दिल्ली और पंजाब की जनता को मूर्ख बनाने के बाद केजरीवाल की नजर अब प्रधानमंत्री की कुर्सी पर

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उगता भारत ब्यूरो

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल अब देश के प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं। इस बात में कोई संशय नहीं रह गया है। हालांकि यह जानकर इस रेस में लगे दूसरे कई दावेदारों के हौसले ठंडे भी पड़ सकते हैं। आम आदमी अब खास आदमी होना चाहता है। दरअसल, गौर करें तो केजरीवाल के दिल में कई हसरतें रूपाकार ले रही हैं। एक तरफ वो देशभर में आम आदमी पार्टी का अखंड साम्राज्य का सपना देख रहे हैं तो दूसरी तरफ खुद के देश के प्रधानमंत्री पद पर आरूढ़ होने का। गोवा, गुजरात, उत्तराखंड, हिमाचल आदि कई राज्यों में ज़ोर-आज़माइश में लगे ही हुए हैं। पंजाब में दो कोशिशों के बाद सत्ता पर काबिज़ होने के उपरांत तो उनके हौसलों ने नई परवाज़ ली है। हालांकि खुद पर और उनके साथियों पर लग रहे तमाम तरह के आरोपों-प्रत्यारोपों ने उनके उड़ते पंछी की पूंछ पर पांव रखा हुआ है तो भी उनकी कोशिश जारी है।

बहरहाल, केजरी जी के मन में पीएम की गद्दी की गुदगुदी होती है, इसकी पुष्टि के लिए दो बातों पर गौर करने की ज़रूरत है। इन दो बातों को ठीक से समझ लिया तो सारी गुंजल दूर हो जाएगी। मामले के जाले साफ हो जाएंगे। पहला, केजरी जी के राइट हैंड मनीष सिसोदिया का बयान। दूसरा, केजरी जी के खुद के बयान के निहितार्थ। दोनों के बयानों को ज़रा विपरीत क्रम में लेते हैं। पहले हम लेते हैं केजरीवाल के बयान को। वह कहते चले आ रहे हैं कि पीएम बनने की मेरी ‘अभी’ कोई योजना नहीं है। यहां ‘अभी’ शब्द पर गौर किया जाना चाहिए। उन्होंने यह नहीं कहा कि मैं पीएम बनना ही नहीं चाहता। उन्होंने कहा ‘अभी’ नहीं। अभी नहीं का मतलब कभी नहीं, नहीं है। यानी कभी-न-कभी ज़रूर बनना चाहता हूं। अब पंडित लोग (राजनीतिक पंडित) कहेंगे कि जो राजनीति में आया है, वह कभी-न-कभी सर्वोच्च शिखर तक पहुंचने की कामना/लालसा रखकर ही आता है। उसमें नई बात क्या है?

ठीक है भई, अगर आपको बनना ही है और सबको जब घुमा-फिराकर यह मेसेज पास करवा भी रहे हैं तो ना-नुकुर का नाटक क्यों? खासकर, तब जब विपक्षी एकता के पैरोकार कई और लोग भी अपनी दावेदारियां बनाने में जुटे हुए हैं। ‘पहले वार करे सो वीर’ के सिद्धांत के अनुसार, जितनी जल्दी हो अपने इरादे स्पष्ट कर देना अच्छा रहता है वरना अभी नहीं तो कभी नहीं वाला मामला भी हो जाता है कई बार। और सब गोल-गुपाड़ा। राजनीति के पूर्व दिग्गज चौधरी देवीलाल के साथ क्या हुआ था? दरअसल, यह मिडिल क्लास सिंड्रोम है। हम मिडिल क्लास वाले मन में हसरतें तो सारी रखते हैं, पाना भी बहुत कुछ चाहते हैं पर, संकोच करते हैं कि लोग क्या कहेंगे। जब नाचन लगे तो घूंघट कैसा? खैर।

दूसरी पुष्टि मनीष सिसोदिया के बयान से होती है। उनका बयान तो शीशे की तरह साफ है। सबकुछ ओपन। उसमें छिपाने को कुछ बचा ही नहीं। जो बात केजरी जी नहीं कह पा रहे थे, वह मनीष ने उजागर कर ही दी। पोटली खोल ही दी। पिछले कई दिनों से विवादों में फंसे दिल्ली के उपमुख्यमंत्री ने एक मीडिया बयान में कह ही दिया कि अगला चुनाव मोदी बनाम केजरीवाल होगा। बिल्कुल स्पष्ट। यह सुनकर तो किसी के मन में बची-खुची शंका भी दूर हो जानी चाहिए।

केजरीवाल के मन में पीएम बनने के बुलबुले तो उठ रहे हैं जिसे मनीष सिसोदिया के बयान ने बिल्कुल साफ कर दिया है। जबकि केजरी जी कहते चले आ रहे हैं कि नही मेरी तो अभी ऐसी कोई योजना नहीं है। सिसोदिया ने साफ कर दिया कि 2024 लोकसभा का चुनाव मोदी बनाम केजरी होगा। उनका कहना है कि लोग चाहते हैं बदलाव हो। लोग अब केजरीवाल को लाना चाहते हैं।

ध्यान रहे, यह बयान किसी और का नहीं बल्कि केजरीवाल के सबसे खासमखास मनीष सिसोदिया का है। अब सबसे खास आदमी पब्लिकली कोई बात तभी कहेगा जब आपस में उनकी कोई बातचीत इस मुद्दे पर हो गई हो। सिर्फ बात ही नहीं हो गयी हो बल्कि ऐसी कोई मंशा या योजना बन भी चुकी हो। खिचड़ी पक चुकी है बस तड़का लगाना बाकी है। तब यह तो पक्का है कि केजरीवाल अपनी गद्दी का साइज बड़ा करना चाहते हैं।

वैसे पीएम बनने की मंशा उनकी तभी ज़ाहिर हो गई थी जब वो मोदी को हराने बनारस के चुनावी मैदान में ताल ठोंकने पहुंच गाए थे। उनके दिमाग में तब शायद पुराने राजा/महाराजाओं के ज़माने की नीति काम कर रही थी कि अगर सेनापति हार जाएगा तो सेना भी तितर-बितर हो ही जाएगी। उसे हराना तब कौन-सी बड़ी बात रह जाएगी। फिर, पब्लिक में भी मेसेज चला जायेगा कि जो मोदी को हरा सकता है उसमें पीएम बनने का माद्दा तो होगा ही। अब पब्लिक का क्या है साहब, वह तो चश्मे की एक आंख से ही देखती है आमतौर पर। जो दिखा दो उसे। पर, किसी को भी यह नहीं भूलना चाहिये कि टाइम मिलने पर पब्लिक चश्मे की दूसरी आंख का इस्तेमाल भी कर लेती है। फिर वह किसी के नियम-कायदे-कानून नहीं सुनती ।
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