गीता का छठा अध्याय और विश्व समाज

योगेश्वर श्री कृष्णजी कहते हैं कि अर्जुन यह कार्य अर्थात मन को जीतना या वश में करना अभ्यास तथा वैराग्य के माध्यम से सम्भव है।
अभ्यास और वैराग्य से होती मन की जीत।
मन को लेते जीत जो पाते रब की प्रीत।।
इस प्रकार श्रीकृष्णजी ने मन को विजय करने का अमोघ अस्त्र अर्जुन को दे दिया। उसे बता दिया कि संसार के इस सबसे दुष्कर और असम्भव से दिखने वाले कार्य को भी सम्भव बनाया जा सकता है और उसके लिए बस इतना ही करना होगा कि हमारा अभ्यास बने और वैराग्य की भावना बलवती होती जाए। जिसने अपनी साधना का अभ्यास बढ़ाना आरम्भ कर दिया-वह निश्चय ही मन की विजय की ओर चल दिया। यह नित्य प्रति का अभ्यास धीरे-धीरे संसार के प्रति हमें विरक्त करता है। यह विरक्ति की भावना ही हमारा वैराग्य बनता है। जिससे हमारे हृदय में ज्ञान का प्रकाश होने लगता है। धीरे-धीरे संसार के विषय वासना की केंचुली से हम मुक्त होने लगते हैं। हमारे ऊपर से अज्ञान का आवरण हटने लगता है, पर्दा हट जाता है और अन्धकार मिट जाता है। ज्ञान के उस प्रकाश में हम मन के संकल्प विकल्पों की आने वाली बार-बार की पत्रावलियों की समीक्षा करने में सक्षम होते जाते हैं। अभी तक हम मन के द्वारा तैयार की गयी पत्रावलियों पर आंख मूंदकर हस्ताक्षर करते जा रहे थे, पर अब हमारी आंखें खुलने लगती हैं और हम खुली आंखों से देखने लगते हैं कि हमारा यह मन नाम का लिपिक या बाबू हमसे क्या करा रहा है? हम किस कागज पर हस्ताक्षर कर रहे हैं? -हम उसमें बाद में जाकर कहीं फंसेंगे तो नहीं? वास्तव में जितने भर भी मामलों में ईश्वर के न्यायालय में या संसार के न्यायालय में हम फंसते हैं उनमें इस मन नाम के लिपिक का या बाबू का सबसे बड़ा योगदान होता है। जिस अधिकारी का लिपिक या बाबू उस पर शासन करने लगता है-वह अधिकारी दुर्बल होता है और उसे उसका लिपिक या बाबू बेचकर खा जाता है। वह बाहर बैठा-बैठा उस अधिकारी के नाम पर पैसे वसूलता है, और उनमें से कुछ उसे देकर उसकी आत्मा को खरीद कर उल्टी सीधी पत्रावलियों पर अधिकारी के हस्ताक्षर करा लेता है। अधिकारी को पता नहीं होता कि उसका सौदा हो चुका है, वह तो पैसे के लालच में सब कुछ करता रहता है और अपने लिपिक या बाबू के यहां अपनी लेखनी और आत्मा दोनों को गिरवी रख देता है।
योग के क्षेत्र में भी यह मन नाम का लिपिक या बाबू हमारा पीछा नहीं छोड़ता। वहां भी दुर्बल साधक इसकी मक्कारी के जाल में फंस जाते हैं और बाहर आकर शोर मचा देते हैं किवहां भी मन नाम के मक्कार जादूगर अर्थात लिपिक या बाबू से बच पाना सम्भव नहीं है। वे समझ जाते हैं कि इस राक्षस का जंजाल कितना व्यापक है? -और यह हमें मारने व फंसाने के लिए कैसे-कैसे उपायों को प्रयोग में लाता है? परन्तु जो साधक वास्तव में ही अपनी साधना को सफल बनाना चाहते हैं वह दुर्बल होकर साधना में नहीं बैठते, अपितु वह इस संकल्प के साथ बैठते हैं कि मैं मन को वश में रखूंगा। मन जो स्वयं हमें संकल्पों और विकल्पों में घुमाता फिरता है-उसी के लिए हमने संकल्प कर लिया कि मैं तेरे किसी धन्धे में फंसकर अपने आपको गिराऊंगा नहीं, अपितु तुझे ही गिराने के लिए मैं कृत-संकल्प होकर बैठ गया हूं। तुझमें साहस है तो मुझे अपने संकल्प से टस से मस करके दिखा। इस संकल्प के आते ही मन के विकल्प शान्त होने लगते हैं। हम हारी हुई बाजी को जीतने लगते हैं और हमारे भीतर आत्मस्वाभिमान उत्पन्न होने लगता है। इन के विकल्प उसकी बहानेबाजी हैं, हमें साधना में से उठा लेने के उसके षडय़न्त्र हैं। संकल्प के आते ही मन की ये बहाने बाजी और उसके षडय़ंत्र धीरे -धीरे शान्त होने लगते हैं, जिससे अभ्यास में मन लगने लगता है। इस प्रकार के अभ्यास के दृढ़ हो जाने से इससे अगली अवस्था अर्थात वैराग्य का जन्म होता है।
श्रीकृष्णजी ने अर्जुन को वैदिक संस्कृति के रहस्यों को स्पष्ट करते हुए यह बताया कि इस मन को विजय करने को असम्भव नहीं मानना चाहिए। आज के संसार के लिए मन को विजय करना असम्भव है, परन्तु श्रीकृष्णजी कह रहे हैं कि अर्जुन इस मन को जीतना असम्भव नहीं है। इसको विजय करना सम्भव है, पर उसके लिए एक साधना का मार्ग अपनाना अनिवार्य है और वह साधना का मार्ग अभ्यास और वैराग्य का मार्ग है। इस मार्ग को अपनाकर योगीजन मन की चंचलता को मारकर उसके निज स्वभाव अर्थात स्थिरता को प्राप्त कर लेते हैं। जिससे उनमें भी अदभुत ऊर्जा का संचार होता है।
योग भ्रष्ट की गति कैसे संभव है?
संसार में ऐसे लोग भी हैं जो योग मार्ग पर चल तो देते हैं-परन्तु किसी भी कारण से उनका मन बीच में ही उचट जाता है, उनके मन की चंचलता उन्हें आगे बढऩे से रोक देती है और वे आगे न बढक़र रूक जाते हैं। ऐसे लोग न तो घर के रहते हैं और न घाट के। तब उनकी क्या गति होती है? यह प्रश्न अर्जुन के हृदय में उपजता है। जिसकी सन्तुष्टि के लिए वह श्रीकृष्ण जी से पूछ लेता है-
”हे कृष्ण! यदि कोई साधक पूर्ण श्रद्घा से अपनी साधना के मार्ग पर चल तो पड़ा, परन्तु किसी भी कारण से यत्न पूरा न होने से उसका मन योग से विचलित हो गया तो वह योगभ्रष्ट हो जाता है, और ऐसी स्थिति में वह योग के उद्देश्य को प्राप्त करने से भी वंचित रह जाता है तब वह किस गति को प्राप्त करता है?
अर्जुन ऐसे साधक को किंकत्र्तव्यविमूढ़ की अवस्था में देखता है और ऐसी अवस्था में द्वन्द्व भाव में फंसा हुआ साधक न तो संसार के मतलब का ही रहता है और न ब्रह्म प्राप्ति ही कर पाता है। इसके लिए अर्जुन उसे बादल का उदाहरण देता है, जो आकाश में रहकर ही अर्थात बिना बरसे ही छिन्न-भिन्न हो जाता है और न इधर का रहता है और न उधर का रहता है। इसलिए अर्जुन श्रीकृष्ण जी से अपने संशय को मिटाने का अनुरोध करता है कि आपके सिवाय मेरे इस संशय को मिटाने वाला अन्य कोई नहीं हो सकता। अत: आप मुझे स्पष्ट करो कि योग भ्रष्ट योगी की स्थिति क्या और कैसी होती है?
योगभ्रष्ट कहते किसे क्या हैं उसके राज।
कैसी उसकी स्थिति पूछूं योगी राज।।
अर्जुन के गम्भीर प्रश्न का समाधान करते हुए श्रीकृष्ण जी ने अपनी बात को निरन्तर जारी रखते हुए आगे कहा-अर्जुन! ऐसा योगभ्रष्ट व्यक्ति अपने विनाश को ना तो यहां प्राप्त करता है और न वहां अर्थात परलोक में। श्रीकृष्ण जी कहते हैं कि कोई भी पवित्र कार्य या कल्याण कार्य करने वाला व्यक्ति कभी भी किसी भी प्रकार से दुर्गति को प्राप्त नहीं होता। उसे अपने शुभ कार्यों का परिणाम मिलता है।
जिस स्थान को पुण्यशाली लोग पाते हैं-उसे प्राप्त कर वहां बहुत समय तक रहने के उपरान्त वह योगभ्रष्ट व्यक्ति पवित्र और श्रीमान लोगों के घर में जन्म लेता है। इस प्रसंग में श्रीकृष्ण जी स्पष्ट करते हैं कि ऐसे व्यक्ति का जन्म जिन बुद्घिमान और श्रीमान योगियों के घर में होता है वह तो और भी बड़े सौभाग्य की बात है। योगीराज श्रीकृष्णजी यहां पुनर्जन्म के भारतीय वैदिक मत की पुष्टि कर रहे हैं और स्पष्ट कर रहे हैं कि जिस अवस्था से या जिस ऊंचाई से मनुष्य अपने इहजीवन का अन्त करता है, या जिस ऊंचाई पर रहते हुए उसे मृत्यु का ग्रास बनना पड़ता है-उसी ऊंचाई से अगले जीवन की भोर होती है। सन्ध्या को सोते समय जैसी मति थी -वैसी ही भोर में गति हो जाती है।
क्रमश:

Comment:

betpark giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
vdcasino giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
vdcasino giriş
betpark giriş
vdcasino giriş
betgaranti giriş
vdcasino
vdcasino giriş
vaycasino giriş
noktabet giriş
betgaranti
betpark giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
noktabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
bettilt giriş
roketbet giriş
roketbet giriş
betnano giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
vdcasino giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
vdcasino giriş
vaycasino giriş
bettilt giriş
vaycasino
vdcasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
bettilt giriş
betgaranti giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
bettilt giriş
bettilt
bettilt
vaycasino giriş
betnano giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betnano giriş
vaycasino giriş
madridbet giriş
madridbet giriş
madridbet giriş
madridbet giriş
norabahis giriş
madridbet giriş
maritbet giriş
maritbet giriş
betnano giriş
romabet giriş
romabet giriş
betnano giriş
kolaybet giriş
kolaybet giriş
maritbet giriş
maritbet giriş
kolaybet giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
vdcasino giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
mavibet giriş
vdcasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
vdcasino giriş
betgaranti giriş
mavibet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
romabet giriş
romabet giriş
Safirbet giriş
Safirbet
vdcasino giriş
mavibet giriş
betpark giriş
mariobet giriş
Betgar giriş
Betgar güncel
vegabet giriş
betnano giriş
vegabet giriş
betnano giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
betnano giriş
matbet giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
vdcasino giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
vaycasino giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betpark giriş