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Dr DK Garg

*यज्ञो वै विष्णुः* 

यज्ञ को विष्णु क्यों कहा गया है?

विष्लेषण

ईश्वर के अनेक गुणवाचक नामों में से एक नाम है ‘‘यज्ञ‘‘ । (यज देवपूजा संगतिकरणदानेषु) इस धातु से ‘यज्ञ’ शब्द सिद्ध होता है। ‘यज्ञो वै विष्णुः’ यह ब्राह्मण ग्रन्थ का वचन है। ‘यो यजति विद्वद्भिरिज्यते वा स यज्ञः’ जो सब जगत् के पदार्थों को संयुक्त करता और सब विद्वानों का पूज्य है, और ब्रह्मा से लेके सब ऋषि मुनियों का पूज्य था, है और होगा, इससे उस परमात्मा का नाम ‘यज्ञ’ है, क्योंकि वह सर्वत्र व्यापक है।
इसमें यज्ञ को विष्णू कहा है तो एक अन्य चिंतन फिर सुरु हो जाता है की विष्णू कोई शरीरधारी तो बिलकुल नहीं परंतु यज्ञ को विष्णु शतपथ ब्राह्मण ग्रंथ में क्यों कहा गया?
यज्ञ को भी विष्णु कहते हैं क्यों यज्ञाग्नि में जब शाकल्य हुत-आहुत व घृत आदि ड़ाला जाता है तो वह सब अग्नि की तरंगांे पर बहता हुआ अंतरिक्ष और द्यौ लोक तक फैल जाता है। अतः चहुं ओर यज्ञ की सुगंध व्याप्त होने के कारण यज्ञ भी विष्णु है। इतना ही नहीं यज्ञ का धूम्र बादलों में जाकर जल का रूप धारण कर पुनः वर्षा होकर इस भूमि को शस्य श्यामला बनाता है। इस प्रकार यज्ञ पर विष्णु की परिभाषा युक्ति युक्त लागू होती है। अतः विष्णु परमात्मा, आत्मा, सूर्य, राजा और यज्ञ का अलंकारिक नाम है। जिसका वर्णन यहां पर है। इसी चक्र को कृष्ण ने गीता में इस प्रकार वर्णन किया है-
अन्नाद भवंति भूतानि, पर्जन्यात् अन्न संभवः।
यज्ञाद भवंति पर्यन्यो, यज्ञः कर्म समुद्वभवः।। भगवद् गीता अध्याय 3 श्लोक 14
अर्थात्््् अन्न से जीवों की उत्पत्ति होती है। बादल से अन्न यज्ञ से बादल। अतः यह कर्म सभी को करना चाहिए।
यज्ञ का अर्थ बहुत व्यापक है। जितने भी अच्छे कर्म है सभी यज्ञ-कोटि में आते हैं। यज्ञ का अर्थ ही कर्म है। यज्ञ शब्द यज धातु से बना है जिसके विशेष अर्थ हैं- देवपूजा, संगतिकरण और दान देव कोटि में माता-पिता, आचार्य, गुरू व विद्वान लोग आते हंै अर्थात््् बड़ों को आदर सम्मान देना सेवा-सुश्रूषा करना। संगतिकरण अर्थ में तो सारा समाज ही आ जाता है। दान तो सभी को यथाशक्ति देना ही चाहिए। इससे उदारवृत्ति बनी रहती है तथा लोक संवरण होकर राग द्वेष भी कम होते हैं।ऐसा कौन सा कार्य है जिसमें परस्पर मानव जाति को व्यापार-व्यवहार नहीं करना पड़ता है। इसी विचार को कृष्ण ने गीता में कहा-
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः।
अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक्।।3.10।।
प्रजापति ने सृष्टि रचना के साथ ही यज्ञ की रचना की और कहा कि हे मानव ! तू इसको प्रज्वलित रखना इसी से तेरी सारी इच्छायें पूर्ण होंगी। यही कारण है कि कृष्ण ने यज्ञ की महत्ता के बारे में गीता में सैकड़ों श्लोकों द्वारा विषद् रूप से वर्णन किया है। एक अन्य स्थान पर वे कहते हैं-
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः।
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात।।3.13।।
जो नर नारी यज्ञशेष खाते हंै उनके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। जो केवल अपने लिये पकाते हैं, वे तो पाप ही खाते हैं तात्पर्य कि यदि मानव जो भी कर्म करता है। उसको सभी का हित ध्यान में रख कर सम्पन्न करता रहे। स्वार्थ में लिप्त न होवे तो वह कार्य यज्ञ रूप बन जाता है और उससे जो धनोपार्जन होता है वह यज्ञ शेष कहलाता है। अतः जो मनुष्य अपने व्यापार धंधों को कर्तव्य कर्म को निष्ठा के साथ करते हंै, सच्चाई से सम्पादित करते हंै, वे यज्ञ ही करते हंै और उससे जो धन कमाया जाता है। वह यज्ञ शेष ही है।
कोई भीं परोपकार का कार्य यज्ञ है ,लेकिन मुख्य रूप से यज्ञ पांच बताए गए हैं जिनमें अग्निहोत्र भी एक यज्ञ है। इस कथन ने अग्निहोत्र को विष्णू की संज्ञा दी गई है क्योंकि यज्ञ के लाभ अत्यंत व्यापक और सम्पूर्ण जीवधारियों के लिए है।टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित एक खबर के अनुसार यज्ञ का धुवा सुगंधि 10000 किलोमीटर तक यात्रा करता है ।ऐसी बहुत से खोज हुई है जिनमे यज्ञ को जीवन का श्रोत माना जा सकता है।इसलिए यज्ञ को विष्णू की उपमा दी गई है।
महर्षि दयानन्द जी ने अपनी विनय पुस्तक ‘‘आर्याभिविनयः‘‘ के द्वितीय मन्त्र ‘‘अग्निमीळे पुरोहितं‘‘ में ईश्वर को यज्ञदेव से सम्बोधित किया है ।यज्ञ का अर्थ भी परमात्मा होता है और अग्नि का अर्थ भी परमात्मा होता है। अतः किसी प्रकार की जड़ पूजा का यहाँ स्थान नहीं है।

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