“आचार्य सत्यानन्द वेदवागीश जी की पुस्तक दयानन्द-दृष्टान्त-निधि” -मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।

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ओ३म्
हम वर्ष 2018 के परोपकारिणी सभा के उत्सव ऋषि मेले में देहरादून निवासी वैदिक विद्वान डा. कृष्णकान्त वैदिक जी के साथ गये थे। वहां हमने अनेक विद्वानों सहित आचार्य सत्यानन्द वेदवागीश जी के भी दर्शन किये थे। वहां एक दिन आचार्य जी की पुस्तक ‘दयानन्द-दृष्टान्त-निधिः’ निःशुल्क वितरित की गई थी। इसकी एक प्रति हमारे पास है। कल हमारी इस पुस्तक पर दृष्टि गई। विचार आया कि इस पुस्तक पर भी परिचय कुछ शब्द लिख देते हैं। पुस्तक में कुल 241 पृष्ठ है। पुस्तक के दो भाग वा खण्ड हैं। प्रथम खण्ड ‘स्वामी दयानन्द कृत ग्रन्थों से संकलित दृष्टान्त’ का हैं तथा उत्तर खण्ड में ‘स्वामी दयानन्द सरस्वती का संक्षिप्त जीवन-चरितः एक अकल्पित महादृष्टान्त’ नाम से दिया गया है। इस पुस्तक के संकलयिता-सम्पादक, प्रकाशक आचार्य सत्यानन्द वेदवागीश जी हैं। पुस्तक की यह दूसरी आवृत्ति है जिसका प्रकाशन विक्रमी संवत् 2072 में हुआ है। पुस्तक का मूल्य रुपये 90.00 है।

पुस्तक के आरम्भ में ‘निवेदन’ शीर्षक से आचार्य जी ने पुस्तक के विषय में अपनी बात कही है जो पढ़ने योग्य है। स्वामी दयानन्द जी के विषय में विद्वान लेखक ने लिखा है कि “स्वामी दयानन्द सरस्वती ने सहस्रों वर्षों बाद वैदिक-धर्म की पुनः प्रतिष्ठापना की। उन्होंने वैदिक सत्य सिद्धान्तों को सिद्ध करने के लिये, उन्हें साधारण बुद्धिगम्य बनाने क लिये और अन्धविश्वासों, पाखण्डों तथा कुरीतियों के निराकरण के लिये अपने प्रवचनों, उपदेशों और ग्रन्थों में अनेक स्थानों पर दृष्टान्तों का समावेश किया है। वे दृष्टान्त इतने सटीक एवं उपादेय हैं, कि उनके कारण वह-वह विषय तत्काल हृदयंगम हो जाता है।”

निवेदन के बाद पुस्तक ‘‘दयानन्द-प्रशस्तिः” शीर्षक से श्री रामदास छबीलदास वर्मा, कैम्ब्रिज, इंग्लैण्ड रचित संस्कृत के चार श्लोक उनके हिन्दी अनुवाद सहित दिये गये हैं जो पढ़ने योग्य हैं। इस दयानन्द-प्रशस्तिः के बाद पुस्तक की विस्तृत अनुक्रमणिका है जो कि 13 पृष्ठों की है। पुस्तक से ‘‘कर्मकर्ता ही फलभोक्ता” विषयक एक दृष्टान्त प्रस्तुत कर रहे हैं।

शीर्षक कर्मकर्ता ही फलभोक्ता

(स्वामी जी लिखते हैं कि ईश्वर, जीव और प्रकृति ये तीन पदार्थ नित्य हैं। जीव ईश्वर द्वारा निर्मित नहीं है। वह भी अनादि है। वह जैसे कर्म करता है, वैसे फल ईश्वर-व्यवस्था से पाता है। -आचार्य सत्यानन्द वेगवागीश)

प्रश्न-जो परमेश्वर जीव को न बनाता और सामथ्र्य न देता तो जीव कुछ भी न कर सकता। इसलिये परमेश्वर की प्रेरणा ही से जीव कर्म करता है।

उत्तर- जीव उत्पन्न कभी न हुआ, अनादि है। जैसा ईश्वर और जगत् का उपादान कारण नित्य है। और जीव का शरीर तथा इन्द्रियों के गोलक परमेश्वर के बनाये हुए हैं, परन्तु वे सब जीव के आधीन हैं। जो कोई मन, कर्म, वचन से पाप-पुण्य करता है वही भोक्ता है, ईश्वर नहीं।

जैसे किसी कारीगर ने पहाड़ से लोहा निकाला, उस लोहे को किसी व्यापारी ने लिया, उसकी दुकान से लोहार ने ले तलवार बनाई, उससे किसी सिपाही ने तलवार ले ली, फिर उससे किसी को मार डाला। अब यहां जैसे वह लोहे को उत्पन्न करने, उससे लेने, तलवार बनाने वाले और तलवार को पकड़ कर राजा दंड नहीं देता, किन्तु जिसने तलवार से मारा वही दंड पाता है। इसी प्रकार शरीरादि की उत्पत्ति करने वाला परमेश्वर उनके कर्मों का भोक्ता नहीं होता, किन्तु जीव को भुगानेवाला होता है। जो परमेश्वर कर्म कराता होता, तो कोई जीव पाप नहीं करता, क्योंकि परमेश्वर पवित्र और धार्मिक होने से किसी जीव को पाप करने में प्रेरणा नहीं करता। इसलिये जीव अपने काम करने में स्वतन्त्र है। जैसे जीव अपने कामों के करने में स्वतन्त्र है वैसे ही परमेश्वर भी अपने कर्मों के करने में स्वतन्त्र है।।
(सत्यार्थप्रकाश, सप्तम समुल्लास, पृष्ठ 136)

पुस्तक के सभी दृष्टान्त पढ़ने योग्य हैं। आचार्य जी ने इस पुस्तक को लिखकर पाठकों के लिए अत्यन्त उपकार का कार्य किया है। हमारा कर्तव्य है कि हम इस पुस्तक का अध्ययन करें और इससे लाभ उठायें।

पुस्तक पृष्ठ 236 पर समाप्त होती है। इसके बाद परिशिष्ट-1 में स्वामी दयानन्द सरस्वती कृत ग्रन्थों का परिचय दिया गया है। पुस्तक में स्वामी जी की कुल 26 पुस्तकों का परिचय है। पुस्तक में परिशिष्ट-2 में उन प्रकाशकों की सूची दी गई हैं जहां से स्वामी दयानन्द सरस्वती के ग्रन्थ तथा अन्य वैदिक साहित्य प्राप्त किया जा सकता है। पुस्तक के आवरण के अन्तिम बाहरी पृष्ठ पर ग्रन्थकार आचार्य सत्यानन्द वेदवागीश जी रचित एवं सम्पादित 17 ग्रन्थों की सूची पृष्ठ-संख्या एवं मूल्य सहित दी गई है।

लेखक का ग्रन्थ ‘दयानन्द-दृष्टान्त-निधि’ स्वाध्याय के लिये उत्तम ग्रन्थ है। सभी पाठकों को इसका लाभ उठाना चाहिये। पुस्तक में ग्रन्थ प्राप्तव्य स्थानों की सूची भी दी गई है जो कि निम्न हैः-

1- आचार्य सत्यानन्द वेदवागीश, द्वारा जीवन प्रभाग (आर्यसमाज संचालित) सेक्टर 7, गांधीधाम (कच्छ) 370201 (गुजरात)
2- राष्ट्र सहायक विद्यालय, सेक्टर 5, जयनारायण व्यास कालोनी, बीकानेर-334004 (राजस्थान)
3- विजयकुमार गोविन्दराम हासानन्द, 4408 नई सड़क, दिल्ली-110006
4- श्री व्रतमुनि जी वानप्रस्थ, ए 13, लेखराम भवन, ऋषि उद्यान, पुस्कर रोड़, अजमेर-305001 (राजस्थान)

दिनांक 14 अप्रैल, 2019 को आचार्य सत्यानन्द वेदवागीश जी को डीएवी प्रबन्धकत्र्री समिति, दिल्ली द्वारा पूना के औंध डीएवी कालेज में आयोजित हंसराज दिवस समारोह में आमंत्रित कर उनका सम्मान किया गया था। हम भी इस कार्यक्रम में सम्मिलित हुए थे। तब हमने आचार्य जी को बहुत निकटता से देखा था। हम समझते है कि हमने वहां पूरा के महात्मा हंसराज समारोह में जो दो-तीन दिन बिताये थे और आचार्य जी के दर्शन करते रहे थे, वह समय हमारे जीवन का महत्वपूर्ण अवसर था।

हम आशा करते हैं हमारे पाठक मित्र इस विवरण को उपयोगी पायेंगे। ओ३म् शम्।
-मनमोहन कुमार आर्य
पताः 196 चुक्खूवाला-2
देहरादून-248001
फोनः 9412985121

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