गीता का छठा अध्याय और विश्व समाज

योगेश्वर श्रीकृष्णजी ऐसे पाखण्डियों के विषय में कह रहे हैं कि ऐसे लोग किसी रूप में ना तो योगी हैं ना ही संन्यासी हैं और उनके भगवान होने का तो कोई प्रश्न ही नहीं है। श्रीकृष्णजी योगी या संन्यासी होने के लिए कह रहे हैं कि वह व्यक्ति अपने कर्मों को कत्र्तव्य कर्म के रूप में करने का अभ्यासी होना चाहिए। उसका जीवन व्यवहार ऐसा हो कि वह अपने सारे कर्मों को सहज रूप में कत्र्तव्य कर्म के रूप में करता चला जा रहा हो। वह कर्म तो करे पर बिना आसक्ति के करे। ऐसे लोगों को संसार के भोगों की और संसार के ऐश्वर्यों की आवश्यकता नहीं होती। वह उनमें रहकर भी उनसे दूर होते हैं। 
श्रीकृष्ण जी कहते हैं कि-”हे पाण्डव! जिसे लोग ज्ञान योग अर्थात संन्यास कहते हैं-तुम उसी को कर्मयोग समझो।” श्री कृष्णजी कर्मयोग पर अधिक बल देते हैं। इसका अर्थ यही है कि वह व्यक्ति को निठल्ला और अकर्मण्य बनाना नहीं चाहते ना ही चेले चेलियों से अपने लिए उपहारों की दानादि की व्यवस्था कराने वाला जुगाड़ू उसे बनाना चाहते हैं। वह तो मनुष्य को कर्मशील बनाये रखना चाहते हैं। पर ऐसा कर्मशील हो कि कर्म करते-करते भी कर्म में लिप्त ना हो। इसका अर्थ है कि संत, योगी संन्यासी बाबाओं को भी श्रीकृष्णजी संन्यस्त रहकर भी अपने जीवन को चलाने के लिए कर्मशील बने रहने की सीख दे रहे हैं। भारत की सनातन संस्कृति का यह एक सांस्कृतिक मूल्य है। हमने संन्यास को निठल्लेपन का प्रमाणपत्र पाने के रूप में प्रचारित और प्रसारित किया है-जिससे संन्यास और संन्यासियों का महत्व संसार में कम हो गया है।
वास्तविक योगीजन संन्यस्त्र रहकर भी कर्मशील बने रहते हैं। वे जानते हैं कि संन्यासी होकर भी यदि किसी के निमित्त का खाया या कुछ लिया तो वह भी एक प्रकार की चोरी ही होगी। यही कारण है कि वास्तविक योगीजन संसार के लोगों के साथ रहकर उनसे दो रोटी या तन ढकने के योग्य कपड़ा तो ले लेते हैं, पर इससे अधिक कुछ भी नहीं लेते। उनके लिए सारा अर्थ व्यर्थ हो जाता है। वह सब संकल्पों को और फल की आशा को कर्म का त्याग करके छोड़ चुके होते हैं। जब तक किसी कर्मयोगी की ऐसी स्थिति नहीं आती तब तक वह कर्मयोगी नहंी बन सकता।
संसार के बहुत से लोग अपने घरों में यज्ञादि कराते समय किसी फल की आशा रखते हुए संकल्प लेते हैं। इस संकल्प को दिलाने वाला भी कोई पंडित या कोई संन्यासी बाबा ही होता है। जबकि श्रीकृष्णजी का मानना है कि कर्मयोगी हो चाहे ज्ञान योगी हो उसे ऐसे फल की आशा में लिये गये संकल्पों का तो त्याग करना पड़ता है। जब ऐसी अवस्था आ जाती है-तब ज्ञान योग और कर्मयोग दोनों एक ही दीखने लगते हैं।
श्रीकृष्णजी कह रहे हैं कि जब कोई साधक अपने कर्मयोग के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए ऊपर चढ़ रहा होता है अर्थात अपनी साधना की ऊंचाई को तय कर रहा होता है तो उस समय उसकी साधना का साधन कर्म ही होता है। वह कर्म के माध्यम से ही ऊंचाई पर पहुंचता है। बिना कर्म के साधना की यह ऊंचाई प्राप्त करना कठिन है। सर्वथा असम्भव है। पर जब वह ऊंचाई को प्राप्त कर लेता है तो उस समय वहां टिके रहने का उसका साधन शम् अर्थात शान्ति हो जाता है।
कर्म में विद्वानों ने चंचलता मानी है, जबकि शम अर्थात शान्ति में चंचलता न होकर स्थिरता है। अपने ऊंचे लक्ष्य को प्राप्त करके हर व्यक्ति शान्ति का अनुभव करता है, उसे आनन्दानुभूति होती है। एक अजीब सा सुख अनुभव होता है। जब सांसारिक लक्ष्य को प्राप्त करने पर ऐसी स्थिति आ सकती है तो ब्रह्मानंद को पाकर कैसी स्थिति आती होगी? साधारण मनुष्यों के द्वारा तो उस स्थिति की कल्पना भी नहीं की जा सकती। उस अवस्था में कर्म-निष्कर्म हो जाता है। संसार के लोगों को अपना जीवन ध्येय इसी शान्ति को बनाना चाहिए। शान्ति के पुजारी का खिताब पाने के लिए संसार में बड़े-बड़े राजनीतिज्ञ और सामाजिक कार्यकर्ता रहते हैं। वे ये युक्तियां भिड़ाते रहते हैं कि शान्ति का नोबेल पुरस्कार उन्हें ही मिल जाए तो कितना अच्छा रहे? ये लोग शान्ति का नोबेल पुरस्कार लें अथवा उसे लेने के लिए युक्तियां भिड़ायें- इस पर हमारी कोई टिप्पणी नहीं है, हम तो यह कहना चाहते हैं कि ऐसे लोग शान्ति की परिभाषा को भी जानते हैं या नहीं? ‘नोबेल पुरस्कार कमेटी’ उन्हें ऐसा पुरस्कार देने से पहले इस प्रश्न पर गम्भीरता से चिंतन करे।
वास्तव में नोबेल पुरस्कार (शान्ति के लिए) उन्हें मिलना चाहिए जिनके कर्म की चंचलता शान्त हो गयी है और जिनके भीतरी जगत में स्थिरता आ गयी है।
प्राणीमात्र का भला जिनका जीवन ध्येय।
शान्तिदूत होते वही पाते सच्चा श्रेय।।
जिन्होंने अपने अंतर की इस स्थिरता के चलते संसार के प्राणियों के कल्याण के लिए कार्य किये हैं और संसार को अपने कार्यों से प्रभावित किया है। यदि नोबेल पुरस्कार प्राप्ति के लिए भी लोग युक्तियां खोज रहे हैं या खोजते हैं तो समझना चाहिए कि उनके चाल, चरित्र और चेहरे में दोगलापन है। कृष्णजी इस दोगलेपन को मिटाने के पक्षधर हैं। वह चाल, चेहरे और चरित्र में साम्यता स्थापित करना चाहते हैं। वह अंतर्जगत के और बाह्य जगत के भावों और कर्म में साम्यता स्थापित करना चाहते हैं। भारत का साम्यवाद यही है और भारत के इसी साम्यवाद को यदि संसार अपना ले तो संसार की वर्तमान दुर्दशा को समाप्त किया जा सकता है।
‘कर्म’ को ‘शम’ में परिवर्तित करने के लिए नेताओं के गला सुखाने वाले भाषणों को सुनने की संसार को आवश्यकता नहीं है। इसके लिए तो किसी योगी के प्रवचनों की आवश्यकता है जो एक लय होकर सधी हुई आवाज में बोलता है। वह चीखता नहीं है।
वह चिल्लाता भी नही है और वह ‘नोबेल पुरस्कार’ का सबसे प्रबल दावेदार होकर भी उसके लिए प्रयास नहीं करता। क्योंकि उसके लिए ‘नोबेल पुरस्कार’ पाना बहुत छोटी चीज हो जाती है। इसे पाने के लिए तो छोटे लोग प्रयास किया करते हैं। यह बड़े लोगों (कर्मयोगियों) के लिए उपयुक्त नहीं है। बाहरी संसार का एक खिलौना है-नोबेल पुरस्कार। भीतरी जगत में इसका कोई महत्व नहीं है, कोई मोल नहीं है। तभी तो भारत के किसी योगी ने इसे पाने के लिए कभी प्रयास नहीं किया। वैसे यह संसार भी अजूबों का घर है। पात्रों को यह ना तो प्राथमिकता देता है और ना ही पुरस्कार देता है। यह अपात्रों का और कुपात्रों का सम्मान करता है और उनके ही गुणगान करता है। कृष्णजी ऐसे महामानव को नोबेल से बड़ा पुरस्कार देते हैं-जिसने कर्म को शम में परिवर्तित कर लिया है और जो वास्तविक शान्ति को प्राप्त कर चुका है।
वह उस महामानव को ‘योगारूढ़’ कहते हैं। ‘योगारूढ़’ का अभिप्राय है-वह व्यक्ति जो कर्मयोग की ऊपर की मंजिल पर चढ़ गया है। जिसने आत्म साक्षात्कार कर लिया है। जिसने चित्त की चंचलता को समाप्त कर लिया है। अब उसका चेहरा ही लोगों को इतनी ऊर्जा देने लगा है कि लोग उसे देखकर ही शान्ति अनुभव करने लगते हैं।
संसार में उन लोगों के लिए हमारे ‘योगारूढ़’ योगी सदा चुनौती बने रहेंगे जिनके दोगले चरित्र हैं और इसके उपरान्त भी ‘नोबेल पुरस्कार’ पाने की चाह रखते हैं। निश्चय ही हमारे ‘योगारूढ़ ‘ जन इन नोबेल पुरस्कार विजेताओं से लाख गुणा उत्तम हंै। क्या ही अच्छा हो कि संसार के लोग ‘नोबेल पुरस्कार’ पाने की अपेक्षा ‘योगारूढ़’ होने का प्रयास करें। संसार की समस्याएं रातों रात छूमन्तर होकर भागेंगी। क्रमश:

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