गीता का अठारहवां अध्याय

अंग्रेजों के कानून ने किसी ‘डायर’ को फांसी न देकर और हर किसी ‘भगतसिंह’ को फांसी देकर मानवता के विरूद्घ अपराध किया। यह न्याय नहीं अन्याय था। यद्यपि अंग्रेज अपने आपको न्यायप्रिय जाति सिद्घ करने का एड़ी चोटी का प्रयास आज भी करते हैं। इसके विपरीत गीता दुष्ट के विनाश करने को या उसका वध करने को अपराध नहीं मानती।
विनाश करना दुष्ट का होता नहीं है पाप।
बुरे कर्म तुझे बावरे देंगे घोर सन्ताप।।
भारतीय मनीषा में दुष्ट के विनाश को अपराध न मानकर प्रशंसनीय कार्य माना गया है। जैसे जिसके कर्म हैं, वैसा उसको फल मिलना निश्चित है। यह फल कोई अन्य देने वाला नहीं होता-अपितु हर व्यक्ति को उसके कर्म ही रूलाते हैं, और कर्म ही पुरस्कार दिलाते हैं।
‘सब लोगों को मारता हुआ भी नहीं मारता’ -का यही अर्थ है। हमारे जितने भर भी ‘भगतसिंह’ स्वतन्त्रता आन्दोलन में अंग्रेजों को मार रहे थे-वे मारते हुए होकर भी मार नहीं रहे थे, अपितु वे मानवता का उद्घार कर रहे थे। मानवता पर उपकार कर रहे थे। वे मानवता के लिए लड़ रहे थे कि अत्याचार और अनाचार कहीं पर भी न रहने पाये। उनके इस महान उद्देश्य को उनसे छीनने के लिए अंग्रेज जितने भर भी प्रयास कर रहे थे वे सबके सब अमानवीय थे। मानवता के विरूद्घ अपराध थे। अंग्रेजों ने इसे इस प्रकार उल्लेखित किया है कि जैसे उनके स्वयं के कार्य तो मानवता के हित में थे और हमारे क्रान्तिकारियों के कार्य मानवता के विरोध में थे।
श्रीकृष्णजी कहते हैं कि अर्जुन मनुष्य को कर्म की प्रेरणा देने वाले त्रिक हैं-ज्ञाता, ज्ञेय और ज्ञान। (जब ज्ञान से कर्म होने लगता है) तब कार्य के अंग कत्र्ता, कर्म, और करण ये कर्म के तीन अंग हैं। इनमें भी ज्ञान, कर्म और कत्र्ता को ही मुख्य माना गया है।
वेदान्तशास्त्र में ज्ञाता, ज्ञेय और ज्ञान को त्रिपुटी कहा गया है। यह गीता का ज्ञान सम्बन्धी दार्शनिक विवेचन है। इसे कर्म का त्रिक (तिक्कड़ी शब्द इसी त्रिक से बना है) कहा जाता है। घड़े को बनाने का विचार ज्ञान है, घड़े का बन जाना कर्म है। इस प्रकार प्रत्येक कर्म पहले ‘ज्ञान’ में आता है।
त्रिविध ज्ञान क्या है
गीता ज्ञान को भी तीन भागों में बांटकर देखती है। जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य इस चराचर जगत में उस एक ही परमज्योति को देखता है, अथवा एक ही अविनाशी सत्ता के दर्शन करता है और विभक्तों में उस अविभक्त परमसत्ता अर्थात परमपिता परमात्मा को देखता है और निद्र्वन्द्व रहकर जिसकी बुद्घि उसे सही निश्चय कराने में सहायता करती है-उस ज्ञान को सात्विक ज्ञान कहकर श्रीकृष्णजी चिह्नित कर रहे हैं। ऐसे ज्ञान के द्वारा भक्त को ईश्वर की वास्तविक सत्ता का बोध होता है और उसकी बुद्घि किसी भी प्रकार के विभ्रम या भ्रान्ति का शिकार नहीं होती। उसे एक स्पष्ट मार्ग मिल जाता है और वह मार्ग ऐसा होता है जिस पर किसी प्रकार का कोई भटकाव नहीं होता।
श्रीकृष्णजी राजसिक ज्ञान के विषय में अर्जुन को बताते हुए स्पष्ट कर रहे हैं कि जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य इस चराचर जगत में भूतों की पृथकता के कारण उस परमसत्ता अर्थात परमात्मा को एक न देखकर विविध रूपों में देखता है,- वह राजसिक ज्ञान होता है। स्पष्ट है कि ऐसे राजसिक ज्ञान में मनुष्य की बुद्घि में विभ्रम और भ्रान्ति की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। आगे तामस ज्ञान के बारे में प्रकाश डालते हुए श्रीकृष्णजी ने अर्जुन को स्पष्ट किया है कि तामस ज्ञान ऐसा ज्ञान है जिसमें भक्त किसी एक कार्य को ही सब कुछ मान लेता है। किसी एक कार्य को ही सब कुछ मान लेना -मानो ज्ञान को ससीम कर लेना है। ऐसा ज्ञान ‘अहैतुक’ है-कारण का पता नहीं लगाता। तत्व का पता नहीं लगाता, इसलिए ‘अतत्त्वार्थ’ है। अल्प है, संकीर्ण है, सम्पूर्ण की दृष्टि से नहीं देखता।  
एक व्यक्ति ऐसा है जो सम्पूर्ण वसुधा को ही अपना परिवार मानता है, उसका मानस ‘विश्वमानस’ है। जबकि एक व्यक्ति ऐसा है-जो अपने परिवार से बाहर कुछ समझता ही नहीं है, जानता ही नहीं है। उसका सारा संसार अपने परिवार की चारदीवारियों में सिमट जाता है । जबकि एक व्यक्ति परिवार की चारदीवारियों का विस्तार इतना कर लेता है कि सम्पूर्ण संसार उसमें समाहित हो जाता है। जिसका दायरा संकीर्ण है, उसकी सोच संकीर्ण है, उसका ज्ञान संकीर्ण है, अल्प है, तामस है। इस तामस ज्ञान ने व्यक्ति के व्यक्तित्व को संकीर्ण और सीमित कर दिया है। सीमाओं में बांध दिया है। उसके पंखों को कुतर दिया है, और उसे उडऩे योग्य नहीं छोड़ा है।
त्रिविध कर्म
श्रीकृष्णजी ने गीता में त्रिविध कर्म की भी बड़ी सुन्दर व्याख्या की है। वह कहते हैं कि सात्विक कर्म, राजस कर्म और तामस कर्म-ये तीन प्रकार के कर्म हैं।
पहले सात्विक कर्म के विषय में स्पष्ट करते हुए श्रीकृष्णजी कहते हैं कि सात्विक कर्म आसक्ति के बिना और राग-द्वेष से ऊपर उठकर निष्पादित किये जाते हैं। इनमें फल की इच्छा से रहित होकर कर्म किया जाता है। ऐसे कर्म करने से व्यक्ति का कल्याण होता है। ये कार्य धर्म सम्मत और न्यायसंगत होते हैं। इनके करने से लोक व्यवस्था बनी रहती है और सारा कुछ धर्मानुसार, न्यायानुसार और नीति अनुसार होता रहता है। जिससे किसी को कोई आपत्ति नहीं होती। सब एक दूसरे के कार्यों में सहयोगी होते हैं, कोई किसी के कार्य में जानबूझकर न तो अडंग़ा डालता है और न ही किसी प्रकार का हस्तक्षेप करता है।
राजस कर्म के विषय में श्रीकृष्णजी ने अर्जुन को बताया कि राजस कर्मफल की प्राप्ति की इच्छा से किये जाते हैं। राजस कर्म को करने वाले व्यक्ति के भीतर अहंकार की भावना होती है। इन कर्मों को करने में बहुत परिश्रम लगता है। इन राजस कर्मों के विषय में डा. राधाकृष्णन कहते हैं कि-”जिस कर्म में बहुत परिश्रम लगता है, जो ‘बहुलायास’ है, उसे राजसिक क्यों कहा? उसे राजसिक कहने का कारण यह है कि यह भावना कि हम किसी कष्ट में गुजर रहे हैं-कर्म के मूल्य को समाप्त कर देती है। चेतनापूर्वक यह अनुभव करना कि हम कोई बड़ा काम कर रहे हैं-कोई महत्वपूर्ण बलिदान कर रहे हैं, स्वयं बलिदान की विफलता है। परन्तु जब कोई काम किसी आदर्श के लिए किया जाता है, तब वह श्रम श्रम नहीं लगता, बलिदान बलिदान नहीं लगता। उसे पूर्णत: चेतनारहित होकर अहंकार की भावना को छोडक़र मुस्कराते हुए करना, जैसे कि सुकरात ने विष पिया था, सात्विक कर्म का ढंग है।”
रागद्वेष के बिना किया जाए जो कर्म।
फल की इच्छा से रहित सात्विक है वह कर्म।
संसार में ऐसे कर्म तामस कर्म कहलाते हैं-जिनमें यह द्वन्द्व बना रहता है कि इसका क्या परिणाम होगा? क्या हानि हो जाएगी? किस-किस की हिंसा होगी? हमारा सामथ्र्य इस कार्य को करने का है या नहीं?-इन सब बातों पर विचार किये बिना ये कर्म बिना सोचे-समझे मूर्खतावश कर दिये जाते हैं।
क्रमश:

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