गीता का सोलहवां अध्याय

श्रीकृष्णजी की यह सोच वर्तमान विश्व के लिए हजारों वर्ष पूर्व की गयी उनकी भविष्यवाणी कही जा सकती है जो कि आज अक्षरश: चरितार्थ हो रही है। स्वार्थपूर्ण मनोवृत्ति के लोगों ने जगत के शत्रु बनकर इसके सारे सम्बन्धों को ही विनाशकारी और विषयुक्त बना दिया है।
अल्पबुद्घि नष्टात्मा करें भयंकर कर्म।
जगत के शत्रु बनें करते हैं दुष्कर्म।।
कभी तृप्त न होने वाली लालसा का आश्रय लेकर, दम्भ, मान और मद से युक्त मोह के कारण, असद ग्रहों-दुष्ट, आसुरी इच्छाओं को ग्रहण करके अपवित्र निश्चयों को मन में लेकर कार्य में प्रवृत्त होने वाले ये आसुरी प्रवृत्ति के लोग जगत का अहित करते रहते हैं। ऐसे दुर्गुण संसार को नरक बना देते हैं।
श्रीकृष्णजी ने ये जितने भी दुर्गुण गिनाये हैं-ये तो बने बनाये खेल को बिगाड़ देते हैं, जिन घरों में ऐसी दुष्टात्माएं जन्म लेती हैं, जिनका चिन्तन इतना निम्न होता है-वे परिवार नष्ट हो जाते हैं। ऐसे लोगों की लालसाओं की प्रचण्ड लपटें उन्हें तो मारती ही हैं, साथ ही अन्यों का भी विनाश करती हैं। इस प्रकार के चिन्तन से अपरिमित चिन्ताओं का जन्म होता है। श्रीकृष्णजी का कहना है कि ये अपरिमित चिन्ताएं सृष्टि के प्रलय पर ही जाकर समाप्त होंगी। इस प्रकार ये चिन्ताएं दीर्घकाल तक हमारा पीछा करती रहेंगी। हम कामनाओं के भोगी बनकर इनमें पड़े-पड़े भुनते रहते हैं। हमारा चिन्तन बदल जाता है कि भोग ही सर्वस्व है-ऐसा हम मानने लगते हैं।
भोग के विषय में जिसका चिन्तन ऐसा हो जाता है उसका आत्मिक पतन होने लगता है। जो लोग भोगों से छुटकारा पाकर कर्मयोग के माध्यम से मुक्ति की कामना करते हैं औरमुक्ति की साधना में लगे रहते हैं उनकी जीवन सफल और सार्थक होता है।
श्रीकृष्णजी के अनुसार लालसाएं हमारे लिए सैकड़ों जालों का काम करती हैं। जिनमें हम एक बार फंस गये तो फिर उनसे निकल पाना बड़ा कठिन है। काम और क्रोध का पंजा तो इतना भयानक है कि अपने पाप-ताप से मनुष्य का सर्वनाश करके ही दम लेता है। इन जालों में फंसे लोग अज्ञानतावश अन्यायपूर्ण उपायों के द्वारा ढेर की ढेर सम्पत्ति का संचय करने के लिए प्रयास करते रहते हैं। इनकी लालसा दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जाती ह,ै ये सोचते रहते हैं कि यह तो मैंने प्राप्त कर ही लिया है-अब आगे ऐसा कर लूंगा फिर वैसा कर लूंगा और एक दिन सब कुछ मेरा हो जाएगा। यह धन तो मेरा है ही कल को वह भी मेरा हो जाएगा।
ऐसी लालसा करने वाले लोग संसार में उपद्रव और उन्माद फैलाते हैं। आज के जितने आतंकवादी संगठन हैं वे सारे के सारे अराजकतावादी हैं और इसी सोच से प्रेरित होकर संसार में विनाश की प्रक्रिया को प्रबल करते जा रहे हैं। सरकारें इन पर नियंत्रण स्थापित करना चाहती हैं, परन्तु यह नियंत्रण डंडे के बल पर स्थापित किये जाने का प्रयास किया जाता है। इनकी दृष्टि में यदि गीता का समभाव उत्पन्न कर दिया जाए तो सारी व्यवस्था में परिवर्तन आ सकता है।
ऐसी सोच अन्तहीन होती है और यही गुण लालसा में पाया जाता है। यह कभी भी ना तो थमती है और ना ही थकती है। यह व्यक्ति को रूकने भी नहीं देती और झुकने भी नहीं देती। वह अहंकार में फूला रहता है और अपनी मनमर्जी करता रहता है, वह शत्रुओं का नाश नहीं कर पाता अपितु शत्रुओं में वृद्घि करता रहता है। शत्रुओं का नाश वैर विरोध को शान्त करने से होता है, परन्तु लालसाएं वैर विरोध को शान्त नहीं होने देती हैं।
लालसाएं वैर विरोध की अग्नि में घी डालने का काम करती हैं, जिससे वह अग्नि और भी प्रचण्ड हो उठती है।
लालसाओं में घिरा-फंसा व्यक्ति सोचता है कि इस शत्रु को मैंने मार लिया और अब शेष को भी मार लूंगा। वह घमण्ड में स्वयं को ही भगवान मानने लगता है। उसके यहां हिंसा और हत्या का भाव उसके विचारों में और कृति में सदा समाया रहता है और यह एक सर्वमान्य सत्य है कि हिंसा और हिंसा मिलकर प्रचण्ड हिंसा को जन्म देती हैं। इस प्रचण्ड हिंसा में ही यह संसार आजकल उबल रहा है। हर व्यक्ति इस प्रचण्ड हिंसा की चपेट और लपेट में है। सब एक दूसरे पर अपना प्रभुत्व जमाने का प्रयास कर रहे हैं और जितना ही इस प्रयास को बढ़ाते जाते हैं उतनी हिंसा की लपटें बढ़ती जा रही हैं। सारा संसार एक जलता हुआ वन बन चुका है। जिसमें सभी प्राणी जल-जलकर मर रहे हैं। लालसा में फंसा व्यक्ति अर्थात आसुरी प्रकृति वाला व्यक्ति सोचता है कि मैं सबसे धनी हूं, ऊंचे कुल में उत्पन्न हुआ हूं, अत: मेरे समान कोई और नहीं है। ऐसा व्यक्ति अज्ञानतावश कहता फिरता है कि मैं यज्ञ करूंगा, दान दूंगा और सुख चैन की अनुभूति करता रहूंगा। इस प्रकार की अज्ञानता के कारण ये आसुरी प्रवृत्ति के लोग संसार में अव्यवस्था बनाये रखते हैं। अपनी इसी प्रकार की सोच के कारण ये लोग अनेकों भ्रान्तियों का शिकार बनते हैं और मोहजाल में फंसे रहकर विषय भोगों में दिनरात अपनी ऊर्जा का अपव्यय करते रहते हैं। फलस्वरूप एक दिन घोर नरक में जा पड़ते हैं। जहां से इनका उद्घार हो पाना सम्भव नहीं हो पाता है। गीता ऐसे नारकीय जीवन को मानव के लिए अनुपयुक्त मानती है। इसीलिए वह मनुष्य को उत्कृष्ट, सार्थक जीवन जीने के लिए एक जीवनशैली प्रधान कर रही है।
आसुरी प्रकृति के लोगों के विषय में श्रीकृष्णजी कह रहे हैं कि ये लोग अपनी प्रशंसा अपने आप ही करते रहते हैं । अपनी पीठ अपने आप थपथपाना यह भी एक रोग है और यह रोग आजकल लोगों में बहुत देखा जा रहा है। जब कोई अन्य व्यक्ति प्रशंसा के लिए नहीं मिलता है तो व्यक्ति स्वयं ही अपनी प्रशंसा करने लगता है। ऐसे लोग अकड़ में बिगड़े रहते हैं। ये लोग धन व सम्मान के मद में सड़े रहते हैं। इन्हें यज्ञादि में कोई रूचि नहीं होती जो भी यज्ञादि करते हैं वह केवल नाम के लिए करते हैं। अहंकार, बल, घमण्ड, काम और क्रोध के वशीभूत होकर ये आसुरी प्रकृति के लोग एक और भयंकर व्याधि के शिकार बन जाते हैं और वह व्याधि है-असूया की। असूया का अभिप्राय दूसरों की निन्दा करने से है। इन लोगों को जब अपनी प्रशंसा सुनने को नहीं मिलती तो ये दूसरों से जलन करने लगते हैं और यह मानने लगते हैं कि दूसरों के पास कुछ भी नहीं है जो कुछ है मेरे पास है। यदि अपने पास दूसरों से कुछ कम लगता है तो फिर दूसरों की निन्दा, चुगली करने उसे कमतर दिखाने का घटिया और ओच्छा प्रयास करते हैं। इस प्रकार की सोच से समाज का परिवेश विषाक्त बनता है।
श्रीकृष्णजी कह रहे हैं कि इस प्रकार के असूया आदि दुर्गुणों में फंसे लोग वास्तव में नराधम होते हैं। ये द्वेष करने वाले लोग अपने अशुभ कार्यों से संसार का सदा ही अकल्याण करते रहते हैं। जो लोग ऐसे दुर्गुणों में फंसे रहते हैं-वे जन्म-जन्म तक आसुरी योनियों में पड़े रहकर कष्ट भोगते हैं। श्रीकृष्णजी कह रहे हैं कि ऐसे मूढप्राणी मुझे पा नहीं सकते। ये लोग ईश्वर का साक्षात्कार नहीं कर सकते। जिससे इनकी अधम गति होती है।
क्रमश:

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