धुंध के लिए सिर्फ किसान जिम्मेवार नहीं

पूरे उत्तर भारत को घनी धुंध ने घेर रखा है और इसने लोगों का जीना दूभर कर दिया है। इसकी चपेट में पड़ोसी पाकिस्तान भी है। गांव के मुकाबले शहरों में रहने वालों की मुश्किलें ज्यादा बढ़ी हैं। सडक़ों पर निकलना मुश्किल है। रेलगाडिय़ां घंटों विलंब से चल रही हैं। दूसरी तरफ दिल्ली से उत्तर भारत के कई राज्यों की तरफ जाने वाली सडक़ों पर कई बड़ी दुर्घटनाएं हो चुकी हैं और उनमें कई लोगों की जान जा चुकी है। लेकिन सरकार की हालत यह है कि सिर्फ बयानबाजी हो रही है, जरूरी कदम नहीं उठाए जा रहे। यह बयानबाजी हर साल होती है, क्योंकि धुंध ने पिछले कई सालों से लोगों का जीना हराम कर रखा है। राज्य एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप में लगे हैं। केंद्र सरकार ने आश्चर्यजनक रूप से चुप्पी साध रखी है। उधर अस्पतालों में दिल और फेफड़े के रोगों से पीडि़त मरीजों की संख्या बढ़ी है। हर साल अक्तूबर-नवंबर में किसान अपने खेतों में पुआल जलाते हैं। किसानों का तर्क है कि पुआल को जलाए बिना वे गेहंू की बुआई नहीं कर सकते हैं। किसानों को खेतों में पड़े पुआल को नष्ट करने का सबसे आसान तरीका जलाना नजर आता है। पुआल जलाने के बजाय इसे अन्य तरीके से नष्ट करने की तकनीक महंगी है। यह तकनीक सरकार अपने खर्च पर मुहैया कराने से भाग रही है। 
दूसरी ओर, पाकिस्तान के पंजाब प्रांत का बड़ा इलाका भी धुंध से पीडि़त है। पाकिस्तानी वैज्ञानिकों के एक वर्ग ने इसके लिए भारत के पंजाब में पुआल जलाए जाने को जिम्मेवार ठहराया है। पाकिस्तान के अंतरिक्ष और वातावरण अनुसंधान आयोग के अनुसार, भारतीय पंजाब में पुआल जलाने की 2630 और पाकिस्तानी पंजाब में 27 मामलों की पहचान इस साल अक्तूबर-नवंबर में की गई। हालांकि खुद भारतीय पंजाब के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने स्वीकार किया है कि 2017 में पुआल जलाने के 39,686 मामले सामने आए,जबकि 2016 में यह संख्या 67,969 थी। हालांकि पाकिस्तानी वैज्ञानिकों का एक तबका पाकिस्तानी पंजाब में धुंध के लिए भारतीय पंजाब में खेतों में पुआल जलाने को जिम्मेवार नहीं मानता है। उनके अनुसार, पाकिस्तानी पंजाब में धुंध के कारण मध्य-पूर्व एशिया में उठे आंधी भरे तूफान और धूल भरे चक्रवात हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, पाकिस्तान में इस तरह का धुंध साल में दो बार आता है। इसके लिए जिम्मेवार ईरान, इराक और सीरिया में उठे भारी धूल भरे चक्रवात हैं। पाकिस्तान के पर्यावरण सुरक्षा संस्थान के पूर्व निदेशक आसिफ शुजा के अनुसार, अप्रैल-जून और सितंबर-नवंबर में यह चक्रवात पाकिस्तान में पहुंचता है। यह चक्रवात थार इलाके में आने के बाद और मजबूत होता है। इसके कारण पंजाब के इलाके में धुंध की स्थिति पैदा होती है। लंबे समय तक बारिश न होने से हालात और नाजुक हो जाते हैं। 2016 में इराक में 122 धूल भरे चक्रवात आए, जिसके कारण पाकिस्तान में धुंध की स्थिति पैदा हो गई।
यह सच्चाई है कि पंजाब और हरियाणा के किसानों ने अक्तूबर और नवंबर महीनों में खेतों में ही पुआल को जलाया है। लेकिन इसके लिए किसानों से ज्यादा जिम्मेवार केंद्र और राज्य सरकारें हैं। केंद्र सरकार पूरे देश में स्मार्ट सिटी का ढिंढोरा पीट रही है। इस पर एक लाख करोड़ से ज्यादा खर्च करने की योजना है। दूसरी तरफ पुआल जलने से होने वाले धुंध को रोकने के लिए वह कुछ हजार करोड़ रुपए की सहायता राशि किसानों को उपलब्ध करवाने को तैयार नहीं है। सरकार को पता होना चाहिए कि कोई भी शहर तभी स्मार्ट होगा, जब वह प्रदूषण-मुक्तहो। खेतों में पुआल जलाना किसानों की मजबूरी है। किसानों को कई नियमों से बांध दिया गया है। पंजाब में 2009 में बनाए गए कानून के मुताबिक किसान पंद्रह जून से पहले धान की बुआई नहीं कर सकते हैं। यह फैसला राज्य में घटते भूजल स्तर के कारण लिया गया। धान की बुआई को मानसूनी बारिश से जोडऩे के लिए यह कानून पारित किया गया।
पंजाब में मानसून जुलाई के आसपास आता है। किसानों का तर्क है कि धान की बुआई में देरी होने से उन्हें अक्तूबर-नवंबर में गेहंू की बुआई के लिए काफी कम समय मिलता है। इसलिए मजबूरी में वे खेतों में पुआल जलाते हैं, क्योंकि परंपरागत तरीके से पुआल नष्ट करने के लिए उन्हें डेढ़ महीने का वक्त चाहिए। दूसरी तरफ, वैज्ञानिक सिफारिश के मुताबिक गेहूं बुआई का उपयुक्त समय 25 सितंबर से 15 नवंबर तक है। वैसे में धान की फसल देर से कटने और गेहूं की बुआई जल्दबाजी में करने के कारण पुआल जलाना किसानों की मजबूरी है।
पंजाब और हरियाणा में धान की खेती का रकबा काफी है। इस साल पंजाब में 29 लाख हेक्टेयर और हरियाणा में 13 लाख हेक्टेयर जमीन पर धान की खेती की गई। पंजाब और हरियाणा में इतने बड़े रकबे में धान की कटाई, देश के पूर्वी राज्यों में अपनाए जाने वाले परंपरागत तरीके के बजाय कंबाइन से होती है, क्योंकि परंपरागत कटाई में समय और श्रम दोनों ज्यादा लगता है। कंबाइन से कटाई के बाद बड़ी मात्रा में पुआल खेतों में रह जाता है।
वैज्ञानिक तकनीक से पुआल नष्ट करने के लिए बाजार में उपलब्ध उपकरणों से पंजाब में 63 हजार हेक्टेयर के पुआल को नष्ट किया जा सकता है।पुआल नष्ट करने के लिए हैप्पी सीडर नामक मशीन इस समय पंजाब में उपलब्ध है। लेकिन पहले से ही घाटे और कर्ज के बोझ तले दबे किसान इस उपकरण से पुआल नष्ट करने के लिए पैसा खर्च करने को तैयार नहीं हैं। किसान संगठनों का कहना है कि पुआल जलाने से बचाव संबंधी उपलब्ध तकनीक को खरीदने के लिए या तो सरकार सहायता राशि दे या धान पर 200 से 300 रुपए प्रति क्विंटल बोनस दे। पंजाब में हैप्पी सीडर एक बेहतर तकनीक है, जिससे पुआल नष्ट कर गेहूं की बिजाई हो सकती है।
पंजाब सरकार को पुआल जलाने से होने वाले प्रदूषण को लेकर गंभीर होना चाहिए, क्योंकि इसका सीधा असर पंजाब के लोगों पर भी है। फिलहाल वह इसके लिए केंद्र सरकार से सहायता राशि चाहती है, ताकि किसानों को जरूरी तकनीक उपलब्ध कराई जा सके। राज्य सरकार दो एकड़ तक की जोत वाले किसानों को पुआल नष्ट करने की तकनीक मुफ्त में देना चाहती है। जबकि इससे ज्यादा जोत वाले किसानों से तकनीक का खर्च लेना चाहती है। उसके अनुमान के अनुसार, नई तकनीक उपलब्ध कराने पर कम से कम नौ हजार करोड़ रुपए का खर्च आएगा, जो केंद्र की सहायता के बिना संभव नहीं है।
दूसरी तरफ केंद्रीय कृषि मंत्री ने दावा किया है कि पंजाब को पुआल जलाने से बचाव के लिए 2016 में 48.50 करोड़ रुपए दिए गए थे। 2017 में भी 48.50 करोड़ रुपए दिए गए। इसमें से भी एक पैसा खर्च नहीं हुआ। हरियाणा को 2017 में 45 करोड़ रुपए दिए गए, जिसमें से उसने 39 करोड़ का इस्तेमाल किया। राजस्थान को उपलब्ध करवाए गए नौ करोड़ में से तीन करोड़ रुपए खर्च हुए। फिलहाल पंजाब और हरियाणा में किसानों को हतोत्साहित करने के लिए पुआल जलाने वाले किसानों पर जुर्माना लगाया जा रहा है। लेकिन इसका असर कम है। अब भी पुआल जलाए जा रहे हैं। कर्ज के बोझ तले दबे किसानों की बदहाली को देखते हुए राज्य सरकार फिलहाल किसानों से ज्यादा टकराव के मूड में नहीं दिखती।

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