ज्ञानी भक्त और पितरों के रूप में पूज्य होने के बावजूद कौवे को समाज में उचित स्थान नहीं

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आचार्य (डा.) राधे श्याम द्विवेदी
चतुर चालाक पक्षी:-
कौआ काले रंग का एक पक्षी है , जो कर्ण कर्कश ध्वनि ‘काँव-काँव’ करता है। उसे बहुत उद्दंड, धूर्त तथा चालाक पक्षी माना जाता है। बिगड़ रहे पर्यावरण की मार कौओं पर भी पड़ी है। कौओं का दिमाग लगभग उसी तरीके से काम करता है, जैसे चिम्पैन्जी और मानव का। ये लोगों की नज़र में अछूत हैं, पर इतने चतुर-चालाक होते हैं कि चेहरा देखकर ही जान लेते हैं कि कौन खुराफाती और कौन दोस्त हो सकता है। अपनी याददाश्त के बल पर कौवे अपने लिए सुरक्षित रखे गए भोजन के बारे में भी याद रखते हैं, जिसको भूख लगने पर वे प्रयोग कर लेते हैं। कौवों को अपने यहाँ मुंडेर पर बैठकर काँव-काँव करने वाले कौवे को संदेश-वाहक भी माना जाता है। कौवे का सिर पर बैठना बुरा माना जाता है और इसको टोने के रूप में प्रचारित किया जाता है।
काक भुसुंडी उत्तम कोटि के ज्ञानी भक्त:-
योग वशिष्ठ में काक भुसुंडी की चर्चा है, रामायण में भी सीता के पांव पर जयंत द्वारा कौवे के रूप में चोंच मारने का प्रसंग आया है। भगवान शंकर के मुख से निकली श्रीराम की यह पवित्र कथा ‘अध्यात्म रामायण’ के नाम से विख्यात है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में लिखा है कि काकभुशुण्डि परमज्ञानी रामभक्त हैं। पूर्व के एक कल्प में कलियुग का समय चल रहा था। उसी समय काकभुशुण्डि जी का प्रथम जन्म अयोध्या पुरी में एक शूद्र के घर में हुआ। उस जन्म में वे भगवान शिव के भक्त थे किन्तु अभिमान पूर्वक अन्य देवताओं की निन्दा करते रहते थे।
एक बार अयोध्या में अकाल पड़ जाने पर वे उज्जैन चले गये। वहाँ वे एक दयालु ब्राह्मण की सेवा करते हुये उन्हीं के साथ रहने लगे। वह ब्राह्मण भगवान शंकर के बहुत बड़े भक्त थे किन्तु भगवान विष्णु की निन्दा कभी नहीं करते थे। उन्होंने उस शूद्र को शिव जी का मन्त्र दिया था। मन्त्र पाकर उस शूद्र का अभिमान और भी बढ़ गया। वह अन्य द्विजों से ईर्ष्या और भगवान विष्णु से द्रोह करने लगा था। उसके इस व्यवहार से उनके गुरु अत्यन्त दुःखी होकर उसे श्री राम की भक्ति का उपदेश दिया करते थे।
एक बार उस शूद्र ने भगवान शंकर के मन्दिर में अपने गुरु, (अर्थात् जिस ब्राह्मण के साथ वह रहता था) , का अपमान कर दिया। इस पर भगवान शंकर ने आकाशवाणी करके उसे शाप दे दिया — “रे पापी! तूने गुरु का निरादर किया है इसलिए तू सर्प की अधम योनि में चला जा और सर्प योनि के बाद तुझे 1000 बार अनेक योनि में जन्म लेना पड़े।” गुरु बड़े दयालु थे इसलिये उन्होंने शिव जी की स्तुति करके अपने शिष्य के लिये क्षमा प्रार्थना की।
गुरु के द्वारा क्षमा याचना करने पर भगवान शंकर ने आकाशवाणी करके कहा, “हे ब्राह्मण! मेरा शाप व्यर्थ नहीं जायेगा। इस शूद्र को 1000 बार जन्म अवश्य ही लेना पड़ेगा किन्तु जन्मने और मरने में जो दुःसह दुःख होता है वह इसे नहीं होगा और किसी भी जन्म में इसका ज्ञान नहीं मिटेगा। इसे अपने प्रत्येक जन्म का स्मरण बना रहेगा जगत् में इसे कुछ भी दुर्लभ न होगा । इसकी सर्वत्र अबाध गति होगी ।मेरी कृपा से इसे भगवान श्री राम के चरणों के प्रति भक्ति भी प्राप्त होगी।” इसके पश्चात् उस शूद्र ने विन्ध्याचल में जाकर सर्प योनि प्राप्त किया। कुछ काल बीतने पर उसने उस शरीर को बिना किसी कष्ट के त्याग दिया । वह जो भी शरीर धारण करता था उसे बिना कष्ट के सुखपूर्वक त्याग देता था, जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र को त्याग कर नया वस्त्र पहन लेता है। प्रत्येक जन्म की याद उसे बनी रहती थी। श्री रामचन्द्र जी के प्रति भक्ति भी उसमें उत्पन्न हो गई।
लोमश ऋषि के शाप से कौवे का स्वरूप मिला :-
अन्तिम शरीर उसने ब्राह्मण का पाया। ब्राह्मण हो जाने पर ज्ञानप्राप्ति के लिये वह लोमश ऋषि के पास गया। जब लोमश ऋषि उसे ज्ञान देते थे तो वह उनसे अनेक प्रकार के तर्क-कुतर्क करता था। उसके इस व्यवहार से कुपित होकर लोमश ऋषि ने उसे शाप दे दिया कि जा तू चाण्डाल पक्षी (कौआ) हो जा। वह तत्काल कौआ बनकर उड़ गया। शाप देने के पश्चात् लोमश ऋषि को अपने इस शाप पर पश्चाताप हुआ और उन्होंने उस कौए को वापस बुला कर राममन्त्र दिया तथा इच्छा मृत्यु का वरदान भी दिया। कौए का शरीर पाने के बाद ही राममन्त्र मिलने के कारण उस शरीर से उन्हें प्रेम हो गया और वे कौए के रूप में ही रहने लगे तथा काकभुशुण्डि के नाम से विख्यात हुए। लोमश ऋषि के शाप के चलते काकभुशुण्डि कौवा बन गए थे। लोमश ऋषि ने शाप से मु‍क्त होने के लिए उन्हें राम मंत्र और इच्छामृत्यु का वरदान दिया। कौवे के रूप में ही उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन व्यतीत किया।
गरुण का भ्रम कागभुशुण्डि द्वारा दूर हुआ था:-
रावण के पुत्र मेघनाथ ने राम से युद्ध करते हुये जब राम को नागपाश से बाँध दिया था। देवर्षि नारद के कहने पर गरूड़, जो कि नागभक्षी थे, ने नागपाश के समस्त नागों को प्रताड़ित कर राम को नागपाश के बंधन से छुड़ाया था। राम के इस तरह नागपाश में बँध जाने पर राम के परमब्रह्म होने पर गरुड़ को सन्देह हो गया। गरुड़ का सन्देह दूर करने के लिये देवर्षि नारद उन्हें ब्रह्मा जी के पास भेजा। ब्रह्मा जी ने उनसे कहा कि तुम्हारा सन्देह भगवान शंकर दूर कर सकते हैं। भगवान शंकर ने भी गरुड़ को उनका सन्देह मिटाने के लिये काकभुशुण्डि जी के पास भेज दिया। अन्त में काकभुशुण्डि जी ने राम के चरित्र की पवित्र कथा उत्तराखंड के काक भुसुंडी ताल की घाटी में सुना कर गरुड़ के सन्देह को दूर दिया था।
गरुण पुराण में कौवा पितर के रूप में पूज्य:-
भारत में श्राद्ध, तर्पण के जरिए पितरों को संतुष्ट किया जाता है। श्राद्ध पक्ष में नियम है कि इसमें पितरों के नाम से जल और अन्न का दान किया जाता है और उनकी नियमित कौएं को भी अन्न जल दिया जाता है। श्राद्ध के समय लोग अपने पूर्वजों को याद करके यज्ञ करते हैं और कौए को अन्न जल अर्पित करते हैं। कौए को यम का प्रतीक माना जाता है। गरुण पुराण के अनुसार, अगर कौआ श्राद्ध को भोजन ग्रहण कर लें तो पितरों की आत्मा को शांति मिलती है। साथ ही ऐसा होने से यम भी खुश होते हैं और उनका संदेश उनके पितरों तक पहुंचाते है।
यम ने कौवे को वरदान दिया था तुमको दिया गया भोजन पूर्वजों की आत्मा को शांति देगा। पितृ पक्ष में ब्राह्मणों को भोजन कराने के साथ साथ कौवे को भोजन करना भी बेहद जरूरी होता है। कहा जाता है कि इस दौरान पितर कौवे के रूप में भी हमारे पास आते हैं।
श्राद्ध में कौए का महत्त्व :-
भारत में हिन्दू धर्म में श्राद्ध अनुष्ठान पूरा करने के लिए कौए तलाशने से कम मिलते हैं। श्राद्ध पक्ष के समय कौओं का विशेष महत्त्व है और कौए के विकल्प के रूप में लोग बंदर, गाय और अन्य पक्षियों को भोजन का अंश देकर श्राद्ध अनुष्ठान पूरा करते हैं। प्रत्येक श्राद्ध के दौरान पितरों को खाना खिलाने के तौर पर सबसे पहले कौओं को खाना खिलाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि व्यक्ति मर कर सबसे पहले कौए का जन्म लेता है। मान्यता है कि कौओं को खाना खिलाने से पितरों को खाना मिलता है। जो व्यक्ति श्राद्ध कर्म कर रहा है, वह एक थाली में सारा खाना परोसकर अपने घर की छत पर जाता है और ज़ोर-ज़ोर से कोबस ‘कोबस’ कहते हुए कौओं को आवाज़ देता है। थोडी देर बाद जब कोई कौआ आ जाता है तो उसको वह खाना परोसा जाता है। पास में पानी से भरा पात्र भी रखा जाता है। जब कौआ घर की छत पर खाना खाने के लिए आता है तो यह माना जाता है कि जिस पूर्वज का श्राद्ध किया गया है, वह प्रसन्न है और खाना खाने आ गया है। कौए की देरी व आकर खाना न खाने पर माना जाता है कि वह पितर नाराज़ है और फिर उसको राजी करने के उपाय किए जाते हैं। इस दौरान हाथ जोड़कर किसी भी ग़लती के लिए माफ़ी माँग ली जाती है और फिर कौए को खाना खाने के लिए कहा जाता है। जब तक कौआ खाना नहीं खाता, व्यक्ति के मन को प्रसन्नता नहीं मिलती।
जयंत के भ्रम का निवारण:-
एक और मान्यता प्रचलित है कहा जाता है कि एक बार कौवे ने माता सीता के पैरों में चोंच मार दी थी। इसे देखकर श्री राम ने अपने बाण से उसकी आंखों पर वार कर दिया और कौए की आंख फूट गई। कौवे को जब इसका पछतावा हुआ तो उसने श्रीराम से क्षमा मांगी तब भगवान राम ने आशीर्वाद स्वरुप कहा जो कौवे को भोजन कराएगा वह अन्न उसके पितरों को तृप्त करेगा।यह कौवा कोई और नहीं इंद्र के पुत्र जयंत थे।
फिर भी कौवा प्रिय नहीं :-
इतनी महत्ता होने के बावजूद आम जन मानस में कौवे के प्रति सम्मान का भाव नही देखा जाता है। काला रूप, कर्कस आवाज और अवांछित स्थल पर विष्टा त्यागने के कारण लोग उसे पास रुकने नहीं देते और तुरन्त दूर भगाने के लिए प्रयास करने लगते हैं।हमारे समाज में पूज्य और उपयोगी जनों को भी सम्मान नहीं मिलता है।लोग मीठी बातों में आकर अवांछित जनों के चक्कर में फंस कर अपना और समाज का नुकसान कर देते हैं।पूज्य विद्वत जन इस दंस को झेलने के लिए मजबूर हो जाते हैं। समाज में पसरी इस समस्या का सम्यक निदान किया जाना चाहिए।

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