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आजकल कांग्रेस के नेता राहुल गांधी चीन के बारे में दुष्प्रचार कर रहे हैं कि वह हमारे सैनिकों को पीट रहा है और केंद्र की मोदी सरकार सो रही है। वास्तव में इस प्रकार के अनर्गल दुष्प्रचार के लिए राहुल गांधी अब अपनी एक विशेष पहचान बना चुके हैं। लोग उनकी बातों को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। इसका कारण केवल एक है कि उनकी बातों के पीछे कोई प्रमाणिकता नहीं होती और केवल दुष्प्रचार के लिए वह बोलने के आदी हो चुके हैं। राहुल गांधी को अपनी बातों को कहने से पहले या किसी भी प्रकार के दुष्प्रचार का एक अंग बनने से पहले अपनी ही पार्टी के और अपने ही परिवार के प्रधानमंत्रियों के इतिहास को भी खंगाल कर देखना चाहिए। उनके पिता के नाना अर्थात जवाहरलाल नेहरू के समय में 1962 में किस प्रकार देश की शर्मनाक हार हुई थी और उसमें नेहरू जी की क्या भूमिका थी ? उन्हें इस पर भी कभी बोलना चाहिए।
1962 की इस शर्मनाक हार के प्रति सचेत करते हुए सरदार वल्लभ भाई पटेल ने अपनी मृत्यु से लगभग एक माह पूर्व नेहरू को सचेत किया था यदि हम तिब्बत की सुरक्षा नहीं कर पाए अर्थात चीन के द्वारा उसे निगलने से रोक नहीं पाए तो चीन भविष्य में हमारे लिए खतरनाक होगा। …. और यही हुआ भी था। जब नेहरू की बहन विजयलक्ष्मी पंडित संयुक्त राष्ट संघ मैं भारत का प्रतिनिधित्व कर रही थी तब उन्होंने कहा था कि अमेरिका भारत को सुरक्षा परिषद का सदस्य बनाने का इच्छुक है। इस पर नेहरू ने अदूरदर्शिता दिखाते हुए अपनी बहन विजयलक्ष्मी पंडित के लिए पत्र लिखकर यह स्पष्ट किया था कि इस पद को लेने की हमें कोई आवश्यकता नहीं है। इसके लिए चीन एक प्रमुख दावेदार हो सकता है। नेहरू की उदासीनता के चलते उस समय चीन को यह महत्वपूर्ण दायित्व मिल गया। जिससे उसे वीटो पावर मिली। नेहरू की उसी अदूरदर्शिता और उदासीनता का परिणाम रहा कि चीन हमारे लिए आज तक एक खतरा बना हुआ है।
राहुल गांधी यदि इन तथ्यों पर गंभीरता से विचार करें तो उन्हें पता चलेगा कि उनकी पार्टी ने एक बार नहीं कितनी ही बार देश को और देश के सम्मान को लुटवाया और मिटवाया है। बात 27 अप्रैल 2013 की है। जब चीन की सेना भारतीय सीमा में 19 किलोमीटर भीतर तक घुसपैठ करने में सफल हो गई थी। उस समय देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह थे। वह कहने के लिए तो सरदार थे, पर वास्तव में बेअसरदार थे। उस समय राहुल गांधी की मां सोनिया गांधी रिमोट से देश की सरकार चला रही थीं।
तब राष्ट्रपति भवन में आयोजित रक्षा अलंकरण समारोह के बाद संवाददाताओं से बातचीत के दौरान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा था कि हमारे पास योजना है। हमें चीन के द्वारा भारतीय सीमा में की गई घुसपैठ के मुद्दे को तूल नहीं देना चाहिए। हम इस बात में यकीन रखते हैं कि समस्या को सुलझाया जा सकता है। बातचीत जारी है यही कि स्थान तक सीमित समस्या है। प्रधानमंत्री का यह बयान उस समय देश के सभी प्रमुख समाचार पत्र पत्रिकाओं में बड़ी प्रमुखता से छपा था। हमने भी यहां पर एक दैनिक समाचार पत्र की कटिंग आपके लिए दी है।
कहने का अभिप्राय है कि जैसे नेहरू ने चीन के किसी भी ऐसे कारनामे को जिससे भारत की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती हो, तूल न देने का निर्णय लिया हुआ था, उसी पर कांग्रेस की सरकारें 2014 तक भी काम करती रहीं।
जब हमारी सेना के सैनिक अपनी वीरता और बहादुरी का प्रदर्शन करते हुए चीन के सैनिकों को मार मारकर खदेड़ रहे हैं, तब उनके बहादुरी के कारनामे को सराहने के स्थान पर उसका उपहास करना किसी भी प्रकार से शोभनीय नहीं है। विशेष रुप से यह तब और भी अधिक बुरा लगता है, जब कोई ऐसा नेता हमारे सैनिकों की वीरता के कारनामों का उपहास कर रहा हो जो देश के प्रधानमंत्री पद का दावेदार हो।
  ज्ञात रहे कि 2013 की अप्रैल में उस समय चीन के सैनिकों की पलटन के आकार वाली एक टुकड़ी ने 15 अप्रैल को लद्दाख में 19 किलोमीटर भीतर घुसकर दौलत बेग ओल्डी के इलाके में अपना शिविर स्थापित कर लिया था। लगभग 16 हजार 3 सौ फीट की ऊंचाई वाले इस बेहद दुर्गम इलाके में उस समय पिछले 25 सालों में पहली बार इतनी तनावपूर्ण स्थिति उत्पन्न हुई थी।
उस समय के कांग्रेसी नेतृत्व का यह साहस नहीं हुआ था कि वह चीन से उसके दुस्साहस के बारे में कोई प्रतिक्रिया दे सके। अच्छी बात तो यह होती कि इस प्रकार की घुसपैठ पर तुरंत कठोर कार्रवाई होती, पर उस समय रिमोट से चलने वाले प्रधानमंत्री के भीतर इतना साहस नहीं था कि वह चीन की इस प्रकार की कार्यवाही का प्रतिकार कर सकते। उनसे यही अपेक्षा की जाती थी कि वह या तो मौन रहेंगे या फिर मामले को ठंडे बस्ते में डाल देंगे और उन्होंने ऐसा ही किया भी।
देश में इस प्रकार की चर्चाएं अक्सर चलती रहती हैं कि चीन से कांग्रेस पार्टी द्वारा संचालित राजीव गांधी फाउंडेशन के लिए बड़ी रकम दान में मिलती रही है। चीन के प्रति राहुल गांधी और उनकी मां सोनिया गांधी के नरम दृष्टिकोण पर भी अनेक बार समाचार पत्रों के स्तंभों में लेख प्रकाशित हुए हैं। इन सबके चलते प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह बेअसर होकर रह गए थे। उन्होंने सार्वजनिक रूप से यह संदेश देने में कोई संकोच नहीं किया था कि चीन के प्रति कठोर नीति अपनाए जाने के संबंध में उनके हाथ बंधे हुए हैं।
आज जब हमारे देश का सैनिक सीमा पर खड़े होकर चीन को अपनी ओर से ललकारने की क्षमता रखता है और देश का नेतृत्व चीन की आंखों में आंखें डाल कर बात करता है , इतना ही नहीं अमेरिका और रूस भी जब भारत की बातों को सम्मान देने लगे हैं और हमारे जन्मजात शत्रु पाकिस्तान की मीडिया भी अपनी टी0वी0 चर्चाओं में यह स्पष्ट रूप से स्वीकार कर रही है कि आज भारत विश्व की वह ताकत है जिससे चीन भी घबराता है तो उस समय देश के सैनिकों के मनोबल को बढ़ाने के स्थान पर उन्हें हतोत्साहित करने की कांग्रेस के नेता राहुल गांधी की सोच और दुष्प्रचार से भरी टिप्पणियों के बारे में सुन पढ़कर बहुत अफसोस होता है।
लोकतंत्र में स्वस्थ आलोचना होने के लिए सदा गुंजाइश होती है। देश के राजनीतिक नेतृत्व के लिए सशक्त विपक्ष का होना भी आवश्यक होता है। यदि ऐसा नहीं होगा तो देश का नेतृत्व सत्ता मद में सड़ जाएगा। हम सभी यह जानते हैं कि सड़ी हुई सोच और सड़ी हुई मानसिकता से कभी भी कोई राष्ट्र खड़ा नहीं हो सकता, पर यह केवल सत्तापक्ष के लिए ही अनिवार्य शर्त नहीं है कि वह सड़ी हुई मानसिकता का ना हो, वह किसी प्रकार के मद में चूर ना हो बल्कि यह बात विपक्ष पर भी लागू होती है। उसे भी तुच्छ मानसिकता से ऊपर उठकर बात करनी चाहिए। सत्ता तो आती जाती रहती है। सत्ता के लिए उतावला होना अपने लिए और देश के लिए घातक हो सकता है। बस, राहुल गांधी को यही बात समझ लेनी चाहिए।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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