पुस्तक समीक्षा : झरने जज्बातों के ( गजल एवं कविता संग्रह)

‘झरने जज्बातों के’ पुस्तक गजल और कविताओं का संग्रह है, जिसके लेखक अमन लेखरा ‘अमन’ हैं। अमन जी ने अपनी यह पुस्तक उर्दू मिश्रित हिंदी में लिखी है। हिन्दी के लिए समर्पित होकर काम करने वाले कवि और लेखकों के लिए यही आज की काव्य शैली भी बन चुकी है। इसके साथ साथ पाठक भी इसी प्रकार की काव्य शैली को पसंद करते हैं। इस प्रकार पुस्तक वर्तमान संदर्भ में पाठकों की रूचि के अनुसार लिखी गई है। उन्होंने अपने इस कविता संग्रह में मंगलाचरण करते हुए लिखा है :-

हे विश्वात्मा !हे निराकार !
देवाधिदेव ! हे जगदीश्वर !
वरदान जगत को दो ऐसा
ना विघ्न रहे इस अवनी पर।

इस कविता संग्रह में जहां उन्होंने विभिन्न 42 विषयों पर अपनी कविताएं लिखी हैं, वहीं राजस्थान के 33 जिलों को समर्पित ‘जिला दर्शन खंड’ प्रस्तुत करके पुस्तक को बहुत ही रुचिकर और संग्रहणीय भी बना दिया है। प्रत्येक जिले की विशेषता और उसकी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्ता को प्रकट करने वाली ये 33 कविताएं जहां हमारा कविता के रूप में मार्गदर्शन करती हैं, वहीं बहुत सारा ज्ञान भी हमें राजस्थान के विभिन्न जिलों के विषय में दे जाती हैं।
समाज के गिरते मूल्यों की ओर संकेत करते हुए ‘ जमाना दलाल हो गया’ नामक कविता में कवि अमन जी लिखते हैं:-

जो मूक था वह भी वाचाल हो गया।
हमने नसीहत दी तो बवाल हो गया।

पढ़ा लिखा समाज होकर भी और आधुनिकता की दौड़ में अपने आपको बहुत बेहतरीन ढंग से रखकर प्रस्तुत करने की कला में कुशल व्यक्तियों के रहते भी समाज में चारों ओर एक अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ हमें बताता है कि यहां सब कुछ ठीक-ठाक नहीं है। अपने आपको भीड़ में भी अकेला समझना वास्तव में यह मनुष्य की उन्नति का नहीं अपितु गिरावट का प्रतीक है। कवि ने बहुत सटीक बात लिखी है :-

आज हर तरफ खामोशी है हर शख्स मौन है ।
दरवाजे बंद हैं खिड़की से तकता कौन है ।
रसूखदारों की नजरें टिकी हक पर गरीब के।
बगैरत की इन सियासतों को बुनता कौन है।

खामोश शहर की दीवारें तहजीब की बखिया उधेड़ती दिखाई देती हैं। यह बात तब और भी अधिक समझ आने लगती है जब मानव ही मानव के काम न आ रहा हो और मानव ही मानव के लिए नए-नए झंझट और नए-नए क्लेश बोने में माहिर होता दिखाई दे रहा हो।

खामोश शहर की दीवारें दरकी इस कदर आज ।
जैसे कि बूढ़े बाप का आखिरी सहारा खो गया ।
अब तहजीब की उम्मीद न कीजिए जमाने से ,
जाने कहां आजकल इंसान का जमीर खो गया।

कवि ने अपने इन जज्बातों के माध्यम से जिस संदेश को देने का प्रयास किया है वह भी बहुत ही लाजवाब बन गया है :-

बचपन में देखा था जिसे अठखेलियां करते हुए।
बचपन से निकलकर वह कमसिन शबाब हो गई।
दिलो-दिमाग पर छाया नशा इस कदर उसका ,
हुस्न की मलिका छलकते जाम सी शराब हो गई।

अपनी इस पुस्तक में राजस्थान के जिला बांरा के बारे में कवि अमन लिखते हैं कि :-

बारह गांव बांरा कहलाया, सीताबाड़ी मन को भाया।
लव कुश भी यहां जन्मे थे यह सहरिया कुंभ कहाया।

अमन जी ने राजस्थान के 33 जिलों के बारे में कविता के माध्यम से उनके ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को जिस प्रकार स्पष्ट किया है उससे पुस्तक बहुत ही उपयोगी बन गई है।

यह पुस्तक साहित्यागार, धामाणी मार्केट की गली, चौड़ा रास्ता, जयपुर 302003 फोन नंबर 0141- 2310785 व4022382 द्वारा प्रकाशित की गई है । पुस्तक का मूल्य ₹300 है। पुस्तक की कुल पृष्ठ संख्या 172 है।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक :उगता भारत

डॉ॰ राकेश कुमार आर्य

मुख्य संपादक, उगता भारत

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