तिल तिल मरती ग्राम चिटेहरा की ढकिया*…..!

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आर्य सागर खारी 🖋️

ढकिया अकारांत स्त्रीलिंग वाची शब्द है लेकिन यह किसी स्त्री के लिए नहीं… जनपद गौतम बुध नगर के दादरी विकास खंड के ग्राम चिटेहरा मैं राष्ट्रीय राजमार्ग NH2 से लगभग डेढ़ किलोमीटर पश्चिम दिशा में स्थित ढाक व खजूर के पेड़ों के समुदाय से निर्मित सदियों पुराने प्राकृतिक वनस्पति जैव उद्यान के लिए प्रयोग होता है। चिटेहरा गांव के खेडे( खेडा)मोहल्ले में स्थित कभी ओर भी अधिक मनोरम सुंदर रहे इस स्थल को यह नाम गांव के पूर्वज संस्थापक गांव वासियों ने ही दिया… जो निसंदेह सच्चे धार्मिक निश्चल प्रकृति वन्य जीव प्रेमी रहे होंगे। कभी यह प्राकृतिक स्थल भूमि सुधार कानून लागू होने से पूर्व कई वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ था आज महज कुछ हेक्टेयर में सिमट गया है। आज भी इसमें साही जंगली शूकर ,नीलगाय, मोर ,बया जैसे पक्षियों की दर्जनों प्रजातियों ने अपना बसेरा बना रखा है। खजूर के दर्जनों पेड़ों पर बया के घोसले बने हुए हैं जो देखने में अद्भुत है। दादरी क्षेत्र के ऊंचाई पर स्थित गांवो का पानी गाँव बिसाडा के बरसाती नाले से होते हुए इस ढकिया को दो भागों में विभाजित करते हुए ग्राम पाली होते हुए मेरे गाँव तिलपता से होते हुये सूरजपुर वेटलैंड पक्षी विहार में जाता है । जलीय तंत्र, उद्यान आपस में जुड़े हुए हैं एक तार में भगवान ने इन्हें पिरो रखा है, एक अमेजिंग इकोसिस्टम का निर्माण करते हैं। ढकिया जो रमणीय भ्रमण योग ध्यान तीर्थ स्थल बन सकता था… ऐसे प्राकृतिक एकांत रमणीय स्थल अनेकों ऋषि महर्षियो अनाम महात्माओं की तपस्थली रहे हैं। कौटिल्य अर्थशास्त्र मैं ग्राम अधिकरण घटक विभाग में ऐसे स्थलों को ‘देवअस्म’ कहा गया है। ऐसे स्थलों का संरक्षण संवर्धन पुण्य कार्य माना गया है लेकिन अहो! दुर्भाग्य कहें भारत में घोर अंधकार का युग सभी क्षेत्रों में आया। ऐसे अधिकांश देव प्राकृतिक स्थल स्थानीय ग्रामीणों की उपेक्षा उनकी अतिक्रमण कारी दूषित मनोवृति का शिकार है…. यह ढकिया भी अपवाद नहीं रही….. रही सही कसर प्रशासन सरकार की उपेक्षा पूरी कर देती है गौतम बुध नगर में गांवों के ऐसे स्थलों के संरक्षण संवर्धन रखरखाव को लेकर कोई ठोस नीति नहीं है…. आखिर सरकार करें भी क्यों इसमें उन्हें कोई राजनीतिक लाभ नहीं लगता… हां समय-समय पर एनजीटी की कागजी कार्यवाही की हुंकार जरूर सुनाई देती रहती है होता कुछ नहीं है । जन विश्वास व जन समर्थन के अभाव में किसी भी क्षेत्र में क्रांति नहीं आ सकती ।उत्तर भारत के अधिकांश गांवों में पर्यावरण चेतना बोध का अभाव है… धर्म तंत्र भी दूषित हो गया है सच्चे साधु महात्मा जितेंद्रिय लोग यदि प्रयास करें तो ऐसे स्थलों का रखरखाव हो सकता है लेकिन प्राय: देखने में आता है ऐसे स्थलों पर आलसी पलायनवादी अशिक्षित कथित नामधारी साधु मौज उड़ाते हैं और गांव का ही कोई व्यक्ति कथित गुरु पहुंचा महात्मा भक्त बन कर बैठ जाए तो सोने पर सुहागा। प्राकृतिक स्थल साल दर साल उजडते रहते हैं….. ऐसे स्थलों पर गुरुकुल गौशाला ध्यान योग केंद्र जैसी गतिविधियां चल सकती है। लेकिन इन स्थलो साल में एक दो बार अन्नदान भंडारा कर लोग अपने धार्मिक कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं… ढकिया जैसे गुमनाम उपेक्षित स्थल ही सच्चे शिवाल्य है अर्थात शिव का घर है ।

इनकी दुर्दशा पर दादा गुरु भीष्म ने ठीक ही लिखा है।

संध्या हवन करने की खातिर बने शिवाले ।
उन पर आज भांग चिलम सुलफा पी रहे रिजाले।।

ढकिया के अंदर घुसे हुए गेहूं के एक खेत की बरसाती नाले के बदबूदार पानी से सिंचाई कर रहे तरूण अवस्था चार -पांच युवक आराम से इस स्थल पर बैठकर हुक्का पी रहे थे। मुझे भी प्रथम दृष्टा उन्होने देखते ही हुक्का ऑफर कर दिया। मैंने समझाया भाई हमारी वैदिक संस्कृति में धार्मिक ग्रंथों शिक्षा इतिहास के ग्रंथों रामायण महाभारत आदि में धूम्रपान का दूर-दूर तक उल्लेख नहीं है बल्कि पग पग पर शरीर आत्मा बुद्धि के बल को बढ़ाने का आदेश मिला है । शरीर की उन्नति से शिक्षित संस्कारी बनकर परिवार समाज राष्ट्र की उन्नति करने का हमारे ग्रंथों में बहुलता से उल्लेख मिलता है
मैंने उन्हें बताया हुक्का फेफड़ों के लिए ही नहीं शरीर के नाड़ी तंत्र के लिए भी नुकसानदायक है । युवको की आई साइट वीक हो रही है आंखों में मैकुलर डिजनरेशन हो रहा है परमानेंट ब्लाइंडनेस आ रही है । गाँव के खेड़ा मोहल्ले की ही वे युवक थे जितना बता सकता था बताया वह माने या ना माने उनका काम संकल्प शक्ति होनी चाहिए ।इस प्राकृतिक स्थल को आप युवक मिलकर बचाएं आपको असीम मानसिक शांति मिलेगी वन्य जीवो को उनका प्राकृतिक आवास मिल जाएगा इससे आपको पुण्य भी मिलेगा आप सच्चे धर्मवीर कहलाएंगे। आप सब यह सुनिश्चित करें कोई भी इस स्थल के ढाक आदि वृक्षों को काट ना पाए हालांकि वर्षों के दोहन के कारण बहुत कम संख्या में ढाक के वृक्ष उस स्थल में शेष बचे हैं ।जब वृक्ष ही ना रहेंगे तो फिर काहे की ढकिया रहेगी।

इस स्थल के सघन अवलोकन के दौरान मुझे साही का कांटा व मादं दोनों मिली। उसे कांटे को मे अपने साथ ले आया ।साही के कांटे का आयुर्वेद के ग्रंथों में वैदिक कर्मकांड मुडनं आदि संस्कारों में इसके प्रयोग को लेकर व्यापक उलेख मिलता है। वनवासी लोग इसका प्रयोग साज सज्जा के साथ-साथ अपने रक्षा उपकरणों में भी इसका इस्तेमाल सदियों से करते आ रहे हैं।

आर्य सागर खारी✍✍✍

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