महंगी पड़ेगी कांग्रेस को मध्य प्रदेश में अनुसूचित जाति- जनजाति की अनदेखी ?**

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मध्य प्रदेश में कांग्रेस पार्टी आजादी के बाद से लेकर 2003 तक (1977-1980 को छोड़ दिया जाए) लगातार सत्ता में रही। इस बीच कांग्रेस के कई दिग्गज नेताओं ने प्रदेश की बागडोर संभाली। लेकिन 10 साल लगातार बागडोर संभालने के बाद दिग्विजय सिंह जब 2003 में उमा भारती के करिश्माई नेतृत्व के कारण सत्ता से बाहर का रास्ता देखा तो फिर कांग्रेस को 2018 तक सत्ता सुख भोगने का मौका नहीं मिला। अथवा यूं कहें कि मध्य प्रदेश की जनता ने कांग्रेस को प्रदेश का राजकाज करने के योग्य नहीं समझा ? मध्य प्रदेश के मतदाता निर्णय बड़ा सोच समझकर दूर दृष्टि को ध्यान में रखते हुए करते हैं।
बिल्ली के भाग्य से 2018 के चुनाव में छींका टूटा और कमलनाथ जी को मध्य प्रदेश की सत्ता मिल गई। जैसे ही कमलनाथ जी को सत्ता मिली, उन्होंने मध्यप्रदेश के परंपरागत अनुसूचित जाति , जनजाति के मतदाताओं को भूलना शुरू कर दिया अथवा यूं कहें कि नेतृत्व विहीन कांग्रेसियों ने एक महत्वपूर्ण “वोट बैंक” को दुत्कारना शुरू कर दिया। कांग्रेस यह भूल गई कि 230 विधानसभा सीटों में 82 सीटें अनुसूचित जाति – जनजाति वर्ग के लिए आरक्षित है। लेकिन इस वर्ग के 47 से अधिक विधायक कांग्रेस के होते हुए 2018 से 2021 तक जितनी भी प्रदेश में राज्यसभा के लिए सीटें खाली हुई हुईं । एक भी सीट अनुसूचित जाति – जनजाति से नहीं भरी गई ? जबकि स्वयं दिग्विजय सिंह राज्यसभा में पहुंचे। बिना जन आधार वाले विवेक तन्खा को दुबारा इस लिए राज्यसभा में पहुंचाया क्योंकि वे सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में कांग्रेस नेताओं के उल्टे सीधे कारनामों को सही साबित कर सके।
जबकि भारतीय जनता पार्टी ने इस दरमियान राज्यसभा की चार सीटें खाली हुई और चारों में से दो सीट अनुसूचित जाति और एक जनजाति वर्ग तथा एक ओबीसी के व्यक्ति को चुनकर के पहुंचाया। मालवा की अनुसूचित जाति वर्ग के लिए आरक्षित विधानसभा- अंबाह, गोहद, डबरा, करेरा, आगर, तराना, घटिया, सांवेर, सोनकच्छ और महेश्वर सीटों पर अनुसूचित जाति के उम्मीदवार विजय हुए थे। लेकिन कांग्रेस ने एक भी अनुसूचित जाति के व्यक्ति को राज्यसभा में भेजना उचित नहीं समझा ?
अब दिग्विजय सिंह, कमलनाथ और राहुल गांधी कहते फिर रहे हैं कि हम अपने ‘कोर” वोटर्स को साधने का प्रयास करेंगे ! दिग्विजय सिंह केवल और केवल मुख्यमंत्री अनुसूचित जाति के विधायकों के बल पर बने थे। मालवा की सभी अनुसूचित जाति आरक्षित सीट कांग्रेस के पक्ष में गई थी। इसी तरह 2018 में कमलनाथ जी की ताजपोशी भी अनुसूचित जाति के कांग्रेस विधायक के विधायकों के बल पर ही हुई थी। दिग्विजय सिंह और कमलनाथ अब ढिंढोरा पीटने से कुछ नहीं होगा ? क्योंकि चिड़िया खेत चुग गई है ! तथाकथित राहुल गांधी के गुरु दिग्विजय सिंह की अनुसूचित जाति के प्रति दूषित मानसिकता तभी झलक गई थी जब उन्होंने अपने बेटे को मंत्री बनाया था?
कोई भी राजनीतिक दल यदि अपने परंपरागत मतदाताओं के साथ विश्वासघात करेगा तो उसके द्वारा मीठा फल चखने की उम्मीद सरासर बेईमानी है ? उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी के सत्ता में आने पर भी ऐसा ही हुआ था । मायावती और कांशीराम जी ने तिलक तराजू और तलवार के हाथ अपनी सरकार गिरवी रख कर अनुसूचित जाति के लोगों को दुत्कारा था। परिणाम सबके सामने है ! शिवराज चौहान सिंह ने भी अपने कार्यकाल में अनुसूचित जाति के मतदाताओं की अवहेलना की है। इसकी एक झलक 2018 में देखने को मिल गई है ?
आशा की जाती है कि राजनीतिक दल अनुसूचित जाति के मतदाताओं को केवल ‘यूज एंड थ्रो’ अर्थात उपयोग करो और फेंक की मानसिकता से न देखें। 1932 में साइमन कमीशन ने जिस आधार पर अनुसूचित जाति को लिपिबद्ध किया था । उन आधारों में अब बहुत अंतर आ गया है। विशेषकर राजनीतिक सोच विचार में !!
अनुसूचित जाति के मतदाताओं की यही पुकार।
जो हमारा विकास दिल से चाहेगा उसकी बनेगी सरकार।।
डॉ बालाराम परमार’हंसमुख’

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