यथा शक्ति संचित करो, जीवन में सत्कर्म

बिखरे मोती भाग-80 
मृत पुरुष परलोक में,
केवल जाए न आप।
उसके संग लिपटे चलें,
किए पुण्य और पाप ॥845॥
मृत पुरुष अर्थात- मृतक की जीवात्मा परलोक में केवल अकेली नहीं जाती है, अपितु उसने अपने जीवन में कितने पाप और पुण्य किए इसका लेखा-जोखा भी उसके साथ जाता है। इसलिए हे मनुष्य! जितना हो सके धर्म का संचय कर। इस लोक में ही नहीं, अपितु परलोक में भी तेरा सबसे बड़ा रक्षक होगा।
एक दिन चिता में छोडकर,
सभी सगे चले जाएँ।
जैसे सूखे वृक्ष को,
विहग छोड़ उस जाएँ ॥846॥
यह विश्व विधाता की विचित्र रचना है। यहाँ जिसका एक दिन जन्मदिवस होता है, उसी का एक मृत्यु दिवस, पुण्यतिथि भी सुनिश्चित है। मृतक को उसके सारे सगे संबंधी, माता-पिता, पुत्र, पत्नी, भाई मित्र इत्यादि एक दिन चिता में छोडकर ऐसे चले जाते हैं जैसे फल-फूल और छाया रहित सूखे पेड़ को छोडकर सभी पक्षी चले जाते हैं। भाव यह है कि संसार अपने स्वार्थ का है।
यथा शक्ति संचित करो,
जीवन में सत्कर्म।
औकात में ही अच्छा लगे,
जगत में किया धर्म ॥847॥
अर्थात जीवन में दान पुण्य अपनी सामर्थ्य के अनुसार शनै:-शनै: करते रहो जो लोग अपनी शक्ति का ध्यान रखकर धर्म के कार्यों में प्रवृत्त होते हैं, उनकी सर्वत्र प्रशंसा होती है, अन्यथा लोग उपहास करते हैं।
परमात्मा का ही अंश है,
आत्मा का ये स्वरूप।
सूरज का ही अंश है,
ज्यों जग फैली धूप ॥848॥
व्याख्या:- जिस प्रकार सूर्य की रश्मियां धूप होती है, किन्तु ये रश्मियां सूर्य नहीं होती हैं। ठीक इसी प्रकार आत्मा परमात्मा का अंश है, किन्तु आत्मा को परमात्मा समझने की भूल कभी मत करना।
ध्यान रहे, परमात्मा सर्वोच्च सत्ता है। वह प्रकृति और आत्मा का अधिष्ठाता है, प्रेरक है, तथा संयोजक है। आत्मा परमात्मा का अंश है, परंतु प्रकृति के कार्य शरीर, इंद्रियाँ, प्राण, मन आदि के साथ अपनी एकता मानकर वह जीव हो गया है। जिस दिन आत्मा को निज स्वरूप का पता चलता है तो उस दिन मनुष्य का नया सवेरा होता है। अतः सोचो – ‘मैं कौन हूँ’?
इंद्रियों की ज्योति मन,
मन की ज्योति विवेक।
विवेक की ज्योति आत्मा,
सबकी ज्योति वह एक ॥849॥
व्याख्या:- ज्योति नाम प्रकाश (ज्ञान) का है अर्थात जिनसे हमें ज्ञान मिलता है। हमारी जो पांच ज्ञानेन्द्रियां (नेत्र, जिव्हा, नासिका, कान और त्वचा हैं) इनके पांच विषय हैं- रूप, रस, गंध, शब्द और स्पर्श।
इन पांचों ज्ञानेन्द्रियों के विषयों का ज्ञान हमें तभी होता है, जब इनके साथ मन जुड़ता है, इसलिए इंद्रियों की ज्योति मन है और जब तक मन के साथ बुद्धि नहीं जुड़ती है, तब तक इंद्रियों किए विषय का स्पष्ट और स्थायी ज्ञान नहीं होता है। इसलिए मन की ज्योति बुद्धि है। बुद्धि सही और गलत का निर्णय करती है। निर्णय को धारणा करना है अथवा नहीं, इसका फैसला आत्मा करती है। इसलिए बुद्धि की ज्योति आत्मा है, किन्तु जो आत्मा को भी प्रकाशित करता है वह तो सब ज्योतियों की ज्योति केवल एक परमात्मा है।

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