अंगिरा ऋषि का मत है कि अहंकार देवताओं का भी नाश कर देता है। जबकि वशिष्ठ जैसे आचार्य का कथन है कि अहंकार जीव का ही नाश कर देता है। इसी प्रकार सन्त तुलसीदास जी का कहना है कि अहंकारी का विनाश निश्चित है। इन महापुरूषों के ये वाक्य भारतीय संस्कृति के मूल्य हैं। भारत की महान संस्कृति इन्हीं मूल्यों से भोजन-पानी ग्रहण करती है और प्रत्येक वर्ष अहंकार के प्रतीक रावण का पुतला दहन करके अपने इस सांस्कृतिक मूल्य के प्रति अपनी गहन निष्ठा की अभिव्यक्ति करती है। मानो वह प्रत्येक वर्ष यह बताना चाहती है कि अहंकारी की रक्षा उसका ज्ञान भी नहीं करा सकता है। अहंकारी का नाश एक दिन निश्चित है। अत: संसार के लोगों! सावधान रहो और अपने मानस के किले की पूर्ण सावधानता के साथ देखभाल करते रहो, उसमें किसी भी कोने से अहंकार नाम का तुम्हारा महान शत्रु प्रवेश नापा जाए। सजग रहो और सदा चौकन्ने रहो, तुम्हारी अहंकार शून्यता बनी रहनी चाहिए। उसकी रखवाली वैसे ही करो जैसे कोई किसान अपनी फसल की रखवाली अपने खेत पर बैठकर करता है। संस्कार तुम्हारे मानस की फसल हैं, जिसे अहंकार नाम का भयंकर पशु खा जाता है और वह जैसे ही उसे खाता है वैसे ही तुम्हारा नाश हो जाता है। तभी तो महामति चाणक्य कहते हैं-‘देह के अभिमान का नाश और परमात्मनिष्ठ हो जाने पर जहां-जहां मन जाता है वहां-वहां ही समाधि समझनी चाहिए।’ चाणक्य का मानना है कि इस मन को समाधिस्थ कर लो, महात्मा बना लो। यदि यह समाधिस्थ हो गया, महात्मा बन गया तो तुम्हारा जीवन सफल हो जाएगा।
यह प्रसन्नता की बात है कि इस समय भारत की केन्द्रीय सरकार एक ऐसे नेतृत्व से संचालित हो रही है जो कि भारत की संस्कृति में पूर्ण आस्था और विश्वास रखता है। जिसने अपने मन को बिना कपड़े रंगे ही महात्मापन के सांचे में ढालने का अनुकरणीय प्रयास किया है। उसके भीतर अभीप्सा है, जिजीविषा है, पर किसी प्रकार की लालसा नहीं है। वह भारत को विश्वगुरू बनाना चाहता है, इसलिए वह वासना और रसना दोनों में सना हुआ नहीं है, और इनसे सदा दूरी बनाकर चलने का प्रयास करता है। अपने ऐसे महानायक श्री मोदी के कड़े और कष्टप्रद निर्णयों को भी जनता सहन कर रही है। क्योंकि उनके कठोर से कठोर आलोचक को भी यह पता है कि मोदी अपने लिए कुछ नहीं कर रहा। मोदी वास्तव में राजनीति और राजनीतिज्ञों के प्रति जनविश्वास को बहाल करने में सफल रहने वाले प्रधानमंत्री सिद्घ हो चुके हैं। उनमें वाणी की स्पष्टता है, पर उनके भीतर एक सुकोमल दिल धडक़ता है जो देश और अपने देशवासियों के प्रति उतना ही पवित्र और अहंकारशून्य है-जितना एक महात्मा का होता है।
एक संस्कृत के विद्वान ने कहा है कि ”हे मन! कहां जाने की तैयारी है? तनिक बताइये तो किधर जा रहे हैं आप? क्या किसी मनुष्य पर तुम्हारी दृष्टि पड़ी है या किसी नायिका पर मुग्ध हो गये हो? परन्तु तुम्हारा दोनों स्थानों पर जाना ही अनुचित है। क्योंकि तुम ठहरे नपुंसक (संस्कृत व्याकरण के अनुसार मन नपुंसक लिंग है) जहां जाओगे, वहीं तुम्हारी हंसी उड़ेगी। तुम मनुष्य की भीड़ में मत जाओ। तुम ब्रह्म के पास जाओ, क्योंकि ब्रह्म भी नपुंसक है। वहीं पर तुम्हारा ठीक गुजारा होगा। नपुंसक की नपुंसक से ठीक पटती है।” भाव यह है कि विषय वासनाओं को त्यागकर ब्रह्म में लग जाओ।
जब पीएम मोदी कहते हैं कि वह देश के प्रधानमंत्री नहीं प्रधान सेवक हैं और वह तो अपने मूल में चाय बेचने वाले हैं, (पर देश बेचने वाले नहीं हो सकते) तो पता चलता है कि प्रधानमंत्री ने अपने मन को देशरूपी ब्रह्म के साथ एकाकार कर लिया है। वह राष्ट्रदेव के प्रति समर्पित हो गये हैं और इसी ब्रह्म की साधना पूर्ण मनोयोग से कर रहे हैं। अत: उन्हें अहंकारी नहीं कहा जा सकता।
अब थोड़ा आगे बढ़ते हैं। भाजपा में सत्ता और संगठन पर इस समय मोदी और अमितशाह की पकड़ है। दोनों की बढिय़ा पट रही है। दोनों के भीतर निस्पृहता है और दोनों का एक दूसरे पर अटूट विश्वास है। ये दोनों भाव राजनीति में बड़ी कठिनता से मिलते हैं। पर भारत की वर्तमान राजनीति मेें हैं तो यह दुर्लभ संयोग निश्चय ही किसी ‘शुभ’ का संकेत है। अमित शाह के लिए भी अहंकारी का विशेषण दिया जाता है, परन्तु उनकी कार्यशैली वही है जो उन्होंने घेाषित भी की थी कि-‘मैं मोदी जी का हनुमान हूं।’ सत्ता की लालसा से दूर पर सत्ता के स्थायित्व के लिए संगठन को सुदृढ़ करने वाले अमितशाह पूर्ण निष्ठा से अपना कार्य निर्वाह कर रहे हैं और सत्ता के अत्यंत निकट होकर भी सत्ता से दूर रहने का वह संकेत देते ही रहते हैं। वह सत्ता मद की बात नहीं करते हैं, परन्तु संगठन हित में कठोर फैसले ले लेकर ऐसा संकेत अवश्य करते हैं कि वह किसी की सुन नहीं रहे हैं। उनकी यह मोदी निष्ठा व्यक्ति निष्ठा न होकर राष्ट्रनिष्ठा है, क्योंकि राष्ट्रहित में काम कर रहे मोदी के लिए वह संकट मोचक बने रहने में ही अपना और देश का भला देख रहे हैं। निश्चय ही वह अहंकार शून्य हैं। उधर आज भी सत्ता के त्रिकोण का एक और केन्द्र आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत हैं। उनके भीतर भी राष्ट्र धडक़ता है। उनके दिल की हर धडक़न से राष्ट्र राष्ट्र की धक-धक हो रही है। उनका जीवन हमें बता रहा है-
चाह गयी चिन्ता मिटी मनवा बेपरवाह।
जिनको कछू न चाहिए सो साहन के साह।।
उनके लिए गोधन, गजधन, बाजिधन और रतनधन सभी धूल के समान हो चुके हैं। साम्प्रदायिक संकीर्णता तो उन्हें छू भी नहीं गयी है। तभी तो वह गाजियाबाद में भरी जनसभा में एक मुस्लिम महिला के चरण स्पर्श कर लेते हैं-केवल इसलिए कि वह मुस्लिम महिला भारत के सनातन मूल्यों की संरक्षा और सुरक्षा के लिए बोलती है।
कहते हैं कि भगवान अहंकारी को खाते हैं। अब जो लोग स्वयं को प्रधान सेवक या हनुमान सिद्घ कर रहे हों या इतना सरल दिखा रहे हों कि भरी सभा में अपने से कम अवस्था की एक मुस्लिम बहन के चरण स्पर्श कर रहे हों, निश्चित ही भगवान इनके अहंकार को तो खाएंगे नहीं, क्योंकि इनमें अहंकार है ही नहीं। इसके उपरान्त भी कुछ ऐसा है जो भाजपा रूपी पेड़ में घुन की तरह लग रहा है और इसको कमजोर कर रहा है और यह भाजपा के छुटभैये नेताओं का और आरएसएस के भी ऐसे ही कार्यकर्ताओं या पदाधिकारियों का अहंकार है। ये लोग सीधे मुंह जनता से बात नहीं कर रहे हैं। आरएसएस के दिल्ली कार्यक्रम में या नागपुर कार्यालय सहित किसी भी कार्यालय में आप जाएंगे तो बड़े नेता तो सीधे मुंह बात कर सकते हैं-पर जिन्हें यह सत्ता यूं ही बैठे-बिठाये मिल गयी लगती है, वे आरएसएस और भाजपा की जड़ों में अपने अहंकार का मट्ठा डाल रहे हैं। इसी प्रकार का व्यवहार भाजपा के कार्यालय में छुटभैये नेताओं और पहली बार विधायक या सांसद बने नेताओं का या वरिष्ठ कार्यकर्ताओं का आपक ो देखने को मिलेगा।
भगवान निश्चय ही इन मट्ठा लिये खड़े लोगों को ही खाएंगे, मोदी, अमितशाह और मोहन भागवत यदि समय रहते चेत जाएं तो अच्छा है और इन मट्ठाधारियों का सत्ता संगठन से सफाया करने लगें, अन्यथा आगामी चुनावों में इनके कारण भाजपा को बड़ा नुकसान हो सकता है। आर.एस.एस. के कार्यालय में बैठे लोग हों या भाजपा के लोग हों-पीएम मोदी भाजपा अध्यक्ष अमित शाह आर.एस.एस. प्रमुख मोहन भागवत को इन लोगों के आचरण व व्यवहार पर नजर रखनी चाहिए। क्योंकि ये लोग अधिकतर समय में अधिकतम लोगों के सम्पर्क में रहते हैं, और इनके मिठास भरे या कड़वाहट भरे व्यवहार से लोग सीधे प्रभावित होते हैं। हमारा मानना है कि मोदी, अमितशाह और मोहन भागवत आगामी चुनावों से पूर्व ‘सफाई अभियान’ चलायें और ऐसी स्थिति बनायें जिससे सत्ता और संगठन में सर्वत्र अहंकारशून्यता छा गये।

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