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छूटे हुए कारतूसों का बंडल

janta parivar ka mahavilayजनता परिवार के छह टुकड़े याने छह दल अब एक हो गए हैं। ये छह दल सिर्फ चार राज्यों में सीमित हैं। उ.प्र., बिहार, कर्नाटक और हरियाणा! यदि ये दल इसीलिए एक हो रहे हैं कि ये भाजपा को टक्कर देंगे तो पहले जरा देखें कि इन चारों प्रांतों के अलावा क्या अन्य प्रांतों में ये अपना खाता खोलने में भी समर्थ हैं या नहीं? जाहिर है कि नहीं हैं। तो फिर इनकी टक्कर कैसी होगी? वह अखिल भारतीय नहीं हो सकती। वह प्रांतीय टक्कर होगी। वास्तव में वह टक्कर नहीं, टक्करें होंगी। सबसे बड़ी बात यह कि हर प्रांतीय टक्कर के सिपहसालार भी अलग-अलग होंगे। याने बिहार में नीतीश होंगे। वहां मुलायमसिंह और देवगौड़ा को कौन पूछेगा? उप्र में मुलायमसिंह होंगे। वहां चौटाला और कमल मोरारका की क्या चलेगी? कर्नाटक में देवगौड़ा होंगे।

वहां नीतीश और मुलायम की कौन सुनेगा? कहने का मतलब यह है कि छह दलों का नामपट तो एक हो गया है लेकिन जब तक पांच-छह दुकानें अलग-अलग नहीं लगेंगी, इनका माल कौन खरीदेगा? इसके अलावा इन छह दलों का वैचारिक आधार शून्य है। ये दल विचारधारा पर नहीं, व्यक्तिधारा पर आधारित हैं। ये छह प्राइवेट लिमिटेड कंपनियां हैं। पहले हर कंपनी में मालिक के अलावा उसकी पत्नी, बेटा, बहू, भाई-भतीजे वगैरह डायरेक्टर बना दिए गए थे। अब उन सबको एक दल में कैसे निभाया जाएगा? छह दलों के अब 36 महासचिव कैसे एक दल में भरे जाएंगे? हर दल का नेता अपने आपको प्रधानमंत्री के लायक समझता है। देवगौड़ा तो प्रधानमंत्री रह भी चुके हैं। मुलायमसिंह सबसे वरिष्ठ हैं, अनुभवी हैं और विख्यात हैं लेकिन वे इन छह अहंकार के गुब्बारों को जोड़कर उनसे एक झंडा कैसे बनाएंगे?

मान लें कि राज्यसभा में 30 और लोकसभा में इस नए दल के 15 सदस्य एकजुट हो जाएंगे। लेकिन एकजुट होकर वे करेंगे क्या? सिर्फ सरकार का विरोध? क्या इसके अलावा उनके पास देश को बदलने का कोई ठोस नक्शा है? यदि हो तो वे चमत्कार कर सकते हैं जैसे कि डॉ. लोहिया की संसोपा के सिर्फ छह-सात सदस्य ही इंदिरा सरकार की खाट खड़ी रखते थे। कांग्रेस तो अस्त होता हुआ सूर्य है। यह नई पार्टी उसकी जगह नया उजाला कर सकती है लेकिन यह यदि सिर्फ भाजपा विरोध पर आधारित रही तो वह भाजपा पर अंकुश लगाकर उसका और देश का तो फायदा कर देगी लेकिन खुद छूटे हुए कारतूसों का बंडल बनकर रह जाएगी।

पिछले पचास साल में भारत बहुत बदल गया है। उसकी समस्याएं बदल गई हैं। उसके समाधान बदल गए हैं। जनता परिवार के ये नेता अब तक जातिवाद की ढोलकर बजा-बजाकर अपनी नौटंकी सजाए हुए हैं। वे गांधी, लोहिया और जयप्रकाश को तो भूल ही गए हैं। उनके पास अपने कोई मौलिक विचार भी नहीं हैं। वे इतिहास के कहार बन गए हैं। अन्य नेताओं की तरह वे सत्ता की पालकियां ढो रहे हैं। वे छूटे हुए कारतूस हैं। उनमें विचार की बारुद कौन भरेगा?

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