सत्यार्थ प्रकाश में इतिहास विर्मश ( एक से सातवें समुल्लास के आधार पर) अध्याय (18) राजा के मंत्री और दूत कैसे हों?

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राजा के मंत्री और दूत कैसे हों?

संसार के जिन- जिन देशों में आज तानाशाही है या अबसे पूर्व में तानाशाही रही है, वहां के शासकों की एक प्रवृत्ति देखी गई है कि वे अपने बौद्धिक बल पर ही अधिक विश्वास रखते हैं। जैसे चाहें जो चाहें – उसे पूरा करना उनकी प्रवृत्ति में सम्मिलित हो जाता है। इसी को ऐसे राजाओं की तानाशाही या स्वेच्छाचारिता कहा जाता है। इससे शासक वर्ग निरंकुश हो जाता है और वह जनता पर मनमाने अत्याचार करने लगता है।
भारत में प्राचीन काल से ही बुद्धि बल में श्रेष्ठ व्यक्ति को ही राजा बनाया जाता रहा है परंतु इसके उपरांत भी यह माना जाता है कि उसके अकेले की बुद्धि के सहारे सारे राष्ट्र को छोड़ना उचित नहीं होगा। इससे राजा के भीतर अहंकार का भाव उत्पन्न होगा और वह सोचने लगेगा कि वह जो चाहता है सो कर सकता है या वह जो भी निर्णय लेता है वही उचित होता है। ऐसी प्रवृत्ति से राजा प्रजा के प्रति उत्तरदायी न रहकर उसके प्रति निर्दयी हो जाता है। यही कारण है कि राजा के लिए योग्य और निर्भीक मंत्रियों की आवश्यकता अनुभव की गई। मंत्रियों के भीतर निर्भीकता का होना राजा को निरंकुश बनने से रोकने के लिए आवश्यक है।
यदि आज के लोकतांत्रिक देशों के मंत्रियों को देखें तो अधिकांश देशों की स्थिति यह है कि उनके मंत्रियों की ना तो कोई योग्यता निर्धारित की गई है और ना ही उनके भीतर निर्भीकता को अनिवार्य माना गया है। कहीं-कहीं अपने मंत्रालय से संबंधित विषय की योग्यता मंत्रियों में अवश्य देखी जाती है परंतु निर्भीकता बहुत कम मंत्रियों में देखने को मिलती है। यदि निर्भीकता दिखाते हुए कहीं कोई मंत्री किसी अपने प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति को सही परामर्श देने का साहस करता है तो आजकल उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। यही कारण है कि अधिकांश मंत्री चुप रहकर पद से चिपके बैठे रहते हैं। इस प्रकार के मंत्रियों के होने से लोकतांत्रिक शासन प्रणाली उपहास का पात्र बन कर रह गई है।

राजा के मंत्री या सचिव की योग्यता

इस विषय में प्रकाश डालते हुए स्वामी दयानंद जी महाराज सत्यार्थ प्रकाश के छठे समुल्लास में यह बात स्पष्ट करते हैं कि    "राजा के सचिव या मंत्री स्वदेश में उत्पन्न हुए लोग ही बनने चाहिए। कोई भी सचिव या मंत्री विदेश में पैदा नहीं होना चाहिए। इससे स्पष्ट होता है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के समय यदि स्वामी जी महाराज होते तो वह प्रत्येक मंत्री के लिए संविधान में यह अनिवार्य शर्त स्थापित कराते कि उसका स्वदेश या स्वराज्य में उत्पन्न होना आवश्यक है। स्वामी जी महाराज का मानना था कि प्रत्येक मंत्री / सचिव को वेदादि शास्त्रों का मर्मज्ञ होना चाहिए। वह शूरवीर हो। उसका लक्ष्य अर्थात विचार निष्फल न हो। राजा को चाहिए कि अच्छे प्रकार सुपरीक्षित 7 या 8 उत्तम धार्मिक चतुर सचिवों की नियुक्ति करे।"
वास्तव में इस प्रकार की राजा की योग्यता को आज के संविधान में भी स्थापित करना चाहिए। यह बहुत ही गलत है कि भारत के वैदिक आर्ष ग्रंथों को राजनीति का आदि स्रोत न मानकर बाहरी देशों की बौद्धिक संपदा को चुराकर हमारे देश के संविधान का निर्माण किया गया है। संविधान में हम अपनी भारतीय मनीषा, भारतीय चिंतन और भारतीय विचार को स्थापित नहीं कर पाए। उसी का परिणाम है कि देश राजनीतिक रूप से अभी भी अस्थिर है।

7 या 8 मंत्रियों की कोई अनिवार्य शर्त नहीं है। देश, काल परिस्थिति के अनुसार इनकी संख्या अधिक भी हो सकती है। जिस समय मनुस्मृति लिखी गई थी , उस समय आर्यावर्त की जनसंख्या बहुत कम थी। इतना ही नहीं, महर्षि दयानंद जी के समय में भी आज की अपेक्षा भारतवर्ष की जनसंख्या 5 गुना कम थी। राजनीति शास्त्र के इस सिद्धांत की भारतीय ऋषि मनु के द्वारा की गई घोषणा और उन्हीं के अनुसार अन्य राजनीतिशास्त्रियों के द्वारा अपनाई गई प्रणाली को देखने से पता चलता है कि भारत में सर्वोच्च पद पर बैठे राजा के नीचे सचिव अथवा मंत्री और उनके नीचे के अन्य अधिकारी एवं उन अधिकारियों के नीचे प्रदेशों, प्रांतों या जिलों या ग्रामों को चलाने के लिए शासक वर्ग या प्रशासन वर्ग के अन्य अधिकारी गण का होना यह स्पष्ट करता है कि भारत ने पूर्णतया लोकतांत्रिक पद्धति के आधार पर शासन प्रणाली का आविष्कार प्राचीन काल में ही कर लिया था।

राजा के लिए अनेक सचिव क्यों ?

 राजा के लिए सचिवों की नियुक्ति क्यों की जाए ?  इस बात का उत्तर देते हुए महर्षि दयानंद जी महाराज अगले श्लोक का अर्थ करते हुए कहते हैं कि विशेष सहायक के बिना जो सुगम कर्म है वह भी एक के करने में कठिन हो जाता है। कहने का अभिप्राय है कि यदि अन्य सहायक लोग या अधिकारी ना हो तो एक व्यक्ति संपूर्ण राष्ट्र के कार्यों को नहीं कर सकता। जब ऐसा है तो महान राज्य कर्म एक से कैसे हो सकता है ? इसलिए एक को राजा और एक की बुद्धि पर राज्य के कार्य का निर्भर रखना बहुत ही बुरा कार्य है। 
  इन सचिवों या मंत्रियों के साथ सभापति के लिए यह अनिवार्य किया गया है कि वह नित्य प्रति राज्य कार्यों में कुशल विद्वान मंत्रियों के साथ सामान्य वार्ता करके किसी से संधि या मित्रता किसी से विग्रह अर्थात विरोध ( स्थान ) स्थिति समय को देखकर चुपचाप रहना, अपने राज्य की रक्षा करके बैठे रहना, जब अपना उदय अर्थात वृद्धि हो तब दुष्ट शत्रु पर चढ़ाई करना, मूल राजसेना कोश आदि की रक्षा, जो जो देश प्राप्त हो उस उस में शांति स्थापन उपद्रव रहित करना इन 6 गुणों का विचार नित्य प्रति किया करे। 

इसके उपरांत संबंधित विभाग या कार्य या क्षेत्र के संबंध में प्राप्त किए गए सचिवों या मंत्रियों के विचारों का निष्कर्ष निकाला जाए और जो प्रजाहित में या राष्ट्रहित में उचित हो, उसे करना चाहिए। कुल मिलाकर शासन का प्रत्येक कार्य सम्यक रूप से होना चाहिए। निर्णय चाहे देर से ही लिए जाएं पर वह स्थाई प्रभाव दिखाने वाले होने चाहिए । इसके साथ- साथ उनमें जनहित का ऊंचा चिंतन स्पष्ट परिलक्षित होना चाहिए।

मंत्री का पवित्रात्मा होना

आजकल बुद्धिमान निश्चितबुद्धि और चतुर लोगों को राज्य कार्यों में अधिकारी, सचिव या मंत्री बनाने की परंपरा तो देखी व सुनी जाती है, परंतु एक बात जो भारतीय वांग्मय में बहुत ही महत्वपूर्ण मानी गई है, वह है मंत्री, सचिव या अधिकारी का पवित्र आत्मा होना। इस पर संपूर्ण विश्व के सभी संविधान मौन हैं। कहने का अभिप्राय है कि आज के राजनीतिक मनीषियों और चिंतकों के चिंतन में या मनीषा में या उनके बोध में यह बात नहीं आई कि किसी भी राजकीय सचिव ,मंत्री या अधिकारी का पवित्र आत्मा होना भी आवश्यक है और इसकी व्यवस्था संबंधित संविधान में होनी चाहिए। इस बात को स्वामी दयानंद जी ने अनिवार्य माना है। 

पवित्रात्मा मंत्रियों की नियुक्ति से सर्वत्र पवित्रता परिलक्षित होगी। आजकल हम स्वच्छता अभियान की बात शासकीय स्तर पर बहुत अधिक सुनते हैं। हमारा मानना है कि यह स्वच्छता अभियान पहले आत्मा की स्वच्छता अर्थात पवित्रता से आरंभ होना चाहिए। यदि राजनीतिक लोगों की सोच व चिंतन में कहीं दोष है तो ऐसे राजनीतिज्ञ देश के लिए पवित्रात्मा नहीं हो सकते। मन की मालीनता दूर हो जाए, हृदय के दोष दूर हो जाएं, आत्मा के ऊपर डाले गए कुसंस्कारों की सारी मैल धुल जाए -. जब ऐसे लोग राजनीति के शिखर पर बैठे होंगे तो राष्ट्र और समाज निश्चित रूप से उसका लाभ प्राप्त कर सकेंगे।

अधिकारियों की नियुक्ति

 राजा के लिए यह अनिवार्य किया गया है कि "उसके राज्य कार्य के संचालन के लिए जितने लोगों की आवश्यकता है उतने लोगों को वह अधिकारी अर्थात नौकर नियुक्त करे। स्पष्ट है कि देश, काल, परिस्थिति के अनुसार इनकी संख्या न्यून वा अधिक हो सकती है। स्वामी दयानंद जी महाराज कहते हैं कि राजा शूरवीर बलवान कुलोत्पन्न पवित्र भृत्यों को बड़े-बड़े कामों में और भीरू अर्थात डरने वालों को भीतर के कामों में नियुक्त करे।"
जब शासन की नीतियों में भाई भतीजावाद प्रारंभ हो जाता है तो कई बार राजा या शासकीय कार्यों में लगे अधिकारी महत्वपूर्ण स्थानों पर डरपोक लोगों को बैठा देते हैं। जिससे देश की सुरक्षा के लिए भी खतरा पैदा होता है । साथ ही सामाजिक दृष्टिकोण से भी इसे न्याय पूर्ण नहीं कहा जा सकता। इससे शासन की नीतियों में पक्षपात आता है और पात्र देखकर कार्य न देने की प्रवृत्ति के कारण राष्ट्र दुर्बल होता है। शासकीय कार्यों में पूर्ण पारदर्शिता तभी तक मानी जा सकती है जब तक पात्रता के अनुरूप लोगों को कार्य दिए जाने की प्रवृत्ति स्पष्ट रूप में शासक और शासक वर्ग की कार्यशैली में झलकती रहती है। यदि कहीं इस प्रकार की कार्यशैली में छिद्र हो गया है या पक्षपात की गंध आने लगी है तो समझ लीजिए कि शासन में भ्रष्टाचार पनप चुका है।

पक्षपाती शासक और पक्षपाती अधिकारीगण कभी भी परिजनों के साथ न्याय नहीं कर पाते हैं। ऐसे लोग लिंग , जाति, संप्रदाय के आधार पर लोगों के मध्य भेद करते हैं। इतना ही नहीं, भेद करने की एवज में रिश्वत भी लेते हैं और शासन में भ्रष्टाचार को खुला आमंत्रण देते हैं।

दूत की नियुक्ति और उसकी योग्यता

  महर्षि दयानंद ने दूत के कार्य के निष्पादन के लिए भी योग्यताएं निश्चित की हैं। महर्षि मनु के माध्यम से सत्यार्थ प्रकाश के छठे समुल्लास में ही स्वामी जी महाराज व्यवस्था देते हैं कि

जो प्रशंसित कुल में उत्पन्न चतुर, पवित्र हावभाव और चेष्टा से भीतर हृदय और भविष्य में होने वाली बात को जानने वाला है, और जो सब शास्त्रों में विशारद चतुर है ,उस दूत को भी राजा के द्वारा रखना चाहिए।
स्वामी दयानंद जी दूत के बारे में सबसे पहली बात यह कहते हैं कि वह प्रशंसित कुल में उत्पन्न होना चाहिए। इसका अभिप्राय है कि उसके कुल में किसी पर भी ऐसा कोई चारित्रिक दाग न लगा हो जिससे उनकी देशभक्ति, समाज भक्ति, धर्म और संस्कृति के प्रति समर्पण- भाव संदिग्ध बन गया हो। जिस परिवार में देश सेवा, समाज सेवा और मानव की सेवा को एक संकल्प के रूप में लिया जाता हो, वह परिवार सदा प्रशंसा का पात्र होता है। दूत कर्म करने वाला व्यक्ति ऐसे प्रशंसित परिवारों से निकल कर आना चाहिए। समाज सेवा जब निस्वार्थ भाव से की जाती है तो ऐसे लोग दूसरों के लिए प्रशंसा का पात्र बन जाते हैं। सर्वत्र लोग उनकी प्रशंसा करते हैं और उनके आचरण का अनुकरण भी करते हैं। ऐसे ही सच्चरित्र परिवारों से निकल कर जब कोई व्यक्ति सरकारी विभागों में जाकर नौकरी करता है तो वह अपने घर के पवित्र संस्कारों को लेकर वहां बैठता है।
यदि पारिवारिक पृष्ठभूमि इस प्रकार की है तो ऐसा व्यक्ति दूत कार्य के लिए अच्छा नहीं हो सकता। इसका अभिप्राय है कि हमारे ऋषियों को राजनीति शास्त्र के संबंध में यह भली प्रकार ज्ञात था कि राजनीति में भी पारिवारिक संस्कार व्यक्ति का पीछा करते हैं। इसलिए महत्वपूर्ण पदों पर पारिवारिक पृष्ठभूमि को निश्चित ही खंगाल लेना चाहिए। एक उत्तम दूत के बारे में महर्षि दयानंद जी द्वारा दी गई व्यवस्था पर यदि चिंतन करें तो पता चलता है कि वह किसी तपस्वी से कम नहीं होता। उसे शास्त्रों का विशद ज्ञान होना चाहिए। तभी वह दूसरे के हृदय की बात को जानने वाला हो सकता है। दूत को राजकाज में अत्यंत उत्साही होना चाहिए। उसका आचरण प्रीति युक्त हो अर्थात सबके साथ प्रीति पूर्वक विनम्रता के साथ बात करने वाला हो। दूत के लिए आवश्यक है कि वह निष्पक्ष, पवित्र आत्मा, चतुर, बहुत समय की बात को भी न भूलने वाला हो। देश और कालानुकूल वर्तमान का कर्त्ता, सुंदर रूपयुक्त ,निर्भय और बड़ा वक्ता हो, वही राजा का दूत होने में समर्थ है।

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