गीता का पंद्रहवां अध्याय और विश्व समाज

यह जो प्रकृति निर्मित भौतिक संसार हमें दिखायी देता है-यह नाशवान है। इसका नाश होना निश्चित है। यही कारण है कि गीता के पन्द्रहवें अध्याय में प्रकृति को ‘क्षर’ कहा गया है। इससे जो कुछ बनता है वह क्षरण को प्राप्त होता है। बच्चा जन्म लेता है, फिर उसमें कहीं से ऊर्जा भरती जाती है। वह बचपन से आगे किशोरावस्था को और फिर यौवन को प्राप्त करता है। जवानी लहलहा उठती है। उसे लगता है कि सारा संसार उसकी मुट्ठी में है। पर यौवन पर जाकर एक बिन्दु ऐसा आता है, जब व्यक्ति उत्थान की ओर न जाकर वृद्घावस्था के क्षरण की ओर चलने लगता है। शरीर की ऊर्जा धीरे-धीरे नष्ट होने लगती है। यही ‘क्षर’ की अवस्था फिर एक दिन हमें मृत्यु की गोद में ले जाकर सुला देती है। व्यक्ति को पता ही नहीं चलता कि उसके भीतर ऊर्जा का जो अथाह स्रोत फूटता था और कहीं से प्रवाहित होता था-वह कहां चला गया? उसे यह भी नहीं पता चलता कि अब उस ऊर्जा के अथाह स्रोत के स्थान पर शक्ति के क्षरण की प्रक्रिया कहां से और कैसे प्रारम्भ हो गयी?
गीताकार जहां प्रकृति को ‘क्षर’ कह रहा है वहीं वह पुरूष को ‘अक्षर’ कह रहा है। ‘अक्षर’ वह है जिसका नाश या क्षरण नहीं होता। इसे यहां आत्मतत्व अर्थात आत्मा के अर्थ में समझना चाहिए। इन दोनों से अलग एक और सत्ता परमपुरूष परमात्मा की है। ‘गीता’ ‘क्षर’ और ‘अक्षर’ दोनों को ‘पुरूष’ और परमात्मा को ‘पुरूषोत्तम’ परमात्मा कह रही है। इस अध्याय में हम पुरूषोत्तम का ‘क्षर’ तथा ‘अक्षर’ के साथ सम्बन्ध क्या है? इसी पर गीताकार के विचार सुनेंगे।
संसार वृक्ष ‘अश्वत्थ’ है
वेद की शैली में संसार का चित्रण करते हुए ‘गीताकार’ ने भी संसार को एक वृक्ष की संज्ञा देते हुए इस वृक्ष का नाम ‘अश्वत्थ’ बताया है। कहा है कि एक ‘अश्वत्थ’ पीपल का पेड़ है। इस पीपल के पेड़ की जड़ें ऊपर को हैं। शाखाएं नीचे की ओर हैं। कहा जाता है कि यह पेड़ सनातन काल से चला आ रहा है। यह अव्यय है-नष्ट न होने वाला है। इस पेड़ के पत्ते वेदों के छन्द हैं। इस वृक्ष को जो व्यक्ति जान लेता है वही सच्चा वेदवेत्ता हो जाता है।
अब इस बात पर विचार करते हैं कि यहां पर गीताकार ने उस वृक्ष की उपमा पीपल से ही क्यों दी है? वृक्ष तो सृष्टि में अनेकों हैं। गीताकार उस वृक्ष की उपमा आम, बरगद, शीशम, जामुन आदि के वृक्षों में से किसी भी वृक्ष से दे सकता था। पीपल के वृक्ष से ही उपमा देने का विशेष कारण है। हम देखते हैं कि पीपल के पत्तों में चंचलता होती है। ये इतने संवेदनशील होते हैं कि हवा के हल्के से स्पर्श मात्र से भी हिल उठते हैं। मनुष्य के मन की चंचल वृत्तियां भी पीपल के पेड़ के पत्तों की भांति संवेदनशील होती हैं। विषयों की वायु के स्पर्श के हल्के से झोंके से ये भी हिल उठती हैं। जो व्यक्ति इस सनातन ‘अश्वस्थ’ नाम के पत्तों को वेद की ऋचा मानने लगता है और उनका ध्यान और मनन करने लगता है, उसका जीवन संवर और सुधर जाता है। उसके मन की चंचलता समाप्त हो जाती है। ऐसा पुरूष सच्चा वेद वेत्ता हो जाता है, जो मन की चंचलता को समाप्त कर लेता है, मन को शान्त करने का उपाय खोज लेता है।
गीताकार कहता है कि इस विश्ववृक्ष की शाखाएं नीचे और ऊपर की ओर फैली हैं, जिनमें विषयों की कोपलें फूट रही हैं। इन कोपलों को गीताकार प्रकृति के सत्व, रज और तम के खाद पानी से बढ़ता और फूलता-फलता देखता है। इस वृक्ष की कुछ जड़ें ऊपर की ओर हैं तो कुछ जड़ें नीचे की ओर भी हैं। मनुष्य लोक में अपने कर्मों के अनुसार मानव का बंधन है। कर्म व्यक्ति को बंधन में डालते हैं। ‘गीताकार’ के द्वारा जिस ‘अश्वत्थ’ नाम के कल्पवृक्ष की कल्पना की गयी है-वह वास्तव में तो नहीं है। पर यह कल्पना कोरी कल्पना मात्र भी नहीं है। इस कल्पना के पीछे गहन दार्शनिक भाव छिपा है। उसी दार्शनिक भाव को समझने की आवश्यकता है। यह ‘अश्वत्थ’ नाम का वृक्ष वास्तव में यह प्रकृति है। हर वृक्ष को प्राण ऊर्जा जड़ से ही मिलती है। जड़ ही उसका आधार होता है। इस प्रकृति को प्राण ऊर्जा ब्रह्म से मिलती है और ब्रह्म ऊपर है। यह ऊपर शब्द ध्यान देने योग्य है इसका अभिप्राय यह नहीं है कि वह ब्रह्म किसी अन्य लोक में रहता है और वहां उसका दरबार लगा है, जिसमें सोफे पड़े हैं, कुछ लोग उसकी सेवा में लगे हैं और वह एक ऊंचे सिंहासन पर बैठा आराम से हुक्का पी रहा है। वास्तव में उस ‘ऊपर वाले’ का ऐसा कोई ‘मुगलिया दरबार’ कहीं नहीं है, पर फिर भी उसे ऊपर वाला कहा जाता है तो कोई न कोई कारण तो होगा ही। ऊपर का एक अर्थ ऊंचाई भी है। व्यक्ति को आध्यात्मिकता और ब्रह्म विद्या ऊंचाई की ओर ले जाती है, ऊपर उठाती है। इस ऊंचाई पर जाकर ज्ञान की पराकाष्ठा को पाना ऊंचाई को छूना है, ऊपर जाना है, तो वह ‘ऊपर वाला’ मिल जाता है। वह ज्ञान की ऊंचाई पर मिलता है, वहां जाकर उस सदा साथ रहने वाले से व्यक्ति का साक्षात्कार होता है। वहां जाकर पता चलता है कि जब मैं इस ‘ऊपर वाले को’ खोजने चला था-इससे मिलने चला था तो उस समय कितनी नीचाई पर था-कितने अज्ञान में था? अत: ‘ऊपर वाले’ को ऐसे ही अर्थ में लेना और समझना चाहिए।
संसार में प्रकृति रूपी ‘अश्वत्थ’ वृक्ष की जड़ें अगर ऊपर को हैं तो पता चला कि यह ‘अश्वत्थ’ वृक्ष तो शीर्षासन किये खड़ा है, उल्टा है। पर ब्रह्म ऊंचाई पर है, उत्कृष्ट है, इसलिए इस वृक्ष की ऐसी स्थिति है। इस वृक्ष की टहनियां नीचे को हैं। बात स्पष्ट है कि जब उल्टा लटक रहा है तो टहनियां तो नीचे को हो ही जानी हैं, इसके लिए विद्वानों का मानना है कि प्रकृति से महान, महान से अहंकार फिर पंचतन्मात्राएं, पांच ज्ञानेन्द्रियां, पांच कर्मेन्द्रियां पांच महाभूत और मन ये सब वृक्ष की टहनियां हैं। इन्हीं टहनियों को अपने विकास और वृद्घि के लिए सत्व रज और तम से अर्थात इन गुणों से खाद मिलता है। इन टहनियों पर फूट रही कोपलों संसार के रूप, रस, गंध, शब्द और स्पर्श ये पांच विषय हैं। यदि आत्मतत्व को खोजना है, ज्ञान इस वृक्ष की जड़ों को ज्ञान की तलवार से काटना ही पड़ेगा।
‘गीताकार’ कहता है कि जिस वृक्ष की हम चर्चा कर रहे हैं वह यहां कहीं भी नहीं मिलता। उसका न तो कोई आदि है, और न अन्त है। वह कहीं पर भी टिका हुआ या प्रतिष्ठित हुआ भी नहीं दिखाई देता। फिर भी वह गहरी जड़ों वाला है। इसको सुकोमल ज्ञान की अर्थात अनासक्ति की दृढ़ तलवार से ही काटा जा सकता है, यदि इसकी जड़ों को काट लिया और सच्चा ज्ञान हो गया तो फिर उस ‘परब्रह्म’ को पाना कोई बड़ी बात नहीं रह पाएगी। इस पर विचार प्रकट करते हुए गीता कहती है कि इस ‘अश्वत्थ’ वृक्ष की जड़ों को काटकर उस स्थान को खोज निकालना चाहिए, जहां एक बार पहुंचने के बाद फिर कभी लौटा नहीं जाता। उस ओर बढऩे के लिए एक चाव का भाव पैदा करना पड़ता है। जिसके लिए गीता कह रही है कि जिसे उस आदि पुरूष की ओर जाना है अर्थात ‘परब्रह्म’ को पाना है-वह यह संकल्प (चाव का भाव) करे कि मैं उस आदि पुरूष की ओर जा रहा हूं। उत्थान के प्रति समर्पण की इस भावना में ही गीता चाव का भाव जगाती है और साधक को प्रेरित कर उत्थान की ओर ऊपर वाले की ओर परब्रह्म की ओर बढऩे की प्रेरणा देती है, वह कहती है कि उसी परब्रह्म से विश्व की यह पुरातन धारा बह रही है उसे जानना ही जीवन का ध्येय है।
क्रमश:

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