*1857 की क्रांति के अज्ञात और भूले- बिसरे नायक

राष्ट्रीय संगोष्ठी *

इतिहास विभाग, मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय , उदयपुर (राजस्थान) द्वारा “1857 की क्रांति के अज्ञात और भूले- बिसरे नायक” नामक विषय पर 26-27 अगस्त 2022 को दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया जाना प्रस्तावित है। आधुनिक भारत के इतिहास में 1857 की क्रांति ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध एक अभूतपूर्व युद्ध घोष था। अंग्रेजी कंपनी की शोषणकारी नीतियों का प्रतिकूल प्रभाव भारत के सभी वर्गो पर पड़ा। इस कारण भारतीयों में कंपनी सत्ता के खिलाफ आक्रोश पनप रहा था, परिणामस्वरूप यह क्रांति हुई।
1857 की क्रांति भारतीय इतिहास में एक निर्णायक मोड़ है, जिसने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध जनमानस को उद्वेलित करने में प्रमुख भूमिका निभाई थी। भारत के इतिहास की अहम घटना होनें के बावजूद इतिहास लेखन में इसका एक पक्षीय चित्रण ही हुआ। औपनिवेशिक इतिहासकारों एवं उनकी दृष्टि से लिखे गए इतिहास में क्रांतिकारियों की भूमिका, तत्कालीन परस्थितियाँ और उनकी मनः स्थिति आदि दिखाई नहीं पड़ते हैं। यद्यपि इतिहास लेखन में ‘इतिहास को नीचे से देखने’ और ‘जनसामान्य का इतिहास’ लिखने की प्रवृत्ति के तहत 1857 की क्रांति के जनवादी स्वरूप को सामने लाया गया है। इसकी शताब्दी वर्ष के अवसर पर पी. सी. जोशी ने ‘ रेबेलियन 1857’ में लोकगीतों के माध्यम से आमजन की भागीदारी का उल्लेख किया। एरिक स्टॉक्स ने अंतरक्षेत्रीय एवं क्षेत्रीय स्वरूप का मूल्यांकन कर जन प्रतिरोध को उजागर किया। रुद्रांशु मुखर्जी ने तो सिपाहियों को वर्दीधारी किसानों की संज्ञा दी है। गौतम भद्र और शाहिद अमीन आदि इतिहासकारों ने इस दिशा में कार्य कर क्रांति के जन संघर्ष को सामने लाने का प्रयास किया है किंतु अभी भी ऐसे कई गुमनाम क्रांतिकारी है जिन्होंने क्रांति की अग्नि को प्रज्ज्वलित करने हेतु स्वयं को स्वाहा कर दिया । ऐसे ही क्रांतिकारियों में मेरठ के कोतवाल धनसिंह, मुज्जफरनगर की आशादेवी, आगरा से सूबा देवहंस, रेवाडी के राव तुलाराम, गोरखपुर के गजाधर् सिंह, कटहैडा से उमराव सिंह, ग्वालियर के जनमैद सिंह, पलोद (टोंक) के गुलाम मोइनउद्दीन, कोटा के हीरा सिंह आदि प्रमुख है। इन अल्पज्ञात और गुमनाम क्रांति नायकों को याद किये बिना 1857 की क्रांति की दास्तां अधूरी है।
1857 की क्रांति पर विपुल साहित्य उपलब्ध है जिस पर कार्य तो हुआ है, परंतु आमजन के योगदान पर अभी बहुत कार्य होना शेष है। राष्ट्रीय स्तर पर सन् सत्तावन की क्रांति पर निरंतर जारी शोध से इसका जनवादी स्वरूप सामने आया है और इसी दिशा में आगे बढ़ते हुए भारत के भूले बिसरे क्रांति जन नायकों के योगदान को इतिहास में दर्ज करवाना ही संगोष्ठी का उद्देश्य है।
*उप- विषय*
1.1857 की क्रांति का लीडर : धनसिंह कोतवाल ।
2. मेरठ एवं आस- पास के गाँवों का योगदान।
3. क्रांति में किसानों की भूमिका
4. जनजातीय समुदाय और 1857 की क्रांति।
5. दलित और मजदूर वर्ग की भूमिका।
6. दोआब इलाके में क्रांति का विस्तार।
7. राजस्थान में 1857 की क्रांति।
8. 1857 की क्रांति मे आमजन का योगदान।
9. महिला क्रांतिकारियों की भूमिका।
10. भारतीय शासक वर्ग और 1857 की क्रांति।
11. दिल्ली और आस-पास का क्षेत्र तथा 1857 की क्रांति।
12. दक्षिण भारत में क्रांति का प्रभाव।
13. उत्तर-पूर्व भारत में क्रांति का प्रभाव।
उक्त अथवा अट्ठारह सौ सत्तावन से संबंधित विषयों पर शोधपत्र आमंत्रित हैं।
*नोट*:
1. शोधपत्र वाचन के लिए abstract 10 जुलाई 2022 तथा full paper 10 अगस्त 2022 तक अवश्य भेजें। e-mail- [email protected]
2. शोध पत्र के लिए हिन्दी में कृति देव 010 एवं अँग्रेजी में NEW ROMAN ENGLISH फोंट का प्रयोग करें।
3. रजिस्ट्रेशन नीचे दिए गूगल फॉर्म से कराएं।
https://forms.gle/gBdMGhs2wW8V68cN9
4. रजिस्ट्रेशन फीस ऑन द स्पॉट जमा करवाने की सुविधा रहेगी।
*आयोजन समिति*
प्रो.(श्रीमती) दिग्विजय भटनागर, विभागाध्यक्ष
डॉ. कैलाश चंद गुर्जर, संगोष्ठी संयोजक
डॉ. मनीष श्रीमाली, आयोजन सचिव
प्रो. प्रतिभा,आचार्य
डॉ. पीयूष भादविया, सहायक आचार्य
इतिहास विभाग, मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर (राजस्थान)
*संपर्क सूत्र*
डॉ. कैलाश चंद गुर्जर 9929089995
डॉ. मनीष श्रीमाली 8005816971

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