार्बन जलेगा तो कार्बन सूक्ष्म होकर हवा में आकर ऑक्सीजन के साथ संघनन करके कार्बन डाइऑक्साइड बनाएगा फास्फोरस जलेगा तो फास्फोरस ऑक्साइड हवा में बनाएगा। भूमि का कोई भी तत्व हवा में आकर ऑक्सीजन के साथ तुरंत युग्म बनाता है और वह तत्व ऑक्साइड के रूप में आ जाता है हमारा खून किसी भी तत्व को ऑक्साइड के रूप में ही ग्रहण करता है आधुनिक वैज्ञानिक इस तरह के तत्व को मनुष्य के लिए अवेलेबल फॉर्म में अर्थात ग्रहण करने लायक कहते हैं अब कंडे में जो इंडोल, फिनॉल और फॉर्मलीन होता है वह जलकर इण्डोल-ऑक्साइड, फॉर्मलीन-ऑक्साइड बनाता है जो पर्यावरण को शुद्ध करता है।
2. कुछ विद्वान कहते हैं कि गाय के गोबर का कार्बन जलेगा तो कार्बन डाइऑक्साइड ही निकलेगा।
लेकिन गाय के गोबर से बने कंडे पर प्रकृति का यह नियम लागू नही होता। निसंदेह गाय का गोबर कार्बन से बना है और पूरा का पूरा कार्बन ही है इसकी जांच करेंगे इसमें कार्बन ही कार्बन निकलेगा पर जब कंडा जलता है तो कोई भी कार्बन डाइऑक्साइड नहीं निकलता इसका प्रमाण मैं इस तरह से देता हूं कि गाय के गोबर का कंडा छोड़कर जब भी कोई गोबर या लकड़ी का कार्बन जलाता है तो हमारी आँख से आँसू आते है और सांस लेने में परेशानी होती है आंखों में जलन भी होती है पर गाय के गोबर के कंडे के जलने पर उक्त किसी भी तरह की कोई भी समस्या नहीं होती इससे यह साबित होता है कि गाय के गोबर का कार्बन जलने पर कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित नहीं होता है।
3. अब इन गाय के गोबर के कंडों के ढेर पर घी डालने का तात्पर्य समझे जैसे ही कंडों के लाल अलाव पर आप घी डालेंगे तो घी में पाए जाने वाले 11 सेचुरेटेड एसिड्स गैस के रूप में हवा में आते हैं उनके आने से बहुत तरह की गैसें निकलती हैं पर इनमें से 5 गैस वैज्ञानिकों द्वारा देखी गई हैं ।
• पहला-एथिलीन ऑक्साइड जो हमारे शरीर के तापमान को संतुलित करती है ठंड और बरसात के समय में हमारा शरीर कफ प्रकृति का हो जाता है इस प्रकृति को यह गैस समाप्त करके हमारे शरीर को पुनः कफज प्रकृति से निकाल कर और गर्मी के तेज से बचाने के लिए सक्षम करती है।
• दूसरी गैस प्राॅपलीन ऑक्साइड है यह गैस वायु को शुद्ध और सजीव करती है और वायु में सूर्य के तेज का प्रभाव कम हो ऐसा वायु को बनाती है।
• तीसरी गैस बीटा प्रापियो-ऑक्साइड है जो हमारे शरीर में सभी तरह के विटामिंस और एसिडस के निर्माण में सहायक बनती है।
• चैथी गैस फॉर्मेलिन ऑक्साइड है जो भूमि, वायु और जल में पाए जाने वाले हानिकारक वायरस फंगस और बैक्टीरिया ग्रोथ को रोकती है और इन तीन तत्वों को शुद्ध व सजीव करती है।
• पांचवीं गैस ऑक्सीजन निकलती है जो सबको जीवन देती है।
• इसीलिए होलिका दहन हमें केवल और केवल गाय के गोबर के कंडांे से होलिका जलाना चाहिए।
4. ज्वार, बाजरा, तिल एवं विभिन्न प्रकार के औषधीय जड़ी-बूटियाँ आदि सामग्री डालने से इनके अंदर के रसायन भी सूक्ष्म रूप में निकलते हैं जो पूरे गांव को वायु के कण के रूप में न्यूट्रीशन व सुगन्ध प्रदान करते हैं शायद गांव की बाहर मुहाने में यह होलिका दहन करने की परंपरा इन्हीं कारणों से थी ताकि इन से निकली हुई गैस पूरे गांव को लाभान्वित कर सके। पूरे गाँव का वातावरण ’सुगन्धिम पुष्टि वर्धनम’ हो सके।

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